Friday, 31 October 2014

कवि रसिक!

दिल रीता है स्पंदन से,
जैसे गगन का मिलन न घन से.
अश्रू नम न मिले नयन में,
रूठी  नींदिया, शयन-सदन में.


जीव-द्रव्य, पर जीव नहीं है,
दिखे सजीव ! निर्जीव वहीं है.
मन का कण-कण टूट चला है,
जीने की यह शुष्क कला है.




घृणा की घनघोर घटा है,
लिप्सा की मनोहारी छटा है.
दृग चंचल, पर कुछ नहीं दिखे,
लीपे लेखनी, कुछ नहीं लिखे.



भाव-शून्य विचार बहुल है,
संस्कार रिक्त आर्य संकुल है.
पर पीड़ा का भान नहीं है,
स्वांतःसुखाय बस ज्ञान यही है.


 
लालच मोह कपट विकराल,
  कौआ चले हंस की चाल.
गतानुगतिका  बसी रची है,
भागदौड़ गलकाट मची है.



नहीं घड़ी के पास वक़्त है,
पत्रहीन पीत ठूंठ दरख़्त है.
सब कुछ जड़, पर भ्रम चेतन का,
अज्ञान अहं संग मणि-कंचन का


अचल वदन, चपल मन भागे,
सुप्त अंतस, इतर सब जागे.
भ्रम में जागे, भ्रम में सोये,
भ्रम में पाये, भ्रम में खोये.




चला बटोही बाट नहीं है,
जीवन नैया का घाट नहीं है.
बहे बयार पतवार नहीं है,
संसार निस्सार मंझधार यहीं है.




संग नहीं अब कोइ मेरा,
चला मुसाफिर छूट गया डेरा.
मैं नीतांत एकांत पथिक हूँ,
            नीरस दुनिया का कवि रसिक हूँ.