Saturday, 3 September 2016

गरीबन के चूल्हा चाकी (बिहार की बाढ़ को समर्पित)

                                                  (१)
कमला बलान से बागमती
गंगा से गंडक मिल गयीI
चुई, चुई, चांचर झोपड़
भीत कोटर, मड़ई गील भईI
महापाश में महानंदा के
कमसीन सी, कोशी खिल गयीI
संग सोन पुन पुन रास में
गाँव गँवई घर झील भईI
बजरी बिजुरी, कपार किसान के!

(२)
गाँजे के दम
हाकिम की मनमानी।
दारू की तलाशी,
खाकी की चानी।
मिथिला मगह कोशी सारण
सरमसार अंग, चंपारण, पानी पानी !
लील गयी दरिया
जान धान गोरु खटिया
तहस नहस ख़तम कहानी।

     (३)
ये गइया के चरवैया!
ब्रह्मपिशाच! गोबर्द्धन-बिलास!
अबकी गले
का अटकाये हो!
भईया, का खाये हो?
जो गंगा मईया को
सखी सलेहर संग,
गरीबन के चूल्हा चाकी
दिखाने आये हो।