Thursday, 3 December 2020

वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध ------ (१५)

(भाग - १४ से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य - (ठ)

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)


हरियाणा की पुरु जनजाति के आवासीय स्त्रोत से प्रस्फुटित वैदिक धर्म के  इस विशाल आलोक-पुंज से समस्त भारत वर्ष का जगमग हो जाना किसी भी दृष्टिकोण से सांस्कृतिक आक्रमण की श्रेणी में वैसे ही नहीं आता जैसे  कि आगे चलकर ६०० ईसापूर्व के आस-पास बिहार में इक्ष्वाकुओं की भूमि से निःसृत पवित्र बौद्ध और जैन दर्शन की जल-लहरियों से इस देश के ही कोने-कोने का क्या कहना, प्रत्युत सीमा पार की सुदूर भूमि के पोर-पोर का  भी आप्लावित हो जाना!

और ऐसा भी नहीं है कि हिंदुत्व को ये सारे लक्षण उसे बाद में या बहुत आगे चलकर होनेवाले धार्मिक परिवर्तनों की प्रक्रिया के दौरान मिले जैसा कि बहुत लोग सोच लेते हैं। उदाहरण के तौर पर ऐसा माना जाता है कि वैदिक धर्म ही आगे चलकर उपनिषद के दर्शन के रूप में विकसीत हुआ। ऋग्वेद के ‘कर्मकाण्ड’ उपनिषदों के ‘उपनिषद-काण्ड’ में परिवर्धित हो गए। सच तो यह है कि धर्म के वैचारिक दर्शन की ज्ञानमयी धारा से सराबोर होने की यह प्रवृति पूरब के इक्ष्वाकुओं से आयी। ठीक वैसे ही, जैसे अग्नि-आहुति और ऋचाओं का मंत्रोच्चार उत्तर और उत्तर-पश्चिम के हड़प्पा क्षेत्र के पुरु-अणु-दृहयु जनजाति की संस्कृति के ख़ास लक्षण थे। उपनिषद के विचार-दर्शन से संबंधित विषयों पर सारगर्भित चर्चा के अनेक दृष्टांत पूरब के इक्ष्वाकु राजा जनक के राजदरबार में मिलते हैं। आगे चलकर उपनिषद की दृष्टि का विस्तार बुद्ध, जैन, व्रत्य और चार्वाक के दर्शनों में भी हुआ। शाकाहार को पुण्य और पवित्र मानना भी उसी विकास का विस्तार है। इक्ष्वाकुओं से  भी  पूरब की ओर  और आगे बढ़ने पर हमें धार्मिक परम्पराओं, रीति-रिवाज, लोकाचार तथा पूजा-पाठ पर तांत्रिक प्रभाव की गहरी छाप दिखायी देती है। उसी तरह जैसा कि पहले भी चर्चा की जा चुकी है कि दक्षिण के धर्म का मुख्य लक्षण मूर्ति-पूजा और  भव्य मंदिर-निर्माण की संस्कृति थी जो धीरे-धीरे समूचे भारत में भी फैल गयी।  

समूचे भारतवर्ष में पसरे धर्म और संस्कृति के ये हिंदू-तत्व  चाहे वे व्यापक हों या क्षेत्रीय,  भारतीय सभ्यता के संगठित होते जाने और बाद में रचे जाने वाले संस्कृत ग्रंथों में अपनी जगह पाए जाने के कारण यदा-कदा काल-शृंखला में  वे हिंदू धर्म में विकसित  अर्वाचीन लक्षण  या किसी नवीन धार्मिक परम्परा का भ्रम पैदा करते हैं। किंतु, ऐसा सोचना ठीक उसी तरह की भ्रांति पालना होगा जैसे इतिहास के कालक्रम में ‘अमेरिका’ और ‘औस्ट्रेलिया’ के आस्तित्व की खोज बाद में होने के आधार पर उन्हें यूरोप का कोई नया देश मान  लें। इसलिए कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदुत्व के  ये जितने भी धार्मिक तत्व भारत के विस्तृत भू मंडल पर दिखायी देते हैं, वे बहुत हद तक  हड़प्पा या ऋग्वेद-से प्राचीन काल के ही हो सकते हैं या हैं। उस संदर्भ में देखें तो यह कोरी कल्पना प्रतीत नहीं होती कि जैन धर्मावलंबी  अपने तीर्थंकरों की लम्बी परम्परा महावीर से काफ़ी पीछे ले जाते हैं और बुद्ध के अनुयायी भी अपने तथागत के अनेक पूर्व अवतारों की चर्चा करते हैं।


हिंदू धर्म के शास्त्रीय तत्व और समूचे भारत में छाए विविध धार्मिक तत्व आपस में मिलकर ‘अनेकता में एकता’ का बहुरंगी ताना-बाना बिनते हैं। भारत-भूमि की सभ्यता के इस समग्र स्वरूप और पारस्परिक अवगुंठन के ताने-बाने को इतिहासकारों द्वारा इस समावेशी  परिप्रेक्ष्य में पढ़ने और समझने की ज़रूरत है न कि वैदिक संस्कृति से या अन्य समकालीन या परवर्ती संकृतियों से उसके आपसी टकराव से उद्भूत-विकसित और स्थापित सत्ता के रूप में।

ध्यातव्य : अब यदि हम पूरब और दक्षिण में भी हु-ब-हु हड़प्पा के नगरों की अनुकृति ही खोजने लगें  तो संभवतः यह हमारी निरी घृष्टता  होगी। भारत के अन्य भागों के लोगों की सभ्यता और संस्कृति, चाहे वह उत्तर प्रदेश और बिहार  में इक्ष्वाकुओं की हो या फिर दक्षिण में बसी  अन्य जनजातियों की, ज़ाहिर तौर पर अपनी क्षेत्रीय विभिन्नताओं के सौंदर्य से सजी-धजी होंगी और उनका स्वरूप उत्तर तथा उत्तर पश्चिम के पुरु-दृहयु-अणु जनजाति से अलग होगा। समकालीन होने पर भी  इस सभ्याताओं के उत्खनन से प्राप्त सभ्यता और संस्कृति मूलक अवशेषों की प्रकृति में भिन्नता लाज़िमी है। 


जैसा कि हम देखते आ रहे हैं, सम्पूर्ण भारत वर्ष के धार्मिक और सांस्कृतिक तत्वों में अपने समाहरण और हिंदू धर्म का सर्वसमावेशी आकार पाने से पूर्व वैदिक धर्म और संस्कृति का स्वरूप पूरब और दक्षिण के धर्म और संस्कृति से सर्वथा भिन्न था। अब जैसा कि हिंदू विरोधी वामपंथी विचारधाराएँ सोचती हैं, क्या हिंदू धर्म की ये अनेकताएँ उन दिनों एक-दूसरे से बिल्कुल अनजान थीं या यहाँ तक कि परस्पर प्रतिघाती थीं? ऐसा मानने का कोई ठोस कारण नहीं है। ऐसे काल में जब कि पश्चिमी एशिया और वैदिक-हड़प्पा संस्कृति में सम्पर्क के प्रचुर सूत्र थे, हड़प्पा के जहाज़ों की पहुँच खाड़ी देशों के बंदरगाह तक ही सीमित न होकर उससे आगे भूमध्य-सागर को स्पर्श कर रही थी (Talgeri : The Elephant and the Proto-Indo-European Homeland), इस तरह की बात गले नहीं उतरती कि वे आपस में एक-दूसरे से अनजान थीं।

अब आइए हम इस बात की पड़ताल करें कि वैदिक और द्रविड़ सस्कृतियों में कितना सम्पर्क था? पहले यह देख लें कि ऋग्वेद में कोई द्रविड़ शब्द है कि नहीं! यदि हड़प्पा की भौगोलिक स्थिति और द्रविड़ भाषा के आज के भौगोलिक विस्तार-क्षेत्र की तुलना करें तो इस बात को मानना अत्यंत टेढ़ी खीर होगी कि इन दोनों के बीच भी आपस में कुछ लेन-देन हो सकता है।  बलूचिस्तान में ब्रहुई भाषी लोगों की उपस्थिति के आधार पर यह क़यास ज़ोरों से लगाया जाता रहा कि हड़प्पा के क्षेत्र में द्रविड़ लोगों का निवास था। लेकिन अब यह बात मान ली गयी है कि दक्षिण से ब्रहुई भाषी लोगों का अफगनिस्तान की ओर उत्प्रवासन अपेक्षाकृत बाद के दिनों की घटना है। विजेल ने भी स्वीकारा है कि “इनकी उपस्थिति बाद के उत्प्रवासन का परिणाम है, जो हाल की शताब्दियों में हुआ (एलफेंबाइम १९८७)(विजेल २०००: १)।" उसी तरह साउथवर्थ ने भी भले ही हड़प्पन क्षेत्र में द्रविड़ उपस्थिति की वकालत की है, परंतु उन्होंने भी बड़ी स्पष्टता से हॉक (१९७५:८७-८) एवं अन्य विद्वानों की इस उक्ति को स्वीकारा है कि  ब्रहुई, कुरूक्स और माल्टो लोगों की आज की स्थिति बहुत पुरानी न होकर हाल की ही है।“


यह बात भले ही आर्य-आक्रमण-अवधारणा के संस्कृत-प्रेमी आलोचक  न पचा पाएँ, लेकिन ऋग्वेद में दो शब्द ऐसे मिलते है जो निश्चित तौर पर द्रविड़ भाषा के शब्द हैं :

– क्रिया धातु ‘पूज’ ( आदर करना, अभ्यर्थना करना, पूजा करना, स्तुति करना)  की  उत्पति द्रविड़  परिवार की  तमिल भाषा के ‘पु’ (अर्थात फूल) से हुई है। यह आराधना की एक ऐसी पद्धति को इंगित करता है जिसका स्त्रोत दक्षिण के धर्मों में है और वैदिक संस्कृति के लिए यह पूरी तरह से नयी बात है।

– ‘काना’ शब्द भी स्पष्ट तौर पर तमिल शब्द ‘कन’ से उद्भूत है। ‘कन’ का अर्थ तमिल में ‘आँख’ होता है। वैदिक संस्कृत में ‘काना’ एक आँख वाले या तिरछी निगाह वाले व्यक्ति को कहते हैं।

यह बात भी उतनी ही सही है कि भारत के भिन्न-भिन्न भागों में सभ्यता और संस्कृति का विकास अलग-अलग तरीक़ों से हुआ। इसलिए ज़रूरी नहीं है कि ऋग्वेद के शुरू के मंडलों के रचे जाने के काल में पश्चिमोत्तर भारत की मिट्टी में शेष भारत की संस्कृति के वे समग्र तत्व मौजूद ही हों। लेकिन हड़प्पा-सभ्यता के परिपक्व अवस्था में आ जाने तक इस क्षेत्र के दूरगामी व्यापारिक विस्तार और तिज़ारती रिश्तों से हुए मेल-मिलाप के प्रभाव को भी ख़ारिज नहीं किया जा सकता है। २००८ में लिखी गयी तलगेरी की पुस्तक ‘ऋग्वेद और अवेस्ता : अंतिम सबूत (The Rigved and the Avesta : The Final Evidence)’ में इसका ज़िक्र कुछ यूँ मिलता है : “भले ही हम प्रारम्भ में वैदिक संस्कृत या शास्त्रीय संस्कृत पर अनार्य भाषाओं के प्रभाव से आतंकित हो इस पर अपनी आपत्ति दर्ज करते रहे हों लेकिन हमें यह मानना पड़ेगा कि भारतीय-आर्य भाषाओं में अपनी गहरी पैठ बनाने वाले कुछ शब्द द्रविड़ या औस्ट्रिक परिवार से भी आए हैं। उदाहरण के तौर पर ‘एक आँख वाले’ के लिए ‘काना’ शब्द द्रविड़ परिवार के ‘कन’ अर्थात ‘आँख’ शब्द की निष्पत्ति है। ‘दंड’ और ‘कूट’ जैसे अनेक अन्य शब्दों का दृष्टांत भी उपस्थित किया जाय तो तो उपर्युक्त तर्क की कोई अवहेलना नहीं होगी।“ (पृष्ट-२९२)

सही बात तो यह है कि ऋग्वेद के तत्वों और आँकड़ों की सही पड़ताल करने पर यह भली-भाँति ज़ाहिर होता है कि ऋग्वेद की संस्कृति द्रविड़ तन्तुओं से अछूती नहीं है।  अब ये भी यतना ही सत्य है कि ये द्रविड़ तंतु आर्यों के द्रविड़ हड़प्पा पर हमले के बाद पराजित और भागे द्रविड़ों की संस्कृति के कोई बचे-खुचे अंश या हमलावर आर्यों द्वारा रहन-सहन या संस्कृति के अपना लिए गए कुछ द्रविड़ तरीक़े नहीं थे, जैसा कि आर्य-आक्रमण अवधारणा के प्रतिपादक कहते हैं।  इस बात के प्रचुर सबूत हैं कि ये वे मूल द्रविड़ तत्व हैं जिसे उत्तर और पश्चिम-उत्तर के वैदिक आर्य बजाप्ता दक्षिण से सीख कर ले गए थे। इसके पक्ष में प्रबल तथ्य मौजूद हैं :

– पुराने मंडलों में इनका विवरण नहीं मिलता है। पुराने मंडलों के भौगोलिक तत्वों के नाम की पड़ताल करने पर पता चलता है कि द्रविड़ भाषी लोग हड़प्पा के क्षेत्र में चाहे वैदिक काल हो या उसक पहले का समय, कभी रहे ही नहीं।

– संयोग से, नए मंडलों में इन शब्दों से मुलाक़ात हो जाती है। नए मंडलों के रचे जाने समय तक समुद्री रास्तों से दूर-दूर तक वैदिक-आर्य लोगों के व्यापारिक रिश्ते बन चुके थे। उनका व्यापार मेसोपोटामिया तक जा पहुँचा था और इस क्रम में बेबिलोनिया के भी दो शब्द ‘’बेकनात’ अर्थात व्यापारियों को क़र्ज़ देने वाले महाजन (८/६६/१०) और  ‘मन’, जो भार मापने की आज तक प्रचलित ईकाई है (८/७८/२), ऋग्वेद में प्रवेश पा चुके थे। यह काल मित्तियों और अवेस्ता रचे जाने के काल से ठीक पहले का समय है। बाद में उन्हीं ग्रंथों के मंत्रों में इन द्रविड़ तत्वों के साथ-साथ अवेस्ता और मित्ती तत्वों की भी प्रचुर उपस्थिति मिलने लगती है। 

– भारतीय परम्परायें और भाषा-विज्ञान बड़ी सफ़ाई से और बिना किसी भ्रम के इन वैदिक तत्वों का संबंध दक्षिण की भूमि से द्रविड़ पहचान वाले वैदिक ऋषियों के रूप में जोड़ते हैं। और, ये लोग ऋग्वेद की संस्कृति के शत्रु-से न होकर इसके अभिन्न अंग-से हो गए थे।


मूल रूप से द्रविड़ बोलने वाले वैदिक ऋषियों की कम-से-कम दो धाराएँ तो  साफ़-साफ़ दिखायी देती हैं।

– अभी हमने देखा कि ऋग्वेद में दो ऐसे बहुत ही महत्वपूर्ण शब्द हैं जो अब आज की भारतीय-आर्य भाषाओं और संस्कृत में बहुत आम हो गए हैं और वे बिना किसी संदेह के द्रविड़ परिवार से ही लिए गए हैं। ये हैं क्रिया धातु ‘पूज’ और  ‘काना’ शब्द। ये दोनों शब्द नए मंडलों में इस प्रकार पाए जाते हैं :

– ऋग्वेद के ८/१७/१२ में प्रयुक्त शब्द ‘पूज’, जिसका संबंध 'इरिम्बिठि' ( कन्व ऋषि के कुल) से है,  और 

– ऋग्वेद के १०/१५५/१में प्रयुक्त शब्द ‘काना’, जिसका संबंध 'सिरिम्बिठ' (भारद्वाज ऋषि के कुल) से है  

अब यह महज़ इत्तफ़ाक़ नहीं है कि दो भिन्न-भिन्न ऋषि कूलों ने अलग-अलग जगहों पर इन शब्दों के लिए बड़े आश्चर्यजनक और असामान्य रूप से एक ही समान अनार्य भाषा परिवार की संज्ञाओं को चुना है। दसवें मंडल में ऋषियों के वर्णन का  बड़ी दुरुहता से आपस में घालमेल कर दिया जाता है। ‘ऋग्वेद – एक ऐतिहासिक विश्लेषण’ (तलगेरी :२०००) में पृष्ट २५-२६ पर यह उल्लेख मिलता है, “दसवाँ मंडल जो कि बहुत बाद में रचा गया, कई मामलों में अन्य मंडलों से काफ़ी अलग हटकर है। इसमें एक सबसे बड़ी बात अपने मंत्र के रचयिताओं के बारे में इसकी  अस्पष्टता है। ४४ मंत्रों और दो अन्य सूक्तों में तो यह भी पता नहीं चलता कि इनको रचा किसने!”  बस इतना स्पष्ट है कि दसवें मंडल के १५५ वें सूक्त और आठवें मंडल के १७वें सूक्त के रचनाकार एक ही ऋषि हैं – 'इरिम्बिठि कन्व'।

यह नाम द्रविड़ मूल का है। वास्तव में आज भी केरल में एक जगह का नाम है – 'इरिम्बिलियम'। कोई अचरज की बात नहीं कि यही जगह या संभवतः इसी के आसपास की कोई जगह आज से ४००० वर्ष से भी पहले ऋग्वेद की ऋचाओं के रचनाकार की रिहाईश हो! यह बात उल्लेखनीय है कि आठवें मंडल के १७वें (८/१७) मंत्र में ही दो और शब्द आते हैं जो एक बार फिर से द्रविड़ व्युत्पति वाले शब्द माने गए हैं। 

अ  – ‘खंड’ (८/१७/१२) और 

– ‘कुंड’ (८/१७/१३)

और इन सबका सिरमौर शब्द ‘मुनि’ पूरे ऋग्वेद में नहीं भी तो कम से कम पाँच बार (दसवें मंडल के एक ही सूक्त में तीन बार) आया है। इस शब्द का स्पष्ट संकेत भारत के अंदर ही पूरब और दक्षिण के अ-वैदिक क्षेत्रों के पवित्र व्यक्तियों से है। ‘कुंड’ वाले मंत्र के अगले ही मंत्र (८/१७/१४) में ही यह फिर से आता है। भले ही, इन तीन लगातार मंत्रों में निहित संकेतों पर हमें सहसा विश्वास न हो, किंतु अपने आप में वे गहरे अर्थ समेटे हुए हैं।

एक बात तो साफ़ है कि यह ‘इरिम्बिठि’ ऋषि दक्षिण के द्रविड़ थे जो अपने क्षेत्र से चलकर विकसित और समृद्ध हड़प्पा क्षेत्र में आ बसे थे और कालांतर में ऋग्वेद की रचना करने वाले ऋषि बन गए। आज भी भारत में  ढेर ऐसे सनातनी साम्प्रदायिक समुदाय हैं जो अपनी मूल भूमि से विस्थापित होकर किसी अन्य क्षेत्र में बसे पाए जाते हैं। 


– भारतीय परम्परा में एक अन्य अति महत्वपूर्ण और  महान ऋषि के दर्शन होते हैं जो समान रूप से उत्तर और दक्षिण दोनों में न केवल पूजे जाते हैं, बल्कि दोनों की परम्पराओं में अपनी गहरी जड़ जमाए हुए हैं। यह महान ऋषि महर्षि 'अगस्त्य' हैं जिनके बारे में किंवदंती है कि वह उत्तर से चलकर दक्षिण में आ बसे। आइए देखें उनके बारे में विकिपीडिया क्या बताता है, 

“अगस्त्य हिंदू धर्म के एक अत्यंत आदरणीय वैदिक ऋषि थे। वह भारतीय भाषाओं के प्रकांड विद्वान और एक अनन्य वैरागी तपस्वी थे। अपनी अर्धांगिनी ‘लोपमुद्रा’ के साथ मिलकर उन्होंने ऋग्वेद के पहले मंडल में १६५ से १९१ सूक्तों (१/१६५ – १/१९१) की रचना की। इसके अलावे अनेक वैदिक साहित्य उनके द्वारा रचे गए। रामायण और महाभारत सहित अनेक वैदिक और पौराणिक प्रसंगों में अगस्त्य  का वृतांत मिलता है। एक ओर सबसे महत्वपूर्ण सात या आठ वैदिक ऋषियों (सप्तर्षि) में उनका नाम आता है तो दूसरी ओर, द्रविड़  शैव परम्परा के वह प्रख्यात तमिल सिद्ध हैं। उन्होंने प्राचीन तमिल व्याकरण ‘अगत्तियम’ की रचना की, ‘तांप्रपर्णियन’ नामक औषधि बनायी और श्री लंका तथा दक्षिण भारत के अनेक जगहों पर शैव साधना केंद्रों की स्थापना की। पुराणों की शाक्त और वैष्णव  परम्परा के वह अत्यंत आदरणीय हस्ताक्षर हैं।  प्राचीन प्रस्तर-प्रतिमाओं और दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया सहित जावा-सुमात्रा तक के शिव मंदिरों में उत्कीर्ण क़सीदों में उपस्थित होने वाले वह दुर्लभ भारतीय ऋषि हैं। जावा के प्राचीन ग्रंथ ‘अगस्त्यपर्व’ के वह प्रमुख नायक किरदार और गुरु हैं। इस ग्रंथ का ११वीं शताब्दी का संस्करण आज भी सुरक्षित है। अगस्त्य ने ढेर सारे ग्रंथों की रचना की, जिसमें  ‘वाराह-पुराण’, और 'स्कन्द-पुराण' के भाग ‘अगस्त्य-संहिता’ तथा ‘द्वैत-निर्णय-तंत्र ग्रंथ’ प्रमुख  हैं। अपनी पौराणिक व्युत्पतियों के आधार पर  ‘मन’, ’कलसज’, ‘कुंभज’, ‘कुंभयोनि’ और ‘मैत्रवारूणी’ आदि कई नामों से उन्हें अभिहित किया गया है।

‘अगस्त्य’ शब्द की व्युत्पति को लेकर अनेक मान्यताएँ हैं। एक मान्यता यह है कि इसका  मूल शब्द एक फलदार वृक्ष ‘अगति गंडिफ़्लोरा’ से निष्पन्न है। यह भारतीय उपमहाद्वीप का स्थानीय पौधा है और इसे तमिल में ‘अकट्टी’ कहते हैं। अगट्टी से ही ‘अगस्ति’ शब्द निकला और इस प्रकार यह इस वैदिक ऋषि के नाम के द्रविड़ मूल की व्याख्या होती है। वह एक अनार्य-द्रविड़ हैं जिनके विचारों से समूचा उत्तर भारत आप्लावित-आंदोलित हुआ। उनका आश्रम तिरुनेलवेली, पोथियाल की पहाड़ी और तंजावर सहित तमिलनाडु के अनेक जगहों पर अवस्थित है।

हालाँकि बाद के पौराणिक वृतांतों में उन्हें उत्तर का एक ऋषि बताया गया है जो चलकर दक्षिण में बस जाता है। किंतु, यह सर्वमान्य और ऐतिहासिक रुप से स्थापित तथ्य है कि अगस्त्य मूलतः दक्षिण के निवासी एक द्रविड़ ऋषि थे। वह और बाद में,  उनके वंशज, दक्षिण से चलकर उत्तर में बस गए और ऋग्वेद की रचना करने वाले ऋषि-कूलों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और स्वतंत्र ऋषि-परिवार की उन्होंने स्थापना की। 

– ऋषि कुल परम्पराओं में अगस्त्य एक विलक्षण और अपवाद-से ऋषि हैं।  वह एक ऐसे तपस्वी सन्यासी हैं जो नगरों की चकाचौंध और राजप्रासाद के अनुग्रह से कोसों दूर जंगल की अपनी कुटिया में एक वैराग्यपूर्ण वितरागी का  जीवन बिताते हैं।

– वह स्वयं पूरी तरह से ऋग्वेद के वृहतांश से अनुपस्थित हैं। उनके वंशजों का योगदान बाद के मंडल १ के सूक्तों की रचना में मिलता है जिसमें ढेर-से द्रविड़ शब्दों का प्रयोग मिलता है। किंतु ऋगवैदिक परम्पराओं में न केवल ऋग्वेद के बाहर बल्कि ऋग्वेद के अंदर (८/३३/१०) भी अगस्त्य को एक पुरातन ऋषि के रूप में अत्यंत प्रतिष्ठित पद मिलता है। इस मंत्र  में वह वशिष्ठ के समकालीन और उनके साथ-साथ चर्चित हुए हैं।

– नए मंडलों  में १ और ८ {१/(११७/११, १७०/३, १७९/६, १८०/८, १८४/५), ८/(५/२६)} को छोड़कर बस एक जगह अगस्त्य का विवरण मिलता है। यह पुनर्संशोधित सातवें सूक्त में पाया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह सूक्त, ७/३३/११,  उनके ही वंशज के द्वारा पुनर्संशोधित किया गया। इसी सूक्त के ठीक बाद वाले मंत्र में ‘दंड’ नामक द्रविड़ शब्द उपस्थित होता है।  हड़प्पा की सभ्यता के परिपक्व प्रहर में 'इरिम्बिठि' और 'अगस्त्य' के प्रवेश ने ऋग्वेद की धरा पर द्रविड़ शब्दों की लघु-धार बहायी। इस धारा ने  कालांतर में  वैदिक शास्त्रीय संस्कृत को भिगोते हुए एक प्रचंड सैलाब का रूप धारण कर लिया। ऋग्वेद में ऐसे कथित द्रविड़ शब्दों की एक लम्बी सूची है : ‘वैला’, ‘कियांबु’, ‘वृष’, ‘चल’, ‘बिल’, ‘लीप’, ‘कटुक’, ‘पिंड’, ‘मुख’, ‘कूट’, ‘कुट’, ‘खल’, ‘उलुखला’, ‘कानुक’, ‘सिर’, ‘नद’/’नल’, ‘कलफ़’, ‘उखा’, ‘कनारू’, ‘कलाया’, ‘लांगल’। ये शब्द ऋग्वेद के केवल नए मंडलों में और उनके पुनर्संशोधित सूक्तों  में ही पाये  जाते हैं। अपवाद-स्वरूप ही कहें तो, ‘मुख’ शब्द चौथे मंडल के ३९वें सूक्त के छठे मंत्र (४/३९/६) में, ‘कलाया’ शब्द सातवें मंडल के ५० वें सूक्त के पहले मंत्र (७/५०/१) में  और ‘कलफ’ शब्द सातवें मंडल के ५० वें सूक्त के दूसरे मंत्र (७/५०/२) में पाया जाता है। हॉक की निगाहों में इस विषय के प्रखर विशेषज्ञ अर्नौल्ड ने छंद-योजना के परिप्रेक्ष्य में चौथे और सातवें मंडल के इन पुनर्संशोधित श्लोकों का वर्गीकरण किया है। अतः इन द्रविड़ शब्दों में एक के भी दर्शन हमें पुराने मंडलों में नहीं होते! ऊपर के सूक्तों (७/३३/१०, ४/३९ और ७/५०) के अलावा ऐसे संदर्भ हमें निम्नांकित सुतों या श्लोकों में भी देखने को मिलते हैं : 


पुनर्संशोधित सूक्त :





यहाँ पर यह भी बात उतना ही ध्यान आकर्षित करनेवाली है कि जिन नए मंडलों में इन द्रविड़ शब्दों और द्रविड़ ऋषि-कूलों का विवरण आता है, ये सभी ईसा से २००० वर्ष पूर्व लिखे गए थे। इसके बहुत बाद में आगे चलकर हमें सीरिया-इराक़ में मित्ती संस्कृति के और ईरान में भारोपीय-ईरानी संस्कृति (पर्सियन, पर्थियन और मिडियन) के दर्शन होते हैं। साथ में हमें यह भी नहीं विस्मृत करना चाहिए कि ‘तमिल-संगमों’ की रचना का काल भी क़रीब दो शताब्दी बाद ही आ जाता है। इस आधार पर अब और किसी शक की गुंजाइश नहीं रह जाती कि वैदिक और द्रविड़ संस्कृतियों का संबंध न केवल अत्यंत प्राचीन है, प्रत्युत उनका माधुर्य भी अत्यंत प्रगाढ़ है। 


Thursday, 26 November 2020

वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध ------ (१४)


(भाग - १३ से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य - (ट)

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)


भारत में वैदिक धर्म के प्रसार की प्रकृति 

अब तक यह स्पष्ट हो चुका है कि भारोपीय भाषा परिवार का उद्गम स्थल भारत ही था और यहीं से वे सारी भाषाएँ उत्प्रवासित होकर बाहर की ओर गयीं। कहीं से भी कोई आर्य-आक्रमण नहीं हुआ। सिंधु-सरस्वती घाटी का हड़प्पा-क्षेत्र ही सभ्यता के शैशव काल का  वह भू-भाग  था,  जहाँ से शेष ग्यारह भाषायी शाखाओं ( इटालिक, सेल्टिक, जर्मन, बाल्टिक, स्लावी, अल्बेनियायी, ग्रीक, अनाटोलियन, अर्मेनियायी, टोकारियन और ईरानी) को बोलने वाले लोग पश्चिम की ओर चले गए। 

अब कुछ यक्ष प्रश्न हमारे समक्ष उठ खड़े होते हैं। पश्चिमी उत्तरप्रदेश और हरियाणा में उपजी वैदिक संस्कृति, धर्म और भाषा यदि पश्चिम की ओर फैलकर अफ़ग़ानिस्तान तक पहुँच गयी तो फिर पूरब की ओर पसरने वाली संस्कृति की प्रकृति क्या थी? जैसा कि दोनों अवधारणाओं (हमलावर आर्यों का बाहर से आना और स्थानीय आर्यों का बाहर की ओर उत्प्रवासन) के पैरोकार फ़रमाते हैं कि हमारी शास्त्रीय और पारम्परिक भारतीय/हिंदू सभ्यता का उद्भव भी वैदिक संस्कृति की कोख से ही हुआ है? क्या आधुनिक भारतीय-आर्य भाषाओं की धाराएँ भी पुरुओं की वैदिक भाषा से ही निकली हैं? क्या भारतीय धर्म के मूलभूत तत्व ऋग्वेद के बाद रचे गए ग्रंथों (अथर्ववेद, उपनिषद, पुराण एवं अन्य महाकाव्यों) में पाए जाते हैं? क्या धर्म, दर्शन और संस्कृति की दिशा में बाद में हुए परिवर्धन के बीज भी वैदिक संस्कृति में ही मिलते हैं? इन तमाम बिंदुओं पर सांगोपांग विश्लेषण कर एक सही समझ विकसित करने की आवश्यकता है।  

भाषा  

भारोपीय भाषाओं की ग्यारह शाखाएँ अणु और दृहयु जनजाति की भाषाओं से पनपी हैं। ये जनजातियाँ पुरु जनजाति के पश्चिम में रहती थीं। पुरु जनजाति की भाषा वैदिक भाषा थी। भारत से बाहर की इन अर्वाचीन ग्यारह शाखाओं और भारत-भूमि के अंदर की बारहवीं वैदिक शाखा की तुलना पर ही तमाम भारोपीय मिसाल टिकी हुई है। 

तथापि, आज की भारतीय-आर्य भाषाएँ जो उत्तर भारत में बोली जाती हैं उनका उद्गम पुरुओं की वैदिक भाषा न होकर अन्य भारोपीय भाषाएँ हैं जो पुरुओं के पूरब और दक्षिण में बसी इक्ष्वाकु, यदु, तुर्वसु और अन्य जनजातियों के द्वारा बोली जाती थीं। इसका साक्ष्य हमें ढेर सारे भाषायी कारकों में मिलता है :

– पूर्वी भारत की प्राकृत भाषा और भारतीय-आर्य बोलियों में ‘र’ और ‘ल’ के भेद का क़ायम रहना। यह तकनीकी रूप से भारतीय-ईरानी भाषा से भी पहले की अवस्था का लक्षण है, क्योंकि बाद के ऋग्वेद, ईरानी और मिती ग्रंथ यह दर्शाते हैं कि भारतीय-ईरानी भाषा ने ‘र’ और ‘ल’ का आपस में विलय कर उसे ‘र’ में आत्मसात कर लिया था।

– उत्तराखंड की पहाड़ियों में अलग-थलग पड़ी बाँगनी भाषा में केंटुम भाषा के लक्षण पाए जाते हैं। बताते चलें कि भारोपीय भाषाओं के वर्गीकरण में केंटुम परिवार (इटालिक, सेल्टिक, जर्मन, ग्रीक और टोकारियन) और सैटेम परिवार (बाल्टिक, स्लावी, ईरानी और भारतीय-आर्य) प्रमुख परिवार हैं।

– कुछ ऐसे प्राचीन शब्द हैं जो सिंहली भाषा में तो संरक्षित पाए जाते हैं, किंतु वैदिक या संस्कृत में वे नहीं मिलते। जैसे – ‘वटुर’ (अंग्रेज़ी और हित्ती, दोनों में ‘वाटर’)

– पूर्वी और दक्षिणी प्राकृत भाषाओं में कुछ ऐसे अति प्राचीन शाब्दिक लक्षण पाए जाते हैं जो आश्चर्यजनक रूप से संस्कृत और ईरानी भाषाओं में नदारद हैं। भारतीय आर्य भाषाओं को तीन विभागों में बाँटा जा सकता है – प्राचीन भारतीय-आर्य, मध्यकालीन भारतीय-आर्य और अर्वाचीन भारतीय-आर्य। प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय-आर्य भाषाओं की लाक्षणिक भिन्नताओं का अध्ययन करने के उपरांत के आर नौरमन ने मध्यकालीन बोलियों में अनेक शब्द-रूपों की पहचान की। ये सारे रूप भारतीय आर्य या यहाँ तक कि भारोपीय स्त्रोत से संबंध तो रखते थे लेकिन संस्कृत में इनका कोई समतुल्य शब्द नहीं मिला। उदाहरण के तौर पर संस्कृत में उपसर्गों का प्रयोग बिरले ही होता है। कुछ ऐसे शब्द भी मिले जिनका उद्भव संस्कृत के मूल से अलग था, लेकिन उन्हें मध्यकालीन अन्वेषण या खोज भी नहीं माना जा सकता है क्योंकि या तो वे मध्यकाल से भी पहले के ध्वन्यात्मक विकास से अपने निर्माण की अवस्था को इंगित करते हैं या फिर संस्कृत से इतर  अन्य भारोपीय भाषाओं में ही उनके समतुल्य मिलते हैं। (नौरमन १९९५:२८२)

प्राकृत भाषा के वैयाकरणों ने प्राकृत भाषा, अर्वाचीन भारतीय-आर्य भाषा और यहाँ तक कि समृद्ध संस्कृत-शब्दकोशों में भी ऐसे ढेरों शब्दों की पड़ताल की है जो पूरी तरह से देशज हैं और वे तत्सम तथा तद्भव शब्दों से सर्वथा भिन्न हैं। तत्सम शब्द वे शब्द हैं जो सीधे वैदिक भाषा या संस्कृत से लिए गए हैं जबकि तत्सम शब्दों से बने देशी शब्द तद्भव कहलाते हैं। भाषा के जानकारों और भारतविदों ने भरसक कोशिश की है कि वे इस बात का कोई पुख़्ता सबूत ढूँढ सके कि ये शब्द औस्ट्रिक या द्रविण भाषा परिवारों से लिए गए हैं, किंतु उन्हें सफलता नहीं मिल सकी। हार-पाछ कर उन्होंने एक परिकल्पना गढ़ ली कि ये शब्द अनार्य और अज्ञात मूल के हैं और उत्तर भारत में आर्यों के आक्रमण से पूर्व किसी अज्ञात अनार्य जनजाति की भाषा से लिए गए हों। ध्यातव्य है कि ये सारे शब्द अर्वाचीन भारतीय-आर्य भाषा के अति प्रचलित शब्द हैं। दृष्टांत के तौर पर इन ‘नए’ शब्दों की एक बानगी देखिए – घोटक (घोड़ा), कुक्कुर (कुत्ता), प्रस्तर (पत्थर), पानी (जल) आदि। इनके लिए वैदिक संस्कृत में प्रयुक्त शब्द क्रमशः अश्व, श्वान, अश्म और ऊद या आप हैं।

ये शब्द किंचित अनार्य नहीं हैं, बल्कि  वैदिक पुरुओं से पूरब और दक्षिण के क्षेत्र के अंदरूनी भागों में बोली जाने वाली भीतरी भारोपीय भाषाओं के ये शब्द हैं। जैसा कि नौरमन ने ऊपर संकेत भी किया है कि इनमें से कुछ शब्दों के समतुल्य संस्कृत छोड़कर अन्य भारोपीय भाषाओं में पाए जाते हैं, लेकिन यह सभी शब्दों और सभी भारोपीय भाषाओं के लिए भी  सच नहीं है। इसका कारण यह है कि भले ही वे भारोपीय शब्द हों, लेकिन उनकी उत्पति का मूल पूरब में भीतरी भारोपीय भाषाओं को बोलने वाली  इक्ष्वाकु, यदु, तुर्वसु आदि जनजातियों की बोली में है, न कि पश्चिम और उत्तर के बाशिंदे उन दृहयु, अणु, पुरु आदि जैसी जनजातियों की उस भाषा से है जिस भाषा की संतति के रूप में बारह भाषा-परिवारों की अवधारणा गढ़ ली गयी है और उन्ही बारह शाखाओं के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर प्राक-भारोपीय भाषा की संरचना को नया रुप दिया गया है। ऋग्वेद के बाद के काल में ये शब्द संस्कृत भाषा में प्रवेश कर गए। ऋग्वेद के रचना-काल के अंतिम चरण में ‘रात्रि’ जैसे पूर्वी भारोपीय शब्दों का वैदिक भाषा में प्रवेश करना एक उदाहरण है। सही बात तो यह है कि कुछ विरले द्रविण शब्द भी इस काल में वैदिक संस्कृत में प्रवेश कर गए। उदाहरण के तौर पर ऋग्वेद के दसवें मंडल में १५५वें सूक्त की पहली ऋचा (१०/१५५/१) में एक आँख या तिरछी आँख वाले कनडेर या भेंगे व्यक्ति के लिए ‘काना’ शब्द का प्रयोग हुआ है जिसकी उत्पति का मूल द्रविण शब्द ‘कन्न’ (आँख) है। उसी तरह ऋग्वेद के ८/१७/१२ में ‘पूज’ शब्द का भी मूल द्रविण शब्द ‘पू’ (फूल) है। यह वैदिक और द्रविण लोगों के बीच के परस्पर-आचार की प्रगाढ़ता को प्रदर्शित करता है। बाद के दिनों में भीतरी क्षेत्रों के भारोपीय शब्दों सहित द्रविण और औस्ट्रिक परिवार के प्रचुर शब्दों का वैदिक और भारतीय संस्कृत-शब्दकोश में प्रवेश हुआ। जैसे – हेरंब (भैंस) का द्रविण मूल ‘एरम’। 

यहाँ तक कि ‘आर्य-आक्रमण अवधारणा’ के प्रबल समर्थक और महान भाषाशास्त्री श्री एस के चटर्जी भी यही लिखते हैं कि “मध्यकालीन और अर्वाचीन भारतीय-आर्य भाषाओं का उद्गम ऋग्वेद और शास्त्रीय संस्कृत कदापि नहीं है।“ (चटर्जी १९२६:३६)

……….पूरब की पट्टी में बसे ये आर्य बीचवाले भूखंड के वैदिक आर्यों से कई मामलों में सर्वथा भिन्न हैं – धार्मिक रीति-रिवाजों में, लोकाचारों में, बोलियों में” (चटर्जी १९२६:४०)।

………. ये आर्य पश्चिम के उन आर्यों से जिनके यहाँ वैदिक संस्कृति फली-फूली अपने धर्म और अपनी परम्पराओं में बिल्कुल  अलग थे“ (चटर्जी १९२६:४५)।

अपनी पहली पुस्तक में यह बात श्री तलगेरी ने  पहले भी रखी है कि भारतीय-यूरोपीय अर्थात भारोपीय भाषाओं का सबसे पुराना रूप जिसे आप प्राक-प्राक-भारोपीय भाषा कह सकते हैं, सबसे पहले भारत के अंदरूनी और बहुत भीतरी हिस्सों में बोला गया जहाँ से यह उत्तर और पश्चिम की ओर फैलते हुए कश्मीर और अफ़ग़ानिस्तान तक पहुँचा (तलगेरी १९९३:२२९)।  यह  भाषा अभिवर्द्धित  होकर भिन्न-भिन्न बोलियों और भाषाओं में विकसित हो गयी और सबसे बाहरी किनारों में बसे दृहयु और अणु जनजातियों की यही विकसित बोली भारत से बाहर यूरोप, पश्चिमी एशिया, और तुर्कीस्तान  में फैल गयी।  अर्वाचीन भारतीय-आर्य-भाषाएँ ऋग्वेद या पुरु की बोलियों की संतति न होकर उन इक्ष्वाकु, यदु और तुर्वसु जनजातियों की अन्य समकालीन ऋगवैदिक बोलियों से निष्पन्न धाराएँ हैं। इनका संबंध भीतरी भारोपीय भाषाओं से था। वैदिक बोलियों ने वैदिक साहित्य को ढोया जिसने आगे चलकर ऋग्वेद को जन्म दिया। शीघ्र ही आगे चलकर प्राचीन भारतीय व्याकरण-शास्त्रियों ने शास्त्रीय संस्कृत की रचना की। पाणिनि ने अपने अष्टाध्यायी में अपने से पहले के भी सैकड़ों अन्य आचार्यों की उपस्थिति का संकेत किया है। भीतरी भागों की बोलियों का उनके समकालीन अन्य भाषाओं जिसमें द्रविण भी शामिल है के साथ उत्तरोत्तर पल्लवन, परिष्करण और क्रमिक विकास की प्रक्रिया सहस्त्रों वर्ष तक चलती रही। इन भाषाओं के जड़ और धड़ बिल्कुल स्वतंत्र थे और संरचनात्मक स्तर पर भी ये वैदिक संस्कृत से सर्वथा पृथक थे। इन भाषाओं और वैदिक संस्कृत के मध्य वैयाकरणों द्वारा निर्मित कृत्रिम और शास्त्रीय संस्कृत ने एक संयोजक आवरण का कार्य किया। अनंतर, प्राकृत भाषा जो फिर भीतरी बोलियों के प्रभाव-पाश में बंधी थी प्रचलन में आ गयी। विकास की इस क्रमिक अवस्था को पार कर भीतरी बोलियाँ शनै:-शनै: अर्वाचीन भारतीय आर्य भाषाओं के भिन्न -भिन्न रूपों में अपने स्वतंत्र अस्तित्व में आ गयीं। इस प्रक्रिया में द्रविण सहित इन सभी भाषाओं का बड़े पैमाने पर संस्कृतकरण  हो गया। हज़ारों वर्ष पहले से आज तक यह भाषायी यात्रा निरंतर जारी है और जिन अनेकानेक रूपों में इन्होंने एक दूसरे को प्रभावित किया है और आज भी प्रभावित किए और होते जा रही हैं, वह एक इतनी जटिल और अस्पष्ट प्रक्रिया है कि उसकी विवेचना करना एक टेढ़ी खीर है (तलगेरी १९९३:२३०)। 

 धर्म और संस्कृति  

दुनिया के शेष हिस्सों की तरह भारत में भी धर्म एक जनजातीय मामला था। दुनिया की अन्य बसावटों की भाँति भारत के भी भिन्न-भिन्न खंडों में बसे जनजातीय समूह अलग-अलग जनजातीय धर्मों के अनुयायी थे। समकालीन विश्व के सामाजिक जीवन में हो रही प्रगति की लय  में ही भारत में भी सुसंगठित और नागरीय सभ्यता का विकास होने लगा। इस विकास ने धार्मिक क्षेत्र में भी एक संगठित संरचना को उद्भूत किया जिसके विस्तार की भौगोलिक सीमा पश्चिम और पश्चिमोत्तर की ओर पसरती हुए पश्चिमी उत्तर-प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब को पार कर आज के पाकिस्तान के ऊपरी किनारे तक को छू आयी। इन क्षेत्रों में अनेक जनजातियों का निवास था, जिन्हें भारत के पौराणिक इतिहास में दृहयु, अणु और पुरु के नाम से जाना जाता है।

इस क्षेत्र में पल्लवित-विकसित होने वाले धर्मों का मुख्य ज़ोर प्रकृति के शक्ति-रूप तत्वों यथा- सूर्य, चंद्रमा, मेघ, वर्षा, अंतरिक्ष, नदी आदि की अभ्यर्थना करना था। प्रकृति में स्थित उन ब्रह्मांडीय और खगोलीय बिम्ब, जिनमें वे इन शक्ति रूप तत्वों के मूर्त रूप का दर्शन करते थे उन्हें अग्नि को साक्षी बना पवित्र ऋचाओं के उद्घोष के साथ अर्पण करते थे। धर्म के इस स्वरूप के दर्शन हमें पुरुओं के ग्रंथ, ऋग्वेद, अफ़ग़ानिस्तान के पश्चिम की ओर बढ़ गए अणुओं के धर्मग्रंथ, जेंद-अवेस्ता, और सेल्टिक ड्रूयड (दृहयु जनजाति के यूरोपीय उत्प्रवासी) के प्राचीन यूरोपीय पुजारियों की पूजा-पद्धति में होते हैं। लिथुयानिया के एक ख़ास वर्ग ने तो अपने प्राचीन  धर्म को पुनर्जीवित कर  लिया है जिसे ‘डर्न’ कहते हैं। सच कहें तो इस ‘डर्न’ में भी वे दो मूल तत्व अग्नि और मंत्रोच्चार शामिल हैं। वेद के प्रकृति-पुराण से उद्भूत और विकसित इस तरह की पौराणिक परम्पराएँ और धार्मिक लोकाचार अन्य यूरोपीय धर्मों (ग्रीक, ट्यूटोनिक, स्लावी, लिथुयानियन आदि) में भी मिलते हैं।

भारत से अणु और दृहयु जनजाति के बाहर चले जाने के बाद पुरुओं के धर्म का विस्तार वैदिक संस्कृति के साथ समूचे देश में हुआ। इसका मुख्य कारण इस धर्म का पौरिहत्य, मंत्रोच्चार, पूजा-पद्धति और परम्पराओं के स्तर पर एक सुव्यवस्थित, सुगठित और अत्यंत सुदृढ़ संरचना का होना था। इस धर्म का प्रभाव धीरे-धीरे इतना व्यापक होने लगा कि भारत भूमि की  शेष जनजातियों के धर्म भी अपने आपको उसमें समाहित करने लगे और पुरुओं का वैदिक धर्म एक  प्रमुख मुख्यधारा का धर्म बन गया जिसके लोकाचार, धार्मिक परम्पराएँ, पूजा-पद्धति, रीति-रिवाज और पौराणिक कथायें  सामाजिक व्यवस्था की सबसे ऊपरी परत बनकर छा गयीं और नीचे की परत वाले अन्य धर्म उसकी छाया में आ गये। इस तरह पुरुओं के वैदिक धर्म का वितान फैलकर समूचे भारत पर छा गया। इसमें कोई विवाद नहीं कि इस अखिल भारतीय वितान वाले धर्म को ही ‘हिंदू’ कहा गया किंतु, ऐसा कब से कहा जाने लगा, यह विवाद और भ्रम में लिपटा हुआ है।

हिंदू धर्म के भारत में प्रसार और अब्राहम के रिलीजन के समूचे संसार में विस्तार में एक बड़ा भारी अंतर था।  जिन धर्मों को अब्राहमी रिलीजन तहस-नहस और उनका मुलोच्छेद कर उसकी जगह पर अपने को स्थानापन्न करना चाहते थे, सबसे पहले उनके देवी-देवताओं को वे दैत्य और उनके धार्मिक लोकाचार को आसुरी आचरण घोषित करते थे। दूसरी ओर अपने में समाहित होने वाले और घुलने-मिलने वाले जनजातीय धर्मों को हिंदुत्व सम्मान, समादर और सह-आस्तित्व की दृष्टि से देखता था तथा उनके देवी-देवताओं को भी वहीं भक्ति और आदर-भाव समर्पित करता था जो अपने देवी-देवताओं को करता था। उनकी  धार्मिक मान्यताओं को वह अपना तक लेता था। इसका परिणाम यह हुआ कि आज भारत के कोने-कोने में जो सबसे लोकप्रिय देवी-देवता हैं वे या तो जनजातियों के देवी देवता हैं या फिर उन्होंने अपना जीवन और जीवन-मूल्य जनजातियों को समर्पित कर दिया  है। आप दृष्टांत के रूप में केरल के अयप्पा, तमिलनाडु के मुरगन, आन्ध्र के बालाजी, कर्नाटक के विट्ठल, महाराष्ट्र के विठोबा और खंडोबा, ओडिशा के जगन्नाथ आदि को ले सकते हैं या फिर हज़ारों नामों से भारत के कोने-कोने में पूजी जाने वाली मातृ-शक्ति का स्मरण कर सकते हैं। हर क्षेत्र के स्थानीय देवी या देवता वहाँ की कुल/ग्राम/गृह-देवी/देवता के रूप में पूजे जाते हैं। पौराणिक कथाओं में  इन स्थानीय देवी/देवताओं का संबंध और संदर्भ प्रमुख वैदिक देवी या देवता जैसे विष्णु या रुद्र के साथ ऐसे पिरो दिया जाता है कि ये जनजातीय देवता भी उन वैदिक देवताओं के अंशावतार या विस्तार के रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं और मुख्य धारा में जगह पा लेते हैं। किंतु सबसे अधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सारी प्रक्रिया लोक-कथाओं और लोकाचार के माध्यम से एक सहज स्वाभाविक प्रवाह में होती हैं। कहीं भी ऊपर से आरोपण या ज़बरन थोपे जाने का लेश मात्र भी न होता है, न दिखता है। स्थानीय देवता अपना मूल नाम ही रखते हैं, उनकी उपासना की पद्धति भी वहीं मूल स्थानीय ही होती है, किंतु उनका स्वरूप और उनकी महिमा अखिल भारतीय हो जाती है। वह समूचे भारतवर्ष के भक्तों के तीर्थ-स्थान बन जाते हैं।

हिंदू धर्म की यह विलक्षणता केवल देवी-देवताओं के ही संदर्भ में ही नहीं है, बल्कि हिंदुत्व की विचार परम्परा, उसके दर्शन और उसके अन्य सभी धार्मिक तत्वों में समाहित उदारता और लचीलेपन की दक्षता के साथ भी है जिससे उसने समस्त भारतवर्ष के स्थानीय और जनजातीय धर्मों के तत्वों को अपने में सहेजा है।  हिंदू धर्म की छतरी का प्रतिनिधित्व करने वाले पुरुओं के उसी मौलिक वैदिक धर्म को ही कमोवेश व्यापक स्तर पर अखिल भारतीय धर्म के रूप में मान्यता मिली है जो ऋग्वेद का धर्म है। इंद्र, वरुण, मित्र, अग्नि, सोम और मरुत पूजे जाने वाले मुख्य वैदिक देवता हैं। बाद में विष्णु और रुद्र सबसे प्रमुख देवताओं में शामिल हो जाते हैं। अग्नि-पूजा (होम और यज्ञ की विधि) तथा सोम की पूजा पूजा-पद्धति के  सबसे महत्वपूर्ण अंग  हैं। आज के दिनों में सोम का तत्व ग़ायब हो गया है। सही मायने में सोम की पहचान और प्रकृति सदा से विवाद का विषय रही  है। अग्नि-आहुति या हवन-अनुष्ठान  का प्रचलन आज भी है किंतु यह जन्म, मृत्यु और परिणय-संस्कारों से लेकर गृह-प्रवेश जैसे कुछ ख़ास अवसरों तक ही सीमित है। वेद के ये अधिकांश देवता छोटी-छोटी पौराणिक कहानियों में प्रकट होते हैं।

आचरण के धरातल पर वे सारे तत्व जो हम आज के हिंदुत्व में पाते हैं, वे सभी भारतवर्ष के सभी हिस्सों के निवासियों, मूलतः वृहत भूखंड में फैले जनजातियों की धार्मिक परम्पराओं, उनके रीति-रिवाज, लोकाचार और आराधना-पद्धतियों के तन्तुओं का समाहार हैं। मूर्ति-पूजा या प्रतिमाओं की आराधना हिंदू धर्म का एक ख़ास चरित्र है। यह भौतिक वस्तुओं में पराभौतिक शक्तियों और सगुण स्वरूप में निर्गुण की स्थापना का द्योतक है। शिला-खंडों में आँख की आकृति का चित्र बनाकर उन्हें ‘लिंग’ रूप में पूजा जाता है। ये लिंग सुंदर गढ़े हुए पत्थरों, धातुओं या अन्य पदार्थों के भी बने हो सकते हैं। इन लिंगों में प्राण-स्थापना कर इन्हें एक सजीव सत्ता के रूप में पूजा जाता है। इन्हें नहलाया-धुलाया जाता है। चंदन, सुंदर वस्त्र, आभूषण और  फूलों से इनका श्रिंगार  किया जाता है। इनके ऊपर नारियल, केले, अन्य फल-मूल, मिष्टान्न आदि का अर्पण  किया जाता है,  सुगंधित धूप, अगरबत्ती जलाकर इन प्रतिमाओं की बड़े श्रद्धा-भाव से आरती की जाती है और भक्ति-भाव-विहवल भक्त भक्ति-संगीत में सराबोर हो अपनी आराध्य देव-प्रतिमा के समक्ष कीर्तन-भजन और नृत्य में लीन हो जाते हैं। देव-प्रतिमा पर अर्पित प्रसाद को वे पूजनोपरांत ग्रहण करते हैं और लोगों में वितरित करते हैं।  इन प्रतिमाओं के आवास के रूप में सुंदर नक्काशियों  से उत्कीर्णित भव्य प्रस्तर-स्तम्भों पर टीके  आलीशान देवालयों का निर्माण करते हैं। उनमें सुंदर और पवित्र जलाशयों और भक्तों को ठहराने के लिए उत्तम धर्मशालाओं की व्यवस्था होती  है।  सुंदर घाट, शुभ मुहूर्तों पर मंदिरों में भव्य उत्सव, देवता को ढोने के लिए अत्याकर्षक पालकी, रथ आदि इन देवालयों की विशेषता है। देव प्रतिमा के मस्तक  पर चंदन के लेप, हल्दी और सिंदूर का टीका या त्रिपुंड लगाया जाता है। ये सारे लक्षण अन्य विविधताओं के साथ भारत भूमि के उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम में फैले विशाल क्षेत्र और चतुर्दिक दिशाओं में बसी विशाल जनसंख्या के समस्त सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक  तत्वों का समाहार है। 

उसी तरह हिंदू धर्म के दार्शनिक तन्तुओं का ताना-बाना भी समस्त भारतीय भूखंड पर फैले जनजातीय समाज की लोक-मान्यताओं से बुना हुआ है। इसमें आत्मा का देहांतरण, पुनर्जन्म, पंचांग और तिथि पर आधारित शुभ मुहूर्त की अवधारणा, विशेष प्रकार के वृक्षों, पौधों, पशु-पक्षियों, कीड़ों-मकोड़ों, जंगलों, पहाड़ों और नदी-नालों और पुरखे-पूरनियों की पूजा इसकी अद्भुत मिसाल है।  


Monday, 16 November 2020

वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध ------ (१३)

(भाग - १२ से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य - ()

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)


मूल-भूमि की अंतिम शाखा 


 भारतीय-आर्य शाखा ही उन बारह भारोपीय और तीन अन्य  शाखाओं में  एक मात्र शाखा रही  जो अपनी  मूलभूमि में बची रह गयी। यहीं वैदिक आर्य या पुरुओं की भाषा थी।अन्य पूर्वी जनजातियों के मुक़ाबले इस वैदिक सभ्यता का अध्ययन करने से पहले हमें अणु तथा दृहयु जैसी पश्चिमी जनजातियों के सापेक्ष इनकी स्थिति का आकलन करना होगा। ऐसा करना इस परिप्रेक्ष्य में  भी वांछित होगा कि ये जनजातियाँ भारत से बाहर चली जाने वाली अन्य भाषायी शाखाओं के आद्य स्वरूप को बोलने वाली जनजातियाँ थीं। 

‘आर्य-आक्रमण-अवधारणा’ के परिप्रेक्ष्य में वैदिक भारतीय-आर्य विरासत को तीन चरणों में बाँटा जाता है। 

–  अपनी मूलभूमि, दक्षिणी रूस,  की  अन्य ग्यारह शाखाओं के साथ साझी भारोपीय विरासत, 


– अन्य दस शाखाओं से ईरानी और भारतीय-आर्य शाखाओं के अलग होकर पूरब की ओर बढ़ने के बाद मध्य एशिया में ईरानी शाखाओं की साझीदार भारतीय-ईरानी विरासत, और

 

– ईरानी से पृथक होकर भारत में प्रवेशोपरांत स्वतंत्र रूप से विकसित होनेवाली भारतीय-आर्य विरासत। 


अब दूसरी ओर ‘भारत से निकली’ या ‘भारत ही मूलभूमि’ की अवधारणा के परिप्रेक्ष्य में भी भारोपीय शाखा के यात्रा-पथ के आधार पर उसी प्रकार भारतीय-आर्य विरासत को तीन चरणों में बाँटा जाता है।

– उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत की एक ही कोख में जन्मी सभी बारह शाखाओं की साझीदार भारतीय-यूरोपीय विरासत,


– बाक़ी दस शाखाओं के प्रस्थान के पश्चात ईरानी और भारतीय-आर्य शाखाओं की साझीदार भारतीय-ईरानी विरासत, और

 

– ईरानियों के अप्रवासन और उनके चले जाने के बाद अपने दम पर फली-फूली भारतीय-आर्य विरासत।  


अब यदि ‘आर्य-आक्रमण-अवधारणा’ को सही मान लिया जाय तो फिर जिस वैदिक संस्कृति का चित्र ऋग्वेद में उभरता है, वह इतने गाढ़े रूप में न होकर अपनी कल्पित जन्मभूमि की तथाकथित मौलिक ‘आद्य-भारोपीय’ संस्कृति के अत्यंत फीके और क्षीण स्वरूप को ही प्रतिबिम्बित करता। हमने जैसा कि देखा है कि वैदिक भाषा अन्य भाषाओं की जननी न होकर बस भाषा परिवार की अन्य बारह शाखाओं में से एक शाखा मात्र है। अब आप ही यह तय करें कि दक्षिणी रूस की कोख से निकलकर हज़ारों कोस की यात्रा शताब्दियों में तय करने के बाद भारत-भूमि के उत्तरी छोर  तक पहुँचते-पहुँचते उस भारोपीय  संस्कृति के कितने अंश बच पाते और जो थोड़े बचते भी  उसकी थोड़ी-बहुत छाप ही बस  ऋग्वेद में झलकनी चाहिए थी। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से ऋग्वेद में आद्य-भारोपीय-भाषा का कोई फीका-सा अंश नहीं मिलता है और न ही ऋचा के रचयिताओं ने अपनी किसी ऐसी स्मृति का उद्घाटन किया है जो उन्हें किसी परदेशी अतीत में बाँधता हो।

सच तो यह है कि ऋग्वेद की भाषा और इसके सांस्कृतिक तंतु आद्य-भारोपीय भाषायी संस्कारों से इतने घनिष्ट हैं कि लगता है मानों उसी की कुक्षी का यह नवांकुर बीज हो। ऋग्वेद के अपने अनुवाद की प्रस्तावना में ग्रिफ़िथ लिखते हैं कि “सच कहें तो ऋग्वेद में इसकी काव्यात्मकता से भी ज़्यादा अगर कोई चीज़ रुचि जगाती है तो वह इसकी ऐतिहासिकता है। एक तरफ़ इसकी मौलिक भाषा में ग्रीक, लैटिन, केल्ट, ट्यूटन और स्लावी भाषाओं के जड़ और धड़ तो दिखायी देते ही हैं, दूसरी तरफ़ ईसाईयत के पैदा होने से पहले के यूरोप के देवी-देवता, पौराणिक गल्प-कथायें, धार्मिक आस्थाएँ, वहाँ के लोकाचार और उनकी परम्परायें वेद के प्रचंड प्रकाश-पुंज से जगमग हैं।“ 

-  ऋग्वेद की कथाओं में भारोपीय कथा-परम्परा के प्राचीनतम स्वरूप के दर्शन होते हैं। उदाहरण के तौर पर हम मैकडोनेल की इन बातों पर ग़ौर कर सकते हैं कि “वेद के देवी-देवता अपने रूपकों में अन्य किसी भी भारोपीय कथाओं के नायक देवी -देवताओं की तुलना में भौतिक जगत और सांसारिक घटनाओं के ज़्यादा क़रीब हैं“ ( मैकडोनेल १९६३:१५)। सही मायने में, अधिकांश कथाओं में तो हम कपोल-कल्पित उन पौराणिक सत्ताओं और उनसे जुड़ी प्राकृतिक लीलाओं की सही पहचान उनके उन स्वरूपों में  ही कर लेते हैं जिस रूप में ये चरित्र वेद के कथानक में प्रकट होते हैं। बाक़ी भारोपीय भाषाओं की जितनी भी पौराणिक कथाएँ हैं उन सबमें ऐसे अनगिन तत्व हैं जो वेद की कथाओं से मेल खाते हैं। हालाँकि उन सभी में आपसी समानताएँ बहुत थोड़ी ही हैं और वे जो भी थोड़ी उनकी पारस्परिक समानताएँ हैं वे भी ऋग्वेद में बख़ूबी पायी जाती हैं। अपवाद में बस वे ही तत्व हैं जिनका पड़ोसी भाषाओं से उन्होंने आपस में लेन-देन किया है। इस संबंध में हम ग्रीक देवता अपोलो का दृष्टांत दे सकते हैं जिन्हें रोमन कथाओं ने भी अपना लिया है।(तलगेरी १९९३:३७७-३९५)

उदाहरण के तौर पर हम नीचे दी गयी सूची पर एक नज़र फेर सकते हैं जो भारोपीय भाषाओं की एक से अधिक शाखाओं में वर्णित लगभग सम्पूर्ण पौराणिक देवताओं को प्रतिबिम्बित करती है :

द्यौस पितर (वैदिक), ज़्यूस पेटर (ग्रीक), जूपिटर (रोमन), डे पटरौस (इलिरीयन), डी ईव्स (बाल्टिक) 

उषा (वैदिक), इयोस (ग्रीक), औरोरा (रोमन), औश्रीण (बाल्टिक)

वरुण (वैदिक), ओडिन/वोडन (जर्मन), ओऊरानूस (ग्रीक), वेलिनस (बाल्टिक)

असुर (वैदिक), ऐसिर (जर्मन), अहुर (अवेस्ता)

मारुत (वैदिक), अरेस (ग्रीक), मार्स (रोमन)

पर्जन्य (वैदिक), परकुंस (बाल्टिक), पेरनु (स्लावी), जौर्गिन (जर्मन)

त्रैतं (वैदिक), थ्रेताओं (अवेस्ता), ट्रायटॉन (ग्रीक)

आर्यमान (वैदिक), ऐर्यमान (अवेस्ता), अरीयोमांस/ एरेमों (सेल्टिक)

सरमा/ सारमेय (वैदिक), हर्मिस (ग्रीक)

पूसन/पाणि (वैदिक), पन (ग्रीक), वाणीर (जर्मन)

रूद्र (वैदिक), रुगलु (स्लावी)

दनु (वैदिक), दनु (आइरिश)

इंद्र (वैदिक), इंद्र (अवेस्ता), इनर (हित्ती)

सर्वर (वैदिक), करबरोस (ग्रीक)

श्री (वैदिक), सीरीज़ (ग्रीक), फ़्रेयर/फ़्रेअ (जर्मन)

भग (वैदिक), बग (अवेस्ता), बाओग (स्लावी)

अपाम नपात (वैदिक), अपाम नपात (अवेस्ता), नेपचुनस (रोमन), नेचतें (सेल्टिक)

ऋभु (वैदिक), एल्ब (जर्मन = अंग्रेज़ी में ‘एल्फ़’)

यम (वैदिक), यिमा (अवेस्ता), यमिर (जर्मन)

ऊपर की तालिका में वर्णित कुल १९ सूचियों में वैदिक १९, ग्रीक ९, अवेस्ता ७, जर्मन ७, रोमन ४, बाल्टिक ४, स्लावी ३, सेल्टिक २, हित्ती १ और अल्बानी १ हैं। इन सारे देवताओं में अवेस्ता की समान साझेदारी है। यह भी स्पष्ट है कि सबके देवताओं की तुलना का मार्ग ऋग्वेद के देवताओं से ही होकर जाता है। आगे थोड़ा ग़ौर करें तो हम पाएँगे कि अवेस्ता धर्म और पौराणिकता के एक ऐसे रूप को गढ़ता है जो अत्यंत विकसित, मानवरूपांकित और परिवर्धित है। यहाँ यह भी देखने को मिलता है कि ऋग्वेद से इसकी अलंकारिक तुलनाओं को यदि छोड़ दें तो अवेस्ता का प्राकृतिक घटनाओं से कुछ कम ही लेना-देना है।

मात्र वैदिक चरित्र ही इस मामले में अनोखे हैं कि उनके सजातीय और सहोदर चरित्र बाक़ी सभी शाखाओं में उपस्थित हैं। लेकिन दो अलग-अलग शाखाओं के पौराणिक चरित्रों का आपस में तुलना करना तब तक असंभव प्रतीत होता है जब तक कि उन्हें हम संबद्ध वैदिक चरित्र के आलोक में न देखें। दृष्टांत के तौर पर ट्यूटोनिक (जर्मन) ‘वाणीर’ और ग्रीक के ‘हर्मिस’ और ‘पन’ आपस में जुड़े हैं लेकिन इनके आपसी संबंधों को हम तबतक समझ नहीं समझ पाएँगे जब तक कि हम वेद के शर्मा और पाणि को न समझें। जहाँ तक अवेस्ता के पौराणिक चरित्रों का सवाल है तो वे बाक़ी भारोपीय  भाषाओं से इस मायने में बिल्कुल  अलग-थलग हैं कि उनके चरित्र मात्र वैदिक चरित्रों से ही तालमेल रखते हैं। 

– भाषायी तौर पर देखें तो वैदिक भाषा इस मामले में विलक्षण है कि इसने भिन्न-भिन्न भारोपीय भाषाओं के सजातीय मूल क्रिया-पदों को अभी तक बचाए रखा है। इस बिंदु की ओर सबसे पहले निकोलस कजनस ने ध्यान खींचा। बाद में कोएनराड एल्स्ट ने इसको और विस्तार दिया। उन्होंने बताया कि वैदिक संस्कृत में ऐसे ढेरों अतिप्रचलित और मूलभूत सजातीय शब्द हैं, जिनके उद्भव स्त्रोत नए शब्दों की व्युत्पति में अब भी वैसे ही सक्रिय और उर्वर हैं। उदाहरण के तौर पर पिता, पुत्र, पुत्री, भालू, भेड़िया आदि के लिए वेद में प्रयुक्त शब्द। दूसरी ओर इनके लिए अन्य शाखाओं मेंजो सजातीय शब्द आए हैं उनकी व्युत्पति के संबंध में कोई प्रामाणिक शास्त्रीय स्त्रोत नहीं मिलता है।

ऋग्वेद की थोड़ी और पड़ताल करने पर पता चलता है कि भारोपीय, भारतीय-ईरानी और भारतीय-आर्य, ये तीनों चरण ग्रंथ के इतिहास में ही समाहित हैं। भौगोलिक रूप से भी ये तीनों चरण भारत-भूमि में ही विद्यमान हैं। सच कहें तो, क्रम से ऋग्वेद के सबसे प्राचीन मंडल ६, ३ और ७ की रचना-भूमि हरियाणा और उससे पूरब सरस्वती के पूरबी तट के  क्षेत्रों तक में ही फैली हैं। साथ ही, इस क्षेत्र का पश्चिमोत्तर विस्तार भी वेदों की रचना के साथ ही पसरता रहा। मात्र एक शब्द ‘रात्रि’ के इतिहास पर ही दृष्टिपात कर इस प्रक्रिया को समझा जा सकता है।

– ‘रात्रि’ के लिए प्रचलित भारोपीय शब्द है ‘नक्त’। क़रीब-क़रीब अन्य सभी शाखाओं में भी ऐसे ही शब्द का का प्रचलन है। जैसे, ग्रीक – नौक्स (आधुनिक ग्रीक में – निक़्त), लैटिन – नौक्टिस, फ़्रांसीसी – नुइट, स्पैनिश – नौक, हित्ती – नेकुज, टोकारियन – नेकाई, जर्मन – नाक्ट, आइरिश- अनौक्त, रूसी – नौक, लिथुआनियन – नक्तिस, अल्बानियन – नते आदि-आदि। 

– आम चलन में कम आने वाला एक भारतीय-ईरानी शब्द है – ‘क्षप’, जिसका समूचे ऋग्वेद में प्रयोग हुआ है। यह अवेस्ता में भी ‘क्षाप’ के रूप में पाया जाता है, जहाँ ‘नक्त’ से संबधित शब्द का पूर्ण अभाव है। अपवाद स्वरूप, मात्र एक उप वाक्य में ‘उप-नक्षतरूसु’ शब्द मिलता है जिसका अर्थ ‘रात्रि के समीप’ रूप में प्रकट होता है। आधुनिक फ़ारसी में भी एक शब्द आता है ‘शब’, जिससे उर्दू का शब्द ‘शब-नम’ अर्थात रात्रि की नमी, ओस निकलता है।

– ऋग्वेद के बाद के अंशों में पहली बार कहीं-कहीं ‘रात्रि’ शब्द उपस्थित होता है। यही शब्द बाद के ग्रंथों में ‘नक्त’ के बदले स्थायी रूप से प्रयोग होता है। बाद की भारतीय-आर्य भाषाओं और उन सभी भाषाओं में भी जिनका उद्गम संस्कृत है, ‘रात्रि’ शब्द ही प्रयोग होता है। किंतु, भारतीय भूभाग के बाहर की उन सभी भारोपीय भाषाओं में जिनका प्रस्थान इस भूमि से ‘रात्रि’ शब्द के उद्भव के पहले ही हो गया था, इस शब्द का कोई चिह्न नहीं मिलता है। वही स्थिति जल के लिए आने वाले शब्द ‘आप’, ‘ऊद’ और ‘पानी’ की भी है। 

“ऋग्वेद की भाषा इस बात को बख़ूबी प्रदर्शित करती है कि ईसाईयत के पैदा होने से पहले के समस्त भारोपीय भाषाओं के जड़-धड़, देवी-देवता, पौराणिक गल्प-कथायें, धार्मिक आस्थाएँ, वहाँ के लोकाचार और उनकी परम्परायें वेद के प्रचंड प्रकाश-पुंज से जगमग हैं।“ ऐसा इसलिए है कि समस्त बारह शाखाओं सहित ऋग्वेद की भी जन्मभूमि उत्तरी भारत ही है। हालाँकि, ऋग्वेद में उन शाखाओं में से बस एक, केवल भारतीय आर्य-शाखा ( पुरुओं की जनजाति की भाषा और धर्म) का ही प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद का रचना प्रवाह अन्य भारोपीय भाषाओं के यहाँ से प्रस्थान के उपरांत भी काफ़ी लम्बे समय तक अपनी ज्न्म्भूमि को सिंचित करते रहा। और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह रही  कि इस क्षेत्र के इतिहास और परम्पराओं की मौलिकता न केवल ऋग्वेद की कालजयी ऋचाओं में चिरंतन  सजीव बनी रही, बल्कि उनकी भाषिक और पौराणिक धारा को परवर्ती पौराणिक रचनायें आगे भी बहाए रखी।


Saturday, 31 October 2020

वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध ------ (१२)

(भाग - ११ से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य - (झ )

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)

अंतिम शाखाएँ 

भारोपीय भाषाओं की दस अन्य शाखाओं से अलग हो जाने के बाद भी भारतीय-आर्य और ईरानी भाषाओं के आपस में गहरे संबंध के प्रचुर प्रमाण मिलते हैं।

इस बात को सही ठहराने के लिए भाषा-शास्त्रियों ने कल्पित मूलभूमि दक्षिण रूस में अन्य शाखाओं से भारतीय-ईरानी शाखा के एक साथ अलग होने की परिकल्पना विकसित की है।इसी आधार पर उन्होंने मध्य एशिया में प्राक-वैदिक काल में एक साझी भारतीय- ईरानी संस्कृति के विकसित  होने की अवधारणा गढ़ ली है। ग़ौरतलब है कि मध्य एशिया दक्षिण रूस से इन दोनों शाखाओं, भारतीय-आर्य और ईरानी, की अपनी ऐतिहासिक बसावट वाली भूमि के रास्ते में पड़ता है।

फिर भी, जैसा कि हमने पहले देखा है कि ऋग्वेद और अवेस्ता के जो भी साझे सांस्कृतिक तत्व हैं, उनके बीज हमें नए  मंडलों के  रचना-काल में हरियाणा और अफ़ग़ानिस्तान के  बीच के भूभाग में मिलते हैं। भारतीय और  ईरानी इतिहास के इन साझे सांस्कृतिक तत्वों के प्रचुर साक्ष्य की चर्चा तलगेरी की पुस्तक (तलगेरी २०००:१६३-२३१; २००८:२५८-२७७ आदि) में विस्तार  से उपलब्ध हैं। पुरु और अणु अर्थात  वैदिक और ईरानी तत्वों के संघर्ष और उनकी आपसी प्रतिद्वंद्विता के किस्से पुराण और अवेस्ता में देवासुर संग्राम या देव-अहुर संग्राम के रूप में तथा अंगिरा और भृगु या अथर्व  या फिर अंगिरा और अथर्वों  की पारम्परिक प्रतिद्वंद्विता में संजोये हुए हैं।

भारोपीय शाखा के अप्रवासन या विस्तार की दो घटनाएँ तो ऋग्वेद की रचना के काल से भी काफ़ी पहले हो चुकी थीं –

प्रारंभिक शाखाओं के अपने मूल स्थान से अलग हटकर मध्य एशिया में घुसने और वहाँ बस जाने की घटना, और 

यूरोपीय शाखाओं के अपने मूल स्थान से हटकर अफगानिस्तान में घुसने और वहाँ बस जाने की घटना। छठे, तीसरे और सातवें – इन पुराने  मंडलों  के रचना-काल में ऋग्वेद की भूमि में अंतिम शाखाओं का अस्तित्व अब भी क़ायम था। दसराज्ञ-युद्ध और राजा सुदास  (मंडल ७) की विस्तारवादी  लड़ाइयों ने अंतिम शाखाओं को हटने के लिए बाध्य कर दिया था। फलस्वरूप, अणुओं ने अफ़ग़ानिस्तान में प्रवेश किया और वहाँ से उन्होंने दृहयु जनजाति (यूरोपीय शाखा) को उत्तर  की ओर खिसकने के लिये  बाध्य कर दिया।  फिर,  दृहयु अफ़ग़ानिस्तान से चलकर मध्य एशिया में आ गए। बाद में अन्य अंतिम शाखाओं का अफ़ग़ानिस्तान से पश्चिम की ओर बढ़ने का क्रम जारी रहा। 

– अल्बानी, ग्रीक, अर्मेनियाई, ईरानी और भारतीय-आर्य भाषाओं में बाद में चलकर विकसित  होनेवाले भाषिक लक्षणों के आधार पर ऐसा माना जाता है कि अन्य सात शाखाओं के अलग हो जाने के बाद यही वे पाँच शाखाएँ थीं जो अपनी मूल-भूमि में बनी रहीं। दक्षिण रूस की  इसी मूलभूमि के रूप में  अपनी अवधारणा में ‘दक्षिण रूस मूलभूमि’ के प्रतिपादकों  ने परिकल्पना रच ली है।

तथापि, ऋग्वेद में वर्णित दसराज्ञ-युद्ध और राजा सुदास की विस्तारवादी लड़ाइयों (सातवाँ मंडल) के विवरण यही  दर्शाते हैं कि  इन सभी गतिविधियों की कर्मभूमि पंजाब का ही क्षेत्र था। जैसा कि साफ़ है कि ये वैदिक (भारतीय-आर्य या पुरु) राजा दस जनजातियों (नौ अणु की और एक पहले से उस क्षेत्र में बचे दृहयु की) से युद्ध लड़ने  पंजाब के क्षेत्र में पूरब की ओर से ही  घुसते हैं। बाद में ये जनजातियाँ पश्चिम की ओर खिसकने लगती हैं। युद्ध विषयक ऋचाओं में अणु जनजाति के लिए प्रयोग किए गए विशेष नाम  इस प्रकार हैं :

सातवें मंडल के अठारहवें सूक्त में –  ऋचा ५ – सिम्यु,  ऋचा६ - भृगु,  ऋचा७ – पक्थ, भलान, अलिन, शिव, विसाणिन

सातवें मंडल के तिरासीवें सूक्त में – ऋचा – १ – परसु/पार्सव, पृथु/पार्थव, दास। (आगे की पौराणिक परम्परा में अणुओं के लिए एक और विशेषण ‘मद्र’ का उल्लेख हुआ है।)

दास :

वैसे तो किसी भी अ-पुरु  अर्थात अवैदिक आर्य के लिए इस शब्द का प्रयोग हुआ है, लेकिन ख़ास तौर पर इसे हम ईरानियों के साथ ही जोड़ते हैं। ५४ सूक्तों के ६३ मंत्रों में यह शब्द प्रकट होता है और उनमें से अधिकांश में इसका अभिप्राय अरियों या शत्रुओं के संदर्भ में ही हुआ है। फिर भी, आठवें मंडल में तीन मंत्र ऐसे ज़रूर मिल जाते हैं जहाँ बात उलट जाती है अर्थात वहाँ पर इनका उल्लेख मित्रतापूर्ण संदर्भों में होता है और ‘दास’ की छवि दोस्त के रूप में उभरकर आती है

– ५/३१,  अश्विन को दास के अर्पण को ग्रहण करते दिखाया गया है।

– ४६/३२, संरक्षकों के संदर्भ में दास को दिखाया गया है।

– ५१/९, यहाँ दिखाया गया है इंद्र समान रूप से आर्यों के भी हैं और दासों के भी।

ये तीनों सूक्त  ‘दानस्तुति’ के हैं। यहाँ यह भी साफ़ हो जाता है कि मित्र के रूप में उनका उल्लेख किए जाने का संबंध उनकी पहचान एक संरक्षक के रूप में किए जाने से है। इनमें से दो सूक्त, ५ और ४६ तो ऊँट  दान करने वाले संरक्षकों की चर्चा करते हैं (और  तीसरे सूक्त के साथ भी बहुत कुछ ऐसा ही लगता है, हालाँकि इस सूक्त में स्पष्ट रूप से दान में दी गयी वस्तु-विशेष की चर्चा तो नहीं है, लेकिन इंद्र से उन दानों को स्वीकार किए जाने की स्तुति है)। अन्यत्र, उसी आठवें मंडल में एक जगह और (६/४८) ऊँट दान करने वाले दानकर्ता संरक्षक की दानस्तुति है।

ऋग्वेद के  अन्य सूक्तों से  हटकर आठवें मंडल के ये चारों सूक्त (५, ६, ४६ और ५१) एक  अलग ही विशिष्ट श्रेणी का स्थान रखते हैं :

  -  उनमें से तीन (५, ६ और ४६) ऊँट दान करने वाले संरक्षकों के संदर्भ में हैं,

– तीन (५, ४६ और ५१) दास का भली-भाँति विवरण देते हैं और 

– तीन (५, ६ और ४६) ऊँट दान करने वाले उन संरक्षकों के संदर्भ में हैं जिनकी पहचान आद्य-ईरानी नामों के साथ की गयी हैं। बहुत सारे पश्चिमी विद्वानों ( हौफ़मैन, विल्सन, वेबर, विजेल और ग़मक्रेलिज) ने जिन  आद्य ईरानी नामों की पहचान की हैं वे इस प्रकार हैं : - कसु (५), तिरिंदिरा पार्श्व (६) और पृथश्रवा कानित (४६)। ५१ वें सूक्त के संरक्षक ‘रुसाम पविरु’ को विद्वानों ने ईरानी नहीं माना है। तथापि, एम एल भार्गव (भार्गव :१९६४) ने इन्हें सुसोम और अर्जीकिया के भूभाग में रहनेवाली  पूरी तरह पश्चिमोत्तर की एक जनजाति माना है। इस तरह से उनका स्थान पूर्णरूपेण ईरान में ही निर्धारित होता है।

अब यदि ‘दास’ शब्द की बात करें तो ऋग्वेद में यह मुख्यतः  अ-पुरुओं  के लिए ही शत्रुतापूर्ण संदर्भों में आया है। बाद की संस्कृत भाषा में इसका अर्थ नौकर या गुलाम के लिए आया है। मूल रूप में परोपकार के अर्थ में इस शब्द को लिया गया है जो दूसरों की  भलाई करे। इसकी उत्पति का मूल धातु ‘दमस’ है ज़िसका  अर्थ भी सकारात्मक ही है – चमकना। यह ऊपर के सूक्तों के संरक्षकों के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है। स्पष्ट तौर पर यह अणुओं (ईरानी) के बीच जनजातीय नामों में ज़्यादा प्रयोग में आता था। यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि ईरानियों की खोतानी भाषा में ‘दाह’ शब्द का अर्थ होता है – ‘मनुष्य’। शुरू में तो भरत-पुरुओं ने इस शब्द का प्रयोग केवल  अणुओं के लिए किया था, लेकिन बाद के दिनों में सामान्य तौर पर किसी भी अ-पुरु जनजाति या लोगों का यह पर्याय बन गया। 

सिम्यु 

यह शब्द केवल ऋग्वेद में, और वह भी मात्र दो बार, ही आया है। पहली बार राजा सुदास के शत्रुओं के संबंध में सातवें मंडल के अठारहवें सूक्त के पाँचवे मंत्र (८/१८/५) में आया है और दूसरी बार पहले मंडल के सौवें सूक्त के अठारहवें मंत्र में आया है। इस सूक्त में  केंद्रीय अफ़ग़ानिस्तान में सरयू के पार  हुए वर्षागिरी के युद्ध का वर्णन आया है। सुदास की संतति के शत्रुओं के संदर्भ की इस सूक्त की चर्चा है।


मद्र 

हालाँकि  अणु  जनजाति और राजा सुदास के युद्ध-वर्णन  में ऋग्वेद में मद्र का नाम नहीं आता है, फिर भी इस क्षेत्र की प्रमुख जनजातियों में न केवल उनकी गणना होती है बल्कि ऋग्वेद के परवर्त्ती काल तक भी उनकी यह पहचान बनी रही।


विषाणिन 

सुनने में, अणुओं (ईरानी) की पहचान में यह सबसे कमज़ोर कड़ी लग सकती है, लेकिन जब हम उन्हें नूरिस्तानी ‘पिशाचिन’ या ‘पिशाच’ से जोड़ कर देखते हैं तो तस्वीर बहुत  हद तक साफ़ हो जाती है। यहाँ हम ‘प’ और ‘व’ के आपस में एक-दूसरे  की जगह उच्चरित होने  के लक्षण को भी नज़रंदाज़ नहीं कर सकते हैं। जैसे- ‘पानी’ के बदले ‘वाणी’।  ‘भलाना’ (बोलान) का ‘बलूच’ में बदल जाना भी ध्यातव्य है।

ऋग्वेद के सातवें मंडल के १८वें और ८३वें सूक्त में मुख्य  रूप से इन  जनजातीय नामों की  चर्चा आती है। इनका संदर्भ ‘अणु’ जनजाति से है जिनकी  लड़ाई ‘दसराज्ञ-युद्ध’ या ‘दस राजाओं की लड़ाई’ में राजा सुदास के साथ होती है। अब ज़रा थोड़ी बारीकी से इस  बात पर ग़ौर  करें कि  ७/५/३ और ७/६/३ में वर्णित अपने पश्चिम-प्रयाण के पश्चात इतिहास में बाद के काल-खंडों में ये नाम कहाँ-कहाँ आते हैं। ये बात हमें  अचरज में डाल देती है कि दसराज्ञ-समर-भूमि पंजाब से लेकर पश्चिम की तरफ़ दक्षिणी और पूरबी यूरोप तक की पूरी भौगोलिक  पट्टी में ये नाम बिखरे पड़े हैं।

 

अफ़ग़ानिस्तान :  (अवेस्ता) आद्य-ईरानी – सैरिमा (सिम्यु), दही (दास)

पूर्वोत्तर अफ़ग़ानिस्तान : आद्य-ईरानी : नूरिस्तानी – पिशाचिन, विषाणिन 

पख़्तून (पश्चिमोत्तर पाकिस्तान), दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान : ईरानी : पख़्तून/ पश्तो (पख़्त

बलूचिस्तान (दक्षिणी-पश्चिमी पाकिस्तान), दक्षिणी-पूर्वी ईरान : ईरानी : बोलान/ बलूच (भलान)

पूर्वोत्तर ईरान:  ईरानी : पर्थियन/पर्थव (पृथु/पार्थव)

दक्षिणी-पश्चिमी ईरान : ईरानी : पर्सुआ/ पर्सियन(परसु/पर्सव)

पश्चिमोत्तर ईरान :ईरानी : मड़ई/ मेड़े(मद्र)

उज़्बेकिस्तान : ईरानी : खिव/ खवारेज़मियन (शिव)

यूक्रेन, दक्षिण  रूस : ईरानी: अलान (अलिना), सरमातियन (सिम्यु)

टर्की : थ्रैको-फाईरिजियन/ अर्मेनियायी : फ़्राइज़/ फ़्राइजियन (भृगु)

रोमानिया, बुल्गारिया : थ्रैको-फ़्राइजियन/ अर्मेनियायी : डेसियन (दास)

यूनान (ग्रीस) : यूनानी या ग्रीक : हेलेना (अलिना)

अल्बानिया : अल्बानी : सिर्मीयो(सिम्यु)

ऊपर दिए गए जो भी नाम हैं वे तक़रीबन इतिहास की  सभी प्रमुख जनजातियों के पुरखों से लेकर आधुनिक जनजातीय समुदायों के नामों को अपने में समेटे हुए है। इसमें उदाहरण के तौर पर हम इन्हें देख सकते हैं – सिथियन (शक), औसेटी और कुर्द। यहाँ तक कि पहले ईरानी भाषा किंतु  आज के दिन में स्लावी भाषा बोलने वाले सर्ब, क्रोट और अन्य भाषी नाम भी इनमें शामिल हैं।

इतिहास की एक और महत्वपूर्ण बात यहाँ पर दिखायी देती है। वैसी जनजातियाँ जो सुदूर परदेस में बस गयी  हैं उन्होंने अपनी भाषायी पहचान को बनाए रखा है। किंतु, जो जनजातियाँ नज़दीक में ही बस गयीं या पीछे रास्ते में ही रह गयी वो अपने चतुर्दिक भाषा-संसार में समाहित हो गयीं।

- ‘सिम्यु’  जनजाति में जो लोग सुदूर जाकर बसे उनकी सिर्मीयो भाषा और अल्बानी पहचान बची रही लेकिन जो रास्ते में ही रह गए वे ईरानी भाषा (अवेस्ता की सैरिमा और बाद में सरमाटियन) में घुल गए ।

अलिना जो बहुत दूर जाकर बसे,  उन्होंने अपना ग्रीक नाम (एल्लेन/ हेल्लेन) और भाषा बचा कर रख लिया  जबकि जो रास्ते में ही रह गए वे ईरानी भाषा (अलन) में समाहित हो गए।

भृगु जनजाति में जो लोग सुदूर जाकर बसे  उन्होंने अपने थ्रैको-फाईरिजियन/अर्मेनियायी  नाम और भाषा  (फ़्राइज़/फ़्राइजियन) को संरक्षित रखा।   जो लोग  रास्ते में ठहर गए, वे ईरानी भाषा (उनका पुजारी वर्ग ‘अथ्रौन’) में खो गए तथा जो पीछे ही छूट गए और आस-पास ही बस गए वे भारतीय-आर्य भाषा उनका पुजारी वर्ग ‘भृगु’ में घुल गए।(कौकेसस क्षेत्र में अर्मेनियायी लोगों ने अपने नाम का स्वरूप तो त्याग दिया, किंतु ईरानी भाषा से प्रभावित ही सही, अपनी भाषा को बचाये रखा।)

मद्र जनजाति का वह वर्ग जो बहुत दूर जाकर बस गया, उसने ईरानी नामों को और ईरानी बोली (मद, मेदे, मेदीयन) को धारण कर लिया, जबकि जो लोग आस-पास और पीछे ही रह गए वे भारतीय-आर्य भाषा (मद्र) में समा गए और ‘अणु’ के रूप में अपनी जनजातीय पहचान भी बचाकर रख ली।


कुछ और तथ्य 


- दसराज्ञ-युद्ध में सुदास के विरुद्ध दस राजाओं का गठबंधन लड़ रहा था। इस गठबंधन का नेता पार्थव (६/२७/८)  नाम से लोकप्रिय  राजा  अभ्यवर्ती छायामन {७/२७/(५, ८)} का वंशज कवि छायामन (७/१८/८) था। उनके पुराने पुरोहित कवस (७/१८/१२) थे। ये दोनों नाम ईरानी नाम हैं और इनका ज़िक्र अवेस्ता (कौवी, काओस) में भी मिलता है। अवेस्ता में बड़ी प्रमुखता से वर्णित कौवियान वंश के सबसे पहले राजा का नाम कवि छायामन ही था।  बाद के काल में पर्थियन राजाओं ने अपने को इसी वंश के होने का दावा किया।

– प्रारम्भ में अणुओं ने ‘उसिनर’ के नेतृत्व में दक्षिण की ओर अपने अभियान का रूख किया था। पंजाब के पूर्वी छोर पर उसिनर की नेतृत्व वाली एक शाखा ने कई राज्यों की स्थापना की। बाद में ऋग्वेद के पुराने मंडलों  (६, ३ और ७) के रचे जाने के समय तक उसिनर के पुत्र ‘शिवि औसिनर’ ने अणुओं के इस विजय रथ को और आगे तक बढ़ाया  तथा पश्चिमोत्तर कोने को छोड़कर करीब-क़रीब समूचे पंजाब को उसने हथिया लिया था (पार्जिटर १९६२: २६४)। ‘औसिनर’  भी एक ईरानी नाम है जो अवेस्ता में पाया जाता है।

-  एकदम पीछे की ओर यदि हम चलें तो उत्तर में कश्मीर और इसके पश्चिमी क्षेत्रों में हम अणुओं के मूल निवास को पाते हैं जहाँ से इनकी  ‘वहीं शाखा’ निकलकर दक्षिण में पंजाब को जीत लेती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तर का यह इलाक़ा आज भी नूरिस्तानी भाषा का  मूल स्थान बना हुआ  है और इनमें प्राक-ईरानी भाषा के लक्षण (दंतव्य और तालव्य उच्चारण  ष, श, ज, ज़ आदि)  द्रष्टव्य हैं।

बहुत बाद के काल तक ईरानियों की ‘अणु’ जनजातीय पहचान बनी रही। इतिहास के परवर्ती कालों में ईरान के उत्तरी और दक्षिणी, दोनों छोरों पर अणुओं के बने रहने की चर्चा अवेस्ता में मिलती है :

– ग्रीक ग्रंथ (उदाहरण के तौर पर  इन्सिडोर औफ चरक्स का स्थलमोई पार्थिकोई, १६) दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान के हामुन-इ-हिलमैंड के उत्तरी भाग से सटे क्षेत्रों का उल्लेख ‘अनुओन’ या ‘अनुओइ’ के रूप में करते हैं और 

– मध्य एशिया ( तुर्कमेनिस्तान) में प्रमुख आद्य-ईरानी या ईरानी पुरातात्विक स्थलों के नाम ‘अनऊ’ हैं।

यह बात साफ़ है कि दसराज्ञ-युद्ध या दस राजाओं की लड़ाई के समय में अंतिम शाखाओं (अल्बानी, ग्रीक, अर्मेनियायी और ईरानी) की भाषाओं के आद्य प्रारूप को बोलने वाले लोग पंजाब में रहते थे। यहीं वह काल है जब ऋग्वेद के  पुराने मंडल (६, ३ और ७) रचे जा रहे थे। जैसा कि हमने देखा है कि यह काल ईसा से क़रीब ३००० साल पहले का है और ठीक इसी समय अंतिम शाखा बोलने वालों का अप्रवासन पश्चिम की ओर होना शुरू हुआ था।


२ – अल्बानी और अर्मेनियायी लोगों के अपनी ऐतिहासिक भूमि में बसने से पहले का कोई ठोस इतिहास उपलब्ध तो नहीं है, किंतु  अधिकांश भाषाविद अल्बानी, ग्रीक और अर्मेनियायी  के बीच बहुत प्रगाढ़ संबंध का होना मानते हैं। ग्रीक भाषा के पश्चिम एशिया के रास्ते खिसकने के कुछ साक्ष्य ग़मक्रेलिज ने बटोरे हैं जिसकी चर्चा उन्होंने अपनी पुस्तक “The Greek migration to mainland Greece from the east, Greek-Kartvelian lexical ties and the myth of the Argonauts” (GAMKRELIDGE 1995:799-804) में की है। फिर भी, उनके सिद्धांत को  एक छोटे  अंश के रूप में यह लिया जाता है कि भारोपीय भाषाओं की मूलभूमि अनाटोलिया में थी, “ अ-भारोपीय स्त्रोत वाले आद्य ग्रीक शब्दों के मामले में ग्रीक और कार्टवेलियन भाषाओं में ढेर सारी शाब्दिक समानताएँ पायी जाती हैं। इस बात का यह मतलब निकाला जाता है कि ढेर सारे कार्टवेलियन शब्द ग्रीक भाषा में  पूरब में कहीं पर तब लिए गए जब ग्रीक लोग अपने आद्य निवास-स्थान से अप्रवासित होकर पश्चिम की तरफ़ अपनी ऐतिहासिक भूमि (जहाँ वे आज बसे हैं) की ओर जा रहे थे…………कुछ ग्रीक शब्द कार्टवेलियन भाषा में भी ग्रीक से लिए गए ………यह यही दर्शाता है कि शब्दों का यह आदान-प्रदान दोतरफ़ा था, न कि एकपक्षीय (गमक्रेलिज १९९५:८०१-८०२)।

वास्तव में ईरानियों के पूरब से आने के ढेर सारे दस्तावेज़ी सबूत हैं। 

ईरानियों के ईरान में होने के सबसे पुराने संदर्भ ईसा से १००० वर्ष पूर्व के प्रारम्भ होने तक नहीं मिलते हैं।

“हमें भावी ईरानियों की उपस्थिति के कोई चिह्न ईसा से नौंवी शताब्दी पूर्व से पहले कहीं नहीं मिलते। सबसे पहला संकेत पर्सुआ या पारसी का हमें ८३७ ईसा पूर्व  सिरियायी राजा शलमान शेर के विजय-अभियान के क़िस्सों में मिलता है। तब ये पारसी कुर्दिस्तान की पहाड़ियों में और मदाई या मेदिस के समतल में स्थानीय स्तर पर इकट्ठे रहते थे। तक़रीबन एक सौ साल बाद मेदिस लोगों ने पारस (या ईरान) के पठारी भाग पर हमला बोल  दिया और वहाँ के उन स्थानीय निवासियों को या तो भगा दिया या फिर अपने में आत्मसात कर लिया  जिनका कोई ऐतिहासिक अभिलेख या लिखित दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है (लरौज १९५९:३२१)।

पारस की स्फ़ान लिपि के स्त्रोतों के अनुसार ९वीं सदी ईसापूर्व  के मध्य में दो बड़े ईरानी समुदायों की उपस्थिति के सुराग़ मिलते हैं – मेदिस और पारसी। स्फ़ान लिपि के स्त्रोतों से एक बात तो बड़ी सफ़ाई से उजागर होती है कि मेदिस और पारसी समुदाय ( और निस्संदेह  अन्य ईरानी समुदाय भी जिनके नामों की पहचान अबतक नहीं हो पायी है)  पूरब से पश्चिम दिशा में  ईरान की ओर और ईरान के अंदर बढ़ रहे थे (एंसाइक्लोपीडिया ब्रितानिका १९७४, भाग ९, पृष्ठ ८३२)।

पारसियों का उल्लेख सर्वप्रथम ९वीं शताब्दी ईसापूर्व की सिरियायी गाथाओं और गल्पों में मिलता है। एक विरुदावली  में कहा जाता है कि पर्सुआ के २७ राजाओं ने आक्रांता शलमान शेर को ८३५ ईसापूर्व में उपहार और नज़राना भेंट किए। तिगलथ पिलेसर – भाग ३ (७४४-७२७ ईसापूर्व) में  मेदिस की चर्चा है। 

प्राचीन पारसी शिलालेखों (दरियस के बिजोटन शिलालेख, ५२१-५२९ ईसापूर्व, सं – श्मिट) से पूर्व मध्य एशिया में ऐसे कोई साहित्यिक स्त्रोत नहीं मिलते जो वहाँ ईरानियों की उपस्थिति के प्रमाण दे सकें। ये शिलालेख यहीं दर्शाते हैं कि पहली शताब्दी ईसापूर्व के मध्य तक ग्रीक लोगों  द्वारा कहे जाने वाले ‘सिथियन’ और पारसी लोगों द्वारा कहे जाने वाले ‘शक’ जनजाति के लोग पश्चिमी किनारों ( काले सागर के उत्तर और उत्तर-पश्चिम) से इसके पूर्वी सीमा की ओर बढ़ाने के क्रम में कमोबेश पूरे मध्य एशिया में पसर गए थे।(SKERVO १९९५-१५६)

इस आधार पर यह बात क़रीब-क़रीब साफ़ हो जाती है कि भारोपीय भाषाओं  की मूल-भूमि के उत्तरी भारत में होने और यहाँ से इनकी भिन्न-भिन्न शाखाओं के  बाहर की ओर पसरने के पर्याप्त ऐतिहासिक दस्तावेज़ मौजूद  हैं।


Saturday, 24 October 2020

वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध ------ (११)



(भाग - १० से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य - ( ज  )

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)

शुरू की शाखाएँ 

सुप्रचालनिक और तार्किक दृष्टि से देखें तो हम पाते हैं कि  अफ़ग़ानिस्तान के उत्तर की ओर विस्थापित दोनों प्रारम्भिक शाखाओं को उस क्षेत्र ने अपनी ऐतिहासिकता  में समेट लिया। टोकारियन  पूर्वी मध्य एशिया में अपने दम तोड़ने तक पड़ा रहा।  अनाटोलियन शाखा अपने सबसे शुरू के दिनों में जैसा कि  ऐतिहासिक अभिलेख दर्शाते हैं, अपने स्वाभाविक विस्तार की प्रक्रिया में पहले तुर्की में प्रवेश कर गयी और फिर फैलते-फैलते कैस्पियन सागर के तट को स्पर्श कर गयी। 

दूसरी तरफ़ रूसी मूल-स्थान अवधारणा  की सबसे बड़ी विसंगति जो उभरकर आती है, वह है टोकारियन शाखा की  मध्य एशिया में उपस्थिति!  इस संबंध में चाइल्ड ने बहुत पहले कहा था, “ सेंटम भाषा के मध्य एशिया में हाज़िर होने की सबसे आसान व्याख्या इसे एशियायी आर्य ख़ज़ाने के अंतिम उपलब्ध गहने  के रूप में मंज़ूरी देनी होगी। इतिहास के अंतिम दिनों में  आर्यों का यूरोप से चलकर तुरक़िस्तान  के आर-पार भटकना कहीं से भी गले नहीं उतरता।( CHILDE १९२६:९५-९६)”


अनाटोलियन और टोकारियन हिमालय के उत्तर में बसने वाले लोगों की दो महान जन-जातियों के रूप में पुराण में वर्णित हैं। इन्हें ‘उत्तर-मद्र’ और ‘उत्तर-कुरु’ के नाम से अभिहित किया गया है। उत्तर-कुरुओं की पहचान बड़ी आसानी से उनके भौगोलिक ठिकानों से लगायी जा सकती है। टोकारियन  और उत्तर-कुरु के नामों की समानता से भी इस विचार को बल मिलता है।   टोकारियन को उईघुर (पश्चिमी चीन और उज़्बेकिस्तान में रहने वाली तुर्कों की एक जाति) के ग्रंथों में ‘वघ्री’ और प्राचीन चीनी बौद्ध ग्रंथों में ‘तो-कु-लो’ या ‘तु-हुओ-लो’  कहा जाता है। स्पष्ट तौर पर टोकारियन के देशज नामों का सुसंस्कृत रूप ही उत्तर-कुरु है। हेनिंग के शब्दों में इसे उन भाषिक लक्षणों को बचाये रखना है जो हर नामों के नमूनों को  ‘दन्त्य’, ‘कंठय’ और ‘र’ के व्यंजनात्मक ढाँचों में रखकर   सघोष ध्वनि में उच्चरित करता है।(हेनिंग १९७८:२२५)

दक्षिण में पूरब की जनजाति ‘कुरु’ और पश्चिम की जनजाति ‘मद्र’ कहलाती थी। संभवतः उसी तर्ज़ पर उत्तर में भी पूर्वी जाति  को उत्तर-पुरु और पश्चिमी जाति को उत्तर मद्र कहा जाता था।  इस आधार पर उत्तर-मद्र अनाटोलियन (आद्य-हित्ती) लोगों के लिए ही प्रयोग हुआ जान पड़ता है। 

यह जानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हित्तियों की पौराणिक कथा में भी  ‘इंद्र’ का वर्णन उस राजा ‘इनर’ के रूप में है जो विशाल नागों से युद्ध में बरसात के देवता की सहायता करते हैं। अन्य भारोपीय पुराण-गाथाओं और परम्पराओं में इंद्र का कहीं ज़िक्र भी नहीं मिलता है, सिवाय अवेस्ता के, जहाँ उन्हें एक खलनायक योद्धा के रूप में चित्रित किया गया है। अनाटोलियन लोगों ने संभवतः इस देवता को या बाक़ी प्रकृति-पुराण को वैदिक युग के दिनों की  अपनी  अल्पावास  अवधि में जाना होगा। 

[यह  नाम ‘इंद्र’ इतना अधिक और विलक्षण रूप से ‘ भारतीय-आर्य’ है कि लुबोत्सकी और विजेल (विजेल २००६:९५) ने तो यहाँ तक कहने का जोखिम मोल ले लिया  कि इस शब्द ’इंद्र’ को भारतीय-ईरानियों ने उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान या मध्य एशिया की कल्पित ‘बी एम ए सी भाषा’ से उधार लिया। बताते चलें कि ‘बैक्ट्रिया-मर्जियाना-अरकीयोलौजिकल-कॉम्प्लेक्स’ का संक्षिप्त रूप  ‘बी एम ए सी’ है, जिसे ‘औक्सस-सभ्यता’ के नाम से भी जाना जाता है । यह भारतीय-ईरानी अप्रवासन से जुड़ी सभ्यता है जिसका क्षेत्र  बैक्ट्रिया की अमु दरिया अर्थात औक्सस नदी और मर्जियाना की मुर्ग़ाब नदी के कछार  के आस-पास का आज का उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान और पूर्वी  तुर्कमेनिस्तान का भू-भाग है।] यह भी महज़ संयोग ही है कि फ्रांस  की प्रकाशन कम्पनी के  द्वारा प्रकाशित पुराणों के विश्वकोश ‘Larousse Encyclopedia of Mythology’  में ‘इनर’ या इनार को ’इनर’  देवता के रूप में बताया गया है जो भारोपीय हित्तियों के साथ भारत से चलकर आए थे। 

और अंत में,  सुनने में थोड़ा अचरज पैदा करने के बावजूद हमारे सामने कुछ ऐसे  प्रजातीय प्रमाण (हालाँकि, इनका आर्य जाति से कोई लेना-देना नहीं है) हैं जो इस बात की ओर संकेत करते हैं कि शुरू के आद्य-हित्ती पश्चिम से आने के बजाय पूरब से पश्चिम  अर्थात मध्य एशिया से पश्चिमी  एशिया की ओर गए थे। बीसवीं सदी के शुरू में आकर उनकी भाषाओं  की खोज हो सकी और उनका विशद अध्ययन हुआ । तब जाकर यह प्रकाश में आया कि  उनकी भाषा ‘भारोपीय’ थी। उसके थोड़े ही दिनों बाद अमेरिका की शोध पत्रिका ‘अमेरिकन ओरिएँटल  सोशाइटी’ में यह प्रासंगिक टिप्पणी छपी :

“हरौंजी और अन्य विद्वानों के द्वारा शिलालेखों  को पढ़े जाने  से यह साफ़ हो गया है कि  वे भारोपीय भाषा ही बोलते थे। उनका भौतिक स्वरूप भी पूरी तरह से मंगोली ही था जो पूरी तरह से उनकी मूर्तियों और मिस्त्र  के  स्मारकों, दोनों से भली-भाँति टपकता है।  उनके गाल की हड्डियाँ उभरी होती थीं और माथा अंदर की ओर धँसा होता था। (कर्नोय १९१९:११७)


युरोपीय शाखाएँ   

- भारतीय परम्पराओं के आलोक में  उत्तर की तीन जन-जातियाँ थीं -  ‘पुरु’, ‘अणु’ और ‘दृहयु’। उत्तर-पश्चिमी भारत के धार्मिक अनुष्ठानों में  दो ऐसे केंद्रीय  तत्व थे जिसमें ये तीनों जनजातियाँ एक साझी परम्परा और विधि विधान का निर्वाह करती थीं। वे दो मूल तत्व थे – मंत्रोच्चारण और अग्नि-पूजा। भारतीय-आर्य-भाषी पुरुओं के पुरोहित ‘अंगिरा’ ऋषि थे। ईरानी शाखा के अणुओं के पुजारी ‘भृगु’ ऋषि थे।   थोड़ा और पश्चिम की ओर बढ़ने पर अपनी बनावट की कोई ख़ास पहचान लिए बिना दृहयु जनजाति की बसावट थी। [उनके ‘दृहयु’ नामकरण के पीछे के कारणों को जानने के लिए (तलगेरी २०००:२५४-२६०, २००८: २४७-२५०) को देखा जा सकता है और वैसे ही ‘अंगिरा-भृगु’ के बारे में विस्तार से जानने के लिए (तलगेरी २०००:१६४-१८०) देखा जा सकता है।]  

ऋग्वेद और अवेस्ता में इस बात का स्पष्ट उल्लेख़ है कि  अपने- अपने पुरोहितों के पौरिहत्य में परस्पर प्रतिद्वंद्वी तीन जनजातियाँ थीं। अंगिरा और भृगु के बाद तीसरी जनजाति ‘दृहयु’ की थी। ऋग्वेद के सातवें मंडल के अठारहवें सूक्त की छठी ऋचा में  राजा सुदास के प्रतिद्वंद्वी ‘अनु-दृहयु गठबंधन’  के पुजारी की चर्चा ‘भृगु और दृहयु’ के रूप में है। ठीक उसी तरह अवेस्ता के वेन्दिदाद १९ में ‘अंगरा’ और ‘द्रु’ का विवरण मिलता है जो जरथुष्ट्र को अहुर मज़दा के पथ से डिगाने की भरपूर कोशिश करते हैं। ( जरथुष्ट्र के साथ-साथ अथर्व या भृगु भी इरानियों के पुरोहित थे।)

प्राचीन भारोपीय शाखाओं के समग्र धार्मिक तन्तुओं में  समानता के तत्व का  अध्ययन करने के पश्चात विन इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि “सेल्टिक, रोमन और भारतीय ईरानी, ये सभी, अति प्राचीनकाल की साझी भारोपीय धार्मिक विरासत के वाहक हैं। ( विन १९९५:१०३)

पुरोहितों के मौलिक आद्य-भारोपीय लक्षणों से लबरेज़  इकलौता यूरोपीय समुदाय यदि कोई है तो, वह सेल्टिक समुदाय ही है क्योंकि वैदिक और अवेस्तायी धार्मिक तत्वों के वे दो मूल लक्षण, मंत्रोच्चार और अग्नि-पूजा, इस समुदाय के धर्मों में भी उतनी ही प्रमुखता से पाए जाते हैं। इसने ‘द्रुई’ अर्थात दृहयु के उस असली नाम को भी अभी तक बचा रखा है। जैसा कि हम वैदिक और ईरानी दोनों धर्मों मे समान रूप से पाते हैं  :

क -  ‘सेल्टिक द्रुई’ का पाठ्यक्रम भी वर्षों तक मनुष्य के मुख से श्लोकों और छंदों में छन-छन कर श्रुतियों और स्मृतियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी बहता  रहा है। (विन १९९५:५४) और 

ख – अग्नि-पूजा इस धर्म का भी केंद्र-बिंदु था।अग्नि-पूजा की परम्परा की शुरुआत भृगुओं ने ही की थी और इस बात का श्रेय उन्हें ऋग्वेद भी देता है। हालाँकि यह भी उतना ही सही है कि ऋग्वेद के पुराने मंडलों में भृगुओं को शत्रु के रूप में चित्रित किया गया है  (तलगेरी २०००:१७२-१७४)। उसी तरह अणु जनजाति के ‘भृगु’  को सेल्टिक परंपरा  में सबसे पुराने ऋषि-मुनि के रुप में  सीधे नहीं याद कर, घुमा-फिराकर देवताओं के रूप में याद किया जाता है। तीन में से दो सेल्टिक  देवियों के नाम ‘अणु’  और ‘ब्रिगी’ हैं। बाक़ी सारी देवियाँ उर्वरा की शक्ति का प्रतीक हैं, लेकिन ब्रिगी ज्ञान, संस्कृति और प्रतिभा की भी देवी हैं।(लारोऊज  १९५९: २३९) । और सबसे बढ़कर,  ब्रिगी अग्नि की चिरंतनता की संरक्षक देवी भी हैं जैसा कि ईरानी पुरोहितों द्वारा  और ऋग्वेद में भी (३/२३) अग्नि को शाश्वत कहा गया है। आयरलैंड के कील्डेयर में ब्रिगी देवी के मुख्य मंदिर में देखा जा सकता है कि  किस तरह मंदिर के गर्भ-गृह में पुजारिनें  प्रज्वलित ज्वाला को निरंतर जलाकर उसके स्वरूप को चिरंतन बनाए रखती हैं। 

जहाँ एक ओर सेल्टिक धार्मिक परम्परा ने आद्य भारोपीय पौरिहत्य तत्व के मूल स्वरूप को द्रुई, अणु और भृगु के नामों में बचाए रखा, वहीं यह बात भी उतनी ही साफ़ है कि इस तरह के पौरिहत्य की यह परम्परा बाक़ी सभी यूरोपीय शाखाओं में भी उतनी ही मौजूद थी।

क – ‘दृहयु’ या इसके अन्य सजातीय शब्द ‘द्रुह’, ‘द्रुघ’, ‘द्रोघ’, ‘द्रोह’ आदि ऋग्वेद में और ‘द्रु’ शब्द अवेस्ता में शत्रुओं और दैत्यों के लिए ही प्रयुक्त हुए हैं। ठीक इसके उलट दिलचस्प रूप से, इसके सजातीय शब्दों का उपयोग यूरोपीय शाखाओं में बिल्कुल विलोमार्थक अभिप्रायों में हुआ है। सेल्टिक लोगों के लिए ‘द्रुई’ पुजारी थे। बाल्टिक और स्लावी भाषा में इस शब्द का अर्थ मित्र होता है।(लिथुआनियायी में ‘द्रौगास’ और रूसी में ‘द्रुग’)। जर्मन भाषा में इसका अर्थ सैनिक होता है। उग्र पूजारियों को मित्र के रूप में चित्रित किया गया है। ऋग्वेद में सुदास के  शत्रुओं के पुरोहितों के संदर्भ की ग्रिफ़िथ इस प्रकार से व्याख्या करते हैं “ब्रिगुओं और दृहयुयों ने बड़ी तेज़ी से सुना, दो दूरस्थ जनजातियों के मध्य मित्र ने मित्र को बचा लिया”

ख – घुमा-फिराकर जर्मन परम्परा में भी भृगु को याद कर ही लिया जाता है।छंद और वाक् के देवता ‘ब्रगी’ हैं।  हालाँकि अग्नि-पूजा से इनका कोई संबंध नहीं और इसी कारण ये अवहेलना के पात्र भी हुए हैं, इनके नाम की व्युत्पत्ति का मूल ‘ब्रग’ शब्द में ढूँढा जाता है जिसका अर्थ होता है ‘चमकना’। कुल मिलाकर इनके नाम का भी उत्स वहीं भारोपीय मूल है जहाँ से ‘भृगु’ शब्द का उन्मेष  होता है। भृगु ही वैदिक अग्नि पूजा के अन्वेषक हैं। वहीं हाल यूनानी (ग्रीक) अग्नि-पुरोहित ‘फ़्लेग’ के साथ भी है। यह सब मिलाकर भारतीय इतिहास परम्परा में दृहयु की पहचान को  भारोपीय शाखाओं को पूर्वजों द्वारा बोली जानेवाली  शाखा के साथ  सुनिश्चित  करता है 

२ – जोहना निकोल्स और उनके अन्वेषी भाषाशास्त्री साथियों ने  इस विषय में बड़ा ही गहन शोध किया है। उनके शोध का शीर्षक है – ‘भारोपीय भाषायी विस्तार का उपरिकेंद्र ( The Epicenter of the Indo-European Linguistic Spread)”। इसमें उन्होंने उन शब्दों पर शोध किए हैं जो बहुत पहले पश्चिम एशिया ( सेमिटिक और सुमेरियन) से उधार के रूप में आकर भारोपीय और अन्य भाषा परिवारों में भी जैसे कौकेसियन  ( कार्टेवेलियन, अबखज-सिरसैसियन और नख-दाघेस्तनियन के अलग -अलग तीन समूहों के साथ) में शामिल हो गए।  साथ-साथ उन्होंने इन उधारी शब्दों के उस प्रकार और स्वरूप  की भी समीक्षा की जिस आकृति में वे इन भारोपीय भाषा परिवार या उनकी अन्य शाखाओं में समाहित हो गए और इसी क्रम में उरेलिक और उससे जुड़ी भाषाओं के भारोपीय भाषाओं से अंतरसंबंध के साथ-साथ अनेक प्रकार के भाषायी सबूतों से उनका सामना हुआ। 

“आद्य-भारोपीय भाषाओं के ठिकानों से संबंधित अनेक सबूत यहाँ प्रस्तुत किए गए हैं। पूराने उधारी शब्द अपनी  यात्रा  के रास्तों के उन रेगिस्तानी प्रक्षेप वक्र की ओर इशारा करते हैं जो मेसोपोटामिया से हटकर दूर पूर्वी मरुस्थलों से होकर गुज़रते हैं। वंश-वृक्ष की  बनावट, अपने फैलाव के पश्चिमी किनारे पर आनुवंशिक विविधताओं  का जमवाड़ा, टोकारियन की स्थिति और शुरू की बोलियों के भूगोल के बारे में उसका निहितार्थ, एशिया माइनर में अनाटोलियन के होने के शुरुआती प्रमाण  और भाषिक लक्षणों का सेंटम(यूरोपीय) तथा सतम(ईरानी) में बँट जाना – ये सारे तत्व एक ही दिशा की ओर संकेत करते हैं : बहुत दिनों तक टिका  रहने वाला भाषाओं का पश्चिम-मुखी प्रक्षेप-वक्र मार्ग  एक पूर्वी ठिकाने  की ओर संकेत करता है।  साथ ही, भारोपीय भाषा के विस्तार के तीनों प्रक्षेप-वक्र-मार्ग कैस्पियन सागर के पूर्वी किनारे की ओर संकेत  करते हैं। ‘सतम’ शाखा की ओर झुकाव का भी फैलाव कैस्पियन के दक्षिण पूरब ठिकाने से ही निकलता दिखता है। सतम भाषा तीनों प्रक्षेप-वक्र मार्गों के अवसान बिंदु पर लेट-लतीफ़ पहुँचती दिखायी देती है।(सतम का खिसकाव आद्य-भारोपीय के बाद की परंतु भारोपीय की शुरुआती घटना ही है)। इससे यहीं निष्कर्ष निकलता है कि भारोपीय शाखा का विस्तार का भी ठिकाना  प्राचीन बैक्ट्रिया-सौगदिया के आसपास के  क्षेत्र ही हैं (निकोल्स १९९७:१३७)। “ कहने का अर्थ यह है कि ये सारे भाषायी सबूत यहीं दिखाते हैं कि यूरोपीय शाखाओं के विस्तार का ठिकाना मध्य एशिया में अफ़ग़ानिस्तान के निकास द्वार पर ही था और पुराणों में दृहयु जनजाति के अप्रवासन की भी कहानी इन्हीं सबूतों को पुष्ट करती हैं।

३ – ऊपर के अन्वेषण मध्य एशिया के पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम की भाषाओं की बोलियों के आपसी भाषिक संपर्क से संबंधित हैं।  ऊपर निकोल्स के द्वारा खोजे गए सबूतों से अलग हटकर स्वतंत्र रूप से भी यदि देखें तो थोड़ा और पूरब बढ़ने पर तमाम सबूत मिल जाते हैं।

अ – शुंग-तुंग-चांग नामक चीनी मूल के एक पश्चिमी विद्वान भाषा-शास्त्री ने प्राचीन चीनी शब्दावली (बरनार्ड कार्लग्रे द्वारा पुनर्संपादित ग्रैमट्टा सेरिका १९४०) और आद्य-भारोपीय शब्दावली की व्युत्पत्ति (जूलीयस पोकॉर्नी द्वार पुनर्संपादित इंडो जरमेनैशेज  एटीमोलोजाइशेज़ वर्टरबुक १९५९)  के आपसी संबंधों का बहुत ही गहरायी से अध्ययन किया है। इस अध्ययन के उपरांत उन्होंने अपना मंतव्य दिया कि चीन की प्राचीन शब्दावलियों की व्युत्पत्ति की प्रक्रिया पर भारोपिय भाषाओं का गहन प्रभाव  है :  “भारोपीय बोलियों में जर्मन भाषा क़रीब-क़रीब चीन की प्राचीन भाषा के काफ़ी नज़दीक और समान है (चांग १९८८:३२)।“ और यह सब यहीं दिखाता है कि “ यूरोप की ओर खिसकने से पहले भारोपीय भाषाएँ एक काफ़ी लम्बे अरसे, क़रीब हज़ार से भी अधिक सालों तक साथ-साथ मध्य एशिया में फलती-फूलती रहीं (चांग १९८८:३३)।“

आ – आद्य-जर्मन और आद्य-सेल्टिक भाषाओं के  प्राचीन मध्य एशिया में सहवास की भी पुष्टि ग़मक्रेलिज और इवानोव ने अपनी गहन शोधात्मक पुस्तक “The separation of the Ancient European Dialects from Proto Indo-European and The migration of Indo-European tribes across central Asia” अर्थात “ आद्य भारोपीय भाषाओं से प्राचीन यूरोपीय बोलियों का अलग टूटना और मध्य एशिया से भारोपीय जनजातियों का अप्रवासन”(ग़मक्रेलिज १९१५:८३१-८४७) में की है। यहाँ उन्होंने यूरोपीय बोलियों के मध्य-एशिया से यूरोप की यात्रा के पथ को अंकित किया है। अपनी यात्रा के पथ पर पड़ने वाली भाषाओं के संसर्ग-चिह्नों को बटोरते हुए और अपने समागम-तन्तुओं के जिस अवशेष को छींटते  हुए यूरोपीय बोली आगे-आगे चल रही है, पीछे-पीछे उन्ही अवशेष बिंदुओं को बटोरते-बटोरते ग़मक्रेलिज ने यह पथ-रेखा खींची है।  यहाँ मिलने वाले  सबूतों में एनेसियन और आल्टिक भाषाओं के यूरोपीय भाषाओं से  आपसी लेन-देन वाले शब्द भी शामिल हो जाते हैं। इससे पहले प्राचीन चीनी भाषा और यूरोपीय बोली के शाब्दिक आदान-प्रदान की गाथा हम पढ़ चुके हैं। सबसे प्रमुख बात तो यह है कि ग़मक्रेलिज और इवानोव, दोनों इस परिकल्पना के प्रतिपादक हैं कि यूरोपीय भाषाओं की उत्पत्ति का मूल स्थान अनाटोलियो है। किंतु, उनकी परिकल्पना का एक महत्वपूर्ण बिंदु यह भी है कि अनाटोलियो की गर्भ-गुफा से ये भाषाएँ पहले मध्य एशिया में आयीं। फिर, वहाँ से वे यूरोप की ओर चली गयीं।


४ – ऐसे ढेर सारे अन्य तमाम सबूत भी भरे पड़े हैं जो यह साबित करते हैं कि भारोपीय भाषाओं का भ्रमण पश्चिम दिशा की ओर हुआ न कि पूरब दिशा में। उदाहरण के तौर पर –

अ – प्राचीन भारोपीय भाषाओं से लिए गए  ‘टौरस’ और ‘वाइन’ जैसे अनेक सेमिटिक शब्द पश्चिम की सभी नवों शाखाओं में तो पायी जाती हैं, किंतु भारतीय आर्य,  ईरानी और टोकारियन, इन तीन शाखाओं में नहीं पायी जातीं। वाइन शब्द  अपने पश्चिम की ओर यात्रा के दौरान अपनी संरचनाओं में मामूली बदलाव भी लाता रहा और पश्चिमी शाखाओं में  अपनी तीन नयी  बनावट में शामिल हो गया।  ‘वाइन (wine)’ शब्द पुरानी हित्ती या हेटाइट (अनाटोलियन) शाखा में ‘वायोनो {wi(o)no}’, यूरोपीय शाखाओं में ‘विनो (weino)’ और अंतिम शाखाओं (अल्बानी, ग्रीक और अर्मेनियायी) में ‘वोईनो(woino)’ रूप में पाया जाता है।

आ – पूर्वी यूरोप की यूरेलिक भाषाओं ने बड़े पैमाने पर भारतीय-आर्य और  ईरानी भाषाओं के शब्द लिए हैं। किंतु इसकी उल्टी प्रक्रिया नहीं पायी गयी है।  इससे भी यह साफ़ पता चलता है की ये दोनों पूर्वी शाखाएँ (भारतीय आर्य और ईरानी) कतई न तो पश्चिम से  आयी थीं और न ही यूरेलिक भाषाओं से कभी इनका कोई सम्पर्क भी रहा। ऐसा भले संभव हो कि भारतीय-आर्य और ईरानी भाषा बोलने वाले लोगों का एक छोटा समूह यूरोपीय शाखा वाले लोगों के साथ पश्चिम दिशा में चलकर यूरेलिक भाषी लोगों की जमात में  बस गया हो और अपनी बोली  उनकी भाषा में उन्होंने घोल  दी हों। 

[ प्रसंगवश बताते चलें कि फ़िनलैंड के विद्वान परपोला इस अवधारणा के प्रबल प्रतिपादक हैं कि भारतीय-ईरानी पूरब की अपनी  ऐतिहासिक रिहाईशी भूमि में अवतरित होने से पहले मूल रूप से सुदूर पश्चिम में यूरेलिक से दक्षिण पूर्व बसे, ‘फ़िन्नो-युग्रिक’  लोग थे। वह अक्सर इस बात को दुहराते रहते हैं कि फ़िन्नो युग्रिक आबादी में इस संबंध में अनेक भारतीय-ईरानी, ईरानी या भारतीय-आर्य तत्व पाए जाते हैं। इसी आधार पर वह इस नतीजे पर पहुँच जाते हैं कि भारतीय ईरानी यूरेलिक भूभाग से विस्थापित होकर आए थे।]

यह अपने आप में अधकचरे ज्ञान से निकले उलटफेर का नायाब नमूना प्रतीत होता है। सही मायने में तो भारतीय-ईरानी या ईरानी या भारतीय आर्य भाषाओं के प्रचुर मात्रा में ऐसे प्राचीन शब्द-भंडार हैं जो फ़िन्नो-युग्रिक भाषा में उधार लिए गए हैं। “भारतीय-ईरानी भाषा में प्रयुक्त ऐसे शब्दों की प्राचीनतम परत साझे रूप से आद्य-भारातीय-आर्य और आद्य-ईरानी भाषा में तीन तरह के सांस्कृतिक संदर्भों में प्रयुक्त  हुए हैं – आर्थिक उत्पादन के संदर्भ में, सामाजिक संबंधों के संदर्भ में और धार्मिक मान्यताओं के संदर्भ में। आर्थिक संदर्भ में पालतू जानवरों के नाम हैं। यथा – भेड़, मेमना, बैक्ट्रियायी ऊँट,  बिना बधिया किए घोड़े,  बछड़े, सुअर के बच्चे आदि । देहाती काम-काज और उत्पादों के संदर्भ में थन, चमड़ा, ऊन, कपड़ा, चरख़ा आदि। खेती-बाड़ी के संदर्भ में अन्न, अन्न की बाल, मद्य, दरांती, हँसिया आदि। औज़ार के संदर्भ में आरा, सुआ, सुतरी, कोड़ा, सींग, हथौड़ा, गदा आदि। ढेर सारे शब्द सामाजिक संदर्भों और रिश्तों से संबंधित हैं।  जैसे – मनुष्य, बहन, अनाथ, नाम आदि। इसमें कुछ ऐसे  शब्द भी शामिल हैं जो भारतीय-ईरानी भाषा में मुख्य स्थान रखते हैं। जैसे – अनार्यों के लिए ‘दास’, असुर आदि। कुछ  शब्द धार्मिक  विधि-विधान, रिवाज और कर्म-कांडों के संदर्भों से संबंधित अर्थों में प्रयुक्त हुए हैं। जैसे -  स्वर्ग, नरक, ईश्वर,  देवता, ख़ुशी, इंद्र का अस्त्र वज्र, मृत, नश्वर, आर्यों के दफ़न-संस्कार में प्रयुक्त होने वाला अंग किडनी आदि।कुछ ऐसे नशीले पेय पदार्थ जो भारतीय-ईरानी और फ़िन्नो-युग्रिक पुजारियों द्वारा समान रूप से प्रयोग में लाए जाते थे  उनको इंगित करने वाले शब्द हैं। जैसे – शहद, भांग आदि। (कुज़मीना २००१:२९०-२९१)”

लेकिन कई दशकों के अथक अध्ययन  और अनुसंधानिक प्रयास के बावजूद एक भी ऐसा शब्द नहीं खोजा जा सका जो फ़िन्नो-युग्रिक भाषा से उधार के तौर पर पूरब के भारतीय-ईरानी भाषाओं में प्रवेश किया हो। 

तर्क और तथ्य से छत्तीस का आँकड़ा रखने वाले उन कतिपय पूर्वाग्रही विद्वानों की ओर से यदि आँखें मूँद लें तो ऐसे कोई भी संकेत नहीं मिलते जो यह साबित कर सकें कि ये पूरबिया भारतीय-ईरानी कहीं पश्चिम से चलकर आए थे। हाँ, प्राचीन काल में पूरब से चलकर फ़िन्नो-युग्रिक पश्चिमी क्षेत्र में समाने वाले मित्ती भारतीय-आर्य जैसे  कुछ ख़ास भारतीय ईरानी समुदाय ज़रूर थे जो अब इतिहास की करवटों में लुप्तप्राय हो गए हैं।    

बाहर से आकर बसने वाले अप्रवासी हमेशा स्थानीय भाषा में कुछ नए शब्दों का योगदान करते हैं। भारतीय भाषाओं में भी बड़ी मात्रा में ऐसे शब्दों का वजूद है जो मुग़ल शासन के दौरान अरबी-फ़ारसी से आए। दक्षिण-पूर्व एशिया और उत्तरी एशिया के औस्ट्रिक और चीनी-तिब्बती भाषाओं ने संस्कृत से शब्द ग्रहण किए। गोआ  की कोंकड़ी बोली में पुर्तगाली शब्दों का विलय हुआ। बाल्टी के लिए ‘बालदे’ और रोटी के लिए ‘पाव’ शब्द तो भारत की दूसरी भाषाओं में भी घुस गए। इंग्लैंड पर नौरमन आक्रमण के फलस्वरूप अंग्रेज़ी भाषा में ढेर सारे फ़्रांसीसी शब्द प्रवेश कर गए। पुद्दुचेरी  की तमिल बोली  में भी ढेर सारे फ़्रांसीसी शब्द हैं। उसी तरह ब्रिटेन के पुराने उपनिवेशों की भाषाओं में भी अंग्रेज़ी  शब्दों का अनवरत प्रवाह दिखता है।

हर हाल में ऐसा भी होता है कि अप्रवासी अपनी भाषा में भी स्थानीय बोली के शब्दों को आत्मसात कर लेते हैं। किंतु, ऊपर दिये  गए दृष्टांतों में एक भी ऐसा अवसर नहीं दिखायी  देता है जहाँ अप्रवासियों ने उस स्थानीय बोली के शब्दों को अपने मूल स्थान में प्रेषित कर दिया हो। कोई भी भारतीय शब्द अरबी या फ़ारसी में  घुलता नहीं दिखायी देता है। थाई, कंबोडियाई  या इंडोनेशियाई  शब्द संस्कृत भाषा में नहीं मिलते हैं। इसके अपवाद वहीं दिखायी देते हैं जहाँ उपनिवेशवादियों ने  अपने उपनिवेश  की भूमि को छोड़ दिया हो और वापस अपनी मूलभूमि में लौटकर अपने साथ लाए वहाँ के स्थानीय शब्दों को अपने साहित्य में पिरो दिया हो। उदाहरण के तौर पर अंग्रेज़ी भाषा में ऐसे उदाहरण दिखायी देते हैं।

इसलिए उपलब्ध प्रामाणिक साक्ष्य इस बात को पूरी तरह से नकारते हैं कि भारतीय-ईरानी पश्चिम से पूरब की ओर आए थे। उलटे, हम यह देखते हैं कि भारतीय-ईरानी शब्द फ़िन्नो-युग्रिक भाषा में तो पाए जाते हैं, लेकिन फ़िन्नो-युग्रिक शब्द भारतीय-ईरानी भाषा में  नहीं पाए जाते। यह निस्संदिग्ध रूप से इस बात को साबित करता है कि भारतीय-ईरानी समुदाय का यदि कोई अप्रवासी वर्ग था तो वह विस्थापित होकर फ़िन्नो-युग्रिक भूमि की ओर गया था न कि फ़िन्नो-युग्रिक भूभाग से भारतीय-ईरानी क्षेत्र में आया था।

सबसे ज़्यादा अचरज तो परपोला के इस तर्क पर होता है जब वह कहते हैं कि फ़िन्नो-युग्रिक भाषा ने इन  शब्दों को भारतीय-आर्य और ईरानी लोगों के पूर्वजों से शुरू में ही दक्षिण रूस के आस-पास  ले लिया था। संक्षेप में कहा जाय तो इतनी दूर दक्षिण रूस में और इतना पहले अर्थात वैदिक युग से भी पहले भारतीय-ईरानियों के पूर्वजों द्वारा ‘आर्य’, ‘दास’ ‘मेधु (लेकिन मेलिथ नहीं)’ और यहाँ तक की बैक्टरियायी ऊँटों के नाम प्रयोग किए जाते  थे!

 इ – आद्य-भारोपीय और आद्य- औस्ट्रोनेसियायी ( इंडोनेशिया, मलयेसिया और प्रशांत महासागर के द्वीपों की भाषाओँ  के पुरातन स्वरूप) भाषाओं के बीच आद्य भारोपीय काल से भी बहुत पहले से आपसी संपर्क थे। इसिडोर डायन ( डायन : १९७०) ने इन दोनों भाषाओं के बीच उल्लेखनीय समानताओं को ढूँढ निकाला। उदाहरण के तौर पर पहले चार अंकों के लिए शब्द, व्यक्तिवाचक सर्वनाम के अधिकांश शब्द और पानी तथा ज़मीन के लिए शब्द। डायन (१९७०:४३९) यह बतलाते हैं कि “ऐसी तुलनाओं या समानताओं को हम कम-से-कम इतना कम और यहाँ तक कि इतनी अधिकतर मात्रा में हम ढूँढकर तो निकाल ही सकते हैं जहाँ तक  अर्थों की गुणवत्ता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।  और यदि कोई ऐसा संपर्क वाक़ई था तो यह भारत के अलावा और कहाँ हो सकता है?

प्रसिद्ध भाषविद श्री एस के चटर्जी स्वतंत्र रूप से अपने शोध का यह नतीजा रखते हैं कि भारत ही वह केंद्र-बिंदु था जहाँ से औस्ट्रिक बोलियाँ पूरब के भूभाग और प्रशांत महासागर के टापुओं पर फैलीं ( चटर्जी १९५१/१९९६:१५६)। और,  औस्ट्रिक  बोलियाँ अपने मूल रूप में अर्थात औस्ट्रो-एशियायी तथा औस्ट्रोनेशियायी शाखाओं के परमोद्भव बिंदु के रूप में अपनी असली पहचान भारत की माटी में ही तलाशती हैं (चटर्जी १९५१/१९९६:१५०)।

आज के ज़माने में वर्तमान सभी भारोपीय भाषा समुदायों में मात्र यूरोपीय बोलियाँ ही ऐसी हैं जिनके अपनी ऐतिहासिक बसावट की ज़मीन ( अधिकांशतः यूरोप में ही) में पहुँचने की यात्रा के पुरातात्त्विक साक्ष्य मौजूद हैं। जैसा कि विन का कहना है,  “एक  ‘साझे यूरोपीय क्षितिज’ का विकास ३००० ईसापूर्व के बाद ही होता है। यह तक़रीबन पिट ग्रेव संस्कृति के विस्तार का समय था (कुरगन संस्कृति का तीसरा चरण)। चीनी-मिट्टी से बने पदार्थों के ख़ास शिल्प के आधार पर इसे सामान्यतः कौरडेड वेयर होरिज़ोन  कहते हैं। इस संस्कृति के भिन्न-भिन्न स्वरूपों  के मध्य, पूर्वी एवं उत्तरी यूरोप में फैलने  से उत्पन्न परिदृश्य को ही आद्य-भारोपीय भाषा और संस्कृति के आस्तित्व में आने के  के कारण के रूप में  व्याखायित किया गया है। जिस भूभाग में कौरडेड वेयर या  बैटल ऐक्स संस्कृति का विस्तार हुआ, भौगोलिक रूप से उसी की कोख से पश्चिमी या यूरोपीय  भाषा-शाखाओं, जर्मन, बाल्टिक, स्लावी, सेल्टिक और इटालिक भाषाओं का जन्म हुआ (विन १९९५:३४३, ३४९-३५०)।“

कौरडेड वेयर संस्कृति  की उत्पति के बीज दक्षिण रूस के मैदानी भाग में कुरगन संस्कृति से पूरब की ओर, कौकेसस के उत्तर और यूराल के दक्षिण में भी मिले हैं। और बहुत हाल के शोधों में तो कुरगन संस्कृति की प्राचीनतम जड़ों के अवशेष मध्य एशिया में भी पाए गए हैं।

जहाँ तक पुरातात्विक सबूतों की बात है तो उनसे एशिया, ग्रीस और अनाटोलिया में भारोपीय तत्वों की उपस्थिति की बात बिलकुल नहीं बन पाती, लेकिन यूरोपीय शाखाओं के वहाँ होने की बात का ख़ुलासा ज़रूर मिलता है। फिर वहीं से उन यूरोपीय शाखाओं के पूर्वी यूरोप होते हुए यूरोप के उत्तरी और पश्चिमी भाग तक पहुँच जाने की बात सही बैठ जाती है।


Friday, 16 October 2020

वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध ------ (१०)

(भाग - ९ से आगे)


ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य - ( छ  )

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)




अन्य भारोपीय शाखाओं के अपनी जगह छोड़ने का इतिहास 

जैसा कि भाषायी आँकडें यह दिखाते हैं क़ि अपनी मूल मातृभूमि में भारोपीय-भाषी बोलियाँ बोलने वाले समूहों में से ही एक भारतीय आर्य भी थे। इस तरह की अलग-अलग बोलियाँ बोलने वाले अन्य समूह भी ३००० वर्ष ईसा पूर्व निवास करते थे और आज का ज्ञान यह बतलाता है कि  इस भारोपीय भाषा परिवार में अलग-अलग ११ शाखाएँ विकसित  हो गयी थीं।

पौराणिक इतिहास से यह भी पता चलता है कि  उस समय उस क्षेत्र में निवास करने वाली भारतीय-आर्यों की अनेक जनजातियों में से एक थी – ‘पुरु’ जनजाति। ऋग्वेद के मंडलों में उनकी पहचान पुरुओं  के एक ख़ास वंश की उपजाति  ‘भरत-पुरु’ के रूप में है। ये ‘भरत-पुरु’ ईसा से ३००० साल पहले पश्चिमोत्तर उत्तर-प्रदेश और हरियाणा के मूल निवासी थे। उनके आस-पास रहने वाली अन्य जन-जातियाँ भी थीं। इस आशय की तार्किक परिणति  तो इसी बात में होती है कि ईसा से ३००० साल पहले अपने हरियाणा और उत्तर-पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मातृभूमि में पुरु जनजाति रहती थी और इनके परित: अन्य बोलियाँ बोलने वाली जो जनजातियाँ निवास करती थीं, उनकी ही बोलियों ने भारोपीय भाषा- परिवार की अन्य शाखाओं को जन्म दिया।

अगर उत्तर भारत को  भारोपीय लोगों का मूल-स्थान मान  लिया जाय, तो इर्द-गिर्द रहने वाली जनजातियों के अपनी जगह से खिसककर अगर किसी दिशा की ओर  बढ़ने की संभावना जाती है तो वह दिशा है – ‘पुरुओं’ के पश्चिम की ओर । ऐसा इसलिए भी सही है कि भारोपीय भाषाओं की शाखाओं की  बहुलता भारत के सुदूर पश्चिम में ही पायी जाती है।  और सबसे अधिक यदि कोई सम्भावना जगती है तो इन ‘अणु’ और  ‘दृहयु’ जनजातियों पर जाकर आँखें टिकती हैं। आइए इस तथ्य की जाँच करें:

दोनों जनजातियों की भौगोलिक स्थिति 

पौराणिक आख्यानों के आधार पर ‘अणु’ जनजाति मूलतः ‘पुरुओं’ के उत्तर में आज के कश्मीर से ठीक पश्चिम या इसके आस-पास के क्षेत्रों में रहती थीं और ‘दृहयु’ जनजाति ‘पुरुओं’ के पश्चिम वृहत पंजाब के क्षेत्र में रहती थी। यहीं क्षेत्र  आज का उत्तरी पाकिस्तान है। ऋग्वेद से भी थोड़ा पहले के समय में कुछ ऐसी पौराणिक घटनाओं का पता चलता है जिसके कारण इन दोनों जनजातियों के रिहायशी इलाक़ों में थोड़े फेर-बदल की आहट मिलती है। ‘दृहयु’ अपने विजय अभियान में पूरब और दक्षिण  की ओर बढ़ने लगे और इस क्रम में उनकी अन्य जनजातियों से अनेक  मुठभेड़ें हुई। इसका नतीजा यह निकला कि  सब विरोधी जनजातियाँ एकजुट होकर उनसे टक्कर लेने लगी और उन्हें  खदेड़ते-खदेड़ते पूरब से ही वापस कौन कहे, बल्कि अपनी मूल भूमि से भी दूर और पश्चिम  में अर्थात आज के पाकिस्तान में उन्हें फेंक दिया। इस भाग में ‘अणु’ जनजाति  की एक बड़ी शाखा रहती थी जो अब पश्चिम और दक्षिण दिशा की ओर खिसक गयी। “उसिनर के नेतृत्व में एक शाखा ने पंजाब की पूर्वी सीमा  के क्षेत्र तक कई साम्राज्यों की नींव डाल दी। उसके लोकप्रिय पुत्र ‘शिवि’  ने शिवपुर में शिवि साम्राज्य की स्थापना की। इसे ही ऋग्वेद के सातवें मंडल के १८/(७)  में ‘शिव’  कहा गया है। पश्चिम की ओर शिवि के साम्राज्य विस्तार का अभियान चालू रहा और उत्तर-पश्चिमी कोने को छोड़कर उसने क़रीब-क़रीब समूचा पंजाब जीत लिया और इस राज्य का नाम ‘गांधार’ रखा ।“ (पार्जिटर १९६२-२६२)

इस तरह से ‘अणु’ अब दो स्थानों में बस गये – पहला उत्तर  की ओर कश्मीर और कश्मीर के पश्चिमी क्षेत्र में, तथा दूसरे ‘पुरु’ के पश्चिम  अर्थात आज के उत्तरी पाकिस्तान के क्षेत्र में।

दूसरी तरफ़,  अपने मूल स्थान में कुछ बचे-खुचे अवशेषों को छोड़कर बाक़ी सारे ‘दृहयु’ पश्चिम और उत्तर-पश्चिम की ओर ठेल दिए  गए, जो कि पंजाब का पश्चिमोत्तर कोना और आज का अफ़ग़ानिस्तान है।

अप्रवासी शाखाओं का भाषायी वर्गीकरण 

    अपनी मूल भूमि (जहाँ कहीं भी हो) से हटने के कालक्रम के अनुसार बारहों भारोपीय शाखाओं की  भाषिक विशिष्टताओं के  विश्लेषण करने के उपरांत उन्हें लगभग तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है।

१ – शुरू की शाखाएँ, अनाटोलियन (हिटायट/हित्ती) शाखा और टोकारियन शाखा।

२ – यूरोपीय शाखाएँ, इटालिक, सेल्टिक, जर्मन, बाल्टिक और स्लावी शाखाएँ।

३ – अंतिम शाखाएँ, अल्बानी, ग्रीक, अर्मेनियायी, ईरानी और भारतीय-आर्य। इनके अपनी मातृभूमि से बाहर निकलने का कालक्रम बिल्कुल स्पष्ट नहीं है, इसलिए इन्हें अपने उन स्थानों के पश्चिम से पूरब की ओर के क्रम में यहाँ रखा गया है जहाँ के इतिहास की ये शाखाएँ सांस्कृतिक पहचान हैं। 

भाषा के आधार पर विश्लेषण किए जाने के मुख्य आधार बिंदु निम्नलिखित हैं : 

अ  – अनाटोलियन शाखा की अपनी मातृभूमि से शुरू में ही विदायी हो जाने के बाद वहाँ बची बाक़ी शाखाओं में कुछ ऐसी साझी भाषिक लक्षणों का उदय हुआ जिससे अनाटोलियन शाखा वंचित रह गयी । ये भाषिक लक्षण इस प्रकार हैं :

क़ – ‘आ’, ‘ई’ और ‘ऊ’ से अंत होने वाले शब्दों में स्त्रीलिंग का भाव। (गमक्रेलिज १९९५:३५)

ख – ‘ओईस’ से अंत होने वाले बहुवचन पुल्लिंग  कर्ता। (गमक्रेलिज १९९५:३४५) 

ग – स्थिति को दर्शाने वाले संकेतवाचक निश्चयात्मक सर्वनाम में *सो, *सा, तो (बहुवचन थो) (गमक्रेलिज १९९५:३४५)

आ – शुरू की और अंत की शाखाओं में वृहत पैमाने पर कोई साझे भाषायी लक्षण नहीं दिखते हैं। केवल ऊपर वर्णित लक्षण ही टोकारियन और अन्य  सभी ग़ैर-अनाटोलियन भाषायी शाखाओं में पाए जाते हैं। इससे यह पता चलता है कि अपने मूल स्थान से निर्वसन के पश्चात  भाषा परिवार की इन प्रारम्भिक और अंतिम शाखाओं  में आपसी मेल-मिलाप नहीं के ही बराबर रहा।

इ – प्रारम्भिक  भाषा-शाखा (अनाटोलियन और टोकारियन) के निकल जाने के बाद बची यूरोपीय और अंतिम शाखाओं में अपनी मातृभूमि में गहरा मेल-मिलाप रहा। इसी कारण इन दोनों शाखाओं के भाषायी लक्षणों में काफ़ी साझेदारी दिखती है।

१ - *ओई, *म्वॉ में मध्य। जर्मन-बाल्टिक-स्लावी, अल्बानी- ग्रीक-अर्मेनियायी-ईरानी-भारतीय आर्य। (गमक्रेलिज १९९५:३४५)

२ - *त्तर  और *इष्ट  में विशेषणों की तुलना। जर्मन, ग्रीक-ईरानी-भारतीय आर्य। (गमक्रेलिज १९९५:३४५) 

३ – संकेतवाचक एकवचन पूलिंग *ओ। जर्मन-बाल्टिक, ईरानी-भारतीय आर्य। (गमक्रेलिज १९९५:३४५) 

४ – सीटी-सी ध्वनिकारी तालव्य शब्द। बाल्टिक-स्लावी, अर्मेनियायी-ईरानी-भारतीय आर्य। (हॉक १९९९ a :१४- १५)

५ – ‘स’ और ‘श’ की ध्वनियों का ‘रुकी का नियम’। बाल्टिक-स्लावी, अर्मेनियायी-ईरानी-भारतीय आर्य। (हॉक   १९९९ a :१४-१५)

६ – कंठ के पास नरम तालु  और होठ से निकलने वाली ध्वनियों का मिश्रण। बाल्टिक-स्लावी, अर्मेनियायी-ईरानी-भारतीय आर्य। (हॉक १९९९ a :१४-१५)

७ – स्थानिक विभक्ति (उदाहरणार्थ संस्कृत में सप्तमी विभक्ति) *सु/षु  बाल्टिक-स्लावी, गीक-ईरानी-भारतीय आर्य। (गमक्रेलिज १९९५:३४५)

८ – संबंधवाचक सर्वनाम *योस। स्लावी, ग्रीक-अर्मेनियायी-ईरानी-भारतीय आर्य। (गमक्रेलिज १९९५:३४५)

९ – संबंध-अधिकरण  द्वैत *ओस। स्लावी, भारतीय आर्य। (गमक्रेलिज १९९५:३४५)।

१० – उत्तम पुरुष एकवचन सर्वनाम: कर्ता, संबंध और कर्म कारक। स्लावी,ईरानी-भारतीय आर्य। (गमक्रेलिज १९९५:३४५)

ई  – कुछ भाषायी लक्षण यूरोपीय शाखा और शुरू की दो सदस्यों वाली शाखाओं में समान रूप से विद्यमान हैं:

संबंधवाचक सर्वनाम *खोईस। अनाटोलियन-टोकारियन, इटालिक-सेल्टिक। (गमक्रेलिज १९९५:३४५)

संबंधवाचक एकवचन *इ। टोकारियन, इटालिक-सेल्टिक। (गमक्रेलिज १९९५:३४५)

संयोजक *अ, *ए। टोकरियाँ, इटालिक-सेल्टिक। (गमक्रेलिज १९९५:३४५) 

कर्मवाच्य मध्यक *र। अनाटोलियन-टोकरियाँ, इटालिक-सेल्टिक। (गमक्रेलिज १९९५:३४५) 

अपूर्ण काल *मो। अनाटोलियन बाल्टिक-स्लावी। (गमक्रेलिज १९९५:३४५) 

रूपात्मक भाव या क्रिया भाव द्योतक  *ल। अनाटोलियन-टोकारियन। (गमक्रेलिज १९९५:३४५)  

उ  – कुछ ऐसे भाषिक लक्षण हैं जो यूरोपीय शाखायें बाद की शाखाओं के साथ तो साझा करती हैं लेकिन भारतीय आर्य भाषाओं से यहाँ वह दूरी बनाए हुए हैं।

१ – मूल प्रोटो-भारोपिय का ‘त्त’ बाल्टिक-स्लावी और ग्रीक-अल्बानी=ईरानी में बदलकर ‘स्स’ हो गया है। (भारतीय आर्य शाखा का यही ‘त्त’ अनाटोलियन में ‘त्स्त’ फिर इटालिक-सेल्टिक-जर्मन में त्स’ हो गया।) 

२ – अल्पप्राण और महाप्राण व्यंजनों के उच्चारण। जर्मन-बाल्टिक-स्लावी। (लुबोत्सकी २००१:३०२)

ऊ – शुरू की शाखाओं और यूरोपीय शाखाओं के अपने मूल स्थान से प्रस्थान कर जाने के बाद अंतिम शाखाओं के आपसी मेलजोल और पारस्परिक प्रभावों ने उनके भाषिक लक्षणों और विशेषताओं में बड़े आमूल-चूल प्रभाव और  प्रमुख परिवर्तन देखे।

१ – विरासत में मिली  ‘क्रियापदों’ की संरचना स्वरों के  गण, वृद्धि या पुनरुक्ति के कारण पूरी तरह से बदल गयी। ग्रीक, अल्बानी, अर्मेनियायी, ईरानी, भारतीय आर्य। (गमक्रेलिज १९९५: ३४०-३४१, ३४५)

२ – कर्म कारक ‘-भि-‘। अल्बानी, ग्रीक, अर्मेनियायी, ईरानी, भारतीय आर्य। (गमक्रेलिज १९९५: ३४०-३४१, ३४५)

३ – नकारात्मक या निषेधात्मक क्रियापद *मे । अल्बानी, ग्रीक, अर्मेनियायी, ईरानी, भारतीय आर्य। (मिलेट १९०८/१९६७:३९)

ओ – अंतिम शाखाओं की भाषाओं में से कुछ ने स्वरों के उच्चारण संबंधी कतिपय भाषिक लक्षण विकसित कर लिए जो भारतीय आर्य भाषाओं में अनुपस्थित रहे। जैसे स्वर  के पहले आनेवाले ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ हो जाना। ग्रीक-अर्मेनियायी-ईरानी। (मिलेट १९०८/१९६७:११३)

इतिहास में दर्ज प्रवास 

‘अणु’ और ‘दृहयु’ जनजातियों का अपना मूल स्थान छोड़कर दूसरे जगह पर बस जाने की घटना इतिहास में  अप्रवासन के दृष्टांत के रूप में दर्ज  है। पुराणों में वर्णित पाँच ‘ऐला’ जनजातियों के निवास-स्थान के आधार पर, ‘दृहयु’  जातियों का मूल स्थान ‘पुरुओं’ के पश्चिम वृहत पंजाब के क्षेत्र में था,  जो सप्त-सिंधु प्रदेश का आज का उत्तरी पाकिस्तान है। बाद में जब ‘अणुओं’ ने उन्हें वहाँ से ठेल दिया तो ऋग्वेद की रचना से पहले ही ‘दृहयु’  खिसक कर और पश्चिम की तरफ़ अफ़ग़ानिस्तान में घुस गए जिसे गांधार देश कहा जाता था। (परजाइटर १९६२:२६२)।

बाद में वे और भी आगे उत्तर की ओर खिसकते-खिसकते मध्य एशिया के और भीतर तक घुस गए। “भारतीय परम्पराओं में भी इस बात के स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि दृहयु लोग ऐला जनजातीय क्षेत्रों से  उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर निकलकर काफ़ी दूर के देशों में चले गए, जहाँ उन्होंने कई साम्राज्यों को बसाया। (परजाइटर १९६२:२९८)।

पाँच पुराण इस गाथा से गुंजित हैं कि प्रचेता के वंशज उत्तर की ओर भारत से बाहर म्लेच्छों के देश तक फैल गए थे और वहाँ पर  उन्होंने  अपने साम्राज्य स्थापित कर लिए। (भार्गव १९५६/१९७१:९९)

कुछ समय बाद, जनसंख्या के दवाब के काफ़ी बढ़ जाने से दृहयु जाति के लोग भारत की सीमा के पार उत्तर में म्लेच्छों के क्षेत्र में घुस गए थे और वहाँ अपनी ढेर सारी प्रशासनिक इकाइयाँ स्थापित कर ली थीं। इस तरह अपनी आर्य-संस्कृति को भी वे अपने साथ अपनी सीमाओं से बाहर जाकर रख आए थे। (मजूमदार १९५१/१९९६:२८३)

पौराणिक ठिकानों के अनुसार ‘अणु’ कश्मीर के उत्तर और पश्चिम के इलाक़ों के मूल निवासी थे। ऋग्वेद की रचना से पहले उसिनर के नेतृत्व में उनकी एक शाखा ने पंजाब की पूर्वी सीमाओं पर अपना साम्राज्य बसा लिया था। अनंतर, जब तक ऋग्वेद के सबसे पुराने मंडलों (६, ३ और ७) की रचना पूरी हुई, उनका विजय-अभियान पश्चिम की ओर बढ़ते-बढ़ते समूचे पंजाब को पार कर इसकी उत्तरी-पश्चिमी सीमा को छू गया। (परजाइटर १९६२:२६४)

प्राचीनतम मंडलों के रचे जाने के समय, भरत-पुरु राजा सुदास और उसकी संततियों  की विस्तारवादी हरकतों ने  ‘अणु’ जाति के अधिकांश को पश्चिम की ओर धकेल दिया था। दसराज्ञ युद्ध में ‘भरत’ लोगों ने ‘अणुओं’ को लगभग बेदख़ल कर दिया। हम पहले भी देख चुके हैं हैं कि उनका (अणुओं का) वर्णन [७/{१८/(१३)}] ऐसे पराजित लोगों के रूप में किया गया है जो अपना सबकुछ छोड़कर पश्चिम दिशा [७/[६/(३)}] में भागे और  परदेश [७/{५/(३)}] में जाकर बिखर गए।

साफ़ तौर पर दो महत्वपूर्ण अप्रवासन नज़र में आते हैं। पहला, उत्तर की तरफ़,  मध्य एशिया में थोड़ा अंदर  पश्चिम की ओर बढ़कर, ‘दृहयु’ जाति  के लोगों का जाकर बस जाना और दूसरे, पश्चिम दिशा में अफ़ग़ानिस्तान के अंदर  कुछ और पश्चिम में घुसकर, ‘अणु’ जाति के लोगों का जाकर बस जाना।

यह भारोपीय शाखाओं के दो वर्गों की पहचान करता है। पहला तो पुरानी शाखाओं के साथ मिलकर एक संगठित जातीय समुदाय वाली यूरोपीय शाखा द्वारा  बनायी गयी भारोपीय भाषाओं की उत्तरी पट्टी। और दूसरे, अंतिम शाखाओं द्वारा निर्मित दक्षिणी पट्टी।

इसलिए, दृहयु की पहचान कम-से-कम यूरोपीय शाखाओं के साथ होती है ( नामकरण से संभव हो कि शुरू की शाखाएँ भी उनमें शामिल हों)। और अणु की पहचान अंतिम शाखाओं के साथ होती है, जिनमें पुरु भारतीय आर्य शामिल नहीं हैं।

ऋग्वेद के ग्रंथ और उसकी भाषा से निकले साक्ष्य 

प्रचलित सिद्धांत के अनुसार मूलस्थान को दक्षिण रूस में बताते हैं। क्रमशः अनाटोलियन शाखा को सबसे पहले  दक्षिण दिशा में, फिर टोकारियन शाखा को पूरब दिशा में और यूरोपीय शाखाओं को पश्चिम दिशा में विस्थापित हुआ मानते हैं। बहुत बाद में  अल्बानी और ग्रीक शाखाएँ दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर, अर्मेनियायी शाखा दक्षिण दिशा की ओर और ईरानी तथा भारतीय-आर्य शाखाएँ पूरब की ओर चल पड़ीं।

भारत में इनके मूल-स्थान होने के सिद्धांतकारों  का यह मानना है कि  जहाँ तक अनाटोलियन और टोकारियन शाखाओं के अप्रवासन का संबंध है तो वे अफ़ग़ानिस्तान से निकलकर उत्तर की ओर मध्य एशिया के क्रमशः पश्चिमी और पूर्वी भागों की ओर बढ़ गयीं। बाद में  उसी क्रम में इटालिक, सेल्टिक, जर्मन, बाल्टिक और स्लावी शाखाओं ने मध्य एशिया में अपने पैर फैला दिए। पहली दो शाखाओं का वजूद  मध्य एशिया में काफ़ी दिनों तक बना रहा।  टोकारियन भाषा तो अपने लुप्त होने तक वहीं बनी रही। अनाटोलियन शाखा भी बहुत बाद में वहाँ से पश्चिम की ओर खिसककर कजकिस्तान के रास्ते दक्षिण दिशा में कैस्पियन सागर के आस-पास अनाटोलियो (तुर्की) में समा गयी। यूरोपीय शाखाएँ उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़कर अंततः यूरोप में प्रवेश कर गयीं।

अल्बानी, ग्रीक, अर्मेनियायी और ईरानी शाखाएँ अफगनिस्तान से पश्चिम की ओर बढ़ चलीं। इस विस्थापन में ईरानी शाखा तो पहले  पिछड़कर अफ़ग़ानिस्तान में ही छूटी रही, लेकिन बाद में यह भी उत्तर की ओर चलकर मध्य एशिया में पसर  गयी। भारतीय आर्य शाखा अपने मूल-स्थान से लेकर अफगानिस्तान  के पूरब तक बनी रही। भारत के मूल-भूमि होने के  सिद्धांत से संबंधित जो साक्ष्य पुरातन ग्रंथों में मिलते हैं उनसे रूस की मूल-भूमि वाली अवधारणा पर न केवल ग्रहण लग जाता है, बल्कि उनका वजूद एक कपोल-कल्पित कल्पना से ज़्यादा कुछ नहीं बचता। और तो और, भाषिक लक्षणों के आधार पर हुई विवेचनाएँ भी इस बात को बल देती हैं कि  भारतीय मूल-स्थान की बात इन विवेचनाओं के ढाँचे में जहाँ एक ओर बिल्कुल फ़िट बैठती  है वहीं दूसरी ओर दक्षिणी रूस वाली बात बिल्कुल असंगत। जैसे कि :

१ – भारतीय मूल-स्थान की अवधारणा इस विवेचना में खरी उतरती है कि  सभी शाखाओं की यात्रा की दिशा एक ही तरफ़ रही। दूसरी ओर, दक्षिण रूस की अवधारणा में सारी शाखाएँ सारी दिशाओं में बिखर जाती हैं।

२ – यह बात भी उतनी ही तार्किक है कि मूल-स्थान तो वहीं रहा होगा जहाँ अंतिम पाँच  में से एक शाखा  बाक़ी चार के वहाँ से प्रस्थान कर जाने के बाद भी वहीं बची रही होगी। इस  बात की भारतीय मूल-स्थान की अवधारणा के साथ पूरी तरह से संगति  बैठती है। दूसरी ओर दक्षिण रूस के मूल स्थान वाली अवधारणा में सारी की सारी शाखाएँ वहाँ से प्रस्थान करती पायी जाती हैं। 

३ – अपने मूल स्थान से निकलने वाली शाखाओं में से सबसे पहली शाखा अनाटोलियन शाखा थी। बाक़ी अन्य शाखाएँ एक समूह के रूप में एक साथ किंतु अलग-अलग अनाटोलियन और सम्भवतः टोकारियन शाखा से भी निकलीं। एक और दिलचस्प बात हमें इन शाखाओं के आपसी भाषिक लक्षणों का अध्ययन करने पर  पता चलती  है। सबसे पुरानी और यूरोपीय भाषा-शाखाओं के भाषिक  लक्षणों में हमें कई जगह समानता के तत्व मिलते हैं। वैसे ही, यूरोपीय और परवर्ती अंतिम शाखाओं के बीच भी ऐसे दृष्टांत मिलते हैं। लेकिन सबसे पुरानी और सबसे बाद की शाखाओं के भाषायी लक्षणों में ऐसी समानता के कोई तत्व नहीं पाए  जाते। रूसी मूल-भूमि की अवधारणा में अनाटोलियन शाखा दक्षिण की ओर, टोकारियन पूरब की और यूरोपीयन शाखा पश्चिम की ओर निकलती हैं। आगे चलकर अल्बानी  और ग्रीक दक्षिण-पश्चिम, अर्मेनियायी दक्षिण और ईरानी तथा भारतीय-आर्य शाखाएँ पूरब की ओर निकल गयीं। भिन्न-भिन्न दिशाओं में पसरने वाली इन शाखाओं के परस्पर भाषिक लक्षणात्मक समानता या असमानता   के संबंध में कोई भी प्रामाणिक व्याख्या न तो मौजूद है और न ही जुट पाती  है। अब देखें कि :

अ – भाषिक लक्षणों के मामले में क्रमशः दक्षिण और पूरब की ओर जानेवाली पहले की शाखायें पश्चिम की ओर जानेवाली यूरोपीय भाषाओं के संग कतिपय  महत्वपूर्ण  समानताओं के तत्व स्थापित कर लेती हैं।

आ – पश्चिम दिशा की ओर विस्थापित होने वाली यूरोपीय शाखा ने भाषिक लक्षणों में अपनी समानता दक्षिण-पूर्व, दक्षिण और पूरब दिशा की ओर बढ़ने वाली बाद की शाखाओं के साथ कर ली है।

इ – लेकिन यदि आप दक्षिण और पूरब की ओर निकली पहले की शाखाओं के भाषिक लक्षणों की तुलना यदि दक्षिण-पूर्व, दक्षिण और पूरब की ओर जाने वाली बाद की शाखाओं से करें तो समानता के ऐसे कोई तत्व दोनों में नहीं मिलते  हैं।

अब यदि एक नज़र हम भारतीय मूल-स्थान वाले सिद्धांत पर डाल कर देखें तो वहाँ इस प्रकार की कोई विसंगति नहीं दिखायी देती और भाषायी लक्षणों में परस्पर समानता या असमानता के इन तत्वों की बड़ी सरल व्याख्या भी मिल जाती है। वहाँ शुरू की शाखाएँ अफ़ग़ानिस्तान की उत्तर दिशा की ओर बढ़कर मध्य एशिया में जम गयीं। बाद की शाखाएँ अपने उद्भव काल में कभी उत्तर की ओर बढ़ी ही नहीं। इसका परिणाम यह हुआ कि  उनकी संगति उत्तर में  शुरू की शाखाओं से कभी बैठ ही नहीं पायी। दूसरी तरफ़ यूरोपीय शाखाएँ लम्बे समय तक अफ़ग़ानिस्तान में थमी रहीं। इसका परिणाम यह हुआ कि  इस अति दीर्घ कालमें भाषा के उद्भव और विकास यात्रा में इसने बाद की शाखाओं वाली भाषा के साथ ढेर सारे लाक्षणिक तत्वों की साझेदारी कर लीं। अनंतर,  जब यूरोपीय शाखाएँ अफ़ग़ानिस्तान को छोड़कर उत्तर दिशा में मध्य एशिया की ओर बढ़ीं तथा आगे भी मध्य एशिया से पश्चिमोत्तर बढ़कर यूरोप में घुस गयीं, तो इस क्रम में उन्होंने पहले से मध्य एशिया में जमी पहले की शाखाओं के भी अनेक भाषिक लक्षण समेट लिए। 

४ – रूसी मूल-स्थान सिद्धांत में ‘भारतीय-आर्य’ और ‘ईरानी’ शाखाओं को एक साथ ‘भारतीय-ईरानी’ शाखा के रूप में लिया गया है। इसे दक्षिण रूस से पूरब की ओर चलता माना गया है। यह शाखा अन्य शाखाओं से काफ़ी अलग है। फिर भी जहाँ तक अकेले में ईरानी शाखा का सवाल है इसके कुछ  भाषिक लक्षण बाद की शाखाओं से और कुछ लक्षण तो संयुक्त रूप से बाद वाली और यूरोपीय दोनों ही शाखाओं से मिलती है। भारतीय-आर्य शाखा के साथ ऐसी कोई बात नहीं है।   अब इसके कारणों का कोई जवाब ‘रूसी मूल-स्थान’ सिद्धांत में नहीं मिल पाता है। इसका बड़ा सीधा जवाब ‘भारतीय मूल-स्थान’ सिद्धांत में मिल जाता है कि ईरानी शाखाओं की उपरोक्त समानता वाले तत्व उसे अफ़ग़ानिस्तान के पश्चिम प्रवास काल में मिले जो भारतीय आर्य शाखा को वहाँ नहीं जाने के कारण नसीब नहीं हो सका। भारतीय आर्य शाखा पूरब में ही पड़ी रही। अतः हिमाच्छादित पर्वतीय प्रदेश के कुछ ‘पश्चिमोत्तर अफ़ग़ानी’ शब्दों की उपस्थिति समान रूप से यूरोपीय शाखाओं और ईरानी अवेस्ता और ओस्सेटिक  में तो पायी जाती हैं, लेकिन भारतीय आर्य शाखाओं में ये अनिवार्य रूप से अनुपस्थित हैं। 

अवेस्ता – ऐक्षा – (शीत तुषार, फ़्रॉस्ट आइस) – स्लावी, बाल्टिक और  जर्मन भाषाओं से सजातीय।

ओस्सेटिक – ताज्यं – (पिघलना, थव, मेल्ट) – स्लावी, जर्मन, सेल्टिक, इटालिक, ग्रीक तथा अर्मेनियायी भाषा में सजातीय क्रिया शब्द।

अवेस्ता – उद्र – ( ऊद, ऑटर) – स्लावी, बाल्टिक और जर्मन से सजातीय।

अवेस्ता – बावरा/बावरी – (ऊद बिलाव, बेवर) – स्लावी, बाल्टिक, जर्मन, सेल्टिक और इटालिक से सजातीय।

ओस्सेटिक – व्य्ज़्य्न – (काँटेदार जंगली चूहा, हेज़हॉग) – स्लावी, बाल्टिक, जर्मन, ग्रीक और अर्मेनियायी से सजातीय।

ओस्सेटिक – लेसेग़ – (सालमन, मछली का एक प्रकार) – स्लावी, बाल्टिक, जर्मन और अर्मेनियायी से सजातीय।

अवेस्ता – थ्बेरेस – (सूअर, बोअर) – सेल्टिक से सजातीय।

अवेस्ता - पेरेसा – (सूअर का बच्चा, पिगलेट) -स्लावी, बालटक, जर्मन, सेल्टिक और इटालिक से सजातीय।

अवेस्ता – स्ताओरा – (बैल, स्टियर) – जर्मन से सजातीय।

ईरानी – वब्ज़ – (हड्डा, वास्प) – स्लावी, बाल्टिक, जर्मन, सेल्टिक और इटालिक से सजातीय।

ऊपर वर्णित मूलभूत तत्वों से अलग हटकर भी ऐसे तमाम भाषिक और शाब्दिक सबूतों की भरमार है जो इन तीनों समूहों के भारत भूमि से दूर चले  जाने की पुष्टि करते हैं।