Saturday, 25 January 2014

रजत-मिलन

  

पहूंचे रूडकी के प्रांगण में
जैसे जीवन के सावन में
खुशियों के बादल छा जाये                                           
मन मयूरी मधु रास रचाये
सहपाठी मिले मनभावन
चुप चुप लौटा चपल बालपन.

वर्ष पच्चीस गत , हुए हम दीक्षित
सृजन के श्रृंगार में शिक्षित
नयी प्रेरणा से दीपित मन
 नये सपनों से हर्षित लोचन
रजत काल में ऊर्जस्वित तन
चुप चुप लौटा चपल बालपन .

वसुधा के हर खंड से आकर
मिले हृदय में हृदय समाकर
तन पुलकित है मन पुलकित है
मिलन राग से नभ गुंजित है
और स्वरित है उर में धडकन
चुप चुप लौटा चपल बालपन .

विश्वविद्यालय से विदा जो होकर
आइ आइ टी में उतर आज आये
पंचविश के काल खंड का
अतिक्रमण कर के हैं आये
भरे अंजुली में ज्ञान वो पावन
चुप चुप लौटा चपल बालपन.

जग में जहां जहां भी जाते 
रूडकी के कुल गीत सुनाते
सृजन हित जीवन नित अर्पित
धरा स्वर्ग शोभा कर निर्मित
श्रमं बिना न किमपि साध्यम
चुप चुप लौटा चपल बालपन .
 
गंगा से कौटले कलकल छलछल
गोविंद की बंशी धुन निश्छल
रवींद्र संगीत से सुर मिलाकर
सरोजिनी का कोकील कंठ पाकर 
रचा ज्ञान का स्वर सप्तक जो
मधुर ताल मिलन मनभावन
चुप चुप लौटा चपल बालपन .


रजत मिलन, फिर विरह वेला ने
शाश्वत सत्य को उकेरा है
बिछुडन है फिर मृदु मिलन है
सांझ है तो फिर सवेरा है
चरैवति चरैवति का चिन्मय चिंतन
अक्षत आर्य जीवन दर्शन है
रजत विरह के बाद शेष अभी
स्वर्ण मिलन का नवयौवन है

स्वर्ण मिलन का नवयौवन है 
फिर हीरक का चिरयौवन है.
मेरे हमदम खुश रह हरदम
तेरे साथ  विश्वमोहन है
                   -------------- विश्वमोहन