Saturday, 15 July 2017

अहल्या अस्थान- अहियारी

बिसपी गाँव से वापस सीतामढ़ी की ओर बढे मुश्किल से आठ या दस किलोमीटर भी नहीं हुए थे कि सड़क की बायीं ओर कमतौल स्टेशन जाने की दिशा में लगी एक पट्टिका ने अचानक मेरे मन को खींच लिया. पट्टिका पर तीर के दिशा-निर्देशक चिन्ह के साथ लिखा था ' अहल्या अस्थान'. दिशा सन्देश पढ़ते ही बरबस हमें महाकवि तुलसी की इन पंक्तियों का स्मरण हो आया :-
'गौतम नारी श्राप वश उपल देह धरी धीर,
चरण कमल राज चाहति कृपा करहु रघुबीर.'
                ताड़का, मारीच और सुबाहु का संहार करने के पश्चात मुनि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को धनुष यज्ञ दिखने मिथिला नरेश राजर्षि जनक की राजधानी जनकपुर इसी रास्ते ले जा रहे थे. अत्यंत रमणीक यह वन प्रांतर निरभ्र, शांत, पशु-पक्षी विहीन और निर्जन था. एक सुनसान आश्रम था जहाँ एक भी मुनि दृष्टिगोचर नहीं होने पर राम ने कुतूहल वश विश्वामित्र से निर्जनता के इस रहस्य के विषय में प्रश्न किया. गाधि पुत्र विश्वामित्र ने फिर उस सुनसान आश्रम की कहानी सुनाई. बहुत वर्ष पूर्व यह गौतम ऋषि का आश्रम था जहाँ वह अपनी पतिव्रता यशस्विनी पत्नी अहल्या के साथ तपश्चर्या कर्म करते थे. देवराज इंद्र  चन्द्रमा के साथ मिलकर छल से गौतम का वेश बनाकर रात्रि प्रहर में अहल्या के समक्ष समागम को प्रस्तुत हुए. समागम के पश्चात गौतम के द्वारा पकडे जाने पर इंद्र और अहल्या दोनों उनके शापभाजन बने. अहल्या को उन्होंने शाप दिया कि वह कई हज़ार वर्षों तक केवल हवा पीकर या उपवास करके कष्ट उठाते हुए राख में समस्त प्राणियों से अदृश्य रहकर पड़ी रहेगी.जब राम का इस आश्रम में पदार्पण होगा उस समय वह पवित्र होगी और उनके आतिथ्य सत्कार से उसके समस्त ऐन्द्रिक और मानसिक दोष दूर हो जायेंगे. फिर वह अपना पूर्व शरीर धारण कर लेगी. ऐसा शाप भंजन कर कुपित गौतम हिमालय पर तपस्या करने चले गए.
अब राम और लक्ष्मण ने विश्वामित्र के साथ उस आश्रम में प्रवेश किया. मनुष्य, देव और असुरों को अदृश्य अहल्या को राम ने देखा - महासौभाग्यशालिनी अहल्या अपनी तपस्या से देदीप्यमान हो रही थी. श्री राम का दर्शन हो जाने से जब उनके शाप का अंत हो गया तो वह सबको दिखाई देने लगी. राम और लक्ष्मण ने उनके चरण स्पर्श किये. अहल्या ने उनका आतिथ्य-सत्कार किया और शापमुक्त होकर अपने दिव्य रूप में अपने पति गौतम का साहचर्य ग्रहण किया.
               ये कहानी मैंने वाल्मीकि रामायण में पढ़ी थी. हालांकि तुलसी के रामचरितमानस तक आते आते अहल्या पत्थर की बन चुकी थी और वाल्मीकि रामायण में उनका चरण स्पर्श करने वाले राम यहाँ अब अपने चरणों के स्पर्श से उनका उद्धार करने लगे थे. यह आदि काल से मध्य कल तक की हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक यात्रा के प्रदुषण की प्रक्रिया की राम गाथा है. हालांकि, इस विषय पर न मेरा कभी वाल्मीकि से मतैक्य रहा और न तुलसी से ही; और न उन तमाम अहल्या-इंद्र-गौतम प्रसंगो से जो पद्मपुराण , विष्णु पुराण या अन्य पौराणिक ग्रंथो में यत्र तत्र कपोल कल्पित मिथ्या मिथकों का गाल बजा रहे हैं. अपनी अटूट आध्यात्मिक और पावन परंपरा में हम जिन पञ्चकन्यायों को पूजते हैं वे सभी- कुंती, तारा, मंदोदरी, द्रौपदी और अहल्या - अपने समय की फेमिनिस्ट थी . उन्होंने तत्कालीन नारी विरोधी मान्यताओं को चुनौती दी तथा वे सारे कार्य संपन्न किये जो पुरुष समाज के मिथ्या अहंकार को तार तार कर देते हों. हमें तो यही लगता है कि वैदिक युग के बाद जब मर्यादाओं का अवनयन काल आया तो कुटिल प्रवंचकों ने पुराण की रचना करते समय अपनी थोथी दलीलों को अपने ग्रंथों में थोप दी. नारी को पुरुष से नीचा रखने का सारा कुचक्र रच दिया. बातों को तोड़ मरोड़कर कुतर्कों का जाल फैला दिया. परम पूजनीय पञ्चकन्यायों को प्रपंच पूर्ण प्रसंगों के प्रकारांतर में पातकी प्रमाणित कर दिया और प्रताड़ित भी किया. और तो और , शाप के प्रकोप के निवारण में भी ऐसा विधान रचा कि पुरुष इंद्र का शाप अंग प्रत्यारोपण से छू मंतर हो गया ! जबकि, नारी अहल्या को अप्रमेय प्रक्रिया से पाषाण में परिवर्तित कर दिया !
              प्रमाण , प्रमेय , अनुमान , सिद्धांत आदि ... ये सब न्याय दर्शन के आवश्यक अंग हैं. और न्याय दर्शन के जनक मुनि अक्षपाद गौतम अपनी पत्नी को पत्थर बना देने में स्वयं अप्रमेयता का आखेट बन जाते हैं ! कैसी बिडम्बना है हमारे पौराणिक कथाकारों के साथ! इंद्र देवराज हैं. परस्त्रीगमन करते हैं. इंद्र अहल्या के पास गए थे न! अहल्या तो अपने आश्रम में ही थी. सह षड्यंत्रकारी चन्द्रमा है. इंद्र पुरुष! चन्द्रमा पुरुष! न्यायी पति गौतम पुरुष! और पुरुषार्थ के प्रतीक-पुरुष इंद्र को शाप से मुक्ति की तरकीब सिखाने वाले सारे पंडित, ब्रह्माजी भी, पुरुष! इन सब पुरुषों के बीच एक पाषाणी नारी- अहल्या!
              थाईलैंड में प्रचलित रामकथा, रामकिन, में तो यहाँ तक रच दिया गया है कि सूर्य और इंद्र के समागम से अहल्या ने सुग्रीव और बाली को जन्म दिया जिसका भांडा अहल्या की पुत्री अंजनी ने अपने पिता के सामने फोड़ा. उससे कुपित होकर गौतम ने दोनों पुत्रों को बन्दर बनाकर घर से निकाल दिया. फिर अहल्या के शाप से अंजनी को भी बन्दर रूप पुत्र हनुमान हुए. कुल मिलाकर, नारी इन समस्त प्रपंचों की प्रयोगशाला बनी रही. पुरुष प्रयोग करता रहा!
                विश्वामित्र और राम लक्ष्मण के जनकपुर पहुचते ही अहल्या के बेटे शतानन्दजी जो राजा जनक के राजपुरोहित हैं, पहला प्रश्न यहीं पूछते हैं - " मुनिवर! मेरी यशस्विनी माता अहल्या बहुत दिनों से तपस्या कर रही थी. क्या आपने राजकुमार श्री राम को उनका दर्शन कराया? क्या मेरी महातेजस्विनी एवं यशस्विनी माता अहल्या ने वन में होने वाले फल फूल आदि से समस्त देह धरियों के लिए पूजनीय श्री रामचन्द्रजी का पूजन किया? क्या अपने श्री राम से वह प्राचीन वृतांत कहा था , जो मेरी माता के प्रति देवराज इंद्रा द्वारा किये गए छल-कपट एवं दुराचार द्वारा घटित हुआ था?"
              तो छल इंद्र का! सहषड्यंत्र चन्द्रमा का! दण्ड गौतम के न्याय का! और पत्थर की प्रतिमा अहल्या की! और तो और, ये आँखों देखा हाल सुनाने वाले विश्वामित्रजी ने भी एक अन्य धारावाहिक में इंद्र की ही छल क्रीडा में रम्भा को दस हज़ार वर्षों तक पत्थर की प्रतिमा बना कर खडा करा चुके थे!
              हमने इन प्रसंगों के बाद आधुनिक युग में यशस्वी लोगों की लन्दन में तुशाड की प्रतिमा के बारे में जरुर सुना है लेकिन अभी तक किसी ऐसी प्रावैधिकी से मेरा साक्षात्कार नहीं हुआ जहां सजीव प्राणी को निर्जीव पाषण प्रतिमा में परिवर्तित कर पुनः उसे वापस पूर्ववत सजीव रूप में ला दिया जाय. अर्थात पहले रासायनिक परिवर्तन, और फिर दूसरा प्रतिगामी रासायनिक परिवर्तन और दोनों मिलकर एक पूर्ण भौतिक परिवर्तन! बीच का काल हरिकीर्तन! प्रसिद्द बंगाली फिल्मकार सुजय घोष ने अपनी कल्पनाओं की अहल्या कथा पर चौदह मिनट का एक लघु वृत्त चित्र 'अहल्या' भी बनाया है.
              मेरा अभिप्राय इन मिथकों का मज़ाक उडाना नहीं, प्रत्युत उनकी अवैज्ञानिकता, नारी विरोधी कुत्सित कुसंस्कारों और  सामंती मान्यताओं  को अस्वीकार करना भर है.                
              इस बार हमें गाडी वापस लौटाने की नौबत नहीं आयी क्योंकि हमारे वाहन चालक महोदय ने पहले से ही हमारी भावनाओं को ताड़ लिया था. उन्होंने गाड़ी को अहियारी गाँव की ओर मोड़ दिया था. और जितनी देर तक हम अपने विचारों में डूबते उतराते रहे हमारी गाड़ी घनघोर विशाल वृक्ष की सघन शीतल छाया तले तपस्विनी अहल्या के 'अस्थान' में प्रवेश कर चुकी थी. वहाँ हमें एक आत्यंतिक नैसर्गिक सुख का आभास हुआ. हमने मंदिर के प्रशांत प्रांगण में चबूतरे पर थोड़ी देर  तक 'शांत अमिताभ' मुद्रा में विश्राम किया. मंदिर का जालीदार द्वार यहाँ भी बंद था जिसके पार माँ अहल्या की प्रतिमा दृश्यमान थी. एक धातु पट टंगा था जिसपर लिखा था - " ' अहल्या कुटी ', ऐसा प्रमाणित है कि यहीं पर माँ अहल्या ऋषि गौतम के शाप से पाषाणी हुई थी, जो श्री राम के चरण स्पर्श से शाप मुक्त हुई थी." मंदिर की दीवार रामचरितमानस की अहल्या विषयक चौपाइयों और दोहों से पटी थी.
                मुख्य मंदिर के ठीक सामने आँगन में एक स्तम्भ गड़ा था जिस पर लिखा था - " संस्थापक , गुंटूर आंध्र प्रदेश के श्री श्री श्री त्रिदंडी श्रीमन्नारायण स्वामी. इस श्री राममहाक्रतु: स्तम्भ में एक करोड़ राम यंत्र और मूल रामायण विद्यमान है. इसकी स्थापना  १९६० के दशक में की गयी. यह स्थान वैष्णव मतावलंबियों के द्वारा विवाह , अनुष्ठान , रामार्चा, सत्यनारायण एवं श्राद्ध कर्म के लिए मंगलकारी है ." इन पंक्तियों ने वैष्णव दर्शन के इस मर्म का साक्षात्कार कराया कि श्राद्ध का भी मंगलकारी होना इस बात का प्रतीक है कि जीवात्मा का जन्म-मरण के भवसागर से मुक्त होकर परमात्म विलय की मोक्षवास्था को प्राप्त हो जाना ही समस्त मंगल का मूल है.
                समीप के कमरे में भोजन बना रही एक महिला पुजारी ने आग्रह करने पर बड़ी आत्मीयता से मन्दिर का दरवाज़ा खोलकर दर्शन कराया. वहीँ पर एक बालक अपनी माँ के साथ पूजा सामग्री की दुकान लगाये बैठा था जिसपर अन्य सामग्रियों के साथ चूड़ी और बैगन रखे थे. पूछने पर पता चला कि ' अईला ' नमक एक विशेष प्रकार के दानेदार चर्मरोग के रोगी यहाँ माँ अहल्या का पुजन कर यहाँ की मिट्टी अपने रोग ग्रस्त भाग पर लगाते हैं जिससे यह बीमारी दूर हो जाती है. रोगमुक्त होने पर बैगन को चढ़ावे के रूप में अर्पित किया जाता है. मैंने मन ही मन मिट्टी की मरहमी ताकत को नमन किया. इसी बीच सजी संवरी महिलाओं के एक झुण्ड ने एक नवविवाहित वर वधु के जोड़े के साथ सुमधुर स्वर में समवेत विवाह के गीत गाते प्रवेश किया. हमने माँ अहल्या को प्रणाम किया और उनकी उसी छवि की आभा को अपनी आँखों में बसाये वहां से विदा लिया जो छवि भगवान राम ने अदिकवि वाल्मीकि के वर्णित इन छंदों में की थी :-

"स तुषार आवृताम् स अभ्राम् पूर्ण चन्द्र प्रभाम् इव |
मध्ये अंभसो दुराधर्षाम् दीप्ताम् सूर्य प्रभाम् इव ||

अर्थात
 " तप से देदीप्यमान रूप वाली, बादलों से मुक्त पूर्ण चन्द्रमा की प्रभा के समान तथा प्रदीप्त अग्नि

 शिखा और सूर्य से तेज के समान अहिल्या तपस्या में लीन थी।"

Saturday, 8 July 2017

उगना के मालिक - विद्यापति

"घन घन घनन घुँघर कत बाजय
हन हन कर तुअ काता
बिद्यापति कवि तूअ पद सेवक
पुत्र बिसरी जनु माता..."
 श्री हनुमान सतबार पाठ समारोह में कीर्तन गायन की तैयारी के क्रम में 'माइक चेक' करते मेरे शतकवय बाबा (दादाजी) ने बिना किसी साज संगीत के जब इन पंक्तियों की तान भरी तो मैं अनायास पवन तरंगों पर तैरती इन मधुर स्वर लहरियों में गोते लगाने लगा. भक्ति की अद्भुत भाव भंगिमा में पगी इन पंक्तियों ने मानो सहज साक्षात माँ भवानी को सम्मुख उपस्थित कर दिया हो . विद्यापति की रचनाओं का भक्ति रस बरबस अपनी मीठास से मन प्रांतर के कण कण को आप्लावित कर देता है. बाद में मैंने उनसे विद्यापति के कुछेक दूसरे भजन भी बड़े चाव से सुने.
ये गीत अब भी मेरे कर्ण पटल को अपनी स्वाभाविक मधुरता और भक्ति भाव से झंकृत करते रहते हैं.
      इसीलिए, जब दरभंगा से सीतामढ़ी जाने के क्रम में मेरी दृष्टि सडक पर लगी पट्टिका पर पड़ी " विद्यापति जन्म स्थान 'बिसपी' 7 किलोमीटर " तो भला मै उस पुण्य भूमि को देखे बिना आगे न बढ़ जाने का लोभ कैसे न संवरण कर पाता ! तबतक गाडी थोड़ी आगे सरक चुकी थी. मैंने वाहन चालक को आग्रह किया कि वह गाड़ी को पीछे लौटाए और बिसपी गाँव की ओर मोड़ लें. चालक महोदय मिथिलांचल के ही थे . उनकी आँखों में मैंने एक अदृश्य गर्व भाव के दर्शन किये कि कोई व्यक्ति उनकी भूमि की महिमा को आत्मसात कर रहा है.
 रास्ते में एक डायवर्सन को पार कर हम प्रधानमंत्री सड़क निर्माण योजना के तहत एक नवजात वक्रांग सड़क पर रेंगते हुए करीब बीस मिनट की यात्रा कर भवानी के इस भक्त बेटे महाकवि बिद्यापति के अवतार स्थल पर पहुंचे. चाहरदिवारियों से घिरा एक अलसाया परिसर और उसके बड़े गेट पर लटका ताला ! गेट की दूसरी ओर परिसर के अन्दर विद्यापति की पाषाण मूर्ति साफ़ साफ़ दिख रही थी. हम बाहर से ही दर्शन कर अघाने की प्रक्रिया में थे. किन्तु भला ड्राईवर साहब कहाँ मानने वाले थे इस बात से कि वो बाहर से ही हुलका के हमें लौटा ले जाएँ ! वह मुझे झांकते छोड़ गाँव की ओर निकल गए और करीब दस मिनट बाद चाभी लिए एक अर्धनग्न कविनुमा व्यक्ति को लेकर पहुंचे, जिन्होंने बड़ी आत्मीयता से हमारा दृष्टि-सत्कार किया और गेट खोलकर हमें अन्दर ले गए. हमारे इस ग्रामीण गाइड ने  धाराप्रवाह अपनी मीठी बोली में हमें विद्यापति की कहानी सुनानी शुरू की. मेरे मानसपटल पर शनैः शनैः उनकी साहित्यिक आकृति उभरनी शुरू हो गयी.
     दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में विद्यापति से मेरा नाता बस अंक बटोरने तक रहा था. किन्तु, बाद में जब उनकी सृजन सुधा का पान करने का अवसर फुर्सत में मिला तब जाके लगा कि साहित्य की सतरंगी आभा क्या होती है. सरस्वती के इस बेटे ने विस्तार में बताया कि भक्ति, श्रृंगार और लोक जीवन आपस में किस कदर गूँथ जाते है और इस बात का तनिक आभास भी नहीं मिलता कि भावनाएं जब अपनी प्रगाढ़ता के अंतस्तल में मचलती हैं तो कब श्रृंगार-भावना भक्ति के परिधान में सज जाती हैं. उनकी रचनाएँ भावनाओं के विशुद्धतम फलक पर अवतरित होती हैं जो पांडित्यपूर्ण पाखण्ड और बौद्धिक छल से बिलकुल अछूती रहती हैं. राधा कृष्ण का श्रृंगार जब वे रचते है तो पुरी तन्मयता से वह स्वयं उसमे रच बस जाते हैं. जब वह राधा का चित्र खींचते हैं तो कृष्ण बन जाते है:
' देख देख राधा रूप अपार।
अपरूब के बिहि आनि मेराओल खित-तल लावनि सार॥
अंगहि अंग अनंग मुरछाएत हेरए पड़ए अथीर।
मनमथ कोटि-मथन करू जे जन से हेरि महि-मधि गीर॥"

चढ़ती उम्र की बालिकाओं में  शारीरिक सौष्ठव और सौंदर्य उन्नयन की भौतिक प्रक्रिया के साथसाथ उनकी बिंदास अल्हड़ता में नित नित  नवीन कलाओं के कंगना खनकते रहते हैं और तद्रूप मनोभाव  उनके श्रृंगारिक टटके नखड़े में नख शिख झलकते रहते हैं. कवि की दिव्य दृष्टि से राधारानी के ये लटके झटके अछूते नहीं रहते और उनकी अखंड सुन्दरता अपनी सारी सूक्ष्मताओं की समग्रता के साथ उनके सौन्दर्य वर्णन में समाहित हो जाते हैं, मानों ये वर्णन और कोई नहीं, स्वयं प्रियतम कान्हा ही अपनी प्रेयसी का कर रहे हों!
" खने-खने नयन कोन अनुसरई;खने-खने-बसन-घूलि तनु भरई॥
खने-खने दसन छुटा हास, खने-खने अधर आगे करु बास॥
.............................................................................................
बाला सैसव तारुन भेट, लखए न पारिअ जेठ कनेठ॥
विद्यापति कह सुन बर कान, तरुनिम सैसव चिन्हए न जान॥ "

विद्यापति की रचनाओं में राधा की सौन्दर्य सुधा का पान करते साक्षात् कृष्ण ही नज़र आते हैं.
सहजि आनन सुंदर रे, भऊंह सुरेखलि आंखि।
पंकज मधु पिबि मधुकर रे, उड़ए पसारल पांखि॥
ततहि धाओल दुहु लोचन रे, जेहि पथममे गेलि बर नारि।
आसा लुबुधल न तजए रे, कृपनक पाछु भिखारी॥ "

 और, जब विद्यापति  कृष्ण की छवि उकेरते हैं तो राधा की आँखे ले लेते हैं. अपने प्रिय के अलौकिक सौन्दर्य पर रिझती राधा कान्हा को अपने नयनों में बसाए घुमती रहती हैं:

  " ए सखि पेखलि एक अपरूप। सुनईत मानब सपन-सरूप॥
कमल जुगल पर चांदक माला। तापर उपजल तरुन तमाला॥
तापर बेढ़लि बीजुरि-लता। कालिंदी तट धिरें धिरें जाता॥
साखा-सिखर सुधाकर पांति। ताहि नब पल्लब अरुनिम कांति। "

राधा कृष्ण के सौन्दर्य वर्णन पर ही कवि का चित्रकार चित विराम नहीं लेता. एक दूसरे के अपूर्व प्रेम में छटपटाते प्रेमी युगल के साथ प्रकृति की सहभागिता में भी कवि ने मानवीय प्राण डाल दिए हैं. यहाँ मौसम की छटा प्रेम का वितान नहीं तानती, प्रत्युत गगन में गरजती घटा अपने विघ्नकारी रूप में उपस्थित होकर प्रिय से मिलने निकली प्रेयसी का रास्ता रोक लेती है और प्रिय दर्शन को आकुल व्याकुल आत्मा विरह व्यथा में चीत्कार कर उठती है:

"  सखि हे हमर दुखक नहि ओर
इ भर बादर माह भादर सुन मंदिर मोर॥
झांपि घन गरजति संतत, भुवन भरि बरंसतिया।
कन्त पाहुन काम दारुन, सघन खर सर हंतिया।
कुलिस कत सत पात, मुदित, मयूर नाचत मातिया।
मत्त दादुर डाक डाहुक, फाटि जायेत छातिया।
तिमिर दिग भरि घोरि यामिनि, अथिर बिजुरिक पांतिया।
विद्यापति कह कैसे गमाओब, हरि बिना दिन- रातिया॥"

फिर, जब मिलन की वेला आ जाती है तो प्रेयसी के सारे उपालंभ तिरोहित हो जाते हैं.  मन में इसी प्रकृति के प्रति उसके मन में अभिराम भाव अंकुरित हो उठते हैं:  
   "    हे हरि हे हरि सुनिअ स्र्वन भरि, अब न बिलासक बेरा।
गगन नखत छल से अबेकत भेल, कोकुल कुल कर फेरा॥
चकबा मोर सोर कए चुप भेल, उठिअ मलिन भेल चंद।
नगरक धेनु डगर कए संचर, कुमुदनि बस मकरंदा। "
मैंने विद्यापति का अवलोकन सर्वदा एक आम लोक गायक के रूप मे ही किया है . उनके गीतों या पदावलियों में एक आम आदमी का उछाह है. कहीं कोई कृत्रिमता या वैचारिक प्रपंच नहीं दिखता. सब कुछ सजीव , सब कुछ टटका . जैसा है वैसा है. बिकुल जीवंत. लगता है, कोई जीता जागता चित्र सामने से गुजर रहा है. मानवीकरण से ओत प्रोत. भगवान् शिव को एक गृहस्थ शिव के रूप में खडा कर दिया है उन्होंने जहां गृहिणी गौरा उपालंभ के तीर मारती हैं. अपने निकम्मे से पति को हल फाल लेकर खेती करने जाने को उकसाती हैं. घर में हाथ पर हाथ धर बैठने से कुछ होने वाला नहीं! खटंग को हल और त्रिशूल को फार बनाकर बसहा बैल लेकर खेती करने वे जाएँ अन्यथा उनकी निर्धनता और आलस्य लोगों के उपहास का विषय बन जायेगी. अब मै कोई साहित्य समीक्षक या सामजिक चिन्तक तो हूँ नहीं कि इन पंक्तियों में मैं वामपंथ की प्रगतिवादी जड़ खोज लूँ. किन्तु इतना अवश्य है कि अपने आराध्य भोले और गौरा के प्रकारांतर में कवि ने आम लोक जीवन में निर्धनता का दंश झेल रही एक गृहिणी के उसके नशेड़ी आलसी पति के प्रति व्यथित उद्गारों को वाणी प्रदान की है:

बेरि बेरि सिय, मों तोय बोलों
फिरसि करिय मन मोय
बिन संक रहह, भीख मांगिय पय
गुन गौरव दूर जाय
निर्धन जन बोलि सब उपहासए
नहीं आदर अनुकम्पा
तोहे सिव , आक-धतुर-फुल पाओल
हरि पाओल फुल चंदा
खटंग काटि हर हर जे बनाबिय
त्रिसुल तोड़ीय करू फार
बसहा धुरंधर हर लए जोतिए
पाटये सुरसरी धार.
यहाँ कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रकृति रूपिणी शक्ति अपने पुरुष में प्रेरणा के स्वर भर सृष्टि का सन्देश दे रहीं हो ! शक्ति के बिना शिव शव मात्र रह जाते हैं. कहीं इसीसे सृजन का बीज लेकर कामायनी में जयशंकर प्रसाद की ' श्रद्धा ' अपने मनु को यह सन्देश देते तो नहीं दिखती कि :
"कहा आगंतुक ने सस्नेह , अरे तुम हुए इतने अधीर
हार बैठे जीवन का दाँव , मारकर जीतते जिसको वीर."
 जो भी हो, इन लोक लुभावन लौकिक पंक्तियों में विद्यापति ने एक ओर भक्ति की सगुन सुरसरी की धारा बहायी है तो फिर उसमें उच्च कोटि के आध्यात्मिक दर्शन की चाशनी भी घोल दी है .
हमारे ग्रामीण गाइड महोदय हमें महत्वपूर्ण सूचनाएं दे रहे थे. अभी हाल में बिहार सरकार के सौजन्य से विद्यापति महोत्सव का आयोजन होने लगा है. उनके जन्म के काल के बारे में कोई निश्चित मत तो नहीं है लेकिन यह माना जाता है कि चौदहवीं शताब्दी के उतरार्ध में उनका जन्म हुआ था. कपिलेश्वर महादेव की आराधना के पश्चात श्री गणपति ठाकुर ने इस पुत्र रत्न को पाया था. उनकी माता का नाम हंसिनी देवी था. बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के स्वामी विद्यापति को अपने बालसखा और राजा शिव सिंह का अनुग्रह प्राप्त हुआ. उनके दो विवाह हुए . कालांतर में उनका परिवार बिसपी से विस्थापित होकर मधुबनी के सौराठ गाँव में बस गया. उनकी कविताओं में उनकी पुत्री ' दुल्लहि ' का विवरण मिलता है.
 हमारे सरस मार्गदर्शक बड़ी सदयता से हमें विद्यापति से जुडी किंवदंतियों की जानकारी दे रहे थे. साधारण धोती गमछा लपेटे ऊपर से साधारण दिखने वाले सज्जन की आतंरिक विद्वता अब धीरे धीरे प्रकाश में आने लगी थी. उन्होंने बताया कि विद्यापति शिव के अनन्य भक्त थे . उनकी भक्ति की डोर में बंधे शिव उनके दास बनने को आतुर हो उठे. वह 'उगना' नाम के सेवक के रूप में उनके यहाँ नौकरी मांगने आये. विद्यापति ने अपनी विपन्नता का हवाला देकर उन्हें रखने से मना कर दिया. उगना बने शिव कहाँ मानने वाले! उन्होंने उनकी पत्नी सुशीला की चिरौरी कर मना लिया और उनके नौकर बन उनकी सेवा करने लगे. एक दिन उगना अपने मालिक के साथ चिलचिलाती धुप में राजा के घर जा रहा था. रास्ते में मालिक को प्यास लगी. आसपास पानी नहीं था. उन्होंने उगना को पानी लाने को कहा. उगना पानी लाने गया. थोड़ी दूर जाकर उगना बने शिव ने अपनी जटा से गंगा जल निकाला और पात्र में लेकर मालिक को पीने के लिए दिया. माँ सुरसरी के अनन्य सेवक, भक्त और पुजारी बेटे विद्यापति को गंगाजल का स्वाद समझते देर न लगी. उन्हें दाल में कुछ काला नज़र आया और लगे जिद करने कि बता ये गंगा जल कहाँ से लाया! मालिक की जिद के आगे उगना की एक न चली . उसे अपने सही रूप में आकर रहस्योद्घाटन करना पड़ा, लेकिन एक शर्त पर कि मालिक भी यह भन्डा किसी के सामने नहीं फोड़ेगा , नहीं तो शिव अंतर्धान हो जायेंगे ! दिन अच्छे से कटने लगे . मालिक भक्त और सेवक भगवान !  एक दिन मालकिन सुशीला ने उगना को कुछ काम दिया. ठीक से नहीं समझ पाने से वो काम उगना से बिगड़ गया . फिर क्या! मालकिन भी बिगड़ गयी और 'खोरनाठी' (आग से जलती लकड़ी) से उगना की पिटाई शुरू हो गयी. विद्यापति ने ये नज़ारा देखा तो रो पड़े. उनके मुंह से बरबस निकल पड़ा " अरे ये क्या कर डाला? ये तो साक्षात शिव हैं!" बस इतना होना था कि शिव अंतर्धान हो गए. उगना के जाते ही विद्यापति विक्षिप्त हो गए और महादेव के विरह में पागलों की तरह विलाप करने लगे. निश्छल भक्त की यह दुर्दशा देखकर महादेव की आँखों में आंसू आ गए. वह फिर प्रकट हुए और भक्त से बोले " मैं तुम्हारे साथ तो अब नहीं रह सकता लेकिन प्रतीक चिन्ह में लिंग स्वरुप में तुम्हारे पास स्थापित हो जाउंगा. मधुबनी जिले के भगवानपुर में अभी भी उगना महादेव अपने भक्त शिष्य को दिए गए वचन का निर्वाह कर रहे हैं.
हमें इस कहानी को सुनाने के बाद ग्रामीण महोदय ने एक लोटा मीठा जल पिलाया जिसे हमने मन ही मन उगना का गंगाजल ही माना. फिर उन्होंने विद्यापति के माँ गंगा से अनन्य प्रेम और उत्कट भक्ति की अमर कथा सुनायी. काफी वय के हो जाने के बाद विद्यापति ठाकुर (मिथिला के इस कोकिल कवि का पूरा नाम) रुग्ण हो चले थे  और अपना अंतिम समय अपनी परम मोक्षदायिनी माँ भागीरथी के सानिद्ध्य में बिताना चाहते थे . इसे यहाँ गंगा सेवना कहते हैं. कहारों ने विद्यापति की पालकी उठायी और सिमरिया घाट की ओर चले. पीछे पीछे पूरा परिवार. रात भर चलते रहे. भोर की वेला आयी. अधीर विद्यापति ने पूछा "कितनी दूर और है"? कहारों ने बताया "पौने दो कोस". पुत्र विद्यापति अड़ गया. "पालकी यहीं रख दो. जब पुत्र इतनी लम्बी दुरी तय कर सकता है तो माँ इतनी दूर भी नहीं आ सकती." पुत्र की आँखों से अविरल आंसू बह रह थे . माँ भी अपनी ममता को आँचल में कब तक बांधे रह सकती थी. हहराती हुई पहुँच गयी अपने लाल को अपने आगोश में लेने ! अधीर पुत्र ने अपनी पुत्री दुल्लहि से कहा:
दुल्लहि तोर कतय छठी माय
कहुंन ओ आबथु एखन नहाय
वृथा बुझथु संसार-बिलास
पल पल भौतिक नाना त्रास
माए-बाप जजों सद्गति पाब
सन्नति काँ अनुपम सुख पाब
विद्यापतिक आयु अवसान
कार्तिक धबल त्रयोदसी जान.
पुत्र विद्यापति को उसके जीवन का सर्वस्व मिल चुका था. उसका पार्थीव शरीर अपनी माँ की गोद में समा चुका था. उसके अंतस्थल से माता के चरणों में श्रद्धा शब्दों का तरल प्रवाह फुट रहा था:
बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे
छोड़इत निकट नयन बह नीरे
करजोरी बिलमओ बिमल तरंगे
पुनि दरसन होए पुनमति गंगे
एक अपराध छेमब मोर जानी
परसल माय पाय तुअ पानी
कि करब जप ताप जोग धेआने
जनम कृतारथ एकही सनाने 
माँ गंगा अपने बेटे को गोदी में लिए बहे जा रही थी. नयनों में स्मृति नीर लिए हम वापस अपने गंतव्य को चले जा रहे थे............." उगना के मालिक विद्यापति अपनी अंतिम गति को प्राप्त कर रहे थे!" 

Saturday, 1 July 2017

बरसाती आवारा !

अगिन विरह की पवन जो बोता,
दुबकी दुपहरी सूख गया सोता।

जले खेत हो मिट्टी राखी,
मुरझाये हो मन के पाखी।


तड़पे वनस् पति और पक्षी,
प्रेम पाती को तरसी यक्षी।

दिवस उजास और रातें काली,
आकुल व्याकुल वसुधा व्याली। 


प्यासी नदियाँ, सूखे कुएँ
चील चिचियाती, उठते धुएँ
धनके सनके, सूरज पागल,
अब भी भला, न बरसे बादल!


सूरज तपता धरती जलती
कण कण माटी का रोया।
बादल मैं! आंसू से मैंने
धरती का आँचल धोया।


रिस रिस कर मैं रसा रसातल
रेश रेश रस भर जाता हूँ।
यौवन जल छलकाकर के
सरित सुहागन कर जाता हूँ।


उच्छ्वास मैं घनश्याम का,
चेतन की धारा अविरल ।
प्राण पीयूष पा आप्लावन,
चित पुलकित प्रकृति पल पल।


प्राणतत्व मै, मनस तत्व मै
जीव संजीवन धारा हूँ,
विकल वात वारिद बादल बस !

बरसाती आवारा हूँ !

Wednesday, 31 May 2017

अदृश्य दोलन

           (१)
काल प्रवाह नही यह दृश्य चित्रपट,
अदृश्य दोलन है, समय के साथ।
(यदि हो समय  का
कोई अस्तित्व तो!)
विराट ब्रह्मांड , बिंदुवत कण
और स्थूल तत्व , सूक्ष्म मन।

               (२)
आकाशगंगा , सौरमंडल,
निर्वस्त्र तिमिर ,
अजस्त्र प्रभामंडल।
खगोल से भूगोल
और अनुभूत सत्य से
रहस्यमय ब्लैकहोल तक।

        (३)
प्रसार, संकुचन
सरल, आवर्त, दोलन!
अपनी गति, अपना काल।
अपना दोलन विस्तार।
अपनी कला दुहराता
अनवरत , बार  बार।

          (४)
उदय से प्रलय और
क्षय से विलय तक
डोलता सृष्टि संसार।
बाहर और अंदर
लहरों की लय पर
स्पंदित समंदर समाहार!

               (५)
प्रशांत पुरुष की खूंटी से लटकी,
गोलक प्रकृति! दोलन में भटकी।
सारा व्यापार, मिलाने को साम,
आवृति की, आत्मा का।
गुनगुनाने को अनहद अनुनाद,
महसूसते परम का अनंत आह्लाद!

Thursday, 18 May 2017

प्रेम पंथ के पाथेय!

पता नही क्यों भावुक बनकर,
सपनो में, मैं खो जाता हूँ।
स्वप्न लोक में, स्वप्न सखा संग,
बीज प्यार के बो जाता हूँ।

परम ब्रह्म के भरम विश्व में,
पीव जीव उसकी माया है।
दृश्य जगत के सत चेतन की
सपना अपरा प्रच्छाया है।

सपनो के अंदर सपनो में
कभी मचलता कभी सिसकता।
अभीप्सा ये जिजीविषा की
माया डोर में कसा खिसकता।

प्रेम पुरुष अनुराग तुम्हारा
जीवन रस से कर आपूरित।
प्रकृति रानी सजे तुम्हारी
प्राणों के कण होकर पुलकित ।

प्राण पाश, हे प्राण! तुम्हारे,
श्वासों में सुरभि  घोल गए।
दे अंग अंग ऊष्मा चेतन ,
बंधन ग्रंथि के खोल गए।

घोल रही मधु रास रागिनी
प्रीत वसंत की अमराई जो,
ज्ञात प्रिये यह माया चित्र है,
परम सत्य की परछाई वो!

प्रीत समाधि में उतरेंगे,
प्रेम पंथ के पाथेय हम।
कर स्वाहा सर्वस्व विसर्जन,
द्वितीयोनास्ति, एकोअहम।



Saturday, 13 May 2017

माँ मेरा उद्धार करो!

वसुधा के आंगन में गुंजी किलकारी,
पय पान सुधा संजीवन दात्री महतारी।
साँसों मे घोली माँ ने वत्सल धारा,
मैं प्राणवंत पुलकित नयनो का तारा।

सब अर्पण तर्पण किये तूने न्यौछावर,
जननी जीव जगत जंगम चेतन स्थावर।
शीश समर्पण माँ तेरे अंको को,
सह न पाये विश्व विषधर डंकों को।

मञ्जूषा ममता की, माँ, अमृत छाया,
निमिष निमिष नित प्राण रक्त माँ पाया।
क्रोड़ करुणा कर कण कण जीवन सिंचित,
दृग कोशों से न ओझल हो तू किंचित।

पथ जीवन माँ, मैं पगु अनथक, तेरी शीतल छाया,
पा लूँ मरम मैं भेद सत्य का , जीव, ब्रह्म और माया।
अब जननी गोदी में तेरे, प्यार करो, मनुहार करो,
मैं शरणागत, कुक्षी में तेरी, माँ मेरा उद्धार करो।

Wednesday, 10 May 2017

हँसा के पिया अब रुला न देना.

तथागत यशोधरा के द्वार पधारते हैं और उन्हें बोधिसत्व की ज्ञान आभा से ज्योतित कर अपनी करुणा से सराबोर करते हैं:-
   प्रीता प्राणों के पण में,
       राजे चंदा का संजीवन/
       बोधिसत्व पावन सुरभि, 
       महके तेरा तन-मन हर क्षण/

       तू चहके प्रति पल चिरंतन,
        भर बाँहे जीवन आलिंगन/
        मै मूक पथिक नम नयनो से. 
       कर लूँगा महाभिनिष्क्रमण !

यशोधरा अपने सन्यासी पिया के चिन्मय ज्ञान का पान कर फूले नहीं समाती. भवसागर से मुक्ति की यात्रा में उनकी सहगामिनी बनने को तत्पर होती है और मन ही मन अपनी भावनाओं से तरल हो रही है:-
    यह कैसा चिर स्पंदन!
    देखो, जागे ये निर्मल मन.

    उर पवित्र मंद मचले कम्पन,
    उतरे परिव्राजक मन दर्पण.

    बोधिसत्व कपिलायिनी भद्रा बन,
    तरल अंतस पसरे छन छन.

    उपवासी अन्तेवासी हूँ,
    प्रेम पींग की झुला न देना .

    मैं जागी अब सुला न देना ,
    हँसा के पिया अब रुला न देना.   


Tuesday, 9 May 2017

ज़म्हुरियत : हिन्दुस्तानी तर्ज़-ए-हुकूमत

ज़म्हुरियत
हिन्दुस्तानी तर्ज़-ए-हुकूमत
अवाम और सियासी दल
अबला और सबल
यूं , जैसे
बेगम और बादशाह !
एक बेदम 'वाम'
दूसरा दमदार 'दाम'

बेदम बेगम!
बिस्तर की बांयी कोर पर
कुंथती, कराहती बांयी करवट,
स्वघोषित क्रांतिदूत.....वामांगी!
आँखों से तापती सेकुलर आगि!

और दमदार बादशाह!
दांयी छोर पर,
दक्षिणपंथी करवट लिए,
दहाड़ता बहुरंगी
राष्ट्रदूत भक्त  बजरंगी!

दोनों मज़बूर करवटें बदलने को,
सिर्फ सियासी सहूलियतों के खातिर.
वैशाली की विरासत ले, प्रगतिवादी पंथ,
इज्म एवं वाद की टकसाल में ढलते
अवसर की तलाश में
लोकशाही के खातिर
तथागत और आम्रपाली से 
साथ साथ चलते !

Thursday, 27 April 2017

मौन !

 मैं राही, न ठौर ठिकाना,
जगा सरकता मैं सपनो में ।
डगर डगर पर जीवन पथ के
छला गया मैं बस अपनो से ।

भ्रम विश्व में, मैं माया जीव!
अपने कौन, बेगाने कौन?
संसार के शोर गुल में
सृष्टि का स्पंदन मौन।

मौन नयन, मौन पवन,
मौन प्रकृति का नाद।
मौन पथ और मौन पथिक
मौन यात्रा का आह्लाद।

मन की बाते निकले मन से
मौन मौन मन भाती।
और मन की भाषा मे,
मन मौन मीठास बतियाती।

मौन हँसी है, मौन है रुदन
मौन है मन की तृष्णा।
दुर्योधन की द्युत सभा मे,
मौन कृष्ण और कृष्णा।

जन्म क्रंदन और मौन मरण,
मौन है द्वैत का वाद।
मन ही मन मे मन का मौन,
मौन पुरुष प्रकृति संवाद।

Saturday, 22 April 2017

रेस्जुडिकाटा!

जिंदगी की फटी पोटली से झांकती,
फटेहाल तकदीर को संभाले,
डाली तकरीर की दरख्वास्त।
अदालत में परवरदिगार की!
और पेश की ज़िरह
हुज़ूर की खिदमत में।
.......    ......     .....
मैं मेहनत कश मज़दूर
गढ़ लूंगा करम अपना,
पसीनो से लेकर लाल लहू।
रच लूंगा भाग्य की नई रेखाएं,
अपनी कुदाल के कोनो से,
अपनी घायल हथेलियों
की सिंकुची मैली झुर्रियों पर।
लिख लूंगा काल के कपाल पर,
अपने श्रम के सुरीले  गीत।
सजा लूंगा सुर से सुर सोहर का
धान की झूमती बालियों के संग।
बिठा लूंगा साम संगीत का,
अपनी मशीनों की घर्र घर्र ध्वनि से।
मिला लूंगा ताल विश्वात्मा का,
वैश्विक जीवेषणा से प्रपंची माया के।
मैं करूँगा संधान तुम्हारे गुह्य और
गुह्य से भी गुह्यतम रहस्यों का।
करके अनावृत छोडूंगा प्रभु,
तुम्हारी कपोल कल्पित मिथको का।
करूँगा उद्घाटन सत का ,
और  तोडूंगा, सदियों से प्रवाचित,
मिथ्या भ्रम तुम्हारी संप्रभुता का।
निकाल ले अपनी पोटली से,
मेरा मनहूस मुकद्दर!
.....    ......       .........
आर्डर, आर्डर, आर्डर!
ठोकी हथौड़ी उसने
अपने जुरिस्प्रूडेंस की।
जड़ दिया फैसले का चाँटा!
रेस्जुडिकाटा!!!
रेस्जुडिकाटा!!
रेस्जुडिकाटा!

Thursday, 20 April 2017

विभ्रम 'क्रम-भ्रम' का!

सनसनाती हवाओं का श्मशानी सीना,
धू धूआता धुंआ, धनकती चिता,
नाक के नथुनों में भरती
मांसल गंध, अर्द्ध झुलसी लाश,
कानों को खटकाती
'चटाक' सी चटकती
टूटती उछलती हड्डी

खड़ी-पड़ी आकृतियाँ
इंसानी सी शक्लों की
झोंकें हैं अपने को
अपनी अपनी लय में,
भर भर आँखों से
कराने को निर्जीव देह
का अग्नि स्नान चिता पर

और इस धधकते शरीर का ' मैं '
निमग्न, निहारने में निर्निमेष!
कभी दहकती अपनी निर्जीव देह
आग की थिरकती लपटों में, और
कभी सिहुरती निहुरती इर्द गिर्द
सजीव सी श्लथ लाशों को
जगत की जिजीविषा की ज्वाला में

अब जाके जगती हैं ज्ञान की इन्द्रियाँ,
जैसे जैसे, जर्रा जर्रा, झुलसता है इसका.
छूता हूँ प्रकम्पित पवन, तिल तिल कर
अश्मों में बदलते अंग,उनको झुलसाती लपटें,
छिड़के अभिमंत्रित जल की शीतलता,
जलती लकड़ियों के घहराकर गिरने का स्वर
और चंद कदम दूर चकराती चीलों की चीत्कार!

अब जाके अघाई हैं अपलक पलकें!
निहारता हूँ पल पल मन भर
सोचता हूँ 'बुद्ध' बन बुद्धि भर
और भरता हूँ अंतस अहंकार भर
पर मन, बुद्धि, अहंकार मिलकर
सब फलित हो जाते हैं महाशून्य में
समाहित होकर आत्मा के उत्स में

.......................सत्ता हीन 'सत' में,
जहां मैं अविकार, सूक्ष्म, शांत, अज,
अनादि, नित्य, अनंत, शाश्वत चित्त!
समाहित, परम आनंद के महाशून्य में  
और अहसासता, शून्य का चेतन आनंद!
'नहीं होने' से 'होते हुए', 'नहीं होना' हो जाना
भोगता इसी 'क्रम का भ्रम' और ' भ्रम का क्रम'!

स्पंदन

 (१)
तूने अपनी सोच बताई।
मैं नही सोच पाता,
तुम्हारे लिए!
अब सोच रहा हूँ,
सोच के किस स्तर पर
सोच रहे हैं हम ?
मन, बुद्धि या अहँकार!
आत्मा तो अज अविकार।
सोच के संकुचन से रीता।

           (२)
अच्छा हुआ, नही किया,
तूने अध्यारोप
कि,  घोलूँ मैं तुममें
विकार।
अंतस की आत्यंतिक
रूहानियत में रचे बसे,
मेरे प्यार।
निर्गुण, निरीह, निराकार।
अनंत, अपार।

             (३)
गूँज, विसरित स्वर-सुरों की मेरी
विस्फारित, पाती विस्तार।
आशा की भुकभुकाती ढ़िबरी
कि सुन रही होगी सूनेपन में,
अगणित प्रक्षिप्त छवियों
में से ही तुम्हारी कोई एक!
इस अनहद नाद को मेरे,
सरियाने को साम,
स्पंदन की शाश्वतता का!

Tuesday, 18 April 2017

'तुम' और 'मैं'

तुम्हारी ' शाश्वतता।
तिल तिल घुलती
'मेरी' सत्ता।
और विश्वात्मकता,
में होता विलीन,
विलंबित ताल में
'मेरा' विश्व!

भटकता, 'मैं'  सांत!
विराट अनंत में 'तुम्हारे'।
विस्मृत कर कि
'तुम्हारे' असीम,अखंड
अनंत, अनगढ़ विस्तार
की ज्योतिर्मयी अक्षिप्र  छाया
और 'तुम्हारे' निर्गुण  की
'मैं' सगुण माया!

प्रभु, मुक्त करो
इस भेद से!
'तुम' और 'मैं' के!

Sunday, 16 April 2017

भारत में ब्रितानी साम्राज्य का तिमिर काल (AN ERA OF DARKNESS : THE BRITISH EMPIRE IN INDIA'----By Shashi Tharoor)


आज २०१७ में हम गाँधी के चंपारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष मना रहे हैं. यह ब्रितानी हुकूमत के पैरों तले पिसती कराहती चंपारण की कृषक जनता की सिसकियों को स्मरण करने का समय है और उस अत्याचार से सत्य और अहिंसा के शस्त्र से त्राण दिलाने वाले गाँधी की वीर गाथा को नमन करने का मुहूर्त है. अब प्रश्न यह उठता है कि क्या यह समय उस शासन परम्परा के उत्तराधिकारी ब्रिटेन के वर्तमान शासकों के अपने अत्याचारी पूर्वजों के पाप कर्म के प्रायश्चित करने का नहीं है ! आज से दो वर्ष बाद हम २०१९ में जालियांवाला बाग़ में जनरल डायर के क्रूर कुकृत्यों से ढेर अपनी हुतात्माओं की सौंवी बरसी मनाएंगे. क्या उस ब्रितानी बेशर्मी पर पश्चाताप करने अँगरेज़ प्रधानमंत्री उस बाग में घुटनों के बल बैठेंगे और भारतीय जनमानस से माफ़ी की गुहार लगायेंगे! और शनैः शनैः काल प्रवाह में ऐसे कितने जयन्ती शतकों का हम साक्षात्कार करेंगे जब हमारा स्वतंत्र राष्ट्रीय मानस उस तथाकथित सभ्य अँगरेज़ प्रजाति से प्रायश्चित की परम्परा के निर्वाह के रूप में क्षति पूर्ति की आशा करेगा. इन्ही भावनाओं को अपनी ओजस्वी वाणी दी है शशि थरूर ने अपने बहुचर्चित व्याख्यान में ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन के समक्ष. और उससे भी धारदार ढंग से परोसा है अपनी पुस्तक ' AN ERA OF DARKNESS: THE BRITISH EMPIRE IN INDIA' अर्थात " भारत में ब्रितानी साम्राज्य के तिमिर काल " में ! इस पुस्तक का ताना बाना उपरोक्त बहुचर्चित 'ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन व्याख्यान' की पृष्ठभूमि में बुना गया है अद्भुत आंकडों और ऐतिहासिक घटना क्रम के आलोक में. श्री थरूर ने बड़ी विद्वतापूर्ण ढंग से ब्रितानी हुकूमत के कदमो में कुचलते औपनिवेशिक हिन्दुस्तान के अद्यतन शोषण का सर्वांग चित्र खींचा है और यह भली भांती प्रमाणित कर दिया है कि अब समय माकूल है जब ब्रिटेन की वर्तमान सरकार कम से कम अपने पुराने कुकर्मों पर लज्जा की अनुभूति, प्रायश्चित सम्प्रेषण और क्षमा याचना का ही मुआवजा  दे. थरूर ने पुस्तक की प्रस्तावना में स्पष्ट किया है कि उनकी प्रस्तुति ब्रिटिश उपनिवेश के रूप में भारत के अनुभवों की दास्तान है.
अपनी पुस्तक की भूमिका में थरूर ने थोड़ा आत्म निरिक्षण और आत्मावलोकन भी किया है कि क्या स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरांत उन तमाम विसंगतियों से हम उबर पाए हैं जिसका दोषारोपण हम बड़ी सरलता से अंगरेज़ प्रभुओं पर थोपते रहे हैं! 'टाइम ' पत्रिका  में शिखा डालमिया की टिपण्णी ' शास्त्रार्थ में विजय-श्री संभवतः शशि थरूर को शिरोधार्य हो किन्तु नैतिक विजय ने भारत को सर्वदा छला ही है.' को थरूर ने बड़ी आत्मीयता से अंगीकार किया है. साथ ही वह इस तथ्य से भी सहमत नज़र आते हैं कि चाहे हर्जाने का कितना भी बड़ा मूल्य भारत को सौंप दिया जाय , उसके समुचित उपयोग एवं जरुरतमंदो तक उसकी पहुँच की आशा स्वतंत्र भारत के अद्यतन सत्ता संचालकों की कर्तव्यनिष्ठा के आलोक में धूमिल ही है. उदाहरण के तौर पर भारतीय खाद्य निगम के भंडारों से २०१० में दस हज़ार लाख टन खाद्यान्नों की बरबादी  इस बात की पुष्टि करती है कि अतीत के अकाल इन अभिजात्य सत्ताधीशों की जाहिलता और अक्षमता की ही अभिव्यक्ति थे. राजनितिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर थरूर ने स्वातंत्र्योत्तर शासकों की जम कर खिंचाई की है कि मुलभुत शिक्षा व साक्षरता की अवहेलना, समाजवाद की सनक, लाइसेंस राज की खनक और चुनिंदे धनकुबेर औद्योगिक घरानों की गोद में उनकी सर्व समर्पित अपवित्र प्रेम क्रीड़ा ने देश को दुर्दशा की ऐसी दिशा में धकेल दिया कि १९५० से १९८० के बीच सकल घरेलु उत्पाद के पैमाने पर यह मेक्सिको और दक्षिण कोरिया से भी पिछड़ गया.
किन्तु, महज़ इन असफलताओं की बुनियाद पर निस्संदेह हम ब्रितानी हुकूमत को उनके अतीत के काले कारनामों से न तो बरी कर सकते है और न ही हमारे शासकों की अकर्मण्यता के अंगोछे से ब्रिटिश कलंक को पोंछा जा सकता है. दीगर है कि आप बीस से भी अधिक दशकों के शोषण से दहकते घाव को छः सात दशकों में तो नहीं ही भर सकते. इतिहास के भिन्न भिन्न कालखंडो का मूल्यांकन भी उस काल की अपनी विशिष्टताओं और परिस्थितिजन्य कालगत विलक्षणताओं के विस्तार में ही किया जा सकता है. फौरी तौर पर ब्रितानी हुकूमत अतीत के अपने काले औपनिवेशिक कारनामो से मुंह नहीं मोड़ सकती और उसे प्रायश्चित का मूल्य चुकाना ही पड़ेगा. चाहे, वह सांकेतिक तौर पर २०० वर्षों तक एक पौंड प्रति वर्ष की दर से ही क्यों न हो!
पोलैंड में यहूदियों के सर्वनाशिक विध्वंस के लिए जर्मनी के चांसलर विलि ब्रांट ने वारसा की यहूदी बस्ती में घुटनों के बल बैठकर उस कुकृत्य के लिए क्षमा याचना की थी भले ही उस समय तक क्षमा देनेवाला न कोई यहुदी समुदाय वहाँ बचा था और न ही नाजियों के द्वारा स्वयं सताए गए समाजवादी ब्रांट का उस यहूदी सत्यानाश की प्रक्रिया से कोई सम्बन्ध था.  किन्तु, ब्रांट की मानवीय मूल्यों से ओत प्रोत यह तरल भाव-भंगिमा इतिहास की शुष्क बंज़र भूमि में एक ऐसी त्यागमयी ममतावात्सल भागीरथी का अनुपम अमृत प्रवाह था जो  इस वसुंधरा को सदियों तक आप्लावित करती रहेगी. यह तवारीख की एक अनोखी मिशाल थी जर्मनी की नैतिक जिम्मेदारी की विनम्र स्वीकारोक्ति की.
ब्रितानी हुकूमत का काल अर्वाचीन न सही, इतना प्राचीन भी नहीं है कि इसकी स्मृति भारतीय लोक मानस पटल से बिलकुल विलुप्त हो गयी हो! संयुक्त राष्ट्र संघ की जनगणना से सम्बंधित एक समिति के प्रतिवेदन में प्राप्त आंकड़े ये दर्शाते है कि हिन्दुस्तान में ८० वर्ष से अधिक वय के उन व्यक्तियों की संख्या साठ लाख है जिन्होंने विलायत की रानी के विध्वंस स्वरुप को अपनी बाल स्मृतियों में संजो कर रखा है. उनके बाद की पीढी की ५० से ६० की उम्र वाली उनकी जिन संततियों ने उनके मुंह से यह खौफनाक दास्तान सूनी है, यदि उनको भी जोड़ दिया जाय तो यह संख्या दस करोड़ के आसपास पहुँच जाती है जो स्वयं एक इंग्लैंड की आबादी के करीब है.
आज माकूल समय था जब इंग्लैंड के प्रधान मंत्री चंपारण की धरती पर जाते और सत्य और अहिंसा की इस पुण्यभूमि में सजदा कर सार्वजनिक क्षमा याचना करते अपने पूर्वजो के पातक कर्म का और अपनी आत्मा को पवित्र कर लौटते अपने देश को !  या  फिर दो बरस बाद ही सही, जालियांवाला बाग़ के रक्त रंजित रज का तिलक लगाकर उन शहीद हुतात्माओं की याद में दो मिनट के मौन से माफ़ी मांग लेते ! २०१३ में डेविड केमरून का कास्मेटिक कथन ' घोर शर्मनाक कुकृत्य ' और १९९७ में रानी एलिजाबेथ की औपचारिक यात्रा और दर्शक पुस्तिका पर उनका अनुष्ठानिक हस्ताक्षर पश्चाताप की प्रबल पीड़ा के सम्मुख ऊंट के मुंह में जीरा ही है. एक वृहत राष्ट्रीय सत्ता के रूप में वर्तमान ब्रितानी साम्राज्य उन क्रूर कारनामों के लिए अवश्य उत्तरदायी है जिनके विषैले दंशों से इसके अतीत के शासकों ने इस उपनिवेश को छलनी किया. और शायद इसी उत्तरदायित्व भाव से अनुप्राणित थे कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन टूड जब २०१६ में ' कामगार मारू' के मृत भारतीय अप्रवासियों के मामले में उन्होंने माफी माँगी. और नहीं तो कम से कम ब्रिटिश लेबर नेता जेरेमी कॉरवीन द्वारा सुझाए प्रायश्चित की प्रक्रिया को अमली जामा पहनाया जा सकता है. ब्रिटेन के विद्यालयों के पाठ्यक्रम में उपनिवेशों पर ब्रिटिश शासन के क्रूर कहर के इतिहास को शामिल किया जाय ताकि आज की अंगरेज़ पीढ़ी कम से कम अपनी आँखों में उन घटनाओं से कुछ पानी भर सके! कम से कम नैतिकता की भाव धरा पर ही सही थेम्स की धारा बह तो जाय !
थरूर अपने पुस्तक की प्रस्तावना में उन अभिजात भारत वंशियों का कान उमेठने से भी बाज नहीं आते जिन्होंने अंगरेजों के अत्याचार कर्म में उनके ताल से ताल मिलाकर अपने सहकार धर्म का पूरी स्वामी भक्ति से पालन किया.
विलायती प्रासाद के प्रसाद की छाया में पलने विचरने वाले भारतीय राज घराने अपनी शान ए शौकत के संरक्षण के एवज़ में शोषण तंत्र में शामिल हो गए. प्रथम विश्वयुद्ध में अपने राजकोष के पैसे से अंगरेजों का खजाना क्रिकेट कुमार राजा रंजित सिंह ने चापलूसी में इस बात की परवाह किये बिना भर दिया कि राज्य की जनता भयंकर दुर्भिक्ष में त्राहि त्राहि कर रही थी. और चाटुकारिता की पराकाष्ठा तो तब हो गयी जब ब्रिटिश विजयोल्लास की आतिशबाजी में उन्होंने जनता के एक महीने का राजस्व लुटा दिया !  नीरद सी चौधरी जैसे राजसी साहित्यकारों ने विलायत की बिरुदावली गाने में कोई कसर न छोड़ी. अंगरेजों के इस महा चारण ने भारत से राज के प्रस्थान पर शोक गीत तक गाया !

थरूर ने ब्रितानी प्रायश्चित की इस क्षतिपूर्ति प्रक्रिया में भारत के साथ साथ बांग्लादेश और पकिस्तान को भी साझेदार बनाकर एक अकाट्य सत्य का उद्भेदन किया है. आखिर औपनिवेशिक इतिहास के तो ये तीनो देश संयुक्त साझेदार हैं. और साथ साथ मेरी दृष्टि में यह भी विस्मृत नहीं होना चाहिए  कि आज़ादी की लड़ाई हमारी साझी विरासत है औए ये जयंती शतक भी हम तीनो का साझा त्यौहार है, चाहे वो चंपारण की सत्याग्रह शताब्दी हो . या जालियांवाला बाग़ की सौंवी बरखी ! ........ याद रखिये , "वह जो इतिहास को भूल जाते हैं इसे दुहराने को अभिशप्त हैं ( Those who forget the history are condemned to repeat it)"................! 
शुक्रिया, शशि थरूर ( Shashi Tharoor) ! सत्य के अन्वेषण के लिए !! यथार्थ के उदघाटन के लिए !!!

Wednesday, 12 April 2017

अर्पण

संग संग रंग मेरे मन का,
तनिक सा तुम भी भर लो ना//
भले ' भले' हो तुम तनहा में,
यादों में निमिष ठहर लो ना//

मन की महकी गलियों में,
बस दो पल हमें भी घर दो ना//
लो चंद मोती मेरी पलकों के,
मुस्कान अधर में भर लो ना//

मन उच्छल प्रिय हलचल पल पल,
तल विकल लहर ज्यों मचल मचल//
हिय गह्वर भर भाव भंवर,
आकुल नयन घन आर्द्र तरल//

अवसाद हर्ष के पार प्रिये,
पथ पावन तू मैं, पथिक सरल//
निःशब्द, मौन मैं स्थावर,
रहूं राह निहारे, अनथक अविरल//

हे हृदय हारिणी हंसिनी,
तू रासे विलास, हँसे मुक्त दंत//
गूंजे स्वर-अर्चन दिग दिगंत,
कण कण अर्पण हे पथ अनंत//