Saturday, 25 January 2014

प्रकृति

धरती  की  तपती  छाती  पर,  
रिमझिम बूंदों का  टपटप पड़ना.
सूखी  भूखी  भुरभुर माटी से,
सोंधी सोंधी छौंक का उड़ना.
उमसे गुमसे गगन में बादल,  
मचल मचल गर्जन करते हैं .
अंजुली  में जलकण भर भर कर,  
वसुधा पर नर्तन करते हैं.

नव ऋतु की इस सृजन वेला में,
प्रेयसी, आओ हम छेड़े तान.
सस्वर स्वागत  करो ये सजनी,
आश्विन का ये नया विहान.
नव श्रृंगार के मधु मौसम में,
नवचेतन ने ली अंगड़ाई.
प्रकृति के नव प्रभात में,
शिशिर की सुरीली शहनाई.

शनैः शनैः अब शीत शशक का,
अम्बर में उल्लास मनाना.  
सूने फैले नीलांचल में,  
भगजोगनी संग रास रचाना.
तारक सज्जित रजत पटल पर,
चंदा का मंद मंद मुस्काना.
पवन प्रकम्पित पत्रदलों पर,
शबनम का अब लूटे खजाना.

पूनम के इस प्रेम प्रहर में,
सजनी, प्रीत के गीत सुनाना.
कल बीत जाना, फिर कल आना,
सृष्टि का ये चलन पुराना.
तपना, भींगना और ठिठुरना,
मौसम का ये ताना बाना.
जीवन चक्र ऐसे ही चलता,
उद्भव, पलना और गुजरना.

हिम तरल बन वाष्प में परिणत,
फिर तुषार का वापस पड़ना.
जगत मिथ्या ब्रह्म्-सत्यम दर्शन,
चिन्मय चिंतन चिरंतन चरना.  
नैसर्गिक पावन उपवन में,
विश्वमोहिनी,  हरदम हंसना.
मेरे हमदम हरदम हंसना, 
विश्वमोहिनी, हरदम हंसना.

       ----- विश्वमोहन