Friday, 27 June 2014

प्रेम-जोग

आ री गोरी, चोरी चोरी
मन मोर तेरे संग बसा है.
राधा रंगी, श्याम की होरी
ब्रज में आज सतरंग नशा है.

पहले मन रंग, तब तन को रंग
और रंग ले वो झीनी चुनरिया.
प्रेम-जोग से बीनी जो चुनर
उसे ओढ़ फिर सजे सुंदरिया.

रहे श्रृंगार चिरंतन चेतन
लोचन सुख, सखी लखे चदरिया.
अनहद, अनंत में पेंगे भर ले
अब न लजा, आजा तु गुजरिया.

लोक-लाज के भंवर जाल में
अटक भटक हम दूर रहे हैं.
चले सजनी, अब इष्ट लोक में
देख,  प्रपंची घूर रहे हैं.

दुनियावी कीचड़ में धंसकर,
कपट प्रपंच के पंक मे फंसकर.
अज्ञान के अंध-कुप में
रहे भटकते लुक-लुक छिपकर.

अमृत सी मेरे प्यार की छैंया
सोये गोरी,  जागे सैंया.
लो फिर, नयनन फेरी सुनैना
बसे पिया के अंखियन रैना.

साजन निरखे पल पल गोरी
वैसे,  जैसे चांद चकोरी.
भोर हुआ, अब आ सखी उठें
अमर यात्रा है, अब ना रुठे.

प्रमुदित मन और मचले हरदम
विश्व पर बरसे अमृत पुनम.
मैं पुरुष,  तेरा अभिषेक हूँ
ना मैं’, ना तुम’, मैं-तुम एक हूँ.
          ----------------- विश्वमोहन

Silver Cheers!

(Dedicated to my be(i)tter half on the completion of the silver jubilee year of my wedding on June 28)


Our metamorphosis into
‘made for each other’.
Over the quarter cent years.
 Walk past the memory lane,
Share the silver cheers!

 Mustnot so easily forget,
 All the promises.
 We made to us of sailing together
 for each others’ wishes.


 All those beautiful days and
 Never ending talk long  nights,
 That we justified together,
All the rights wrong and wrongs right!


 With the delicious elixir of love,
That my soul is still replete,
 That you lent me throughout,
 the journey rendering the melody sweet.

The sweet quarrels and bitter love
Through your speaking eyes with frowning lips.
And that we tasted together,
The shrill music carrying the love tips.

Our sojourn in the ‘inn’ on the way
In  dark nights and on rainy days .
Through curse and  boon and thick and  thin
We emerged together with shining rays.

The Providence gifted me with
The everlasting panacea of life.
That He created in you
My friend, philosopher and darling wife.

 O my darling, forget me not
 for my feelings are yet as hot
 as it was, when in my images,
 were you caught!

         ------------------ vishwamohan

Sunday, 22 June 2014

सोशल मीडिया और भारतीय नारी

कुछ हद तक विवाहेतर सम्बंधों के कवच एवम दाम्पत्य उद्देश्य  को छलने वाले उपकरण कंडोम की निर्माता एक व्यावसायिक  कम्पनी ड्युरेक्स का शोध रिपोर्ट प्रकाश में आया है. इसमें सोशल मीडिया और प्राद्यौगिकी  को मनोरंजन के साधन के रुप में खड़ा कर उसके समक्ष  दाम्पत्य  जीवन  को घुटने टेकते हुए दिखाया गया है, मानों दाम्पत्य जीवन भी मनोरंजन का कोइ मंजीरा हो. भारतीय परम्पराओं के परिप्रेक्ष्य में दाम्पत्य वैवाहिक जीवन का एक अविच्छिन्न अंग है,  यानि परिणय का प्रणय पक्ष! विवाह जीवन का दाव है. दाम्पत्य विवाह रुपी ऊर्जा  सागर में उठने गिरने वाली प्रेम क्रीड़ा की उत्ताल तरंगें हैं. प्रलय काल में मनु से की गयी श्रद्धा के प्रेम-मनुहार से समझा जा सकता है:-
कहा आगंतुक ने सस्नेह,
अरे, तुम हुए इतने अधीर.
हार बैठे जीवन का दाव,
मरकर जीतते जिसको वीर.
अतः वैवाहिक जीवन में दाम्पत्य-सहवास क्षणिक उच्छवासों का समागम मात्र नहीं, प्रत्युत सृजन की एक चिरंतन चेतना है. यह व्यष्टि-समास समष्टि को समर्पित यज्ञ है. यह दो देह का मिलन नहीं,बल्कि दो आत्माओं  का विस्तार है.
इस संदर्भ में यदि तकनीक तथा सोशल मीडिया की भूमिका का अवलोकन किया जाय तो यह भी व्यक्ति के समाज से सहकार होने की प्रक्रिया का उत्प्रेरक तत्व है, भले ही इसने एक मनोरंजक दंतमंजन का रुप ले लिया हो!  व्यक्ति के सम्पर्क और प्रभाव क्षेत्र के प्रसार का नियामक यंत्र है यह. आज इन वेबसाइट के माध्यम से लोगों के आपस में जुड़ने की प्रवृति और गति दोनों को पर लग गये हैं. पुराने मित्र एक दूसरे से जुट रहे हैं. मित्रता और परस्परिक सम्बंधों के विविध आयाम पुनर्परिभाषित हो रहे हैं. सारी दुनिया सिकुड़कर एक पृष्ठ पर आ गयी है. सूचना तंत्र की तीव्रता में सबकुछ बस एक पासवर्ड में सिमट गया है. नित्य नयी-नयी शख्सियत की तलाश, नये-नये दोस्तों की नयी दास्तान, मन में उमड़ी भावनाओं का चैटिंग के माध्यम से तात्क्षणिक प्रक्षेपण और शब्द एवम चित्रों की दुनिया में अपने स्व को बड़ी मासुमियत से किसी कल्पित विश्वास को पूर्ण रुप से दे देना, यह सोशल वेबसाइट पर प्रतिदिन घटने वाली दास्तान की झलकी मात्र है.
 सब कुछ यहाँ मिल जाता है. हर मर्ज़ की खुराक परोसी हुई है. दमित,छलित, शापित, प्रताड़ित एवम अनुप्राणित, सारी भावनायें यहाँ अंकुरती है, पल्लवित होती है, अपनी सूरभि बिखेरती है, राहगीरों को छलती हैं , दूकानों पर सजती हैं, अपनी चमक-दमक से आंखों को चकाचौंध करती है, मनचलो को इठलाती है , मासूमों को फुसलाती है, किसी के दिल में आशा का दीया जलाती है, किसी के अरमानों का गला घोंटती है , किसी का आशियाना बसाती है तो किसी की दुनिया उजाड़ती है.
यह नवयुग के सोशल  साहित्य का विस्तृत फलक है, जहाँ साहित्य के सभी काल, कविता के सभी रस और नाट्यशास्त्र के सभी अंग अपने श्रृंगार की समस्त कलाओं की सर्वोच्च सत्ता को बस एक लाइक पर आपके सामने  उड़ेल देते हैं. इसके मोह-पाश की महिमा अकथ्य है. इसके प्रेम फांस मे समय स्थिर हो जाता है और व्यक्ति उस जादूई टाइम-सुट को पहन लेता है जहां खगोलीय गुरुत्व, पारिवारिक आकर्षण और जन्म, उम्र, जाति ये सारे बंधन बेअसर हो जाते हैं. व्यक्ति ग्लोबल और कभी कभी कॉस्मिक हो जाता है. भावनाओं की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता यहां निस्सीम हो जाती है. भावनायें अल्हड़ और व्यंजनायें अराजक. यहां कुछ रुकता नहीं, कुछ टिकता नही. प्रतीक्षा की वेदना नहीं. सबकुछ गत्यात्मक है. चरैवति- चरैवति का दर्शन अपने शाश्वत स्वरुप में विराजता है. यहाँ सबकुछ ताज़ा है, टटका है, बासी कुछ भी नहीं है. बाहर से सब कुछ खुला है. अंदर की गारंटी नहीं. अपीयरेंस महफूज़ है. एस्सेंस का खरीददार नहीं. वाद की फरियाद नहीं, ‘विचारधारा की मीयाद नहीं. सारी क्रियायें, सारे व्यापार  अपने स्वाभाविक प्रवाह में घटित होते हैं. यहाँ किशन की वंशी की धुन भी है, गोपिकाओं के प्रेम उपालम्भ भी हैं, राधा रानी के प्रणय की खनक भी है, मीरा के नयनों से निःसृत अंसुअन की धार भी है और उद्धव की ज्ञान-पोटली भी है. सब कुछ मुफ्त! सब कुछ मुक्त! सर्वथा उन्मुक्त! मानों, भारतीय दर्शन में मीमांसित मोक्ष की प्राप्ति यहाँ अनायास ही हो जाती हो.
अब यदि भारतीय समाज में पुरुष के सापेक्ष नारी की स्थिति का इतिहास के भिन्न भिन्न काल-खंडों  में अवलोकन करे तो मध्यकालीन सामंती परिवेश के प्रवेश के पश्चात से ही मानों दाम्पत्य उसके सहवास की सुकोमल भावनाओं का स्वछंद उच्छवास न होकर उसके सर्वभौमिक आस्तित्व का अनिवार्य कारावास हो. अब परिणय के सुवासित उपवन में उसके प्रणय राग की चहक नहीं सुनायी देती , प्रत्युत उसके भावी जीवन की आजीविका के साधन के रुप में उसका दाम्पत्य परम्परा के बोझ तले कराहता है. अब उसका दाम्पत्य बेबसी के समर्पण का पर्याय बनकर रह गया जहाँ उसके भर्तार का छद्म अहंकार कुलाचें मारता है और अबला औरत संतान जनने और चुल्हा झोंकने का मशीन बनकर रह गयी. वह पर्दानशीं, असूर्यपश्या और पुरुष के समतल जीवन में प्रवाहित होने वाली कृशकाय तन्वंगी धारा बनकर रह गयी. दहलीज के भीतर कैद औरत की मुक्त आकाश में उड़ान भरने की तमन्ना दमित भावना बनकर दिल की कसक में समा गयी. संयुक्त-परिवार प्रणाली में मध्ययुगीन संस्कारों  ने नारीत्व- नाशक मूल्यों का जहर पटाया. परम्परा से प्राप्त समस्त उदात्त संस्कार जो यत्रनार्यस्तु पुज्यंते, तत्र रमंते देवाः का शंखनाद करते थे, शनैः शनैः काल का ग्रास बनते गये. हिंदु स्त्री का पत्नीत्व में महदेवी वर्मा बड़ी साफगोइ से कहती हैं:-
“जैसे ही कन्या का जन्म हुआ, माता पिता का ध्यान सबसे पहले उसके विवाह की कठिनाइयों की ओर गया. यदि वह रोगी माता पिता से पैतृक धन की तरह कोई रोग ले आई तो भी उसके जन्मदाता अपने दुष्कर्म के उस कटु फल को पराई धरोहर कह-कह कर किसी को सौंपने के लिये व्याकुल होने लगे.”
युग आगे बढा. औद्योगिक क्रांति आयी. शहर बने . गांव टूटे. बाज़ारें सज़ी. गांव का कृषक दुल्हा नये सेट-अप में औफीस का नौकरीपेशा बाबु बना. संयुक्त पारिवारीक व्यवस्था के मूल्य घटे. दुल्हे का दाम बढा. खरीद-फरोख्त के तिज़ारत में औरत फिर परवान चढ़ी. हाँ, एक सकारात्मक असर ये हुआ कि गांव मे घूंघट काढ़े गुलामी करने वाली औरत शहर के उजाले में आ गयी. बाद के दिनों में वह, धीरे धीरे ही सही, संघर्ष मे अपने साथी की सहचरी नज़र आयी. समाज के परिवर्तन का पहिया घुमता रहा. आज़ादी की लड़ाई. आज़ाद हिंदुस्तान. सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जेहाद.
 हम पूरा इतिहास उकटना नहीं चाहते. हाँ, इतना जरुर जोड़ेंगे कि जो सदियों की सामाजिक क्रांतियां सौ चोट सुनार के मारती रहीं, वो इक्कीसवीं सदी की सूचना क्रांति ने एक चोट लोहार के में तमाम कर दिया. अब सारी दुनिया उसकी उंगलियों में लिपट गयी.उसका वेबसाइट उसके सम्मुख था. उसके व्यक्तित्व को मुक्त गगन मिला और उसकी मुलायम भावनाओं ने पंचम में आलाप भरना शुरु कर दिया. उसे अपनी मौलिकता से साक्षात्कार हो गया. उसके अंतःस की रचनात्मकता कुसुमित होने लगी. उसे अपनी सृजनात्मकता के सौंदर्य की अभिव्यक्ति का विस्तृत वितान मिल गया. उसकी श्रृंगारिकता उसके सामजिक सरोकार की शोभा बन गयी. अपने प्रतियोगी की कुंठा को नज़रअंदाज़ करते उसकी मुक्ति की उत्कंठा अपने सच्चे मुकाम की ओर मुड़ गयी है. अब उसने नयी सम्भावनाओं की तलाश कर ली है. जाहिर है प्रजनन-उपकरणकी मानसिकता से स्वतंत्र होकर समाज में अपनी नयी भुमिका की तलाश में वह निकल पड़ी है. इस परिप्रेक्ष्य में उपरोक्त शोध  की सूचना तो सही है लेकिन व्याख्या भ्रामक और तथ्यहीन.                             
हाँ, भिन्न-भिन्न सामाजिक संरचनाओं में सम्बंधों के बहुमुखी आयामों की उपस्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता.इसकी पृष्टभूमि में होती है – सामाजिक सरोकारों  के संस्कार की संस्कृति, जहाँ दाम्पत्य के अंतरंग और सामाजिकता के विविध रंग पारस्परिक अवगुंठन में लयबद्ध भी हो सकते हैं या फिर एक दूसरे की लय में पारदर्शिता का प्रलयी विलय भी कर सकते हैं.
जरुरत है – सुसंस्कारों की, सम्बंधगत परिपक्वता की, विश्वास के सशक्त रेशमी बंधन की, समर्पण की और परिणय एवम प्रणय के संतुलन की. यह संक्रमण का काल है. अभी लम्बी यात्रा शेष है.
                                

Saturday, 21 June 2014

चेतना, पदार्थ और ऊर्जा

मैं चेतना को  जीव  के भौतिक तत्व और  उसकी  ऊर्जा से बिल्कुल इतर मानता हूँ. वैज्ञानिक विचार परम्परा में पदार्थ और ऊर्जा परस्पर परिवर्तनीय हैं. पदार्थ ऊर्जा में परिणत होता है और ऊर्जा पदार्थ में. द्वैत प्रकृति का सिद्धांत भी यही है कि प्रत्येक वस्तु पदार्थ और तरंग दोनों सा व्यवहार करती हैं. अस्तु, किसी खास समय उसका व्यवहार कितना पदार्थीय है और कितना तरंगीय, यह जानना दिलचस्प है. हाँलाकि, पदार्थ का कोई विशेष अंश कितनी उर्जा मे बदल गया, इसका सूत्र अवश्य मिल गया है.
अब प्रश्न उठता है कि अखिर वह कौन सा  कारक  है  जो पदार्थ  और ऊर्जा की इस पारस्परिक परिवर्तनशीलता को संचालित करता है, जिसके नेतृत्व में परिवर्तनशीलता की संजीदगी अपनी शाश्वतता को बनाये रखती है. जिसका साया हटते ही पदार्थ ऊर्जाहीन होकर पदार्थ मात्र रह  जाता है जिसे मृत्यु की स्थिति कहते हैं.
वह चेतना है.
पदार्थ और ऊर्जा अधिभौतिक विज्ञान के विषय हैं, चेतना अध्यात्म का. जैसे ही विज्ञान अध्यात्म की गोद में आता है, सृजन की लता लहलहाती है. अर्थात चेतना की चिन्मय ज्योति के आलोक में ही भौतिक तत्व (पदार्थ और ऊर्जा) का संघट्ट स्वरुप सजीव जीव कहलाता है. चेतना का लोप होते ही जीव निष्प्राण,  पदार्थ ऊर्जाहीन और फिर नष्टशीलता की गति को प्राप्त! ऊर्जा तो निर्जीव वस्तुओं पर भी आरोपित की जा सकती हैं. ऊर्जा यानि कार्य करने की क्षमता.  विद्युत ऊर्जा निर्जीव पंखे में यांत्रिक ऊर्जा में बदलकर उसमें गति ला देती है. वहाँ पंखे की गति किसी चेतना से संचालित नहीं होती. इसलिये, गतिशील होकर भी पंखा निर्जीव है.
ठीक इसके उलट, साधना में लीन एक साधक की समस्त ऊर्जा उसके ध्यान में घनीभुत होती है जिसका संचालन एक विराट चेतन शक्ति करती है. इसलिये, वह साधक शरीर अचल, स्थिर व जड़स्वरुप होकर भी सजीव है, जीवंत है और चैतन्य है.
अब यह जीव-चेतना एक स्वयम्भू सम्पूर्ण चेतना है या किसी परम चेतना का शाश्वत अंश-स्वरुप, एवम स्वयम में उतना ही परम जितना इसका स्त्रोत! इसकी आहट हमें वेद में सुनायी देती है:-
“पूर्णमदं पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवशिष्यते”.
इस चेतना को यदि हम आत्मा माने तो वह अक्षय स्त्रोत परम चेतना परमात्मा है. सदियों से मानव आत्मा-परमात्मा के इस समीकरण को सुलझाने में उलझा है.       
“आत्मनि एव आत्मनः तिष्ठः यः पश्यति सः पण्डितः”
अर्थात, अपने चेतन स्वरुप में स्थित होकर अपनी चेतना से समस्त चेतना को आत्म स्वरुप में जो अवलोकन करता है, वही विद्वान है. इस स्थिति मे सब कुछ आत्ममय है, कुछ भी पराया नही. “अयम निजः परो वेति, गणना लघुचेतषाम”. चित्त अर्थात चेतना लघु नहीं, प्रत्युत विराट है. अंश और सम्पूर्ण एकमय हैं.एकोअहंद्वितीयोनास्ति. नदी प्रवाह है और प्रवाह नदी. यह आध्यात्मिक लोक का अवलोकन है.
भौतिक जगत में हम मैटर (पदार्थ और ऊर्जा) का अवलोकन प्रकाश(ऊर्जा) के माध्यम से करते हैं. यह ऊर्जा अपने पदार्थीय स्वरुप (फोटॉन) का आवेग अवलोकित पदार्थ को देकर उसकी स्थिति में परिवर्तन ला देता है. इस तरह हम उसकी विचलित स्थिति देखकर उसकी मौलिक स्थिति का भ्रम पाल लेते हैं. यह भौतिक जगत का दृष्टि-भ्रम है. इसीलिये आध्यात्म लोक विशुद्ध और शाश्वत है जबकि अधिभौतिक जगत प्रदुषित और भ्रांतिपूर्ण! जरुरत है, हम अपनी आत्मा(चेतना) को जगायें.
हाँ, तो ये जगत पदार्थ और ऊर्जा का विस्तार मात्र है. दोनों हैं तो मूलतः एक ही चीज़. यानि, पदार्थ ऊर्जा में बह जाता है और ऊर्जा पदार्थ में जम जाता है. पदार्थ और ऊर्जा का समंवित स्वरुप है - प्रकृति. पदार्थ और ऊर्जा अपने भिन्न-भिन्न अनुपात में एक से दूसरे में अदल-बदल कर प्रकृति की अगणित वस्तुओं का रुप रचते हैं. उनकी पारस्परिक क्रीड़ा उनका रसायन है और तज्जन्य रुप उनकी भौतिकी! अब यह प्रकृति तबतक संजीदा नहीं, जबतक उसमें अंतःस्फुर्त हलचल न हो. यह हलचल पैदा होती है, चेतना से. यह चेतना उसका पुरुष तत्व है. इसी की छाया में उसकी कलायें विकसित होती हैं, विस्तार पाती हैं और अपने किसिम-किसिम के रुपों से सृष्टि को सजाती हैं. अब किस वस्तु को चेतना का कितना प्रसाद मिला या अपनी विशिष्ट मात्रा रचना के बूते वस्तु चेतना के कितने अंश को ग्रहण करने का पात्र बनी – यह रहस्य बना हुआ है और शोधपरक है. फिर, जैसे चेतना का अजस्त्र प्रवाह परम चेतना से हो रहा है, वैसे ही पदार्थ-ऊर्जा रचित प्रकृति का विस्तार भी अनंत है.
पदार्थ और ऊर्जा परस्पर परिवर्तनीय हैं. प्रत्येक पदार्थ का अपना एक ऊर्जा-स्तर (प्रभामंडल) होता है और प्रत्येक ऊर्जा में संचित उसकी एक विशिष्ट मात्रा(तत्व). पदार्थ का भौतिक स्वरुप उसके पंच तत्व हैं. चेतना के आलोक में उसकी तज्जन्य ऊर्जा तदनुसार पंचानूभुतियां हैं. रुप, दृश्य, गंध, स्पर्श और श्रोत्र – ये पंच अनुभूति पंच भुत में चेतना के योग का परिणाम है. चेतना के विस्तार से अनूभुतियां तीव्र होती हैं और उसके संकुचन से मंद. योगेश्वर कृष्ण उसी चेतना के विराट रुप में प्रकृतिस्थ अर्जुन के समक्ष खड़े होते हैं.            
                                ------ विश्वमोहन

                

Sunday, 15 June 2014

बिदा बहुरिया

सुत  गई गोरी, ऑखें खोली,
बिंदिया, चूड़ी, कुमकुम रो ली I



सजा बिछौना, उड़े पताका,
बंध गयी बांस में, जीवन-गाथा I

सजी सेज़ में, लगे लुआठी,
भसम हुआ सब, हो गया माटी I



आसमान से बहे बयरिया,
अगियन की लपटन धधकाये I

पानी भाप बन, उड़ गये उपर,
तन माटी बन, धुल धुसराये I

खतम खेल अब, बुझ गयी बाती,
बिदा बहुरिया, बचे बाराती ! 


आज बाराती, कल बहुरिया,
जीव-जगत के एही चकरियाI