Saturday, 25 January 2014

प्रणीते का त्रास !

अमावस में रजनीश का वनवास,
नील,नीरव, निरभ्र अकेला  आकाश.
भगजोगनियों संग भोगता प्रीत का रास
वसुधा पर ठिठुरती निशा  का वास
झिंगुरों का वक्र  परिहास
सर्द हवाओं का कुटिल अट्टाहास
शनैः शनैः सरकता शारदीय मास
फिर भी धरती की धुकधुकाती आस
कभी  तो मिलेंगे अपने चांद से
दूर क्षितिज के पास
पल पल दिल को दिलाये ये भास
काश, कोई  प्रणीते ना भोगे ये त्रास!
                   --------------- विश्वमोहन