Thursday, 10 June 2021

अहंकार

 जमीन से उठती दीवारों

ने भला आसमान कहीं बांटा है!

या अहंकार के राज मिस्त्रियों ने

कभी हवाओं को काटा है!

भेद की भित्तियों के वास्तुकार! 

दम्भ के शोर-गुल में तुम्हारे

 सिमटा जा रहा समय का सन्नाटा है।

तू-तू, मैं-मैं की तुम्हारी 

तुरही की तान ने

हमेशा जीवन के संगीत 

 व लय को काटा है।

ज्वार में अहंकार की

धंसती फुफकारती भंवर-सी

तुम्हारी क्षुद्रता की भाटा है।

उठो, झाड़ो धूल अपने अहं की,

गिरा दो दीवार और महसूसो,

अपनी धरती की एकता को।

एक ही आसमान के नीचे।

Saturday, 5 June 2021

एक ऋषि से साक्षात्कार


(आज विश्व पर्यावरण दिवस पर पुनः प्रस्तुत)




(मैगसेसे पुरस्कार
, पद्मश्री और पद्मभुषण अलंकृत, चिपको आंदोलन के प्रणेता, प्रसिद्ध गांधीवादी पर्यावरणविद और अंतर्राष्ट्रीय गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित श्री चंडी प्रसाद भट्ट को समर्पित उनसे पहली मुलाकात का संस्मरण)




पोथियों में ऋषियों की गाथा पढ़ता  आया हूँ। उनके आर्ष अभियानों में आकर्षण का भाव होना स्वाभाविक है। मन करता, किसी ऐसे पुरोधा से साक्षात्कार हो और यह जन्म कृत्य-कृत्य हो जाय!  विगत  दिनों एक ऐसे ही मनीषी के दर्शन हुये जिनसे बातचीत के क्रम में ऐसा आभास  हुआ मानों जेठ की तपती दुपहरी में किसी सघन वृक्ष की छाया में उनकी अमृत वाणी की शीतल बयार का झोंका मेरे मन प्रांतर को गुदगुदा रहा हो! ये युग पुरुष थे – 'चिपको' आंदोलन के प्रणेता, श्री चंडी प्रसाद भट्ट जी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी क्षेत्र मुख्यालय, पटना  केंद्र के चौदहवें स्थापना दिवस (२२ फरवरी २०१४)  पर मेरी मुलाकात रात्री भोज में उनसे हुई। माननीय निदेशक महोदय ने हम दोनों  का परिचय करा अपने कक्ष में हमें बड़ी आत्मीयता से बिठाया।
औपचारिक परिचय के उपरांत थोड़ी ही देर में  बातचीत की मिठास में ऐसे घुल गये मानों  उनसे हमारा दीर्घ परिचय रहा हो। उत्तराखंड के गोपेश्वर के इस संत में योगेश्वर की छवि भाषित हो रही थी। पर्यावरण प्रकरण पर उनके प्रकांड पांडित्य पर मन लट्टु हो रहा था। प्रकृति के प्रत्येक परमाणु मे पल-पल पलनेवाली  परिवर्तन की प्रक्रिया,  पर्यावास पर उसकी प्रतिक्रिया और इसके प्रतिगामी प्रभाव से उनका संगोपांग परिचय उनके विद्वत-व्यक्तित्व की विराटता बखान रही थी।
बातचीत की शुरुआत ग्लेशियर के उर्ध्व-विस्थापन विषय से हुई। ग्लेशियर का ऊपर  की ओर  सिमटना उनसे निःसृत नदियों  के अस्तित्व के विगलन के खतरे की घंटी है। अगर यह चलन जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं  जब हमारी विरासत  को ढ़ोने वाली विशालकाय नदियाँ कृशकाय बरसाती नाले का रुप ग्रहण कर लें। यमुना नदी में होनेवाले ह्रास पर मेरा मन अनायास चला गया जिसका स्वरूप दिल्ली में  कमोवेश नाले की तरह ही है।  और तो और, शहर के गटर के गंदे जल और कारखानों से उत्सर्जित अवशिष्टों को समाहित करने के पश्चात तो कालिंदी अपने भाई यमराज के साथ  ही विचरण करती प्रतीत होती है।
ग्लेशियर के उपर खिसकने से ऐसे प्रदेश में पनपने और पलने वाले जंतु भी ऊपर  की ओर सिमटते चले जायेंगे। रिक्त स्थान मे वनस्पतियों का उद्भव होगा जिससे हिमखंडों के उर्ध्व-गमन को और गति मिलेगी और  पर्यावासीय पतन को बल मिलेगा। ढ़ेर सारी प्रजातियों के विलुप्त हो जाने का संकट गहरा जायेगा। उन्होने उदाहारण के तौर पर हिम प्रदेश में रहने वाले याक और एक विशेष प्रकार के चूहे का भी उल्लेख किया।
ग्लेशियल-शिफ्ट तो ऐसे एक वैश्विक घटना है, किंतु दक्षिण एशिया और मुख्यतः हिंदुस्तान की सभी प्रमुख नदियों का अस्तित्व अपने उद्गम-स्थल हिमालय की हलचलों से ज्यादा प्रभावित होता है। गंगा और ब्रह्मपुत्र भारत को जलपोषित करने वाली सबसे बड़ी नदियाँ  हैं, जिसमें  गंगा की भागीदारी २६% और ब्रह्मपुत्र की भागीदारी ३३% है। ग्लेशियर के उपर खिसकने का प्रभाव साफ-साफ इन नदियो में दिखने लगा है और अब ये बरसाती नदियों  की तरह व्यवहार करने लगी हैं।  उत्तराखंड की तुलना में नेपाल  का हिमालय बिहार से नजदीक है जहां से निकलने वाली तमाम नदियाँ  बरसात मे बाढ़ का कहर ढा रही हैं।  कोशी की  प्रलय-लीला  इस प्राकृतिक विपर्ययता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। माउंट एवरेस्ट के उत्तर में कोशी की उद्गम-स्थली है। नेपाल मे वनों की कटाई का दुष्प्रभाव सीधे-सीधे वहाँ  के ग्लेशियरों पर पड़ता है।  और, सच तो यह है कि प्रकृति हमारे दंश से ज्यादा अभिशप्त है जिसे समय-समय पर अपने प्रकोपों के रुप में हमें चुकता  कर  रही है। इस बात को भली-भाँति  समझने का माकूल मौका आ गया है। क्षेत्रों को सदाबहार बनाये रखने में ग्लेशियर की अहम भूमिका है। इस हकीकत से अब और मुंह  मोड़ना मारक साबित  हो  सकता है। इसलिये इस तथ्य पर और अध्ययन एवम संधान की आवश्यकता है। यदि सही वक्त पर समुचित कदम उठा लिये जायें तो केदारनाथ जैसी घटनाओं को रोक न सही , कम-से-कम उनकी मारक क्षमता पर  तो अंकुश लगाया ही जा सकता है। नदियों के सिकुड़ने का धरती की जल-धारण-क्षमता पर काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
बात बढ़ते-बढ़ते नदियों को जोड़ने की महत्वाकांक्षी योजना पर आ गयी। इस योजना पर उन्होनें सतर्कता बरतने की सलाह दी। बरसात में तो बात बन जायेगी, परंतु असली समस्या तो गर्मियों की है जब पीने के पानी के भी लाले पड़ जाते हैं। उन्होने कर्नाटक और तमिलनाडु के जल विवाद की ओर ध्यान खींचा। मैंने उनका ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित किया कि एक ही मौसम में जब बिहार की नदियाँ  उफनती रहती हैं,  बिहार के ही कुछ भाग और झारखंड की धरती सूखे से दरकती रहती है। तो, क्यो नहीं नदियों मे बहने वाली जलराशि का एक समेकित क्षेत्रीय नक्शा तैयार किया जाय और एक क्षेत्र की अतिरिक्त जलराशि को जलहीन क्षेत्रों में  ले जाया जाय?  उनका मंतव्य था कि जब नदियों को जोड़ने के लिये भूमि के सतह पर या भूमिगत जलमार्ग बनाये जायेंगे तो उस मार्ग से जल का प्रवाह होगा जो कभी सूखे थे। ऐसी स्थिति में उस क्षेत्र के पर्यावरण एवम पर्यावास पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखना होगा। साथ ही, विस्थापन की सामाजिक त्रासदी से निपटने की ठोस रुपरेखा तय करनी होगी। फिर, अतिरिक्त जलराशि को परिभाषित करते समय जल बहुल क्षेत्र के पीने के पानी और सिंचाई की स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखना होगा।
स्थानीय जल प्रबंधन की आवश्यकता के संदर्भ में उन्होनें बिहार  का विशेष उल्लेख करते हुए इसके कुप्रबंधन को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जल के समुचित प्रबंधन के आलोक  में समझाया। १८५७ में गंगा नहर के निर्माण के उपरांत सिंचाई की समुचित व्यवस्था से वहां की भूमि हरी-भरी हो गयी और मेरठ , मुज़फ्फरनगर एवम पड़ोसी क्षेत्रों के किसान करोड़पति! ठीक इसके उलट बिहार में  प्रचुर उर्वरा शक्ति की माटी और जल का अकूत भंडार होने के बावजूद यहां के किसानों के पास सिर्फ बदहाली और गरीब मज़दूरों का पलायन!  गंगा नहर में गंगा के पानी को स्थानीय उपयोग में ले लिये जाने के बाद तो इस नदी की हालत कानपुर से लेकर इलाहाबाद और कमोवेश वाराणसी तक तो पतली ही रहती है।  बिहार में आने तक ढेर सारी नदियों  का समागम गंगा के हिस्से आ जाता है और वह गर्भवती ललना के लावण्य से लबरेज़ हो जाती है। यहां आते-आते उसे घाघरा से २०%, यमुना से १६% और गंडक से ११% की अतिरिक्त जलराशि  प्राप्त  हो  चुकी  रहती है। इसके अलावे पुनपुन, सोन एवम अन्य जलधाराओं  का  भी  सान्निध्य इसे प्राप्त होता है। कुल मिलाकर ५०% अतिरिक्त जलराशि का कोष होता है बिहार में गंगा की गोद में। फिर, देश की समूची बेसीन का कोशी का बेसीन १% है जबकि कोशी की जलराशि  १३%। अब जल के इस अक्षय कोष के बावजूद जल कुप्रबंधन से शापित इस प्रदेश और इसके कृषकों की कहानी करुणा से सिंचित है। दूसरी तरफ,  नहरों का जाल बिछा जल के समुचित प्रबंधन से पाँच नदियों का प्रदेश, पंजाब, अपनी कृषि उपलब्धियों के कसीदे काढ़  रहा है। इसलिये इस बात पर बल देने की जरुरत है कि पहले स्थानीय कमी की पुर्ति की जाये फिर अतिरिक्त जल को परिभाषित कर विस्थापन और वातावरण, पुनर्वास और पर्यावास इन सभी तथ्यों को ध्यान में  रखकर इस महत्वाकांक्षी योजना पर अमल किया जाय। उन्होने इस संदर्भ में  शासन की लापरवाही पर खेद जताया।  कुल १८ नहरों में  बिहार के हिस्से मात्र दो या तीन नहरे हैं। अगर यहाँ  नहरों का जाल बिछा रहता तो पंजाब के खेतों में काम करने  के  बजाय बिहार के लोग अपने ही  खेतों  में  काम  क्यो  नहीं करते? हालांकि इस  बात पर उन्होनें गर्व करने  से  गुरेज नहीं किया कि लोग बाहर  देश-विदेश  जायें  और सम्मानजनक पदों पर काम करें।  उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां भागीरथीगंगा और अलकनंदा जैसी नदियां ३००० मीटर की ऊँचाई पर बहती हैं जबकि सिंचाई के क्षेत्र ६००० मीटर की ऊँचाई तक अवस्थित हैं,  वहां १४% सिंचित क्षेत्र की बात तो पचाई जा सकती है लेकिन बिहार में  तो शत प्रतिशत से नीचे बात नहीं  बनती।
बाढ से जुड़े इंजीनियरिंग पक्षों पर उन्होने बडे मनोयोगपुर्वक मेरी राय जानी।  नदियों की तलहटी मे  गाद के निरंतर जमाव से होने वाले दुष्प्रभाव को मैंने उनके समक्ष रखा. गाद  के  जमा होने से नदियों की गहराई घटती है और त्रिज्या के बढ़ने से जलधारा घटे हुए  यानि कम  क्रांतिक वेग पर ही अपने समरेखीय प्रवाह को छोड़कर आराजक (टर्बुलेंट) हो जाती है और तटीय मर्यादाओं का अतिक्रमण करती बाढ के रुप में अपनी वीभत्सता परोसने लगती है। कभी-कभी अपनी अनुशासनहीन अल्हड़ता में आकुल जल-संकुल भुगोल भी बदल  देता  है। बाढ़ में इस गाद का परिमाण और  बढ़ जाता है। इस तरह बाढ़  एक ऐसा प्राकृतिक कैंसर है जो अपने साथ अपने भविष्य को भी लेकर आती है।  जरुरत इस बात की है कि गाद को काछा जाय और नदियों को गहरा बनाया जाय। पनामा और  स्वेज नहरों  में ऐसी व्यवस्था है। काछे गये गाद को किनारों पर पसारा जाय। इस उर्वर गाद  में सघन वन लगाये जायें।
उन्होनें उत्साहित  स्वर में गहरी बना दिये जाने के उपरांत नदियों को जल परिवहनके माध्यम के रुप मे विकसीत किये जाने पर भी जोर दिया। किंतु साथ ही मनीषी के आर्ष वचन में नैराश्य भाव गुंजित हुए – “ इसके लिये प्रबल राजनीतिक इच्छा शक्ति की आवश्यकता है जो यहां दिखता नहीं है।  स्थानीय स्तर पर छोटी बड़ी ऐसी नहरें जिनके तल एवम सतह पक्के नहीं हैं ( अनलाइंड कैनल),  उनसे भी गाद निकालने के काम को प्राथमिकता दी  जानी चाहिये। मनरेगा जैसे कार्यक्रमों में समुचित नियोजन ऐसे ही उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु होने चाहिये।  उन्होनें लोगों में जल संचयन, जल के सदुपयोग एवम जल को संसाधन के रुप मे विकसित करने के लिये प्रशिक्षण की आवश्यकता को प्राथमिकता देने पर बल दिया। दिन-ब-दिन इस क्षेत्र में  आम जनों की बढ़ती रुचि  और  जागरुकता पर उन्होनें  संतोष तो व्यक्त किया, किंतु शासन के  स्तर  पर दृष्टिगोचर उदासीनता पर अवसाद प्रकट  किया।
प्राकृतिक त्रासदियों की ये विडम्बना है कि वो मानव शरीर और उसके अवयवों की तरह समग्रता में  आचरण  करती हैं।  जैसे पेट के  गैस से सिर में दर्द हो सकता है , वैसे ही एक क्षेत्र के लोगों की गलती का खामियाजा दूसरे क्षेत्र में घटित प्राकृतिक त्रासदी के  रुप  में भुगतना पड़ सकता है। इसलिये  पर्यावरणीय असंतुलन की उत्तरोत्तर ह्रासोन्मुख अवस्था को समेकित रुप में समझने और  हल करने की आवश्यकता है।
हम दोनों बातचीत में तल्लीन थे। इसी बीच खाने की बुलाहट आ गयी और हमने अपनी बात को विराम  दिया। इस महान तपस्वी के सान्निध्य में ऐसा  प्रतीत  हो  रहा  था  मानों उनके विचार-प्रसूत ऋचाओं की चिन्मय ज्योति में मन चैतन्य हो उठा हो और उनकी मृदुल वाणी के प्रांजल प्रवाह से अंतस सिक्त हो गया हो। भोजन की मेज पर हमने बिहार की मिथिला संस्कृति की मिठास की चर्चा की। विदा लेने का वक्त आ गया था।  बड़े अपनेपन से हमने अपने चलभाष क्रमांक की अदला-बदली की और फिर मिलने की आशा जगाकर प्रणाम निवेदित किये।
------------------------------  विश्वमोहन





Tuesday, 1 June 2021

वैदिक वांगमय और इतिहास बोध-२३

वैदिक वांगमय और इतिहास बोध-२३

(भाग – २२ से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य (न)

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)


६ – सुरा और जंगली भैंसों का सबूत 

शुरुआती दौर में प्रोटो-भारोपीय शाखाओं पर प्रोटो-यहूदी प्रभाव के अपने दावे को मज़बूत करने के सिलसिले में गमक्रेलिज और इवानोव ने ऐसे सत्रह सम्भावित ‘शब्द-ऋणों’ की सूची बनायी है जो यहूदी से अनुदान स्वरूप आए हैं। इन शब्दों की भारोपीय शाखाओं की बोलचाल में सीमित प्रचलन के लक्षणों के आलोक में मैलरी और आडम्स ने इस सूची को और संघटित कर चार भागों में संक्षिप्त कर दिया है और ये महत्वपूर्ण तुलनाएँ इस प्रकार हैं :

प्रोटो-भारोपीय ‘*मधु-‘ (शहद) : प्रोटो-यहूदी ‘*म्वतक-‘ (मीठा)

प्रोटो-भारोपीय ‘*टौरोस-‘ (जंगली साँड़) : प्रोटो-यहूदी ‘*टाव्र-‘ (साँड़, बैल)

प्रोटो-भारोपीय ‘*सप्तम-‘ (सात) : प्रोटो-यहूदी ‘*सबेतम- (सात), और 

प्रोटो-भारोपीय ‘*वोईनोम-‘ (वाइन) :प्रोटो-यहूदी ‘*वायन-‘ (वाइन) (मैलरी-आडम्स २००६:८२-८३)।


इसमें से तीन तुलनाएँ ऐसी हैं जो समानताओं का अद्भुत संजोग दिखाती हैं। शहद अर्थ वाले प्रोटो-भारोपीय ‘*मधु-‘ और मीठा अर्थ वाले प्रोटो-यहूदी शब्द ‘*म्वतक-‘ के बीच की तुलना तो हम पहले ही देख चुके हैं। ठीक उतनी ही गले नहीं उतरने वाली सात (प्रोटो-भारोपीय ‘*सप्तम-‘ : प्रोटो-यहूदी ‘*सबेतम-‘) वाली तुलना है कि यह बात समझ में नहीं आती है कि दोनों परिवारों ने सात के लिए एक ही शब्द का ऋण एक दूसरे से कैसे ले लिया? उसमें भी तब जब यहाँ पर इस बात की वकालत करने वालों के समक्ष  प्रोटो-भारोपीय और प्रोटो-औस्ट्रोएशियायी संख्या प्रणाली के पहले चार अंकों की एक अत्यंत विश्वसनीय तुलना  रखी जाती है तो उसे वह सिरे से नकार देते हैं। [{प्रोटो-भारोपीय - *सेम, *द्वोउ/द्वय, *त्रि और क्वेत्वोर : टोकारियन –‘सस’/’से’ (एक), रोमानियन – ‘पत्रु’ (चार), वेल्श – ‘पेडवर’ (चार)} और  प्रोटो-औस्ट्रोएशियन { ‘*एस’, ‘*देव्हा’, ‘*तेलु’ और ‘*पति’/’*एपति’ :मलय ‘स’/’सतु’ (एक), ‘दुअ' (दो), ‘तिगा’ (तीन), ‘एपत’ (चार)}]

परंतु, अन्य दो शब्द ऐसे हैं जो भारोपीय भाषा में यहूदी शब्दों के लिए जाने की कहानी को पक्के तौर पर साफ़ कर देते हैं। लेकिन वह भी तब, जब अपनी मूलभूमि में प्रोटो-भारोपीय भाषा अभी अपने उद्भव के प्रारम्भ काल में ही थी! तो चलिए इस स्थिति की भी हम जाँच कर लेते हैं :

प्रोटो(आद्य)-यहूदी शब्द ‘*टाव्र’ (साँड़, बैल) सभी प्रमुख यहूदी भाषाओं में अपना स्थान पाता है – अक्कडियन (‘शुर’), युगारिटिक (‘त्र’), हीब्रू (‘शोर’), सीरियायी (‘तव्रा’), अरबी (‘टाव्र’), दक्षिणी अरबी (‘ट्व्र’)।

जहाँ तक भारोपीय भाषाओं की बात है, वहाँ इसकी उपस्थिति इस प्रकार है – इटालिक (लैटिन ‘तौरस’), सेल्टिक (गौलिश ‘तर्वोस’), आइरिश (तर्ब), जर्मन ( पुरानी आइसलैंड की बोली ‘पज़ोर्र’), बाल्टिक (‘ताऊरस’),  स्लावी (पुरानी स्लावी ‘तरु’), अल्बानी (‘तरोक’), और ग्रीक अर्थात यूनानी (ताऊरोस)। ‘साँड़’ के लिए कोई हित्ती शब्द उपलब्ध नहीं है क्योंकि यह एक ऐसी यहूदी चित्रलिपि द्वारा निर्दिष्ट होती है जिसका हित्ती अनुवाद नहीं पढ़ा जा सका है (गमक्रेलिज १९९५ :४८३)। अर्मेनियायी भाषा ने ‘साँड़’ के लिए एक कौकेसियन  शब्द (‘त्सुल’) उधार ले रखा है। संक्षेप में कहें, तो हमें यहाँ फिर से एक बार पश्चिमी शाखाओं पर ही यहूदी प्रभाव दिखायी पड़ता है, जबकि भारतीय-आर्य, ईरानी और टोकारियन, इन तीनों पूर्वी शाखाओं में यहूदी प्रभाव के लेशमात्र भी लक्षण नहीं दिखते। एक बार फिर से यह दृष्टांत भारतीय-यूरोपीय (भारोपीय) शाखाओं के पूरब से पश्चिम की यात्रा की कहानी को ही कहता है। 

‘शराब’ (वाइन) शब्द से संबंधित साक्ष्य तो ‘आर्य-आक्रमण-अवधारणा’ केलिए और अधिक प्रतिघाती है। यह शब्द या तो एक यहूदी ‘शब्द-ऋण’ है या फिर एक ‘पुरातन अप्रवासी प्राच्य’ शब्द के आस-पास है (गमक्रेलिज १९९५ : ५५९)। यह यहूदी और दक्षिणी कौकेसियन, दोनों भाषाओं में पाया जाता है।

यहूदी भाषा – ‘*वायन-‘, अक्कडियन (‘*ईनु-‘), युग्रेटिक (‘*यं-‘), हीब्रू (‘*यायीं-‘) हमीटिक-मिस्त्र (‘*वंश-‘)।

दक्षिणी कौकेसियन – ‘*विनो-‘ (वाइन), जौरजियन (‘*विनो-‘), मिंग्रेलियन (‘विन’), पुराने जौरजियन (वेनाक)।

गमक्रेलिज ने ट्रान्स-कौकेसस क्षेत्रों में अंगूर की खेती और शराब बनाने की तकनीक के विकास की भी चर्चा की है (गमक्रेलिज १९९५:५६०)। हालाँकि, वह यह भी मानते हैं कि प्रोटो-भारोपीयों ने इस शब्द का इजाद पश्चिमी-एशिया और ट्रान्सकौकेसस क्षेत्रों में ही किया।

अब चाहे यह मूल रूप से यहूदी शब्द हो या कौकेसियन शब्द, इसका भूगोल निस्सन्देह पश्चिम एशिया और ट्रान्स-कौकेसियन क्षेत्रों का ही भूगोल है। 

और फिर – 

१ – यह शब्द पूरब की तीनों शाखाओं, भारतीय-आर्य, ईरानी और टोकारियन में नहीं पाया जाता, जबकि पश्चिम की सभी नवों शाखाओं में पाया जाता है।

२ – स्वर-साधना (वोकालिज़्म) के दृष्टिकोण से पश्चिम की नवों शाखाओं में पाए जाने वाले इस शब्द की तीन श्रेणियाँ हैं (गमक्रेलिज १९५५:५५७-५५८)।  ‘*वीयोनो-‘ में स्वर-साधना शून्य स्तर का है,  ‘*वेनो-‘ में स्वर-साधना ‘ए’ स्तर का है, ‘*वोईनो- में स्वर-साधना ‘ओ’ स्तर का है। ये सभी भारीपीय शाखाओं के कालानुक्रमी समूह हैं :

क – शुरू की शाखाएँ जो पश्चिम की ओर चली गयीं, उनमें शब्दों की व्युत्पति का आधार इस प्रकार है – अनाटोलियन (वीयोनो), हित्ती (वियन), लुवियन (विनियंत), हाईराटिक लुवियन (वीयन)।

ख – पाँच पश्चिमी शाखाओं में इस शब्द की व्युत्पति का आधार इस प्रकार है – वीयोनो : इटालिक (लैटिन ‘उईनुम’), सेल्टिक (पुरानी आइरिश ‘फ़िन’, वेल्श ‘ज्विं’), जर्मन (जर्मन ‘वेन’ और अंग्रेज़ी ‘वाइन’), बाल्टिक (लिथुयानियन ‘व्यंस’, लात्वियन ‘वींस’), स्लावी (रूसी ‘विनो’, पोलिश ‘विनो’)

ग – तीन अंतिम शाखायें जो पश्चिम की ओर चली गयीं उनमें  इस शब्द की व्युत्पति का विज्ञान इस प्रकार है – ‘*वोईनो-‘ : ग्रीक अर्थात यूनानी (माइसेनियन ग्रीक ‘वो-नो’, होमेरिक ग्रीक ‘ओईनोस’), अल्बानी (वीन), अर्मेनियायी (जिनी)।

पश्चिम की ओर बढ़ाने के क्रम में भारोपीय शाखाओं के तीनों समूह में अलग-अलग प्रकार के शब्दों का इजाद हुआ, जबकि जो शाखाएँ पूरब में ही रुक गयीं, उनमें किसी भी तरह का कोई परिवर्तन नहीं हुआ।


७ – घोड़ों का साक्ष्य  

अब हम उन सबूतों अर्थात ‘घोड़ों’ की बात कर लें जिसे दक्षिणी रूस के मैदानी भाग को आर्यों की मूल भूमि मानने की अवधारणा के प्रबल पक्षकार अपना अचूक और अमोघ अस्त्र मानते हैं, हालाँकि उनका यह हथियार भी तर्कों की टकसाल पर काग़ज़ी घोड़ा-सा ही है। सही मायने में  दोनों  पक्षों के बीच इतने बड़े-बड़े और निरर्थक दावे, सिद्धांतों और अवधारणाओं की बौछार तथा आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला है कि सबसे पहले हमारे लिए भी यही उचित होगा कि हम भली-भाँति तथ्यों की गहराई से पहले जाँच-परख कर लें, फिर इसकी विवेचना करें।  कुल मिलाकर तीन ऐसी बातें है जो हर तरह के विवादों से ऊपर उठकर है।

१ – प्रोटो-भारोपीय लोगों को घोड़े के बारे में जानकारी थी और घोड़े का सजातीय शब्द कमोवेश प्रत्येक शाखा में पाया जाता है : प्रोटो भारोपीय ‘*एख्वोस’, अनाटोलियन (हाईरेटिक लुवियन) ‘आ-सु-व’, टोकारियन ‘युक/यक्वे’, भारतीय-आर्य (वैदिक) ‘अश्व’, ईरानी (अवेस्ता) ‘अस्प’, अर्मेनियायी ‘एश’ (खच्चर), ग्रीक या यूनानी (माइसेनियन) ‘इको’, (होमेरिक) ‘हिप्पोस’, जर्मन (पुराने अंग्रेज़ी) ’एओह’, (गोथिक) ‘ऐहवा’, सेल्टिक (पुराने आइरिश) ‘एच’, (गौलिश) ‘एपो-‘, इटालिक (लैटिन) ‘एक़ूस’ और बाल्टिक (लिथुयानियन) ‘एश्व’। यह भी एक संयोग ही है कि जिस एकमात्र शाखा में यह शब्द नहीं मिलता है वह है दक्षिणी रूस के उसी मैदानी भाग में बोली जाने वाली भाषा, स्लावी। और अल्बानी भाषा में भी इसका कोई सजातीय शब्द अब नहीं बचा है। लेकिन यह बात तो साबित हो जाती है कि ईसा से ३००० साल पहले अपनी मूलभूमि में प्रोटो-भारोपीय लोग घोड़े से बड़ी अच्छी तरह परिचित थे और यहीं वह समय भी था जब भिन्न-भिन्न शाखाएँ उस मूलभूमि से भिन्न-भिन्न दिशाओं में छिटकने लगी थीं। 

२ – ग्रंथो के पूरे रचना-काल के दौरान वैदिक लोगों को घोड़े की पूरी जानकारी थी।

३ – भारत घोड़ों का पुश्तैनी वतन तो नहीं था लेकिन उनका यह वतन उत्तरी यूरेशिया के एक वृहत क्षेत्र में फैला था जो पश्चिम में दक्षिणी रूस के मैदानी भाग से लेकर पूरब में मध्य एशिया तक था।

सामान्य तौर पर पहली दो बातों पर कोई विवाद नहीं है। बस तीसरी बात को ‘आर्य-आक्रमण-अवधारणा’ के विरोधी नहीं स्वीकारते हैं। उनका विचार है कि ऋग्वेद में वर्णित घोड़े मैदानी भागों के उत्तरी घोड़े नहीं हैं, बल्कि देशी प्रजाति के हैं। इस सम्बंध में वे शिवालिक में मिलने वाले ‘एक़ूस सिवालेंसिस’ प्रजाति की चर्चा करते हैं जो प्राचीन काल में उत्तर भारत में पायी जाने वाली तगड़े घोड़ों की एक प्रजाति थी। यह माना जाता है कि ८००० ईसापूर्व या इसके आसपास यह प्रजाति विलुप्त हो गयी। ऋग्वेद के १/१६२/१८ और शतपथ ब्राह्मण के १३/५ में ऐसे घोड़े की बलि की चर्चा है जिसकी पसलियों की ३४ हड्डियाँ  थीं। आम तौर पर घोड़ों की पसली में ३६ हड्डियाँ होती है लेकिन शिवालिक क्षेत्र के घोड़ों की कुछ क़िस्मों में ३४ हड्डियाँ होने की बात भी मिलती है। इसी बात को वैदिक युग  में भारत में शिवालिक-घोड़ों के होने के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जहाँ तक इनके जीवाश्मों से संबंधित साक्ष्य का सवाल है तो असली घोड़ों का भी जिस काल और जिस क्षेत्र में बहुतायत में होने की बात कही जाती है, उन दोनों स्थितियों में ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिले हैं। इसी आधार पर शिवालिक घोड़ों के संदर्भ में भी जीवाश्म संबंधी साक्ष्यों को अप्रासंगिक कहकर टाल दिया जाता है। ऐसा भी सम्भव है कि ‘*एखोव-‘ शब्द किसी समान प्रजाति के पशु के लिए प्रचलित हो। ये पशु बहुत तेज़ भागने वाले ओनगा या खच्चर जैसे जंगली गदहों की प्रजाति के हो सकते थे जो अधिकांशतः पुरातन क़ालीन उत्तर भारत में पाए जाते थे और आज भी कच्छ और लद्दख के शुष्क क्षेत्रों में पाए जाते हैं। साथ ही ऋग्वेद में यदा-कदा ‘अश्व’ शब्द का प्रयोग सवारी करने वाले पशु के रूप में हुआ है न कि उन घोड़ों के लिए जो रथ खिंचते थे। चौथे मंडल के ३७/४ में ‘मोटा अश्व’ का निहितार्थ हाथी हो सकता है जब कि ‘दाग़धारी अश्व’ का संकेत मरुत के रथ की ओर है। निश्चित तौर पर इस रथ का मतलब ‘दागधारी हिरण’ से ही लिया गया है। १/(८७/४, ८९/७, १८६/८), २/३४/३, ३/२६/६, ५/४२/१५ और ७/४०/३ के उल्लेखों से हालाँकि  यहीं प्रतीत होता है कि धारीदार ‘घोड़े’ का दागधारी ‘हिरण’ में काव्यातक रूपांकन हो गया है। ३४ हड्डियों वाली ये तमाम बातें पक्के तौर पर न केवल अत्यंत रोचक हैं, बल्कि  और अधिक छानबीन भी किए जाने लायक़ है।  फिर भी तर्कों की इस रोचकता को फ़िलहाल हम तिलांजलि देकर अभी मैदानी भाग के उन असली घोड़ों पर गहरायी से अपनी नज़रें टिकाएँगे जिनका मादरे वतन हिंदुस्तान की ज़मीन नहीं था। 

घोड़ों से संबंधित ऊपर के तीनों तथ्यों के आधार पर ‘आर्य-आक्रमण-अवधारणा’ के पैरोकार निम्नलिखित निष्कर्ष निकाल लेते हैं :

 चूँकि न तो हड़प्पा से मिली मुहरों में घोड़ों की कोई उपस्थिति है और न ही हड़प्पा की खुदायी में घोड़ों की हड्डियाँ मिली है, इसलिए यह तय है कि आर्यों के आगमन से पूर्व न तो भारत में घोड़ों की उपस्थिति थी और न ही भारत के लोगों को घोड़ों के बारे में कोई जानकारी थी। इसी आधार पर यह भी तय है कि हड़प्पा की सभ्यता ‘अनार्यों’ की सभ्यता थी और ये आर्य ही थे जो दक्षिण रूस के मैदानी भागों की अपनी मूल भूमि से घोड़ों को लेकर भारत आए। उदाहरण के तौर पर हॉक इसे कुछ इस तरह से व्यक्त करते हैं कि ‘कुछ छोटी-मोटी बातों पर भले ही असहमति हो लेकिन भारोपीय भाषा विज्ञान और जीवाश्मिकी से जो भी परिचित हैं वे इस बात को मानते हैं या फिर यूरेशिया में जो भी  पुरातात्विक सबूत मिले हैं उनसे भी इसी बात का  संकेत  मिलता है कि यूक्रेन के मैदानी भागों से ही पालतू घोड़ों का और साथ-साथ युद्ध में प्रयोग होने वाले घोड़ों से खींचे जाने वाले दो पहिए वाले रथों का प्रचलन फैला। पुरातन भारोपीय संस्कृति और धर्मों में घोड़ों का बड़ा अहम स्थान है। यूरेशिया के पुरातत्व और भारोपीय ज्ञान की विशेष जानकारी रखने वाले विद्वानों की इसलिए इस बात पर पूरी सहमति है कि भारतीय-आर्यों के आने के साथ-साथ ही घोड़े से संबंधित इन सारे लक्षणों का भारत में फैलाव हुआ।‘ (हॉक १९९९अ :१२-१३)

समूचे ‘आर्य’ विवाद में उपरोक्त निष्कर्ष से ज़्यादा धोखा देने वाली और भ्रम पैदा करने वाली कोई दूसरी बात नहीं हो सकती।

१- पुराने ज़माने में घोड़े भारत में नहीं पाए जाते थे, किंतु अफगानिस्तान के उत्तर मध्य एशिया में मिलते थे। आज तक जो स्थिति बनी हुई है, उसके अनुसार दुनिया में पूरी तरह से पालतू बना लिए गए घोड़ों का पहला सबूत कजकस्तान की बोटाई संस्कृति में मिलता है। इसके मिलने का काल भी उस समय से १००० साल और पहले चले जाता है जिस काल में इनके पाए जाने की मान्यता है। क़रीब ३५०० ईसापूर्व की यह बोटाई संस्कृति पूरी तरह से घोड़ों के प्रजनन की संस्कृति का काल था, जब घोड़ों की नस्लों का जनन होता था, उन्हें दूहा जाता था और फिर उनसे छुटकारा भी पा लिया जाता था। ( उत्खनन क्षेत्रों से प्राप्त जबड़ों की हड्डियों और दाँतों के परीक्षण से यही पता चलता है कि लगाम और नाल भी उस समय चलन में थे।)

यदि थोड़ी और गहरायी से देखें तो इस बात के प्रबल साक्ष्य मिलते हैं कि उससे भी पुराने समय में अफ़ग़ानिस्तान के उत्तर उज़्बेकिस्तान में घोड़ों को आदमी की बस्तियों में भली-भाँति पाला जाता था और उनसे घरेलू काम लिए जाते थे। संदर्भ लसोटा-मोसकलेवस्का २००९ (अ प्रॉब्लम औफ द अर्लीएस्ट हॉर्स डोमेस्टिकेशन: डाटा फ़्रोम द नियोलीथिक कैम्प अयकाज्ञतमा ‘द साइट’, उज़्बेकिस्तान, सेंट्रल एशिया पृष्ट १४-२१, अर्कियोलौजिया बाल्टिका खंड -११, कलैपेडा विश्वविद्यालय, लिथुयानिया २००९)।  

बुखारा शहर से क़रीब १३० किलोमीटर की दूरी पर स्थित उत्खनन-स्थल से प्राप्त सामग्रियों की पुरातत्व एवं पुराजंतु विज्ञानियों ने बड़ा गहन वैज्ञानिक परीक्षण किया है। उन्होंने स्पष्ट तौर पर विकास की दो अवस्थाओं का उल्लेख किया है –

 पहला चरण है प्रारम्भिक नव पाषाण काल। कार्बन समस्थानिक १४  के आधार पर यह काल अंशांकित ८०००-७४०० साल  पूर्व (ca 8000-7000 cal. BP) का है। 

दूसरा चरण है अंशांकित ६०००-५००० साल पूर्व (ca 6000-5000 cal. BP)। आगे बढ़ने के पहले हम आपको समस्थानिक कार्बन १४ के आधार पर अंशांकित काल cal BP (Before  Present) के बारे में बता दें कि काल गणना की इस पद्धति में १४ परमाणु भार वाले समस्थानिक कार्बन परमाणु के किसी वस्तु में बचे अवशेष के आधार पर उसकी आयु निकालने की कार्बन-डेटिंग पद्धति के आविष्कार हो जाने पर एक मानक तिथि, एक जनवरी १९५०, से पूर्व के समय को इस अंशांकित पैमाने पर व्यक्त किया जाता है।

   स्थल के बाढ़ से प्रभावित होने के कारण इस काल गणना में १५०० वर्षों तक के अंतराल का अनुमान भी हो सकता है। इस काल के जानवरों के बड़ी मात्रा में अवशेष इस स्थल से प्राप्त हुए हैं जो नव पाषाण युग की परतों से निकले हैं। अस्थि और दाँतों के अवशेषों के मामलों में घोड़ों की उपस्थिति यहाँ काफ़ी अहम रही है। सबसे पुरानी परतों से प्राप्त अवशेषों में तीस से चालीस प्रतिशत अश्ववंश (equidae family) के ही अवशेष हैं। नव पाषाण युगीन अन्य यूरेशियायी स्थलों की तुलना में यह संख्या अपने आप में अनूठी है (लसोटा-मोस्कालेवस्का २००९:१४-१५)। अश्व वंश के अवशेषों की बहुत अधिक मात्रा (यहाँ तक कि कहीं-कहीं ४१ प्रतिशत से भी अधिक अवशेष अश्व-वंश के ही हैं), उनके कंधों की ऊँचाई और खुरों की चौड़ाई जैसे अनेक  ढेर सारे कारकों और सबूतों के आधार पर यहीं स्थापित होता है कि ये अवशेष किसी ऐसे जानवर के हैं जिनकी ऊँचाई आम जंगली जानवरों की औसत ऊँचाई से काफ़ी अधिक होती थी। बहुत हद तक इनकी आकृति  पालतू घोड़ों से मिलती जुलती थी। इन अश्ववंशी जानवरों के साथ-साथ पालतू स्तनपायी अन्य जानवरों यथा – भेड़, बकरी, सुअर और कुत्तों के जीवाश्म के अवशेष भी इन स्थलों से निकाले गए हैं। ये सारे तथ्य इसी बात को स्थापित करते हैं कि घोड़े मध्य एशिया के निचले भागों में नव पाषाण काल के प्रारम्भ से ही पाले जाने लगे थे और यह काल ९००० से ८००० अंशांकित काल पूर्व (cal BP) का समय है। साथ ही हमारे लिए आज की तिथि में घोड़ों को पालतू बनाए जाने के  सबसे शुरू के समय के रूप में यही काल स्थापित है (लसोटा-मोस्कालेवस्का २००९:१९-२०)।

कहने का तात्पर्य यह है कि इस बात में कोई जान नहीं है कि ३००० साल ईसा पूर्व दक्षिण रूस के मैदानी भागों को छोड़कर आने वाले ‘आर्यों’ के साथ घोड़ों का प्रवेश यहाँ हुआ। चाहे पूरी तरह से घरेलू और पालतू पशु के रूप में हों या फिर पालतू और घरेलू बनाने की प्रक्रिया में हों – अफ़ग़ानिस्तान के उत्तरी क्षेत्र में बसी सभ्याताओं में  ये घोड़े ईसा से ६००० साल पहले से ही पाए जाते रहे हैं। यहाँ यह भी बात उतनी ही ध्यान देने लायक़ है कि भारतीय मूलभूमि का तात्पर्य भारत के अंदरूनी हिस्सों तक ही सिमटा हुआ नहीं है। इस बात के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं कि ऋग्वेद के समय से भी काफ़ी पहले ‘दृहयु’ और ‘अणु’ जनजातीय समुदाय भारत के भीतरी इलाक़ों से निकलकर मध्य एशिया और अफ़ग़ानिस्तान के उत्तरी भागों तक फैल चुके थे।  ऋग्वेद के पुराने मंडलों का रचना काल ईसा से ३००० साल से भी पीछे तक जाता है। उस काल तक ‘प्रोटो-अनाटोलियन’ और ‘प्रोटो-टोकारियन’ आबादी के साथ-साथ ‘दृहयु’ जनजाति की पहली पंक्ति की बसावट मध्य एशिया में बस चुकी थी। दृहयु-अणु-पुरु आबादी के उत्तर में फैले वितान के दृहयु छोर तक के भूभाग घोड़ों से भरे-पूरे क्षेत्र थे और इस क्षेत्र में पालतू बनकर घोड़े घरेलू जानवर के रूप में रच-बस चुके थे। पालतू घोड़ों का यह काल ३००० साल ईसा पूर्व से पहले तक का काल है। इसलिए उस समय के एक ऐसे अनोखे पशु, चाहे वह जंगली हो या पालतू, के लिए एक ही तरह  के प्रोटो भारोपीय नामों के अपनाए जाने या विकसित होने के दृष्टांत यदि मिलते हैं तो इसमें कोई अचरज की बात नहीं है।

#ऋग्वेद 


Sunday, 30 May 2021

नीड़





यह नीड़ नहीं, दिल मेरा है
आंगन में तेरे उकेरा है।

अवनि से अम्बर के घट में,
पलक झपकते उड़ती चट में।
गहराता तम का जब घेरा,
खिंचे बांधे मोह बसेरा।
चिड़ा-चिड़ी की चिर चूँ-चूँ,
ये, सप्तपदी का फेरा है।
यह नीड़ नहीं, दिल मेरा है,
आंगन में तेरे उकेरा है।

जंगल झाड़ी वन-वन घूम-घूम,
खर, पात और टहनी चुन चुम।
चोंच-सी सुई में गूँथ गूँथ कर,
आर्द्र उर ऊष्मा से तर कर।
पलकों में पलते सपनों का,
मेरा रैन बसेरा है।
यह नीड़ नहीं, दिल मेरा है,
आंगन में तेरे उकेरा है।

माँ चिड़िया का दाना चुगना,
लौट घोंसले को फिर आना।
चूजे के फैले चोंचों में
डलता है जीवन का दाना।
कल जो चूजा आज वह चिड़िया,
नीड़ का गिरना और फिर छाना।
जीव-जगत की तिजारत यह,
चंद दिनों का डेरा है।

तेरे नीम के गाछ पर,
छा छतरी-सा मेरा घोंसला।
दिल की आकृति में सजती,
मेरी नीड़-निर्माण-कला।
मोहक महक मेरी चहकों ने,
मन-आँगन तेरा घेरा है।
यह नीड़ नहीं, दिल मेरा है
आंगन में तेरे उकेरा है।

बस पल थोड़ा बीत जाने दे,
खुशियों के गीत चंद गाने दे।
क्षणभंगुर ही सही, हमें बस!
बन बसंत तू छा जाने दे।
फिर कालग्रास बन जाएंगे,
आँगन छोड़ यह जाएंगे।
आज बसंत, फिर कल पतझड़,
यही! यहाँ का फेरा है।

यह नीड़ नहीं, दिल मेरा है,
आंगन में तेरे उकेरा है।















 

Wednesday, 26 May 2021

हँसा के पिया अब रुला न देना.

तथागत यशोधरा के द्वार पधारते हैं और उन्हें बोधिसत्व की ज्ञान आभा से ज्योतित कर अपनी करुणा से सराबोर करते हैं:-
   प्रीता प्राणों के पण में,
       राजे चंदा का संजीवन/
       बोधिसत्व पावन सुरभि, 
       महके तेरा तन-मन हर क्षण/

       तू चहके प्रति पल चिरंतन,
        भर बाँहे जीवन आलिंगन/
        मै मूक पथिक नम नयनो से. 
       कर लूँगा महाभिनिष्क्रमण !

यशोधरा अपने सन्यासी पिया के चिन्मय ज्ञान का पान कर फूले नहीं समाती. भवसागर से मुक्ति की यात्रा में उनकी सहगामिनी बनने को तत्पर होती है और मन ही मन अपनी भावनाओं से तरल हो रही है:-
    यह कैसा चिर स्पंदन!
    देखो, जागे ये निर्मल मन.

    उर पवित्र मंद मचले कम्पन,
    उतरे परिव्राजक मन दर्पण.

    बोधिसत्व कपिलायिनी भद्रा बन,
    तरल अंतस पसरे छन छन.

    उपवासी अन्तेवासी हूँ,
    प्रेम पींग की झुला न देना .

    मैं जागी अब सुला न देना ,
    हँसा के पिया अब रुला न देना.   


Monday, 17 May 2021

वैदिक वांगमय और इतिहास बोध-२२

वैदिक वांगमय और इतिहास बोध-२२

(भाग – २१ से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य (ध)

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)


५ - शहद के सबूत 


ऋग्वेद में शहद का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। हर भाषा में इसके सजातीय शब्द हैं। इससे यही झलकता है कि प्रोटो भारोपीय संस्कृति में शहद का केंद्रीय स्थान था, चाहे इस संस्कृति की मूल भूमि जो भी हो। अनेक विद्वानों का यही मत है कि मधुमक्खी-पालन और शहद का उत्पादन मिस्त्र (इजिप्ट) और भू-मध्यसागरीय क्षेत्र में फला-फूला और सुदूर पूरब ईरान तक फैल गया। इसलिए प्रोटो-भारोपीय संस्कृति का जो वितान बुना गया उसमें शहद का स्थान बहुत महत्वपूर्ण दिखाया गया और यहीं बताया गया कि इन मधुमक्खियों के प्रदेश में ही भारीपीय लोगों का या तो मूल निवास था या फिर प्राक-ऐतिहासिक काल में वे इन प्रदेशों से होकर गुज़रे थे। एक अन्य विद्वान हड्जु का हवाला देते हुए परपोला का कहना है कि ‘बहुत हाल तक एशिया माइनर, सीरिया, पर्सिया, अफ़ग़ानिस्तान, तिब्बत और चीन को छोड़कर एशिया में मधुमक्खियों की कोई जानता भी नहीं था। दूसरी तरफ़ पूर्वी यूरोप में यूराल पर्वत के पश्चिम में मधुमक्खियाँ पायी जाती थी (परपोला २००५:११२)।‘ वह आगे जोड़ते हैं कि “‘एपीस मेल्लिफेरा’ का मूल क्षेत्र अफ़्रीका, अरब और उसके समीप पूरब में ईरान तक, यूरोप में यूराल पर्वत के पूरब तक, दक्षिणी स्वीडन और उत्तर में एस्टोनिया तक फैला था। उत्तर में यह अर्क्टिक के शीत प्रदेश की शीतलहरी और पूरब में मरुभूमि और पहाड़ों के अवरोध के कारण थम जाता था। इसके प्रसार की दूसरी अवरोधक कारक थे - यूराल तक फैले शीत और समशीतोष्ण प्रदेशों के कँटीले जंगल और फिर  साइबेरिया में उनका नहीं उगना। १६०० इस्वी तक ‘एपीस मेल्लिफोरा’ इसी क्षेत्र तक सीमित थे जहाँ से उनका अन्य जगहों के लिए उत्प्रवासन प्रारम्भ हुआ (परपोला २००५:११२)।“

उसी ढर्रे पर ग़मक्रेलिज का भी कहना है कि, “भारोपीय देशों में मधुमक्खी पालन के बूते मज़बूत अर्थव्यवस्था वाले विकसित देशों में मधु के लिए प्रयुक्त ‘हनी’ शब्द और प्राचीन प्रोटो भारोपीय धर्मों में शहद के महत्व के आलोक में इस बात में कोई दुविधा नहीं कि मधुमक्खी पालन और मधुमक्खी के लिए ‘बी’ शब्द भी पूरी आर से प्रोटो भारोपीय व्युत्पति के ही हैं (ग़मक्रेलिज १९९५:५१६-५१७)।“ वह इसे खिंचकर भू-मध्यसागरीय क्षेत्रों तक ले जाते हैं – “ यह भू-मध्यसागरीय क्षेत्र ही था जहाँ मधुमक्खी पालन की प्रविधि ने अपने प्राथमिक अवस्था से निकलकर उन्नत स्वरूप को प्राप्त करने की दिशा में पहला क़दम उठाया। यहाँ हम विकास की दूसरी अवस्था पाते हैं जहाँ जंगलों  में मधुमक्खी पालन की तकनीक इजाद की गयी।जंगल के पेड़ों में और उनके मोटे तनों में खोखले कोटर बनाकर उसमें मधुमक्खियों को पाला जाता था। फिर हम तीसरी अवस्था भी पाते हैं जब घरेलू मोर्चे पर कृषि कार्य परम्परा का सूत्रपात होता है और घरों में या घरों के पास ही बनाए कोटरों और घोसलों में मधुमक्खियों को पालने की तकनीक और परम्परा का उन्मेष हुआ (ग़मक्रेलिज १९९५:५२२)। और अंत में वह हमें ‘हनी’ शब्द के बारे में सूचित करते हैं कि “ भारोपीय जनजातियाँ पूरब की ओर अपने बढ़ने के क्रम में शहद और मधुमक्खी पालन के साथ-साथ ‘हनी’ शब्द भी लेकर पूर्वी एशिया में घुसीं (गमक्रेलिज १९९५:५२४)।“ 

अब आइए ऊपर लिखी गयी बातों के बारे में हम सही सबूतों और तर्कसंगत बातों का वलोकन करें :

१ – विकिपीडिया हमें ‘हनी- बी’ (मधुमक्खी) के बारे में बताता है कि “मधुमक्खियों की उत्पति  का स्थान फ़िलिपींस समेत दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया प्रतीत होता है।  एपीस मेल्लिफेरा को छोड़कर बाक़ी वजूद वाली मधुमक्खियों का यह क्षेत्र ही गृह-प्रदेश प्रतीत होता है। सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि मधुमक्खियों की प्राचीनतम प्रजाति जिससे अन्य प्रजातियाँ निकली उसके जीवित अवशेष (‘एपीस फ्लोरी’ और ‘एपीस एड्रेनिफोरमिस’) के उद्भव का भी स्थान यहीं है।“  

इन साक्ष्यों की पड़ताल करने वाले विद्वानों ने पश्चिमी मधुमक्खी, एपीस मेल्लिफेरा, के भौगोलिक परास (सीमा), मधुमक्खी-पालन की प्राथमिक अवस्था से उन्नत अवस्था तक उनके क्रमगत विकास, इस तकनीक में मिस्त्र तरथ भू-मध्यसागरीय क्षेत्रों में रहने वाली मधुमक्खियों के योगदान और प्रोटो भारोपीय शाखाओं में शहद के विशद महत्व की पूरी विवेचना की है और इसके आधार पर यही निष्कर्ष निकाला है कि प्रोटो भारोपीय जनजातियों की भिन्न-भिन्न शाखायें  इन्हीं उन्नत अवस्थाओं को भू-मध्यसागरीय क्षेत्रों से एंकर अपनी मूल भूमि में गयीं। तथापि, :

क – इस बात का कोई भी सबूत नहीं है कि प्रोटो भारोपीय या वैदिक संस्कृति में अपना ख़ास स्थान रखने वाला शहद ‘एपीस मेल्लिफोरा’ प्रजाति की ही मधुमक्खी से प्राप्त शहद  था। भू-मध्यसागरीय मधुमक्खी-पालन के सम्पूर्ण इतिहास को उकटने के बाद परपोला बड़ी साफ़गोई से कहते हैं कि “खोडरों और कोटरों में घोंसला बनाकर रहनेवाली मधुमक्खी की प्रजाति ‘एपीस सेराना’ पूर्वी एशिया, दक्षिणी पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, चीन, कोरिया और जापान की मूल निवासी है (परपोला २००५:१२३)। “आकार में सबसे बड़ी मधुमक्खी की प्रजाति ‘एपीस डोर्सटा’ भारत और उससे भी पूरब में पायी जाती है।

ख – ये पूर्वी मधुमक्खियाँ अत्यंत पुरातन काल से ही भारत में मधु संग्रह का स्त्रोत रही हैं। शहद का इकट्ठा किया जाना समूचे भारत और इसके सुदूर आदिवासी और दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में भी अति प्राचीन परम्परा रही है। मध्य प्रदेश के भीमबेटका और पंचमढ़ी में पाए गए ८०००-६००० ईसा पूर्व प्राचीन पाषाणयुगीन प्रस्तर-चित्रकला (रॉक-पेंटिंग) सारी बात बोल देते हैं, “पंचमढ़ी की तीन चित्रकलाओं और भीमबेटका की एक कलाकृति में मधु का संग्रह करते दिखाया गया है।जंबूद्वीप आश्रय की एक पेंटिंग में एक पुरुष को मधु निकालते तथा एक स्त्री को शहद पात्र लेके उसके समीप जाते दिखाया गया है। दोनों सीढ़ियों पर खड़े हैं। इमलिखो आश्रय की एक अन्य पेंटिंग में महिला मधुमक्खियों को उड़ा रही है। सोनभद्र आश्रय की तीसरी पेंटिंग में मधुमक्खियों से घिरे दो पुरुष लकड़ी कसे बने ढाँचों पर खड़े हैं। भीम बेटका की पेंटिंग में एक पुरुष मधुमक्खियों के छाते को एक गोल माथे वाले छड़ी से छेद रहा है। उसकी पीठ पर एक टोकरी है और वह एक रस्सी के सहारे लटका हुआ प्रतीत होता है। उसके नीचे तीन लोग खड़े हैं।उसमें से एक दूसरे के कंधे पर चढ़ा हुआ है (मथपाल १९८५:१८२)।“ ये प्रस्तर-चित्रकलाकृतियाँ सारे एशिया में शहद बटोरने की कला दर्शाने वाली प्राचीनतम कलाकृति है। इसकी तुलना स्पेन और औस्ट्रेलिया की बस कुछ वैसी ही समकालीन कला कृतियों से की जा सकती है।

२ – सच कहा जाए तो उपलब्ध भाषाई साक्ष्य प्रोटो-भारीपीय शहद संस्कृति और मिस्त्र तथा भू-मध्यसागरीय क्षेत्रों में पनपे घरेलू मधुमक्खी पालन के बीच किसी भी तरह के ताल-मेल को पूरी तरह से नकारते हैं। हालाँकि कुछ खास ऐतिहासिक भारीपीय शाखाओं की शहद संस्कृति भी प्रोटो-भारोपीय शहद संस्कृति से बिलकुल हटकर है जिसपर हम आगे प्रकाश डालेंगे।

क – जहाँ शहद (हनी) के लिए प्रोटो भारोपीय संसार में एक ही तरह के शब्द हैं, वहीं मधुमक्खी, मधुमक्खी के छत्ते, मोम और मधुमक्खी पालन के लिए शब्दों में कोई साझेदारी नहीं है और ऐसी संस्कृति में जहाँ मधुमक्खी पालन या उससे शहद निकालने  की प्राविधि का क्रमिक विकास हुआ हो, ऐसी स्थिति की कल्पना कतई नहीं की जा सकती है। कमोवेश ऐसी ही स्थिति ऋग्वेद से भी प्राप्त सबूतों के साथ है जबकि यह  भारोपीय  भाषाई ग्रंथों में सबसे पुराना उपलब्ध दस्तावेज़ है। ऋग्वेद के पुराने मंडलों से ही शहद के लिए ‘मधु-‘ और ‘सारघ-‘ शब्द चले आ रहे हैं। पुराने मंडलों से बहुत बाद में नए मंडल रचित हुए और जहाँ तक पश्चिमी एशिया में दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के पूर्वार्द्ध में मित्ती और हित्ती भारतीय-आर्यों का    प्रश्न है तो उनका भी नए मंडलों की संस्कृति से सैकड़ों वर्ष बाद उदय हुआ। ऋग्वेद में भी मधुमक्खियों के संदर्भ बहुत थोड़े ही ‘मक्ष’ और ‘मक्षिका’ के रूप में आए हैं। मधुमक्खी के छत्तों या मोम जैसी किसी भी वस्तु का कोई वृतांत नहीं मिलता जो इस बात का कोई प्रमाण प्रस्तुत कर सके कि मधुमक्खी पालन की कोई उन्नत प्राविधि उस समय अस्तित्व में हो।

ख – शहद के लिए प्रोटो-भारोपीय शाखाओं  के भाषायी सबूत तो और खलबली पैदा कर देते हैं। शहद के लिए सामान्य अपभ्रंश प्रोटो-भारोपीय शब्द ‘मधु-‘ है। यह दो स्पष्ट अर्थों में प्रयुक्त होता है। पहला अर्थ तो शहद ही है। दूसरा अर्थ पेय पदार्थ/शराब या कोई भी मादक मद्य पदार्थ है। इन दोनों अर्थों में यह शब्द भारतीय-आर्य, ईरानी, टोकारियन, स्लावी और बाल्टिक – इन पाँचों शाखाओं में पाया जाता है। यूनानी (ग्रीक), जर्मन और सेल्टिक, इन तीन शाखाओं में यह मात्र मादक पेय पदार्थ(सुरा)/शराब/अन्य पेय पदार्थों के अर्थ में ही प्रयुक्त किया जाता है। इन शाखाओं में नये शब्द ‘*मेलिथ-‘ ने ‘*मधु-‘ का स्थान ले लिया है जिसका अर्थ शहद या मधु होता है। अन्य चार शाखाओं, हित्ती (अनाटोलियन), अर्मेनियायी, अल्बानी और इटालिक में ‘*मधु-‘ शब्द पूरी तरह लुप्त हो गए हैं किंतु यहाँ पर भी ‘*मेलिथ-“ शब्द का अभिप्राय केवल शहद ही है और पेय पदार्थ/सुरा/शराब के लिए अन्य नए शब्द हैं।

यह सबूत तो वाक़ई अचरज में डालने वाला है कि पुरानी शाखा टोकारियन, यूरोपीय शाखा स्लावी और बाल्टिक तथा सबसे अंतिम शाखा भारतीय-आर्य  और ईरानी – इन सभी शाखाओं में मात्र *मधु-‘ शब्द है। दूसरी ओर पुरानी शाखा अनाटोलियन, यूरोपीय शाखा इटालिक और अंतिम शाखाएँ अर्मेनियायी और अल्बानी – इन शाखाओं में केवल *मेलिथ-‘ शब्द है। संक्षेप में,       समरूप रूप भाषायी लक्षणों को दर्शाती यह समवाक रेखा भारोपीय शाखाओं के भिन-भिन्न कालानुक्रमी समूहों का आलिंगन करती दिखायी देती है। तो फिर वे साझे तत्व कौन-से हैं?

जवाब बड़ा सरल है। यह पूरब और और पश्चिम का विभाजन है :

१ – तीनों समूहों (प्राचीन, यूरोपीय और अंतिम) में वे पाँच शाखायें जो ज़्यादा पूर्वी हैं, टोकारियन, स्लावी, बाल्टिक, भारतीय-आर्य और ईरानी, इन्होंने मूल शब्द ‘*मधु-‘ को संजोये रखा किंतु ‘*मेलिथ-‘ को नहीं अपनाया।

२ – तीनों समूहों की बाक़ी सात शाखाओं, जो ज़्यादा पश्चिमी हैं, ने नए शब्द ‘*मेलिथ-‘ को ग्रहण कर लिया। इन सात में से पाँच शाखाएँ मिस्त्र और भू-मध्यसागरीय क्षेत्र से सटे हुए हैं। इन पाँच में से चार, अनाटोलियन, अर्मेनियायी, अल्बानी और इटालिक, से मूल शब्द, *मधु-‘ बिलकुल ग़ायब है। बाक़ी एक प्राचीन यूनानी (ग्रीक) ने ‘*मधु-‘ शब्द को पेय/शराब/सुरा के रूप में संजो लिया किंतु शहद के लिए इसने इस शब्द ‘*मधु-‘ के बदले ‘*मेलिथ-‘ शब्द को अपना लिया। इसका कारण मिस्त्र और भू-मध्यसागरीय क्षेत्र में पनपे मधुमक्खी पालन की संस्कृति का गहन प्रभाव है।

३ – ठीक ऊपर वाली बात ही बाक़ी बची दो पश्चिमी शाखाओं, जर्मन और सेल्टिक, के साथ भी है। ये दोनों शाखाएँ मिस्त्र-भूमध्यसागर-क्षेत्र के अत्यंत निकट रहने के कारण उनके असर से बच नहीं पायी और इन्होंने भी पेय/शराब/सुरा के लिए ‘*मधु-‘ शब्द को तथा शहद के लिए ‘*मेलिथ-‘ शब्द को अपना लिया।

४ – उसी तरह सभी पाँचों यूरोपीय शाखाओं (इटालिक, सेल्टिक, जर्मन, बाल्टिक और स्लावी) ने मिस्त्र से ‘बी’ या उसका अपभ्रंश ‘भी’ ले लिया। थोड़ा दक्षिण-पूर्व की ओर बढ़ने पर ग्रीक, अर्मेनियायी और अल्बानी शाखाओं ने ‘*मेलिथ-‘ (शहद) से ही मधुमक्खी के लिए भी शब्द ले लिया। मधुमक्खी के लिए हित्ती शब्द ज्ञात नहीं हैं। ग्रंथों में सुमेरि लिपि के चिह्न मिलते हैं। इससे अन्दाज़ मात्र लगाया जाता है कि हित्ती शब्द भी कुछ वैसे ही होंगे। इससे यह बात साफ़ हो जाती है कि भारतीय-आर्य, ईरानी और टोकारियन यही मात्र तीन शाखाएँ हैं जो मधुमक्खी के लिए अपने शब्द मिस्त्र से या ‘*मेलिथ-“ से किंचित नहीं लेती।

[टिप्पणी (१) – संयोग से, फ़िन्नो-युग्रिक भाषा में भारतीय-ईरानी शब्दों की तर्ज़ पर विद्वानों ने कुछ कुतर्क भी प्रस्तुत किए हैं। गमक्रेलिज का कहना है कि प्रोटो-भारोपीय शब्द ‘*मधु-‘ यहूदी शब्द ‘*म्वतक-‘ अर्थात ‘मीठा’ से निकला है। मधुमक्खी के शहद के लिए घरेलू भारोपीय शब्द ‘*मेलिथ-‘ से हटकर किसी भी मीठे मादक पेय के लिए भारीपीय शाखाओं में यहूदी से निकले शब्द ‘*मधु-‘ का प्रचलन होने लगा (गमक्रेलिज १९९५:७७१)। जैसा कि हमने देखा है कि –

१ – यहूदियों से अनुदान के रूप में लिए गए जिस शब्द का वह दावा करते हैं वह ‘ मादक पेय’ और ‘शहद’ दोनों अर्थों में इन पाँच शाखाओं, भारतीय-आर्य, ईरानी, टोकारियन, बाल्टिक और स्लावी में पाया जाता है। इन क्षेत्रों का ऐतिहासिक पर्यावास यहूदी प्रभाव से पूरी तरह अछूता था। दूसरी ओर पूर्ण यहूदी प्रभाव में वे जो पाँच शाखाएँ, इटालिक, अल्बानी, ग्रीक (यूनानी), अर्मेनियायी और हित्ती, थीं, उनमें से चार में यह ‘यहूदी अनुदान’ बिलकुल नदारद है। केवल एक ग्रीक शाखा में यह ‘मादक पेय’ के रूप में पाया जाता है। साथ ही जिस शब्द को वह ‘घरेलू भारोपीय’ कहते हैं, वह भी न केवल यहूदी क्षेत्र के प्रभाव के पार वाली पाँच शाखाओं के पहले समूह से ग़ायब हैं, बल्कि मात्र उन सात शाखाओं में ही पायी जाती हैं जो पूरी तरह से यहूदी प्रभाव क्षेत्र में थीं!

२ – इस मानव जीवन में शहद और मधुमक्खियों के इतिहास के बारे में थोड़े और विस्तार में यदि हम चर्चा करें तो पाएँगे कि सभ्यता के उषा काल में शहद इकट्ठा करने के पीछे शहद पाने के साथ-साथ उस नशीले और मादक पेय द्रव के पान का सुख  भोगने का भी सामान उद्देश्य था जिसे शहद से ही तैयार किया जाता था। बाद में मधुमक्खी पालन के घरेलू तकनीक विकसित हो जाने पर शहद का व्यापारिक महत्व बढ़ गया और इससे बना सुरा गौण हो गया।  मधुमक्खी पालन के यहूदी क्षेत्र के प्रभाव से अछूते और सुदूर इलाक़ों में बोली जाने वाली पाँचों यूरोपीय शाखाओं  में ‘सुरा’ और ‘शहद’ दोनों के लिए प्रयुक्त होने वाला शब्द ‘*मधु-‘ वस्तुतः स्थानीय और घरेलू भारोपीय शब्द ही था। ‘* मेलिथ-‘ शब्द उन अर्थों में सिर्फ़ ‘शहद’ का अर्थ लिए मधुमक्खी पालन के यहूदी प्रभाव क्षेत्र के सात भारोपीय शाखाओं में ही पाया जाता है। इन सात में भी चार वैसी शाखाओं में जो क़रीब-क़रीब या तो यहूदी क्षेत्र में ही हैं या फिर इससे सटे क्षेत्रों में, मादक पेय द्रव (सुरा) के लिए कोई सजातीय शब्द नहीं है। यह स्पष्ट रूप से ‘यहूदी अनुदान’ वाली बात को साबित करता है। अब जबकि ‘शहद और सुरा’ पुराने अर्थ में एक साथ व्यक्त होते थे और नयी स्थिति में यहूदी प्रभाव में यह सिर्फ़ ‘शहद’ के अर्थ तक ही सीमित रह गया, इस तथ्य से प्रमाणित होता है कि इरान के सबसे पश्चिमी किनारे की ओस्सेटिक भाषा जो मधुमक्खी पालन के यहूदी क्षेत्र के प्रबल प्रभाव में थी उसने ‘*मधु-‘शब्द को तो ग्रहण कर लिया किंतु ‘*मेलिथ-‘ को छोड़ दिया। तथापि, “’*मधु-‘ शब्द की ओस्सेटिक झलक उसके शहद अर्थ वाले शब्द ‘म्यद’ में मिलती है (गमक्रेलिज १९९५:५२०)।]


[टिप्पणी २ – प्रोटो-भारोपीय शब्द ‘*मधु-‘ ऐतिहासिक रूप से टोकारियन भाषा के रास्ते चीनी भाषा में भी आ गया और ठीक उसी तरह भारतीय-आर्य अप्रवासियों के रास्ते यह फ़िन्नो-युग्रिक भाषा में प्रवेश कर गया।]

पश्चिमी शाखाओं का ही इस मिस्त्र-भूमध्यासागरीय-पश्चिमी एशियायी क्षेत्र की मधुमक्खी पालन संस्कृति से प्रभावित होना भारोपीय अप्रवासन के संबंध में इस एक मौलिक बात की पुष्टि करता है कि अप्रवासन की दिशा पूरब से पश्चिम की ओर रही। इसलिए मध्य एशिया (पश्चिमी एशिया-अनाटोलिया-कौकेसियन) क्षेत्र और भाषाओं (यहूदी और कौकेसियन) के शब्द पश्चिमी शाखाओं में तो पाए जाते हैं किंतु इस क्षेत्र से ठीक पूरब की शाखाओं में नहीं पाए जाते हैं। कहने का मतलब है की इन मध्य देशांतरो को पार कर पूरब से जो लोग पश्चिम की ओर बढ़े वे इन शब्दों को भी अपने साथ लेकर बढ़ते चले और जो अप्रवासन की इस प्रक्रिया से अछूते रहकर पूरब में ही रह गए उन्होंने इन शब्दों का स्वाद ही नहीं चखा।

अब हम जल्दी से इस सिद्धांत की वैधता को जाँचने के लिए दो और महत्वपूर्ण दृष्टांतों पर अपनी दृष्टि दौड़ा लें।


Tuesday, 4 May 2021

समय की चाल

 कभी नहीं होता कुछ जग में,

 अकारण अकाल!

समय सदा से चलता आया,

अपनी अद्भुत चाल।


जब दिखता है जहां ये सूरज,

कहते हुआ है भोर।

होता हरदम पथ परिक्रमा, 

कहीं ओर न छोर।


और ओझल होते ही इसके,

रजनी धरा पर छाती।

पूनम अमा की चक्र कला में, 

अंधियारा फैलाती।


निहारिकाओं को निहार कर,

जब चंदा मुस्काता।

चंदन-सी चूती चांदनी,

चट चकोर पी जाता।


फिर छाते ही नभ में मेघिल,

घटाटोप घनघोर।

कुंज वीथिका विहंसे मयूरी,

वन नाचे मन-मोर।


लट काली नागिन-सी बदरी,

पवन प्रचंड इठलाती।

प्रेम पिपासु प्यासी धरती,

पानी को अकुलाती।


विरह-व्यथा में विगलित बादल,

 गरज-गरज कर रोता।

अविरल आँसू से अपनी,

आहत अवनि को धोता।


पीकर पिया के पीव-पीयूष,

धरती रानी हरियाती। 

रेश-रेश और पोर-पोर में,

तरुणाई अँखुआती।


वसुधा के उर में फिरसे,

नव जीवन छा जाता।

कभी अकारण और अकाल,

नहीं काल यह आता।






Thursday, 29 April 2021

सजीव-निर्जीव

जिसका स्फुरण आपकी अनुभूतियों को उद्भूत करे, आपके विचारों को जगाए, आपकी इंद्रियों को उद्वेलित करे और आपकी संवेदना में सजीवता घोल जाए, मेरी दृष्टि में वही सजीव कारक है। अनुभूतियों का दायरा अत्यंत फैला हुआ है। यह भौतिक सत्ता से लेकर वैचारिक और भावनात्मक धरा का स्पर्श करती आध्यात्मिक बिंबों तक विस्तृत है। मस्तिष्क की तंत्रिका से दृष्टिबोध का कितना तालमेल है, यह दृश्य की जीवंतता के परिमाण को इंगित करता है। सजीवता की अनुभूति में ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान तीनों समान रूप से शामिल हैं। ज्ञेय का अस्तित्व ज्ञाता की अनुभूति की प्रखरता और तीव्रता पर निर्भर करता है। एक बार 'ज्ञेय' यदि 'ज्ञाता' की प्रखरता की पकड़ में आ गया तो वह फिर 'ज्ञान' बन जाता है। मतलब ‘ज्ञान’ का ‘होना’ ज्ञाता और ज्ञेय दोनों की क़ाबिलियत पर भी उतना ही निर्भर करता है जितना उसके स्वयं की सत्ता में होने के सच पर। यहाँ क़ाबिलियत का सीधा मतलब है कि ज्ञाता को अपनी अनुभूतियों में पकड़ने के क़ाबिल होना चाहिए और ज्ञेय में भी पकड़े जाने की उतनी ही क़ाबिलियत होनी चाहिए। दोनों में एक भी तंतु टूटा कि ज्ञान छूटा!

जब तक अति सूक्ष्म जीवाणु दृष्टि की पकड़ में न आए, भौतिक धरातल पर वह सत्ताहीन है। एक शक्तिशाली माइक्रस्कोप उसे सत्ता में ला देता है। अर्थात एक अक्षम ज्ञाता को माइक्रस्कोप सक्षम और क़ाबिल बना देता है। ज्ञाता के सक्षम बनते ही ज्ञेय की सत्ता सच हो जाती है और वह अब ज्ञान बन जाता है। अर्थात ‘होना’ या ‘न होना’ एक सापेक्षिक सत्य मात्र है ज्ञाता के लिए।  सच कहें तो ज्ञाता को उस जीवाणु का ज्ञान न होने से उस जीवाणु का अस्तित्व असत्य नहीं हो जाता! तो, भ्रम ज्ञाता में है, ज्ञेय में नहीं। ज्ञेय तो ज्ञान बनने के लिए व्याकुल है। उसे इंतज़ार है ज्ञाता के सजीव होने की।

बस आप मान कर चलें कि हमने सजीव और निर्जीव के विषय में जो अपने विचार बना लिए हैं न, वह भी हमारी अपनी सक्षमता या सजीवता की इन्हीं परतों में दबा है। हम किसी वस्तु की सजीवता के कितने सूक्ष्मातिसूक्ष्म लक्षणों को ग्रहण कर पाने में सक्षम या सजीव  हैं – यही कसौटी है हमारे द्वारा उस वस्तु को सजीव घोषित किए जाने की! निरपेक्ष रूप में तो वह जो है, वही है और जैसा है, वैसा ही है। अर्थात किसी वस्तु की सजीवता की अनुभूति सच में हमारी  अपनी सजीवता का प्रतिभास है।

इसलिए हमारा मानना है कि इस चराचर जगत में कुछ भी निर्जीव नहीं है। सभी सजीव हैं। बस सब कुछ निर्भर करता है हमारी अपनी अनुभूति और संवेदना की सक्षमता जिसे आप चेतना भी कह सकते हैं, उसके स्तर पर कि ज्ञेय की सजीवता के कितने अंश को वह पकड़ पाता है। और यह पकड़ना, मैं फिर दुहराऊँगा, “भौतिक सत्ता से लेकर वैचारिक और भावनात्मक धरा का स्पर्श करती आध्यात्मिक बिंबों तक विस्तृत है।“ बीसों साल पहले परम धाम को प्रस्थित माँ आज भी स्मृतियों में सजीव हो उठती है और दुलारकर चली जाती है। क्लांत मन हरिहरा जाता है। आँखें ओदा जाती हैं। मन कुछ बुदबुदाने लगता है। इसे आप क्या कहेंगे – किसी सजीव सत्ता से ‘इंटरैक्शन’ या किसी सत्ताहीन निर्जीव का ‘इन्फ़ेक्शन’!  


Friday, 23 April 2021

वैदिक वांगमय और इतिहास बोध-२१


वैदिक वांगमय और इतिहास बोध-२१

(भाग – २० से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य (द)

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)


४ - ‘सोम’ के सबूत   


ऋग्वेद और ईरानियों के धर्म में ‘सोम’ का बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान था। सोम का पौधा सम्भवतः एफिड्रा नामक जड़ी-बूटी का एक विशेष प्रजाति है जो मध्य एशिया में सुदूर पश्चिमोत्तर के पहाड़ी इलाक़ों में बहुतायत में पाया जाता है। पूरब में हिमालय में पायी जाने वाली इस पौधे की प्रजाति से पर्याप्त मात्रा में उतना बढ़िया रस नहीं निकलता था जिसकी चर्चा ऋग्वेद में हम पाते हैं। इसी आधार पर भारतविदों का यह विचार है कि जिस ढंग से ऋग्वेद के वैदिक कर्मकांडों और ईरानी धर्म में सोम रस की प्रमुखता है, उससे यहीं साबित होता है कि वैदिक आर्य भारत में पश्चिमोत्तर से ही अपने साथ सोम की परम्परा को लेकर घुसे थे।

लेकिन ऋग्वेद के कुछ महत्वपूर्ण साक्ष्यों से हम मुँह नहीं फेर सकते जो इस प्रकार हैं :

क – सोम के पौधे और इससे जुड़े अनुष्ठान पूरी तरह से बाहरी चलन थे जिसका श्री गणेश काफ़ी शुरुआती दिनों में वैदिक आर्यों और उनके पुजारियों के बीच भृगु ने किया था। भृगु ईरानी अणुओं के पूजारी थे जो उत्तर-पश्चिम के उस प्रदेश के निवासी थे जहाँ सोम की पैदावार बहुत ज़्यादा होती थी। 

ख – ऋग्वेद के पुराने मंडलों की बात करें तो उनके लिए सोम एक अपरिचित नाम था क्योंकि इसका उत्पादन उन क्षेत्रों में होता था जो वैदिक आर्यों की भूमि से काफ़ी दूर था। जब वे कालांतर में पश्चिम की ओर बढ़े तभी उनका परिचय इस ‘सोम’ नामक पौधे से हुआ।

ग – यह भी कहा जा सकता है कि सोम का ज्ञान होने पर इसकी खोज और प्राप्ति भी वह एक उत्प्रेरक तत्व था जिसके कारण वैदिक-आर्य तेज़ी से उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ने लगे और धीरे-धीरे काल-क्रम की जुड़ती कड़ियों में भारोपीय फैलाव और बिखराव की प्रक्रिया ने गति पकड़ ली।

१ - वैदिक आर्य, भरत, के प्रमुख पुरोहित अंगिरा, वशिष्ठ और विश्वामित्र थे। इन पुजारियों का सोम के प्रयोग से कोई मतलब नहीं था। सोम के प्रयोग से जुड़े रहनेवाले पुरोहितों में मुख्य रूप से कश्यप और भृगु ही थे जो सीधे तौर पर उत्तर-पश्चिम और कश्मीर के क्षेत्रों में रहने वाली अणु जनजाति के पूजारी थे। कश्यपों का तो सोम से बहुत गहरा लगाव देखने को मिलता है। उनके द्वारा रचित सूक्तों में सत्तर प्रतिशत से भी ज़्यादा सूक्त ‘सोम-पवमान’ को ही समर्पित हैं। कश्यप कुल रचित ‘अप्रि-सूक्त’ सोम को ही समर्पित है जबकि बाक़ी के नौ ‘अप्रि-सूक्त’ अग्नि को समर्पित हैं। न केवल ये कश्यप सिर्फ़ सोम की ही पूजा करते थे बल्कि साथ-साथ यह भी तथ्य है कि इनका पदार्पण ऋग्वेद में बहुत बाद में होता है। वैदिक आर्यों के सोम की पैदावार वाली भूमि में पहुँच जाने के बाद से ही कश्यप ज़्यादा सक्रिय दिखायी देने लगते हैं। 

भृगुओं के बारे में भी हम बार-बार यह दुहरा चुके हैं कि जमदग्नि और उनकी संततियों की एक शाखा को यदि छोड़ दिया जाय तो वैदिक आर्यों की भूमि से उत्तर और उत्तर-पश्चिम में बसने वाले आद्य ईरानियों के पूजारी भृगु ही थे। भृगुओं की सोम से पहचान काफ़ी पुरानी और बहुत अंदर तक की है। यह पूरी तरह से साफ़ है कि न केवल सोम के चलन का अविष्कार भृगुओं ने किया, प्रत्युत वैदिक परम्पराओं और वैदिक,उज़ारियों में उसका बीजारोपण भी उन्हीं ने किया :  

क – ऋग्वेद में हज़ारों बार आने वाले शब्द ‘सोम’ के बस एक ही रचनाकार दिखायी देते हैं। वह ‘सोमाहुति भार्गव’ ऋषि हैं।

ख – नौवें मंडल के ‘पवमान मंडल’ में सैकड़ों बार आने वाले शब्द ‘पवमान’ इस नौवें मंडल से बाहर बस एक जगह दिखायी देता है। वह है आठवें मंडल के १०१वें सूक्त की १४वीं ऋचा और इसके रचयिता हैं – ‘जमदग्नि भार्गव’।

ग – ऋग्वेद और अवेस्ता से मिले सबूत इस बात पर एक मत हैं कि सोम के प्रचलन की शुरुआत करने वाले ऋषि भृगु ही हैं। मकडॉनेल  का विचार है कि “यहाँ तक कि ऋग्वेद और अवेस्ता भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि सोमरस तैयार करने वाले सबसे प्राचीन पुरुष एक तरफ़ विवस्वत और त्रित अप्त्य हैं तो दूसरी ओर विवनहंत, अथव्य और त्रित हैं (मकडॉनेल १८९७ : ११४)।“ अवेस्ता के मुताबिक़ सोम को बनाने वाले पहले पुरुष ‘विवनहंत (विवस्वत)’, दूसरे ‘आप्त्य’  और तीसरे ‘त्रित’ हैं। ऋग्वेद के अनुसार विवस्वत ‘मनु’ और ‘यम’ के पिता हैं। अवेस्ता में भी विवनहंत ‘यिमा’ के पिता हैं। विवस्वत और यम वैवस्वत, दोनों,  की पहचान ऋग्वेद में ‘भृगु’ के रूप में है [भृगु कुल के ऋषियों का संदर्भ तलगेरी २०००:३१-३२]। आठवें मंडल के २९वें सूक्त की अनुक्रमणिका में ‘मनु वैवस्वत’ की पहचान कश्यप ऋषि के रूप में की गयी है। यद्यपि त्रित आप्त्य की ऋग्वेद में कोई स्पष्ट पहचान नहीं है, तथापि दूसरे मंडल के ११वें सूक्त से लेकर १९वें सूक्त तक घृष्टमदष (केवल भृगु) यह कहते सुने जाते हैं कि ‘त्रित आप्त्य’ ‘हमारे कुल’ के हैं (ग्रिफ़िथ का अनुवाद)। 

घ – नौवें मंडल में सोम को समर्पित तक़रीबन सारी रचनाएँ ऋग्वेद की रचना के मध्य और अंतिम काल की हैं। हालाँकि सप्तर्षि सूक्त में पुराने रचनाकारों के काल्पनिक नाम से कुछ बाद में भी जोड़ दी गयी रचनाएँ भी हैं। भृगु के नाम से भी जोड़े गए १२ सूक्त हैं, जो बहुत सम्भव है कि उनकी संततियों के द्वारा भी रचित या पुनः सम्पादित हों। फिर भी, इन सूक्तों को जिन भृगुओं के नाम से जोड़ा गया है वे पुरातन और पुरखे भृगु हैं जो ऋग्वेद के काल से भी पहले के थे और यहाँ तक कि ऋग्वेद के पुराने मंडलों में भी वे पौराणिक पुरुषों के रूप में चित्रित होते हैं – ‘वेण भार्गव’ (नौवें मंडल के ८५वें सूक्त), ‘उषण काव्य’ (नौवें मंडल के ८७-८९वें सूक्त), और ‘कवि भार्गव’ (नौवें मंडल के ४७-४९वें सूक्त तथा ७५-७९वें सूक्त)। इसलिए यह साफ़-साफ़ लगता है कि सबसे पुराने सोम सूक्त भृगु के द्वारा ही लिखे गए थे।

ङ – ऋग्वेद से ऐसा पूरा संकेत मिलता है कि वैदिक आर्यों और फिर उनके पुरोहितों तथा देवताओं को सोम पिलाने वाले भृगु ही थे। कम से कम ऋग्वेद के ऐसे तीन संदर्भों {१/(११६/१२, ११७/२२ और ११९/९)} से यह बात खुलकर सामने आती है कि सोम की उत्पति का स्थान पहले गोपनीय था। इस रहस्य को ‘दध्यांक’ ने अश्विन के सामने खोला था। बताते चलें कि दध्यांक ऋग्वेद के एक पौराणिक चरित्र और अति प्राचीन भृगु ऋषि थे जो यहाँ तक कि कवि भार्गव और उषण काव्य से भी बहुत पहले के थे। दध्यांक अथर्वन के पुत्र और उस आदि भृगु के पोते थे जो अपने भृगु कुल के नामकरण का स्त्रोत थे अर्थात उन्हीं के नाम पर उनकी कुल परम्परा का नाम भृगु पड़ा था।

च – यहाँ तक कि वह गरुड़ पक्षी जो सोम लेकर आर्यों के बीच उतरा था, सांकेतिक अर्थों में भृगु को ही इंगित करता है। मकडॉनेल ( १८९७:११२) का मानना है कि “गरुड़ पक्षी का मतलब अग्नि वैद्युत या आसमान से गिरने वाली बिजली (दामिनी) से है।“ ठीक वैसे ही, बेरगैगने का सोचना है कि ‘इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि भृगु वास्तव में अग्नि का ही नाम था’ और इसमें आगे कून और बर्थ अपनी सहमति के स्वर जोड़ते हैं, ‘अग्नि का जो यह रूप है वह आकाश से गिरने वाली बिजली का ही है।‘ (मकडॉनेल १८९७:१४० और साथ में ४/७/४ में ग्रिफ़िथ की पाद टिप्पणी)

२ – सोम दूरस्थ इलाक़ों में उपजता था। इतनी दूर कि बार-बार उस जगह की उपमा स्वर्ग से दी गयी है।[४/{२६/६, २७/(३, ४)}, ८/१००/८, ९/(६३/२७, ६६/३०, ७७/२, ८६/२४ आदि):

अ – एक ही ख़ास बात बतायी गयी है वह सोम के पहाड़ों पर उपजने की बात है {१/९३/६, ३/४८/२, ५/(४३/४, ८५//२), ९/(१८/१, ६२/४, ८५/१०, ९५/४, ९८/९ आदि)}। कुल-मंडलों (२-७) में सोम के बारे में इससे ज़्यादा कोई और विशेष बात का कहीं उल्लेख नहीं है।

आ – सोम का क्षेत्र वैदिक भूमि में न तो कहीं था और न ही किसी ऐसे वैदिक क्षेत्र की ओर ऋग्वेद में लेश मात्र भी संकेत है। हाँ यह बात बार-बार दुहरायी गयी है कि ‘दूरस्थ क्षेत्रों में पाया जाने वाला सोम’ ({४/२६/६, ९/६८/६, १०/(११/४, १४४/४)}! इस क्षेत्र को ‘त्वष्ट्र की भूमि’ (४/१८/३) के नाम से जाना जाता है। ‘तवस्त्र’ के बारे में भी विद्वानों का यही कहना है कि ‘वैदिक पंथ की अवधारणाओं में सबसे धूमिल और अस्पष्ट पक्ष ‘त्वष्ट्र’ का है। इस अस्पष्टता की विवेचना हिलब्रांट ने इन शब्दों में की है कि ‘वैदिक जनजातियों की बसावट की सीमा के बाहर एक काल्पनिक और पौराणिक वृत्तिय क्षेत्र है जहाँ त्वष्ट्र पाया जाता है (मकडॉनेल १८९७:११७)।‘

इ – पौराणिक तौर पर वैदिक लोगों और उनके देवताओं को सोम कहीं बहुत दूर स्थित अपनी उत्पति स्थान से गरुड़ पक्षी के द्वारा लाये जाने की अनेकानेक चर्चाएँ हैं:

पहला मंडल – ८०/२, ९३/६

तीसरा मंडल – ४३/७

चौथा मंडल – १८/१३, २६/(४-७), २७/(३, ४)

पाँचवाँ मंडल – ४५/९

छठा मंडल – २०/६

आठवाँ मंडल – ८२/९, १००/८

नौवाँ मंडल – ६८/६, ७७/२, ८६/२४, ८७/६

दसवाँ मंडल – ११/४, ९९/८, १४४/(४, ५)

सोम के पाए जाने का यह स्थान वैदिक लोगों की जानकारी के परे था। गरुड़ पक्षी भी इस सोम को चुरा कर वहाँ के लोगों की आँख से अपने को बचाकर शीघ्रता से वहाँ से प्रस्थान कर जाता था (४/२६/५)। ऐसा भी उल्लेख (४/२७/३) मिलता है कि सोम चुराकर उड़ते गरुड़ पक्षी पर वहाँ के लोग आक्रमण तक कर देते थे। 

‘त्वष्ट्र’ ही सोम का संरक्षक या सरपरस्त था और सोम को ‘त्वष्ट्र का सुरा’ कहते थे (मकडॉनेल १८९७:११६)। इस सोम को पाने के लिए इंद्र के द्वारा त्वष्ट्र को जीत लेने का भी वृतांत है।

१/४३/८ की अपनी पाद टिप्पणी में ग्रिफ़िथ ‘उन लोगों का ज़िक्र करते हैं जो अपनी भूमि से सोम ले जाए जाने का विरोध करते हैं।‘

ई – सामान्य तौर पर कुल-मंडल सोम के पैदावार की भूमि के बारे में अनभिज्ञ-से ही प्रतीत होते हैं। जो थोड़ी भी जानकारी अ-कुल नए मंडलों में है वह इस प्रकार है – आठवें मंडल के ६४/११ में सोम के पैदावार की प्रमुख भूमि के रुप में ‘सुसोम’ (सोहन) और ‘अर्जीकिय’ (हारो) नदियों के आस-पास का क्षेत्र वर्णित है। ये सिंधु की पूर्वोत्तरी सहायक नदियाँ हैं जो पंजाब के ठीक ऊपर और कश्मीर के उत्तर-पश्चिम में बहती हैं। इन दोनों नदियों के क्षेत्र में ही अवस्थित ‘सर्यणावन’ झील भी निकट में ही स्थित है।  ८/७/२९ में सुसोम और अर्जीकिय पूलिंग रूप में आते हैं जो इस नाम के पहाड़ों को प्रदर्शित करते हैं और इन पहाड़ों से निकली इसी नाम की नदियाँ स्त्रीलिंग रूप में वर्णित हैं। १०/३५/२ में सर्यणावन का नाम फिर से उन पहाड़ों के लिए आता है जिनसे घिरा इन पहाड़ी क्षेत्रों में इसी नाम का झील अवस्थित है।

एक अन्य सूक्त १०/३४/१ में सबसे बढ़िया सोम के उपजाने का क्षेत्र मुजावत पर्वत दिखलाया गया है। अथर्ववेद (५-२२-५, ७, ८, १४) में अफगनिस्तान के पड़ोसी क्षेत्रों में बसने वाली मुजावत एक जनजाति है जिसका संबंध गंधारी से है। ऋग्वेद में गंधारी (उत्तरी अफगनिस्तान) का सोम से रिश्ता गंधर्वों को मिली विशेष भूमिका में परिलक्षित होता है।मकडॉनेल के शब्दों में, ‘ऋग्वेद के नौवें मंडल में सोम और गंधर्व के बीच के गहरे सम्बंध उजागर होते हैं। वे सोम की निगरानी करते हैं (९/८३/४)। स्वर्ग के गुंबद से सोम के सभी नमूनों पर उनकी सतर्क दृष्टि रहती है (९/८५/१२)। पर्जन्य और सूरज की बेटियों के साथ वे सोम को निरंतर अपनी आँखों में बसाए रखते हैं (९/११३/३)। उनके ही मुख से देवता सोम का पान करते हैं (अथर्ववेद ७/७३/३)। सोम को अगोरने के अति उत्साह ने उन्हें इंद्र का शत्रु बना दिया है। वायु के सहयोग से इंद्र उन पर आक्रमण कर देते हैं (८/६६/५) या कभी कभी इंद्र को इस आक्रमण के लिए उकसाया भी जाता है (८/१/११)।‘ (मकडॉनेल १८९७ : १३६-१३७)

ये सारे नाम अ-कुल और नए मंडलों (१, ८, ९ और १०) में ही मिलते हैं। तीसरे मंडल के संशोधित सूक्त में बस एक बार गंधर्वों का ज़िक्र आता है जिसका प्रक्षेप ऐतरेय ब्राह्मण (६/१८) में मिलता है :

तीसरा मंडल : ३८/६

पहला मंडल :  २२/१४, ८४/१४, १२६/७, १६३/२

आठवाँ मंडल : १/११, ६/३९, ७/२९, ६४/११, ७७/५

नौवाँ मंडल : ६५/(२२, २३), ८३/४, ८५/१२, ११३/(१-३)

दसवाँ मंडल : १०/४, ११/२, ३४/१, ३५/२, ७५/५, ८५/(४०, ४१), १२३(४, ७), १३६/६, १३९/(४, ६), १७७/२

उ – भले ही वैदिक आर्य सुदूर पश्चिम में उपजने वाले सोम से परिचित थे और अणुओं के ज़रिए इसली ख़रीद भी कर लेते थे, लेकिन इसका प्रचलन मुख्य रूप से नए मंडलों की रचना के काल में ही जाकर हुआ। और इस काल में यह सोम इतना हावी हो गया कि एक पूरा का पूरा मंडल (९) ही इस पर रच दिया गया। आगे चलकर उत्तर-वैदिक काल में जैसे-जैसे भारतीय धर्म पूरब की ओर खिसकता गया सोम के अनुष्ठान कि परम्परा का महत्व शनै:-शनै: भारतीय धर्म में विलुप्त होता चला गया और उसपर पूरब के दर्शन का रंग चढ़ता गया। फिर भी अपनी मूल भूमि में सोम अभी भी जीवित रहा। ईरानी भाषा ( पारसी, पश्तो, बलूची और अधिकांश दारदी एवं नूरिस्तानी भाषाओं) में एफिड्रा के पौधे को होम कहा जाता है तथा नेपाल सहित हिमालयी क्षेत्रों में इसे सोमलता के नाम से जाना जाता है। पारसी धर्म में यह प्रचलन आज भी जारी है।

३ – यह सोम की तलाश ही थी जिसकी बदौलत वैदिक आर्य पश्चिम और उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ते चले गए। सुदास के नेतृत्व में भरत राजाओं और विश्वामित्र के सतुद्री और विपाश नदियों को लाँघ जाने के साथ ही वैदिक आर्यों के पश्चिमोत्तर अभियान का श्री गणेश हुआ।उनके इस अभियान की दिशा और इसके उद्देश्य पर तीसरे मंडल के ३३वें सूक्त का पाँचवाँ  मंत्र समुचित प्रकाश डालता है। ३/३३/५ में विश्वामित्र के नदियों के संबोधन का अनुवाद ग्रिफ़िथ ने यूँ किया है, ‘हमारे  मैत्री-वचन की सुधा के पान हेतु थोड़ी सुस्ता लो, ठहरो, पवित्र सरिता! अपने बहाव को तनिक विराम दो!’ अपनी पाद टिप्पणी में वे इस अर्थ को और खोलते है, “यास्क और सायण सरीखे विद्वानों ने ‘मे वचसे सौम्याया ( हमारे मैत्री वचन की सुधा के पान हेतु) का अर्थ ‘सोम रस के लिए मेरी वाणी’’ किया है अर्थात मेरे इस उड़बोधन का अभिप्राय सोम की प्राप्ति हेतु तुम्हें पार करना है। नदियों के पार कर जाने के पश्चात ऐसा लगता है कि सुदास और भारत राजाओं के साम्राज्य-विस्तार की लिप्सा भी लहकने लगी। शीघ्र ही विश्वामित्र सुदास के लिए अश्वमेध यज्ञ का आयोजन कर लेते हैं। इसका चित्रण ३/५३/११ में मिलता है। “आगे बढ़ो कुशिक! सुदास के अश्वों के रास खोलो! पूरब, पश्चिम और उत्तर के सारे वैभव और ऐश्वर्य को जीत लो! हे नृप! अरियों का वध करो और विश्व की इस चिर-अभिलिषित भूमि (वर आ पृथिव्या:) का वरण करो!” (ग्रिफ़िथ)

कुछ विस्तार पूरब की ओर भी हुए (किकट ३/५३/१४) लेकिन मुख्य ज़ोर पश्चिम और उत्तर-पश्चिम की ही ओर था। इस कड़ी का पहला युद्ध परश्नि के तट पर दसराज्ञ-संग्राम था और अंतिम रण सरयू के पार मध्य अफगनिस्तान में था।  परश्नि के युद्ध में तो भरत राजाओं का नेतृत्व सुदास के हाथों में ही था परंतु सरयू के समर तक आते-आते ऋग्वेद का मध्य काल आ गया था और नेतृत्व भी बहुत नीचे की पीढ़ी के भरत राजा सहदेव के हाथों में आ गया था। जैसा कि चौथे मंडल के १५वें सूक्त में ७ से लेकर १०वीं ऋचा तक सहदेव के पुरोहित वामदेव का संदर्भ यह उद्घाटित करता है कि इस युद्ध में सहदेव का पुत्र भी लड़ा था और संभवतः सोम बहुल क्षेत्रों को पिता सहदेव द्वारा आधिपत्य में ले लेने के कारण उसका नाम ‘सोम-का’ पड़ गया।

इस तरह ऋग्वेद के साक्ष्य यही प्रस्तुत करते हैं कि सोम के पौधे और अनुष्ठान दोनों को अणुओं के पुरोहित भृगु पश्चिमोत्तर पर्वतीय प्रांतों से लेकर वैदिक आर्यों के पास लाए थे और वैदिक आर्य बाद में नए मंडलों के रचे जाने के युग में अपने साम्राज्य विस्तार के क्रम में उन क्षेत्रों से परिचित हुए।


Thursday, 22 April 2021

अभिसार का आसव

 महाकवि दिनकर की पुण्यतिथि पर उनकी काव्य कृति ' उर्वशी' के ' नर प्रेम,  नारी प्रेम' अंश में व्यक्त मनोविज्ञान के प्रत्युत्तर में पुरुष मन का उद्गार क्षमा याचना सहित उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित।

पता नहीं कब तोड़ बाँध,

लहरें यौवन प्रचंड से।

ऊष्मा उर से उकस-उकस,

भड़केगी भुजबंध से।


आँखों में उसकी छलकेगा

अभिसार का आसव।

और प्रेम की कुञ्ज वीथी में,

कुजे कोकिल कलरव।


कादम्बरी के मधु मादक से,

नर्तन करे कब प्याली।

प्रेम के आतप से धिप-धिप,

हो रमणी रति-सी व्याली।


और विश्व के नस-नस में,

धधके पौरुष की ज्वाला।

अधराधर कर्षण-घर्षण में,

बहे मदिरा का नाला।


रम्य रमण रमणी का रण में,

आलिंगन अंतिम क्षण में।

उत्कर्ष के चरम चरण,

आरोहण अवरोहण में।


श्वासों का उत्थान-पतन,

बेलि-सी  सिमटी! बाहुपाश।

वनिता तंद्रिल क्लान्त शिथिल,

विश्रांत विश्व गोधुल आकाश।







  




Tuesday, 13 April 2021

माँ, कुछ तुमसे कह न पाया!

 



अहर्निश आहुति बनकर,

जीवन की ज्वाला-सी जलकर,

खुद ही हव्य सामग्री बनकर,

स्वयं ही ऋचा स्वयं ही होता,

साम याज की तू उद्गाता।


यज्ञ धूम्र बन तुम छाई हो,

जल थल नभ की परछाई हो,

सुरभि बन साँसों में आई,

नयनों में निशि-दिन उतराई,

मेरी चिन्मय चेतना माई।


मंत्र मेरी माँ, महामृत्युंजय,

तेरे आशीर्वचन वे अक्षय,

पल पल लेती मेरी बलैया,

सहमे शनि, साढ़ेसाती-अढैया,

मैं ठुमकु माँ तेरी ठइयाँ।


नभ नक्षत्रो से उतारकर,

अपलक नयनों से निहारकर,

अंकालिंगन में कोमल तन,

कभी न भरता माँ तेरा मन,

किये निछावर तूने कण कण।


गूंजे कान में झूमर लोरी,

मुँह तोपती चूनर तोरी,

करूँ जतन जो चोरी चोरी,

फिर मैया तेरी बलजोरी,

बांध लें तेरे नेह की डोरी।


 तू जाती थी, मैं रोता था,

जैसे शून्य में सब खोता था,

अब तू हव्य और मैं होता था,

बीज वेदना का बोता था,

मन को आँसू से धोता था।


सिसकी में सब कुछ कहता था,

तेरी ममता में बहता था,

मेरी बातें तुम सुनती थी,

लपट चिता की तुम बुनती थी,

और नियति मुझको गुनती थी।


हुई न बातें अबतक पूरी,

हे मेरे जीवन की धुरी,

रह रह कर बातें फूटती हैं,

फिर मथकर मन में घुटती है,

फिर भी आस नहीं टूटती है।


कहने की अब मेरी बारी,

मिलने की भी है तैयारी,

लुप्त हुई हो नहीं विलुप्त!

खुद को ये समझा न पाया,

माँ, कुछ तुमसे कह न पाया!







Thursday, 8 April 2021

सफर

 प्राची के आँचल में नभ से,

उषा की पहली रश्मि आती।

पुलकित मचली विश्व-चेतना,

जीवन में उजियारी छाती।


मन के घट में, भोर प्रहर में,

जीवन-रंग बिखरता है।

जीव-जगत का जंगम जीवन,

मन अनंग निखरता है।


चहकी चिड़िया,कूजे कोकिल,

साँसों में बसंत मचलता है।

किरणों से ज्योतित जड़-चेतन,

भाव तरल- सा बहता है।


आसमान में इंद्रधनुष की,

चित्रकला-सी सजती है।

क्षितिज-छोर के उभय कोर से,

आलिंगन में लगती है।


प्रणय कला का यह अभिनय,

हर दिवस प्रहर भर चलता है।

प्रेमालाप के प्रखर ताप में,

डाह से सूरज जलता है।


फिर ईर्ष्या में धनका सूरज,

सरके सरपट अस्ताचल में।

दुग्ध-धवल-सी सुधा चांदनी,

उतरी विश्व के आंचल में।


आज अमावस और कल राका,

गति ग्रहण की आती है।

यही कला है समय चक्र की,

कालरात्रि दुहराती है।


जनम से अंतिम लक्ष्य बनी वह,

महाकाल की,रण भेरी।

हरदम हसरत में हंसती,

मनमीता है, वह मेरी।


एक वहीं जो,अभिसार की,

मदिरा हमें पिलाएगी।

आलिंगन में लेकर हमको,

शैय्या पर ले जाएगी।


अग्नि से नहलाकर हमको,

नए लोक में लाएगी।

शुरू सिफ्र से नया सफर फिर,

गीत गति का गायेगी।



Thursday, 1 April 2021

अहसास और निजता!

पत्ते पुलकित हैं। हिलते दिख रहे हैं। कौन है उत्तरदायी? हवा। पत्ते स्वयं। आँखें। कोई झकझोर तो नहीं रहा पेड़ को! या फिर, ‘हिलना’ स्वयं एक स्वतंत्र सत्ता के रूप में! किसी एक को हटा लें तो सारा व्यापार ख़त्म! और यदि सभी साथ इकट्ठे हों भी और मनस के चेतन तत्व को निकाल लिया जाय तो फिर वही बात – “ढाक के तीन पात”!

चेतना कुछ ऐसा अहसास छोड़ जाय जो समय, स्थान या किसी भी ऐसे भौतिक अवयव से जो बाँधते हों मुक्त हो जाय, तो वह अहसास रुहानी  हो जाता है। एक छोटी उम्र का बालक अपने खेलने-खाने की शैशव अवस्था में अहसास की उस उम्र में पहुँच जाए जहाँ से सन्यास के द्वार की साँकले खुलती हैं, तो वह फिर शंकराचार्य बन जाता है। मैथुन क्रीड़ा  में रत क्रौंची  के प्रेमी क्रौंच  की वधिक के  द्वारा हत्या से उपजा विषाद कल के एक लुटेरे को अभी उस अवस्था में धकेल देता है कि वह आदि कवि वाल्मीकि बन जाता है। यह भावनाओं के स्तर पर  महज़ एक मनुष्य के एक पक्षी से  जुड़ने की घटना नहीं है बल्कि रूहों के स्तर पर एक प्राणी के दूसरे प्राणी से एक हो जाने का संयोग है जिससे राम कथा का जन्म होता है।
प्रेम का संगीत भी मुक्ति के कुछ ऐसे ही राग छेड़ता है जो रूह को देह से छुड़ाकर परमात्मिक आकाश में छोड़ देता है। दादा-दादी, नाना-नानी बनी देह के भीतर  का मन प्रेम में पगकर अपने कैशोर्य की कमनीय कलाओं में रंगने लगे तो वह ‘विदेह’ हो जाता है। समय, स्थान, अवस्था, देह सबसे मुक्त हो जाता है। फिर चेतना के स्तर पर वह वृंदावन की गोपिकाओं के अहसास में समा जाता है जहाँ तर्क-वितर्क के खूँटे में बँधे उद्धव जड़वत दिखायी देते हैं।
इधर निजता की बातें ज़ोर-शोर से की जा रही हैं। संस्कृति का सभ्यता के सामने घुटने टेक देना समष्टि  के व्यष्टि  की ओर ताकने और व्यक्ति  द्वारा समाज  को घूरे जाने की कहानी कह रही है। यह सोचने का विषय है कि निजता आख़िर है क्या चीज़! यह कोई प्रकृति  प्रदत्त सम्पदा है या मनुष्य की अपनी निर्मित धारणा। सच पूछें तो निजता की सोच ही व्यक्ति के किसी बंधन में बँधे होने का अहसास है। किसी बंधन से मुक्त होने की छटपटाहट! अपने में दूसरों से इतर एक अलग सता के आरोपण का अहसास और पृथकता का भाव! टाइम और स्पेस के अनंत वितान में एक अलग घोंसले की चाह! वह घोंसला भी पूरी तरह से एक मानसिक परिकल्पना! आदमी भीड़ में भी तो अकेला हो जाता है। या फिर जब उसका आत्म अहसास के स्तर पर ऐकांतिकता के अनंत  में कुलाँचे भरने लगे जहाँ वह फैलकर स्वयं अनंत बन जाए तो वह स्वयं भी कहाँ रह पाता है। भला, अनुभवों की जलराशि में तैरते आर्किमिडिज को ‘युरेका, युरेका’ चिल्लाते नग्न अवस्था में सड़क पर दौड़ते समय निजता के इस भाव ने क्यों नहीं पकड़ा। या तो वह अपनी निजता को त्याज्य अनंत के अहसास में फैल गए थे या फिर निजता की चिर समाधि में विलीन होकर अपने भौतिक अस्तित्व से मुक्त हो गए थे। ‘कंचुकी सुखत नहीं सजनी, उर बीच बहत पनारे’ का प्रलाप करती मीरा अपने मोहन के मोहपाश में अपनी निजता कहाँ छोड़ आती है।
जहाँ अहसास रुहानी होता है वहाँ ‘अयं निज: परो वेत्ति’ की बात नेपथ्य में ही रह जाती है। वहाँ सब कुछ एक हो जाता है – ‘ तत् त्वम असि। सो अहं।। एकोअहं, द्वितियोनास्ति।।।‘

Sunday, 21 March 2021

रूपसी का भ्रमजाल!


 




नागिन-सी जुल्फों का जलवा,

चमके चाँद-सा चेहरा।

टँके नयन सितारों जैसे,

शुभ्र सुभग-सा सेहरा।


पंखुड़ी-सी होठों की लाली,

ग्रीवा ललित सुराही।

शाखों-सी बाहों की शोखी,

निरखे ठिठके राही।


अलमस्त कुलाँचे मारे,

हिरणी जैसी चाल।

शायर की मद मस्त शायरी

रूपसी का भ्रम जाल।


अक्षर आसव आप्लावित,

शब्द छंद मकरंद।

कलि कुसुम मन मालती,

मधु मिलिंद सुगंध।


पद पाजेब पखावज बाजे,

उझके अंग मृदंग।

कंचुकी कादम्बरी चुए,

भंगिमा भीगे भंग।


राजे वो ऋतुराज-सी,

अंग-अंग अनंग।

चारु-चंद्र-सी चपल-चमक,

देख दामिनी दंग।


माया की मूर्ति मृदिका की,

क्षणभंगुर श्रृंगार।

रूह रुखसत हो देह से,

जीव-जगत निस्सार।

Thursday, 18 March 2021

वैदिक वांगमय और इतिहास बोध-२०


(भाग – १९ से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य (थ)

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)


अन्य भारतीय जंतु 

यह भी उतना ही ध्यान देने योग्य तथ्य है कि ऋग्वेद में वैसे ढेर सारे पूरी तरह से देशज भारतीय-आर्य नाम उन पशुओं या जंतुओं के हैं जो केवल पूर्वी भाग के तो नहीं कहे जा सकते, लेकिन हैं खाँटी भारतीय:

सिंह (शेर), शिम्शुमार (गांगेय डॉल्फ़िन), सालावृक (लकड़बग्घा)

समूचे ऋग्वेद में इनका विवरण मिलता है।

मंडल सूक्त/ऋचा 

६४/८, ९५/५, ११६/१८, १७४/३

२/११, ९/४, २६/५

१६/१४

७४/४, ८३/३

१८/७

८९/३, ९७/२८

१० २८/(४, १०), ६७/९, ७३/३, ९५/१५


कुछ ऐसे भी जानवरों के नाम हैं जो ऋग्वेद में जानवर के नाम के रूप में तो उपस्थित नहीं होते किंतु किसी ख़ास व्यक्ति के रूप में इन नामों का उल्लेख वहाँ अवश्य होता है। हालाँकि यजुर्वेद और अथर्ववेद में यही नाम जानवरों के नाम के रूप में प्रकट अवश्य होते हैं। जैसे – कश्यप (कछुआ), कपि (बंदर), व्याघ्र (बाघ), पृडाकु (चीता)।

ऐसे भारतीय-आर्य नाम वाले कुछ ऐसे अन्य भारतीय जानवर भी हैं जिनका ज़िक्र ऋग्वेद में तो कहीं नहीं आता, किंतु अथर्ववेद और यजुर्वेद में वे ज़रूर मिल जाते हैं। जैसे – शार्दुल (बाघ), खड़ग (गैंडा), अजगर (पाईथन), नाक्र (मगरमच्छ), कृकलास (गिरगिट), नकुल (नेवला), जाहक (काँटेदार जंगली चूहा), शाल्यक (साही), कूर्म (कछुआ), जतु (चमगादड़) आदि।

यहाँ पर ऋग्वेद में चर्चित सभी जंतुओं की सूची प्रस्तुत करना कोई उद्देश्य नहीं है। इन जंतुओं में वैसे कतिपय जानवरों के नाम मिलेंगे जो साझे रूप से भारत और यूरोप दोनों जगहों पर जाने जाते हैं। जैसे – भेड़िया, भालू, बनविलाव, लोमड़ी/ गीदड़, हिरण/बारहसिंगा, साँड़, गाय, खरहा, चमगादड़, चूहा, बत्तख़/हंस, कुत्ता, बिल्ली, घोड़ा, खच्चर, साँप, मछली, अनेक प्रकार के पक्षी, कीड़े आदि। इनमें से कुछ जंतुओं के तो ऋग्वेद और अन्य संहिताओं में एक से अधिक नाम हैं। जैसे हिरण के लिए ‘रूरु’ ‘एणी’, ‘ऋष्य’, ‘हरिण’ आदि। यहाँ पर सामन्य तौर पर हम जानवरों के उन्हीं नामों पर अपनी मीमांसा करेंगे जिनकी प्रासंगिकता इन दो अवधारणाओं, ‘बाहर से आए आर्यों का आक्रमण’ और ‘आर्यों का अपनी मूलभूमि भारत से बाहर जाना’, पर छिड़े विवाद से है।  इस विषय में नीचे दिए गए कुछ पक्षियों के भारतीय-आर्य नामों पर विचार करना प्रासंगिक होगा जिनके नाम अथर्ववेद और यजुर्वेद में तथा कहीं-कहीं ऋग्वेद में भी आते हैं :

चक्रवाक (ब्रह्मिनी बत्तख़, २/३९/३), ऊलूक (उल्लू, ७/१०४/२२, १०/१६५/४), अन्यवाप (कोयल), कृकवाक (मुर्ग़ा), कपोत {कबूतर, १/३०/४, १०/१६५/(१, २, ३, ४, ५)}, कपिंजल/ तित्तिरी (तीतर), कंक/ क्रौंच (सारस), चाश (, श्येन/सुपर्ण (गरुड़, ढेर प्रसंग), गृद्ध (गीध, ढेर प्रसंग), शुक (तोता) आदि।


वृक्ष और पौधे


प्रोटो भारोपीय शब्दावली में ‘शीतोष्ण’ आबोहवा के पेड़ पौधों के इन तमाम जुमलों के बावजूद ‘ऋग्वेद में ऐसे किसी एक भी पश्चिमी पौधे का कोई नाम चाहे अपभ्रंश ही सही, कहीं भी नहीं है। सही बात तो यह है कि ऋग्वेद उन पौधों और वृक्षों के वृतांत से भरा पड़ा है जो पूरी तरह से न केवल पूरबिया और खाँटी भारतीय हैं, बल्कि भारत की धार्मिक परम्पराओं से लेकर वाणिज्यिक महत्व तक की सभी चीज़ों में आजतक अपनी जगह बनाए हुए हैं।

ऋग्वेद में ऐसे नामों का विवरण इस प्रकार है :

शिंशप (Dalbergia sissoo, शीशम)

खदिर (acacia catechu, हर्टवुड या काठ) 

शल्मली (salmalia malabaricum, रेशम और सूत के पौधे)

किंशुक, पर्ण (butea monosperma,  जंगल-ज्योति)

शिंबल (salmalia malabaricum,  रेशम और सूत के पौधे)

विभिधक (terminalia bellerica, the beleric myrobalan बहेरा)

अरत्व (terminalia arjuna, अर्जुन)

अश्वत्थ, पीप्पल (ficus religiosa, पीपल)

उर्वारूक (Cucumis sativus, ककड़ी)

वेतस (calamus rotang, बेंत)

दर्भ, मूँज, शर्य, सैर्य, कुशर, वैरिण (भारतीय घास)

ऊपर वर्णित वनस्पतियों का विवरण ऋग्वेद में इस प्रकार है :

पहला मंडल : १३५/८, १६४/२०, १९१/३

तीसरा मंडल : ५३/९, ५३/२२

चौथा मंडल : ५८/५

सातवाँ मंडल : ५०/३, ५९/१२, ८६/६

आठवाँ मंडल : ४६/२७

दसवाँ मंडल : ८५/२०, ९७/५

यजुर्वेद और अथर्ववेद में ऐसे तमाम वृक्षों और पौधों का वृतांत है जिनके नाम विशुद्ध भारतीय-आर्य हैं। जैसे –

इक्षु (saccharum officinale, गन्ना)

बिल्व (aegle marmelos, बेल)

न्यग्रोध (fficus benghalensis, बरगद)

शमी (prosopis cineraria, समी)

पलक्ष (ficus infectora, सफ़ेद अंजीर)

पिप्पली (piper longum,  लम्बी मिर्च)

आर्यावर्त की दीर्घकालीन प्राचीन परम्पराओं का प्रतिनिधित्व करने वाली भारतीय जड़ी-बूटियों एवं आयुर्वेदिक महत्व के अन्य पौधों का उल्लेख करना भी यहाँ अप्रासंगिक नहीं होगा जिनकी लम्बी सूची हमें अथर्ववेद में मिलती है। सार रूप में हम यहीं कह सकते हैं कि पूरब के भीतरी इलाक़ों में फलने-फूलने वाली वनस्पति ऋग्वेद की चर्चाओं का केंद्र-बिंदु है और इस चर्चा का वृहत विस्तार आगे रची जाने वाली वैदिक संहिताओं यथा, यजुर्वेद और अथर्ववेद में मिलता है।  दूसरी ओर अपेक्षाकृत पश्चिम में पनपने वाले पेड़-पौधों का उन्मेष  ऋग्वेद के क्षितिज पर बहुत बाद में चलकर होता है।    

इत्तफ़ाक़ से, ऋग्वेद के अनुसार अपने रथों को बनाने में वैदिक आर्य जिस भारतीय काठ का प्रयोग करते थे उनमें शिंशप (शीशम या उत्तर भारतीय सीसो), शल्मली, खदिर और किंशुक के वृक्ष प्रमुख हैं। दूसरी ओर, जैसा कि टार ने उल्लेख किया है कि “मिस्त्र के युद्धक रथों के निर्माण में जिस लकड़ी का प्रयोग होता था वे मिस्त्र के न होकर उत्तर के होते थे। रथ की धुरियों और आरे को बनाने में कछार बलूत (holm-oak) के पेड़, खम्बों को बनाने में एल्म नामक एक जंगली वृक्ष, आरे को फँसाने वाले रिम, पहिये और डैशबोर्ड अर्थात नियंत्रण-पट्ट को बनाने में ऐश या सुन के पेड़ और जुए को बनाने के लिए हानबीन या हार्नबीन के पेड़ प्रयोग में लाए जाते थे। रिम के साथ आरे को मज़बूती से लपेटने और बाँधने के लिए संटी या भोजपत्र-वृक्ष के छालों का प्रयोग किया जाता था। मिस्त्र के रथों को बनाने में प्रयुक्त होने वाले काष्ठ-पदार्थ कॉकसस से लाए जाते थे (टार १९६९:७४)।


३ - पश्चिमोत्तर और उससे आगे का प्रोटो भारोपीय प्राणी एवं वनस्पति-संसार 


पश्चिमी भारतविदों द्वारा पिछली शताब्दियों से प्रचारित की जानेवाली परिकल्पना और ऊपर के आँकड़ों में भारी विसंगति है। ऊष्णकटिबंधीय (tropical) क्षेत्रों, विशेषकर भारत, के प्राणी-जगत और वनस्पति-संसार की अवहेलना कर पक्षपातपूर्ण ढंग से शीतोष्ण (temperate) आबोहवा में ही उनके सिमटे रहने की वृत्ति को यहाँ तक कि आर्य-आक्रमण-अवधारणा’ के समर्थक पश्चिमी विद्वानों ने भी अतार्किक क़रार कर अस्वीकृत कर दिया है (वेबर १८५७, कीथ १९३३, डोल्गोपोल्स्की १९८७ आदि)। इनका भी यही कहना है कि जैसे-जैसे भ्रमणकारी जनजातियाँ अपने अप्रवासन के क्रम में आगे बढ़ती जाती हैं, अपनी सदियों लम्बी यात्रा में अपने मौलिक प्राणी और वनस्पति संसार को भूलते जाती हैं और अपनी नयी बसावट के जंतुओं और पेड़-पौधों में अपना आश्रय ढूँढकर उन्हीं को अपनी स्मृति में बसा लेती हैं। दूसरी बात है कि ‘शीतोष्ण-विद्यालय’ के भारतविदों ने अपने भ्रम की निर्मिती में जिन जंतुओं या वनस्पति को सहेजा है, वे समान रूप से भारत और यूरोप दोनों जगह मिलते हैं। इसलिए इससे यह उजागर नहीं हो पाता कि आर्य भारत से यूरोप गए या यूरोप से भारत आए।

विजेल अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए यह कहते हैं कि भले ही ये ‘शीतोष्ण नाम’ ऋग्वेद की भूमि के चारित्रिक लक्षण न रहे हों, लेकिन ऋग्वेद के बाद की संस्कृत-भाषा में वे पाए जाते हैं। और, उनमें से भी कुछ भले संस्कृत में न हों, लेकिन ईरानी भाषा में पाए जाते हैं।  इस आधार पर उनका यह कहना है कि “ऐसे शब्दों का महत्व उनके निर्यात में कम, बल्कि ठंडी आबोहवा की यादों को संजोये रखने में ज़्यादा झलकता है। ठीक वैसे ही, जैसे काफ़ी ऊँचाई पर उगने वाले कश्मीरी भोजपत्रों का संदर्भ ईरान, मध्य एशिया और यूरोप में लिया जाता है (विजेल २००५:३७३)। उनके कहने का मतलब यह है कि प्रोटो भारोपीय भाषा के ढेर सारे आम शब्द ऐसे हैं जो ‘पंजाब या भारत के मैदानी भागों (वैदिक क्षेत्र) के देशज या लाक्षणिक रूप’ नहीं हैं। ये शब्द केवल यूरोपीय भाषाओं में ही नहीं, बल्कि ईरानी भाषाओं में भी पाए जाते हैं। इसलिए ऐसा नहीं लगता है कि पश्चिम की ओर बढ़ने वाली जनजातियों ने इसे वैदिक क्षेत्र से लाया होगा। उनके अनुसार यह ‘आर्य-आक्रमण-अवधारणा’ के साथ ज़्यादा संगत और उचित जँचता है कि पश्चिम से आने वाली ‘भारतीय-ईरानी’ जनजातियाँ यूरोपीय और उसके मैदानी (स्टेपी) शब्दों को अपने साथ संजोये  भारतीय सीमा तक तो पहुँच गयी लेकिन बाद में भारत-प्रवेश के क्रम में मात्र भारतीय-आर्यों ने ही उन्हें विस्मृत कर दिया!

लेकिन विजेल के साथ सबसे बड़ी समस्या कुछ और है। वह दिन-रात इसी बात को काटने में लगे हैं कि भारतीय आर्यों की मूलभूमि भारत है और यहाँ से बाहर निकलकर वे पश्चिम की ओर गए। इस बात को स्वीकारने का मतलब उनके लिए यह मान लेना है कि संसार की सारी भारोपीय भाषाएँ ‘पंजाब और भारत के मैदानी भागों की भाषा, संस्कृत’ की ही संतति हैं। लेकिन उनकी यह अवधारणा उपलब्ध आँकड़ों से मेल नहीं खाती और इसीलिए ठीक नहीं जँचती। उपलब्ध सामग्रियाँ तो यही दर्शाती हैं कि हरियाणा और उससे पूरब में रहने वाले वैदिक आर्य उस क्षेत्र की ‘पुरु’ बोली बोलते थे। पश्चिम और पश्चिमोत्तर में रहने वाले लोग ‘अणु’ और ‘दृहयु’ भाषाएँ बोलते थे जो भारोपीय भाषाओं का प्रारंभिक रूप था। इन भाषाओं में उन्ही जंतुओं और पेड़-पौधों के नाम आते थे जो पश्चिम और पश्चिमोत्तर के उन क्षेत्रों में पाए जाते थे, न कि वैदिक क्षेत्रों में।

इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि इसमें से ढेरों शब्द ऋग्वेद या इसके शुरुआती भागों में अनुपस्थित पाए जाते हैं। इन शब्दों का वैदिक भाषा में तभी प्रवेश संभव हुआ जब वैदिक लोग अपने फैलने के क्रम में उत्तर की ओर बढ़े। पथ की उसी रेखा पर पड़ने वाले आगे की जगहों में जहाँ वैदिक आर्य नहीं पहुँच पाए, या केवल नाम के लिए ही पहुँच पाए हों, बोली जाने वाली भारोपीय भाषाओं में पश्चिमी शब्दों का ही प्राचुर्य रहा और ये पश्चिमी शब्द वैदिक संस्कृत, बाद के संस्कृत या अन्य परवर्ती भारतीय भाषाओं से भी पूरी तरह नदारद रहीं।

जंतुओं या पौधों के नामों के उपस्थित होने के कालक्रम का भी अपना एक ख़ास अन्दाज़ है :

१ - भारत के अंदरूनी हिस्सों के जंतुओं और वनस्पति ( हाथी, चीता, धारीदार हरिण, भारतीय जंगली भैंस, भैंस, मोर, ब्राह्मिनी बत्तख़, अर्जुन वृक्ष, रेशम और सूत के पौधे आदि) का ज़िक्र ऋग्वेद के पुराने मंडलों (६, ३, ४, ७ और २) से ही मिलना शुरू हो जाता है। इन नामों के पश्चिमोत्तर में बसने वाले ‘अणु’ और ‘दृहयु’ के बीच पाए जाने की संभावना नहीं के बराबर थी और यही कारण है कि हज़ारों वर्षों तक और हज़ारों मील की दूरियों तक जारी रहने वाले उनके अप्रवासन के क्रम में इन शब्दों का उनके साथ शायद ही जाना हुआ। फिर, नए जगह के प्राणी-लोक और वनस्पति-संसार में पहुँचने के उपरांत तो इन शब्दों से उनका कोई नाता ही नहीं रहा। तथ्य तो यह है कि जो भारतीय-आर्य ख़ानाबदोश जिप्सी, सिंटी या रोमानी भी अपनी भूमि से हज़ारों मील दूर जाकर बस गए, उन्होंने भी समय की धार में अपने जंतु और वनस्पति के नाम बहा दिये और अपने साथ कुछ भी बचा नहीं पाए। 

२ – पश्चिमोत्तर जंतु-जगत या वनस्पति-संसार के नामों के ‘साझे भारतीय-ईरानी शब्द’ आश्चर्यजनक ढंग से ऋग्वेद के बाद के नए मंडलों (५, १, ८, ९, १०) में मिलते हैं। उदाहरण के तौर पर वैदिक शब्द, मेष (भेड़), ऊरा (मेमना), ऊष्ट्र (ऊँट), वराह और सुकर (सुअर), कश्यप (कछुआ), खर (गदहा), जहाक (साही) की तुलना अवेस्ता के शब्द, मेष, ऊरा, ऊष्ट्र, वराज, हुकर, क़स्सीयप, क्षर, दुज़ुक से की जा सकती है। ये शब्द वेद (भारतीय-आर्य) और अवेस्ता (ईरानी) के साझे शब्दकोश का प्रतिनिधित्व करते हैं।

३ – पश्चिम के बहु-प्रचारित ‘शीतोष्ण’ प्रोटो भारोपीय शब्द ऋग्वेद के बाद में रचित नए मंडलों या फिर उससे भी बाद रचित वैदिक ग्रंथों में ही मिलते हैं :

क – जैसा कि देखा गया है कि ‘आवि-‘ और ‘ऊर्ण-/ऊर्णा‘ जैसे ‘पुराने’ प्रोटो भारोपीय शब्द, या अन्य भारोपीय शाखाओं में उनके सजातीय और सपिंडी शब्द, ऋग्वेद के तीन सबसे पुराने मंडलों में नहीं मिलते हैं। वे बाद के मंडलों में ही विशेषकर सबसे पहले चौथे मंडल में दिखायी देते हैं। यह भारतीय-आर्यों के पश्चिम की ओर बढ़ने के उस चरण को इंगित करता है जब सुदास के वंशज सहदेव और सोमक के काल में अपने विस्तार-अभियान में आक्रमण करते-करते वे ‘सरयू के पार’ (४/३०/१८) अफगनिस्तान में पहुँच गए।

ख – विजेल ने ‘भेड़िए’ और ‘बर्फ़’ का ‘ठंडी आबोहवा की भाषिक-स्मृति’ के रूप में उल्लेख किया है। हम पहले ही देख चुके हैं कि भेड़िए समूचे भारत में बहुतायत में पाए जाते थे। जहाँ तक ‘बर्फ़’ की बात है तो इसका उल्लेख भी ऋग्वेद के बाद में रचित नए मंडलों में ही मिलाता है।

ग – विजेल ने भोजपत्र के लिए जिस ‘भुर्ज’ शब्द का उल्लेख किया है वह भी ऋग्वेद में कहीं नहीं पाया जाता और सबसे पहली बार यजुर्वेद में उपस्थित होता है जो ऋग्वेद से बाद का ग्रंथ है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि इस शब्द का प्रयोग एकदम सीमांत उत्तर और पश्चिमोत्तर दर्दिक, नुरिस्तानी और ईरानी भाषाओं में मिलता है। “पश्चिमोत्तर भारत के पहाड़ों में बसने वाली जनजातियों की दर्दिक भाषा में ‘भोजपत्र’ के लिए ‘फलुर बढ़ुज’, ‘दमेलि ब्रुश’ और ‘गवार-बटी ब्लज़’ (मेरहोफ़र १९६३:११.५१४-१५),  बरेज, वैगली ब्रुझ (मोरजेंसटायर्न १९५४:२३८), खोतानिज सक ब्रमजा, ब्रुमजा, वाखी फुर्ज, संगलेची, शुगनी बरुज़, पश्तो बर्ज, ताजिक बर्ज,  और बुर्स ‘जेनिपर’ (ग़मक्रेलिज १९९५ : ५३१-५३२)  जैसे शब्द पाए जाते हैं। इस बात की पुनरावृति यहाँ अपेक्षित है कि पश्चिमोत्तर के इन शब्दों के ऋग्वेद के बाद में रचित नए मंडलों और अन्य परवर्ती वैदिक संस्कृत ग्रंथों में मौजूदगी के तमाम सबूत हैं और यह तब हुआ जब भारतीय आर्य अपने साम्राज्य विस्तार के अभियान में उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़े।

४ – अवेस्ता के शब्दकोश की शुरुआत ऋग्वेद के नए मंडलों की रचना-काल के समकालीन है। इस बात की विशद चर्चा श्री तलगेरी की पुस्तक ‘The Recorded History of the Indo-European Migrations – Part2, The chronology and the geography of the Rigveda’ में की गयी है। किंतु, नए मंडलों के रचना काल से भी बहुत आगे बढ़कर अवेस्ता का समय ठहरता है। अवेस्ता की रचना होने के समय तक आद्य-ईरानी (प्रोटो-ईरानी) अफ़ग़ानिस्तान में प्रवेश कर गए थे और उनका सम्पर्क अब पश्चिमी दुनिया तथा भारोपीय भाषाओं के पश्चिमी शब्दों या यूँ कहें कि ‘अणुओं’ के उन शब्दों से होने लगा था जो ग्रीक, अर्मेनियायी और अल्बानी शब्दों के साथ मिलकर अपने नए विकसित रूप में गढ़ चुके थे।  इन शब्दों के विकास और गढ़ने में उनसे सटे उत्तर में रहने वाले  स्लावी, बाल्टिक, जर्मन, सेल्टिक और इटालिक जैसे ‘दृहयु’ समुदाय के लोगों की स्थानीय भाषा का भी योगदान था। भारतीय-आर्य भाषा से पूरी तरह अनुपस्थित रहने वाले दृहयु और ईरानियों के इन साझे शब्दों का उद्भव अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया के हिमाच्छादित पर्वतीय इलाक़ों में हुआ। निम्नांकित कतिपय शब्दों में यह स्थिति साफ़-साफ़ झलकती है।

अवेस्ता – बेरेज- ‘पहाड़ी’, ‘पहाड़’। इसके सजातीय शब्द  स्लावी, जर्मन और सेल्टिक में भी हैं।

अवेस्ता – स्नाएजेटि ‘बर्फ़ बनना’ (क्रिया)। इसके सजातीय शब्द जर्मन, सेल्टिक, इटालिक, ग्रीक और अर्मेनियायी भाषाओं में          भी मिलते हैं।

अवेस्ता – ऐक्षा ‘शीत’, ‘बर्फ़’। इसके सजातीय शब्द स्लावी, बाल्टिक और जर्मन में भी हैं।

ओस्सेटिक – तज्यन पिघलना (क्रिया)। इसके सजातीय शब्द स्लावी, जर्मन, सेल्टिक, इटालिक, ग्रीक और अर्मेनियायी में भी हैं।

अवेस्ता – उद्र ‘ऊद’। इसके सजातीय शब्द स्लावी, बाल्टिक और जर्मन में हैं।

अवेस्ता – बावरा-/बावरी- ‘ऊदबिलाव’। इसके सजातीय शब्द स्लावी, बाल्टिक, जर्मन, सेल्टिक और इटालिक में मिलते हैं।

ओस्सेटिक – व्य्ज़्य्न ‘साही’। इसके सजातीय शब्द स्लावी, बाल्टिक, जर्मन, ग्रीक और अर्मेनियायी में मिलते हैं।


विजेल बार-बार एक उदाहरण सामने लेकर आते हैं – अ-भारतीय ऊदबिलाव का। इसे अंग्रेज़ी में ‘बेवर’, पुरानी अंग्रेज़ी में ‘बेब्र’, ‘बेओफ़ोर’, लैटिन में ‘फ़ाइबर’, लिथुआनियायी में ‘बेब्रस’, रूसी में ‘बोब्र’ या ‘बेब्र’ और अवेस्तन में ‘बब्री’ बोलते हैं। भारतीय नेवले के संस्कृत नाम, ‘बभ्रु’ से इसकी तुलना कर वह ‘आर्य-आक्रमण-परिकल्पना’ को सही ठहराते हैं (विजेल २००५:३७४)। लेकिन ये जितने भी साझे अ-भारतीय नाम हैं, ये सभी भारतीय आर्यों के समूह को भारत-भूमि से बाहर निकलने के क्रम में उनके रास्ते में पड़ने वाले अफगनिस्तान और मध्य एशिया की ज़मीन पर जन्मे-पले और बढ़े तथा यूरोपीय और प्रोटो-ईरानी बोलियों तथा भाषाओं में शामिल हो गए। साथ ही, ऐसे किसी भी नाम के भारत की भूमि में प्रवेश का कोई दृष्टांत नहीं है। ऋग्वेद और मित्ती भारतीय-आर्य में ‘बभ्रु’ शब्द पाया जाता है, किंतु वहाँ यह घोड़ों के ख़ास रंग के रूप में प्रयुक्त हुआ है। पूरब में बहुत बाद के संस्कृत में रंग के लिए आने वाला यह शब्द ‘नेवले’ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। किंतु इसका मतलब आर्यों के भारत-प्रवेश के संदर्भ में भी नहीं लिया जा सकता। इस संदर्भ में गमक्रेलिज की ये बातें ध्यान देने योग्य है कि ‘भारतीय-ईरानी भाषा के विभाजन की सीमा रेखा यदि खिंची जाय तो संस्कृत ने  अपने शब्दों के अर्थों में पुरातन कलेवर को सुरक्षित रखा है जब कि अवेस्ता ने शब्दार्थों में नवोन्मेष की परम्परा का सूत्रपात किया है।‘ (गमक्रेलिज १९९५:४४८)

गमक्रेलिज और इवानेव (गमक्रेलिज १९९५:५२५-५३१) ने इस बात का स्पष्ट संकेत किया है कि प्रोटो-भारोपीय भाषा की मूलभूमि अफगनिस्तान और मध्य एशिया के पर्वतीय क्षेत्र ही थे। इस मूल भूमि में वे बलूत अर्थात ‘ओक’ के वृक्षों के प्रमुख स्थानों को इंगित करते हैं। बादल की घोर गर्जना से दहलाती ऊँची चोटी वाली ‘ओक’ के वृक्ष से अच्छादित पर्वत-मालाओं की ओर ध्यान खींचते हुए उसमें वे मेघों के तड़ित-देव का निवास बताते हैं (गमक्रेलिज १९९५:५२९)। सही कहें तो इस मूल भूमि को थोड़ा और पश्चिम की ओर खिसकाकर वे ‘अनाटोलिया’ के पास ले आते हैं लेकिन उपलब्ध आँकड़ों पर आधारित जो परिदृश्य उभरता है उसका इशारा अफगनिस्तान, ईरान और ट्रान्स-कौकेसियन अर्थात जौर्जिया, आर्मेनिया और अज़रबैजान के क्षेत्रों से है। इन भू-भागों में ओक के वृक्ष का बहुत ही अहम स्थान है। इसीलिए इस भाग के प्रमुख लक्षणों को चिन्हित करने के लिए गमक्रेलिज ने ओक के पेड़ को ही चुना है।  इन्हें उस क्षेत्र में ‘ट्री’ या ‘वुड’ (संस्कृत – द्रु-/द्रुम-/दरु-/तरु-) के  लिए ‘टे/ओर-‘ या *ट’रे/ओऊ जैसे अपभ्रंश रूप में लिया जाता है। इनके सपिंडी और सजातीय शब्द आठों अन्य शाखाओं (अनाटोलियन, टोकारियन, बाल्टिक, स्लावी, जर्मन, भारतीय-आर्य, ईरानी और ग्रीक) में भी पाए जाते हैं। किंतु, ऐतिहासिक विविधताओं से सम्पन्न सेल्टिक, अल्बानी और ग्रीक जैसी भाषाओं में उन्हीं अपभ्रंश रूपों में ही ये व्यक्त होते हैं। ग्रीक भाषा में ‘ट्री’ और ‘ओक’ दोनों प्रचलित हैं।  अर्मेनियायी और इटालिक शाखाओं ने ‘वुड’ के लिए अर्थ अपने विशेषण ‘हार्ड’ शब्द में संजो लिया है।  

‘ट्री’ ( ‘टे/ओर-‘ या *ट’रे/ओऊ) के लिए मौलिक शब्द ‘ट्री/वुड’ बारह में से नौ शाखाओं में यथावत बना रहा लेकिन बाक़ी तीन शाखाओं में इसका अर्थ ‘ओक’ हो गया। इनमें सेल्टिक भी एक है। इसी मूल में ऋग्वेद और पुराणों के नाम दृहयु का रहस्य भी छुपा हुआ है जो इन पाँच यूरोपीय शाखाओं -  स्लावी, बाल्टिक, जर्मन, सेल्टिक और इटालिक – को बोलने वाली जनजातियाँ थी और इन भारोपीय जनजातियों की रिहायिश अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया के इन्ही पहाड़ी क्षेत्रों में थीं। यहाँ तक कि  इन जनजातियों के पुरोहितों  के लिए भी ‘द्रु-इ/द्रु-इद’ शब्द प्रचलित थे जो आयरलैंड की सेल्टिक भाषा में आज भी सुरक्षित है। 

५ – एक अन्य अपभ्रंश शब्द है – ‘पेर्क’। इसका अर्थ इटालिक, सेल्टिक और भारतीय-आर्य भाषा में ओक होता है। संस्कृत में ‘पर्कटी’ शब्द का अर्थ अंजीर होता है। पंजाबी में ‘पर्गाइ’ शब्द पवित्र ओक के लिए आता है। ‘पेर्क’ का अर्थ जर्मन में ‘फर (fir)’ अर्थात देवदार का वृक्ष होता है। इसी शब्द से अंग्रेज़ी के ‘फ़ॉरेस्ट’ शब्द की निष्पति हुई है। आद्य भारोपीय शब्द संस्कृत और हित्ती में पाए जाने वाले मूल शब्द *पेरु-‘ (पहाड़/चोटी/चट्टान) से व्युत्पन्न है जिससे हम संस्कृत शब्द ‘पर्वत’ पाते हैं। मेघों की गर्जना के भारोपीय देवता के नाम की निष्पति भी दो शब्दों - ‘पेर्क/न’ और ‘पेरू/न’ से हुई है। भारतीय-आर्य (वैदिक) भाषा में  ‘पर्जन्य , बाल्टिक भाषा में ‘पेरकुनस’,  स्लावी भाषा में ‘पेरूँ’ और जर्मन भाषा में ‘जोरगिन’ (मेघ देवता की माता का नाम ‘थोर’) इसके दृष्टांत हैं। मेघ-देवता के लिए आद्य-भारोपीय शब्द ‘पेरकूँ’ और पर्वतीय ओक, पर्वतीय शिखरों पर ओक के जंगल, पर्वत या पर्वतों की चोटी के लिए प्रयुक्त होने वाले शब्द ‘पेरू’ के बीच के संबंधों को हम आसानी से समझ सकते हैं, यदि पौराणिक कथाओं में आसमान से गिरने वाली बिजली के हम पर्वत शिखरों पर खड़े ओक के वृक्षों में लिपटने के दृश्य को अपने मन में उतारें। यह दृश्य इन पर्वतीय क्षेत्रों के निवासी प्राचीन भारोपीय जनजातियों के जीवन में बार-बार घटित होने वाले परिदृश्य को प्रतिबिम्बित करता है (गमक्रेलिज १९९५:५२८)।

तो, क्या यह मान लें कि प्राचीन भारोपीय जनजातियों की रिहायिश, अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया की इस पर्वतीय भूमि (या, फिर उससे और आगे!), की ‘भाषायी यादें’ ऋग्वेद में समाहित हैं! जबकि सही बात तो यह है कि :

१ – ऋग्वेद या किसी भी वैदिक ग्रंथ में ओक या किसी अन्य नाम से भी इस तरह के किसी पेड़ की कोई चर्चा नहीं है। बाद के शास्त्रीय संस्कृत ग्रंथों में ‘पर्कटी’ शब्द का प्रयोग अवश्य हुआ है जिसका अर्थ भारतीय वृक्ष श्वेत अंजीर (फ़ाइकस इंफ़ेक्टोरा) है। अथर्ववेद में ‘पलाक्ष’ के वृक्ष का ज़िक्र आता है। बहुत बाद में चलकर पंजाबी भाषा में ‘पर्गाइ’ शब्द मिलता है जो ओक की  भिन्न प्रजातियों में से एक पवित्र प्रजाति ‘क्वेर्कस आइलेक्स’ के नाम के लिए आता है। यह पवित्र प्रजाति भूमध्य-सागर के आस पास पायी जाती है। अतः कालांतर में पश्चिम से यह नाम पंजाब पहुँचा है।

२ – स्पष्ट तौर पर ऋग्वेद में दो ‘मेघ-देवताओं’ की चर्चा है। एक ‘इंद्र’ और दूसरे ‘पर्जन्य’। ‘इंद्र’ शब्द की व्युत्पति ‘इन्दु’ शब्द से हुई है। इसका अर्थ होता है – बूँद। अतः वर्षा की बूँदों से इंद्र का रिश्ता है। इस बात के अलावा कि इंद्र भारतीय- आर्य शाखा में ही सिमटे हुए हैं यह भी उतना ही सत्य है कि वह हरियाणा और इसके अंदरूनी हिस्सों के मानसून क्षेत्रों के ही देवता हैं। पर्जंय शब्द की व्युत्पति के बीज तो हम पहले ही  ओक से आच्छादित पर्वतीय क्षेत्रों और तीन यूरोपीय शाखाओं में पा चुके हैं।

आर्य-आक्रमण अवधारणा के पैरोकार भारतशास्त्री अपने तर्कों में पर्जंय को मूल आद्य भारोपीय, और साथ-साथ भारतीय भी, मेघ-देवता के रूप में चित्रित करते हैं तथा इंद्र को बाद में पर्जंय की जगह लेनेवाले भारतीय मेघ-देवता के रूप में स्थापित करते हैं। इसका कारण वह स्लावी, बाल्टिक और जर्मन पौराणिक कथाओं में भी मेघ-देवता के रूप में पर्जंय की उपस्थिति को देखते हैं। किंतु, सच्चाई ठीक इसके विपरीत है। 

अ – इंद्र ऋग्वेद के सबसे प्रमुख देवता हैं। ऋग्वेद में कुल १०२८ सूक्त हैं। इनमें से २५० सूक्त इंद्रदेव की महिमा के मंडन में समर्पित हैं। पर्जंय की गौरव-गाथा में मात्र तीन सूक्तों का योगदान है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इंद्रदेव ऋग्वेद के नए और पुराने सभी मंडलों में उपस्थित होते हैं। इनके पर्यायवाची नामों को तो छोड़ दें, ‘इंद्र’ नाम से ही ५३८ सूक्तों में २४१५ बार इनका वर्णन है। दूसरी ओर २५ सूक्तों में पर्जंय मात्र ३६ बार वर्णित हुए हैं। इनका विवरण इस प्रकार है:

पूराने मंडल (६, ३, ७, ४ और २) 

चौथा मंडल – ५७/८

छठा मंडल – ४९/६, ५०/१२, ५२/(६, १६), ७५/१५

सातवाँ मंडल – ३५/१०, १०१/५, १०२/(१, २), १०३/१

नए मंडल (५, १, ८, ९, १०)

पाँचवाँ मंडल – ५३/६, ६३/ (४, ६), ८३/(१, २, ३, ४, ५, ९)

पहला मंडल – ३८/(९, १४), १६४/५१

आठवाँ मंडल – ६/१, २१/ ८, १०२/५

नौवाँ मंडल – २/९, २२/२, ८२/३, ११३/३

दसवाँ मंडल – ६५/९, ६६/(६, १०), ९८/(१, ८), १६९/२

यहाँ ग़ौर करने वाली बात यह है कि सातवें मंडल के ३५/१० को छोड़कर बाक़ी जितने भी सूक्त हैं, वे या तो पुराने मंडलों के पुनर्संशोधित सूक्त हैं (इन्हें अधोरेखित किया गया है) या फिर नए मंडलों के सूक्त हैं। पुराने दूसरे और तीसरे मंडल में तो इनका ज़िक्र तक भी नहीं आया है। ७/३५/१० का भी जो एकमात्र अपवाद स्वरूप वर्णन है वह विश्वदेव (सभी देवताओं) की लम्बी सूची में उद्धृत हुआ है।

इससे तो यहीं बात सामने आती है कि पर्जन्य  पश्चिमोत्तर से अवतरित  ऐसे देवता हैं जो नए मंडलों की रचना के युग में ऋग्वेद में प्रवेश कर गए। यह तब की बात होगी जब हरियाणा और उसके पूरब के मानसूनी क्षेत्रों से उत्तर-पश्चिम दिशा में चलकर वैदिक आर्य पश्चिमोत्तर पर्वतीय प्रदेशों में पहुँचे होंगे। अब एक बात और ग़ौर करने वाली है कि यह पर्जन्य देवता मात्र स्लावी, बाल्टिक और जर्मन क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं। इससे इस अवधारणा को बल मिलता है कि ऋग्वेद के नए मंडलों की रचना के समय मध्य एशिया में स्लावी, बाल्टिक और जर्मन बोलियों के अवशेष मात्र ही सही ज़रूर बचे रहे होंगे। 

आ – कुछ और महत्वपूर्ण बातें भी ग़ौर फ़रमाने लायक़ हैं। केवल भारतीय आर्य परम्परा में ही इंद्र देवता के रूप में चित्रित होते हैं। अवेस्ता की प्रतिद्वंदी ईरानी परम्परा में इंद्र एक दैत्य है। हित्ती पुराण में तो ‘इनर’ नामक एक देवी की चर्चा है जो बिना नाम वाले बरसात के देवता को उन नागों को मारने में सहायता देती है जो बरसात होने से रोकते हैं। हित्ती (अनाटोलियन) भारोपीय शाखा से अपनी कल्पित मूलभूमि से अलग होने वाली पहली भाषा थी। इस परिप्रेक्ष्य में हित्ती पुराण में इनर देवी की उपस्थिति से तो एक बात पूरी तरह से साफ़ हो जाती है कि या तो इंद्र पर्जन्य से पुराने हैं या फिर वैदिक आर्यों के पश्चिमोत्तर में पसरने के दौरान वहाँ हित्ती भी मौजूद रहे होंगे या फिर दोनों बातें एक साथ भी सही हो सकती हैं।

यदि हम वानस्पति जगत, प्राणियों के वृहत संसार और पहाड़, बर्फ़, पर्जन्य जैसे उनसे सम्बद्ध समग्र सांस्कृतिक तत्वों का गहरायी से परीक्षण और उनकी विवेचना करें तो यह बात उभर कर सामने आती है कि पश्चिमोत्तर के शब्दों का प्रवेश ऋग्वेद के बाद में रचित नए मंडलों में तब हुआ जब वैदिक आर्य पसरते- पसरते पश्चिम की ओर पहुँच गए और उनके साथ-साथ ईरानी लोग भी और पश्चिम की ओर बढ़े जा रहे थे। इसी क्रम में ‘अणु’ और ‘दृहयु’ जैसी यूरोपीय बोलियाँ भी नए प्राणियों और नए वनस्पतियों के देश में काफ़ी दूर तक पहुँच गयी।