Saturday, 5 April 2014

चुनाव

न जाने, मन क्यों भटका है ?
प्रचार तंत्र में जा अटका है !
राजनीति का पंकिल पथ है,
जनता हत है और लथपथ है.

पंचवर्षीय काल खंड के,
लोकतंत्र के पर्व-प्रचंड में.
मनभावन है छटा बिखेरी.
नीति-प्रपंच और छल-पाखंड ने.

दल परिवर्तन की बयार है,
गिरगिट भी आज शर्मशार है.
वारे-नारे गलियारों में,
गांधी दिखते हत्यारों में.

कोई लोहिया, कोई लोहा लाये,
कोई कबीर का दोहा गाये.
और कर में धारे अम्बेदकर,
बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय.

खिदमतगारों का खूब मज़मा है,
फतवा से अल्लाह सहमा है.
और, सनातन ऐसे जागे,
हर-हर डर कैलाश को भागे.

 वामपंथ ने ली डकार है,
दक्षिणपंथी की हुंकार है.
आडम्बर की ओट में छुपकर,
आम आदमी पर हुआ प्रहार है.


सामाजिक न्याय के सब्जबाग में,
कोई विकास का बिगुल बजाये.
सम्पूर्ण-क्रांति की मृग-मरीचिका,
जन-गण-मन को फिर भरमाये.

भ्रष्टाचार के भव्य दहन में,
बंशी बजाये, नीरो मस्त है.
कपटी नेता व्योम में विचरे,
झुलसी जनता आहत त्रस्त है.

तंत्र है जन का, मत है मन का,
अब निकाल लो तीर कमान की.
बेटा, क्या बिगाड़ के डर से,
नहीं करोगे,  बात ईमान की !  

हर दम हारे , अब ना हारें,
छलियों  का ये नया दाव है.
उठो पार्थ, गांडीव सम्भालो,
मारो मुहर , आया चुनाव है.

       ------ विश्वमोहन