Friday, 23 August 2019

गांधी को महात्मा बना दिया

सींच रैयत जब धरा रक्त से
बीज नील का बोता था।
तिनकठिया के ताल तिकड़म में
तार-तार तन धोता था।

आब-आबरू और इज़्ज़त की,
पाई-पाई चूक जाती थी।
ज़िल्लत भी ज़ालिम के ज़ुल्मों ,
शर्मशार झुक जाती थी।

बैठ बेगारी, बपही पुतही,
आबवाब गड़ जाता था।
चम्पारण के गंडक का,
पानी नीला पड़ जाता था।

तब बाँध कफ़न सर पर अपने,
पय-पान किया था हलाहल का।
माटी थी सतावरिया की,
और राजकुमार कोलाहल का।

कृषकों की करुणा-गाथा गा,
लखनऊ को लजवा-रुला दिया।
गांधी की काया-छाया बन,
अपना सब कुछ भुला दिया।

काठियावाड़ की काठी सुलगा,
चम्पारण में झोंक दिया।
निलहों के ताबूत पर साबुत
कील आखिरी ठोक दिया।

'सच सत्याग्रह का' सपना-सा,
भारत-भर ने अपना लिया।
राजकुमार न राजा बन सका,
गांधी को महात्मा बना दिया।

(शब्द-परिचय:-
राजकुमार - पंडित राजकुमार शुक्ल (१८७५-१९२९)
कोलाहल - श्री कोलाहल शुक्ल, राजकुमार शुक्ल के पिता
चम्पारण सत्याग्रह की नींव रखने वाले राजकुमार शुक्ल गांधी को
चम्पारण बुलाकर लाये और सबसे पहले सार्वजनिक तौर पर उन्हें 'महात्मा' संबोधित कर जनता द्वारा 'महात्मा गांधी की जय' के नारों से चम्पारण के गगन को गुंजित किया। आगे चल के महात्मा गांधी ही प्रचलित नाम बन गया।
तिनकठिया - एक व्यवस्था जिसमें किसानों को एक बीघे अर्थात बीस कट्ठे में से तीन कट्ठे में नील की खेती के लिए मजबूर होना।
आबवाब - जहांगीर के समय से वसूली जाने वाली मालगुजारी जो अंग्रेजो के समय में चम्पारण में पचास से अधिक टैक्सों में तब्दील हो गयी। जैसे:-
बैठबेगारी - टैक्स के रूप में किसानों से अंग्रेज ज़मींदारों द्वारा अपने खेत मे बेगार, बिना कोई पारिश्रमिक दिए, खटवाना,
बपही - बाप के मरने पर चूंकि बेटा घर का मालिक बन जाता थ, इसलिए अंग्रेजो को बपही टैक्स देना होता था।
पुतही- पुत्र के जन्म लेने पर अंग्रेज बाप से पुतही टैक्स लेते थे।
फगुआहि- होली में किसानों से वसूला जाने वाले टैक्स)




Tuesday, 30 July 2019

सिऊंठे

मां!
कैसी समंदर हो तुम!
तुम्हारी कोख के ही केकड़े
नोच-नोच खा रहे है
तुम्हारी ही मछलियां।
काट डालो न
कोख में ही
इनके सिऊंठे!
जनने से पहले
इनको।
या फिर मत बनो
मां!




सिऊंठा - केंकड़े के दो निकले चिमटा नुमे दांत जिससे वह काटता या पकड़ता है, भोजपुरी, मैथिली, वज्जिका, अंगिका और मगही भाषा मे उसे सिऊंठा कहते हैं।

Thursday, 25 July 2019

कारगिल की यहीं कहानी।

सिंधु की धारा में धुलता
'गरकौन' के गांव में।
था पलता एक नया 'याक'
उस चरवाहे की ठाँव में।

पलता ख्वाबों में अहर्निश,
 उस चौपाये का ख्याल था।
सर्व समर्पित करने वाला,
वह 'ताशी नामोग्याल' था।

सुबह का निकला नित्य 'याक',
संध्या घर वापस आ जाता।
बुद्ध-शिष्य 'ताशी' तब उस पर,
करुणा बन कर छा जाता।

एक दिन 'याक' की पथ-दृष्टि,
पर्वत की खोह में भटक गयी।
इधर आया  न देख  शाम को,
'तासी' की सांसें अटक गई।

खोज 'याक' ही दम लेगा वह,
मन ही मन यह ठान गया।
खोह-खोह कंदर प्रस्तर का,
पर्वत मालाएं छान गया।

हिमालय के हिम-गह्वर में,
ताका कोना-कोना 'ताशी'।
दिख गए उसको घात लगाए,
छुपे बैठे कुछ परवासी।

पाक नाम नापाक मुल्क से,
घुसपैठी ये आये थे।
भारत माँ की मर्यादा में,
सेंध मारने आये थे।

सिंधु-सपूत 'ताशी' ने भी अब,
 'याक' को अपने भुला दिया।
लेने लोहा इन छलियों से,
अपनी सेना को बुला लिया।

वीर-बांकुड़े भारत माँ के,
 का-पुरुषों पर कूद पड़े।
पट गयी धरती लाशों से,
थे बिखरे ज़ुल्मी मरे गड़े।

स्वयं काली ने खप्पर लेकर,
चामुंडा संग हुंकार किया।
रक्तबीजों को चाट चाटकर,
पाकिस्तान संहार किया।

'द्रास', 'बटालिक' बेंधा हमने
'तोलोलिंग' का पता लिया।
मारुत-नंदन 'नचिकेता' ने
यम का परिचय बता दिया।

पाकिस्तान को घेर-घेर कर,
जब जी भर भारत ने छेंका।
होश ठिकाने आये मूढ़ के,
घाट-घाट घुटने टेका।

करे नमन हम वीर-पुत्र को,
और सिंधु का जमजम पानी।
'पगला बाबा' की कुटिया से,
कारगिल की यहीं कहानी।




'पगला बाबा' की कुटिया --  कारगिल के 'बीकन' सैन्य-संगठन क्षेत्र में एक ऊपरी तौर पर मानसिक रूप से अर्द्धविक्षिप्त साधु बाबा अपनी कुटिया बनाकर रहते थे। कहते हैं कि कारगिल युद्ध के समय पाकिस्तान की ओर से दागे गए जो भी गोले उस कुटिया के आस-पास गिरते, वे फट ही नहीं पाते। युद्ध समाप्ति के बाद सेना ने उस क्षेत्र को उन जिंदा गोलों से साफ किया। बाद में बाबा की मृत्यु के बाद सेना ने उनके सम्मान में सुंदर मंदिर बनवाया जहाँ आज भी नित्य नियमित रूप से पूजा-अर्चना होती है।


Friday, 12 July 2019

चाचा की जुबानी : परदादी माँ से सुनी एक कहानी




पिछले दिनों विक्रम सक्सेना का बाल उपन्यास 'चाचा की जुबानी : परदादी माँ से सुनी एक कहानी' अमेज़न पर लोकार्पित हुआ। 137 पृष्ठों के इस उपन्यास को पढ़ने में लगभग सवा तीन घंटे लगते हैं। इस पुस्तक का आमुख मेरे द्वारा लिखा गया।
आमुख
साहित्य के अभाव में समाज हिंसक हो जाता है. भावों में सृजन के बीज का बपन बचपन में ही होता है. जलतल की हलचल उसकी तरंगों में संचरित हो सागर के तीर को छूती है. वैसे ही चतुर्दिक घटित घटनाओं से हिलता डुलता मन संवेदना की नवीन उर्मियों को अनवरत उर के अंतस से उद्भूत करते रहता है. बाह्य बिम्ब और अंतस में उपजे तज्जन्य संवेदना के तंतु बाल मन में सृजन के संगीत की धुन बनाते हैं. उसी धुन में कल्पना के सुर, चेतना का ताल और अभिव्यंजना के साज सजकर नवजीवन के अनुभव का गीत बन जाते हैं. फिर धीरे-धीरे अक्षर और शब्दों के संसार से साक्षात्कार के साथ ज्ञान का अनुभव से समागम होता है और बाल मन रचनात्मकता के पर पर सवार होकर सत्य के अनंत के अन्वेषण की यात्रा पर निकलने को तत्पर हो जाता है.
आदि-काल से ही श्रुति और स्मृति की सुधा-धारा ने अपनी सरल, सरस और सुबोध शैली में हमारी ज्ञान परम्परा को समृद्ध किया है. माँ की गोद में सुस्ताता और उसके आँचल के स्पर्श से अघाता बालक उसकी लोरियों में अपने मन के तराने सुनते-सुनते सो जाता है. मन को गुदगुदाते इन तरानों में वह अपनी आगामी ज़िन्दगी के हसीन नगमों के राग और जीवन के रस से रास रचाता है. दादी-नानी की कहानियां उसके बाल-मन में कल्पना तत्व का विस्तृत वितान बुनती हैं. इन कहानियों से ही उसका रचनात्मक मन अतीत की गोद में सदियों से संचित बिम्बों, परम्पराओं, मूल्यों और प्रतिमानों के मुक्तक चुनता है. इन्ही मोतियों के हार में गुंथी फंतासी और सपनों की सतरंगी दुनिया उसे कल्पना का एक स्फटिक-फलक प्रस्तुत करती है. प्रसिद्द रसायन-वैज्ञानिक केकुल ने सपने में एक सांप को अपने मुंह में पूंछ दबाये देखा और इस स्वप्न चित्र ने कार्बनिक रसायन की दुनिया को बेंजीन की चक्रीय संरचना दी. कहने का तात्पर्य यह है कि सपनों के सतरंगे कल्पना-लोक की कोख से विचारों की नवीनता, शोध की कुशाग्रता, अनुसंधान की अनुवांशिकता और जिज्ञासा की जिजीविषा का जन्म होता है.
बालकों की कल्पना-शक्ति के उद्भव, विकास और संवर्द्धन में बाल-साहित्य का अप्रतिम योगदान रहा है. पंचतंत्र, रामायण, महाभारत, जातक-कथाएं, दादी-नानी की कहानियों में उड़ने वाली परियों की गाथा, भूत-प्रेत-चुड़ैलों की चटपटी कहानियां, चन्द्रकान्ता जैसी फंतास और तिलस्म के मकड़जाल का वृत्तांत और स्थानीय लोक कथाओं के रंग में रंगी रचनाएँ सर्वदा से बाल मन को कल्पना के कल्पतरु की सुखद छाया की शीतलता से सराबोर कराती रही हैं. किन्तु, दुर्भाग्य से इधर विगत कुछ वर्षों से साहित्य की यह धारा इन्टरनेट और सूचना क्रांति की चिलचिलाती धुप में सुखती जा रही है. न केवल संयुक्त परिवार का विखंडन प्रत्युत, एकल परिवारों में भी भावनात्मक प्रगाढ़ता और संबंधों की संयुक्तता के अभाव ने बालपन को असमय ही कवलित करना शुरू कर दिया है. बालपन की कोमल कल्पनाओं के कोंपल का असमय ही मुरझा जाना नागरिक जीवन में अनेक विकृतियों का कारण बनता जा रहा है. मूल्य सिकुड़ते जा रहे हैं, परम्पराएं तिरोहित हो रही हैं, आत्महीनता के भाव का उदय हो रहा है, मानव व्यक्तित्व अवसाद के गाद में सनता जा रहा है, जीवन की अमराई से कल्पना की कोयल की आह्लादक कूक की मीठास लुप्त होती जा रही है और जीवन निःस्वाद हो चला है.
ऐसे संक्रांति काल में विक्रम सक्सेना का यह बाल-उपन्यास ' चाचा की जुबानी : परदादी माँ से सुनी एक कहानी' शैशव की शुष्क मरुभूमि में मरीचिका के भ्रम में मचलते मृगछौने के लिए शीतल जल के बहते सोते से कम नहीं. उपन्यास का नाम ही इस देश की उस महान संयुक्त-परिवार व्यवस्था का भान कराता है जहाँ परम्परा से प्राप्त परदादी की कहानी को चाचा अपने भतीजे-भतीजी को सुना रहा है. इस नाम से उपन्यास की कथा का वाचन मानों गीता में भगवान कृष्ण के उस भाव को इंगित करता है:
" हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार गुरु-शिष्य परम्परा से प्राप्त इस विज्ञान सहित ज्ञान को राज-ऋषियों ने विधिपूर्वक समझा, किन्तु समय के प्रभाव से वह परम-श्रेष्ठ विज्ञान इस संसार से प्रायः छिन्न-भिन्न होकर नष्ट हो गया. आज मेरे द्वारा वही यह प्राचीन योग तुझसे कहा जा रहा है....."
इस उपन्यास की कथावस्तु में इस तथ्य के योगदान को भी नहीं नकारा जा सकता कि उपन्यासकार, विक्रम, ने बाल-मन की कल्पना-धरा पर वैज्ञानिकता के बीज बोने का अद्भुत पराक्रम दिखाया है. आईआईटी रुड़की से धातु-कर्म अभियांत्रिकी में स्नातक इस कथाकार ने अपनी रचना में सोद्देश्यता के पक्ष का पालन तो किया ही है , साथ-साथ रचना की प्रासंगिकता के तत्व को भी बनाए रखा है जो बड़े आश्चर्यजनक रूप में रचना के अंत में प्रकट होता है. कहानी में जहाँ-तहां लेखक पीछे से छुपकर अजीबो-गरीब घटनाओं के प्रकारांतर से प्रमुख वैज्ञानिक अवधारणाओं और ज्ञानप्रद सूचनाओं की घुट्टी भी डाल देता है. बात-बात में वह सांप के एनाकोंडा प्रजाति की सूचना  देता है. छोटू-मोटू द्वारा तलवार से दो भाग करने के उपरांत कटा पूंछवाला खंड अनेक फनों वाले स्वतंत्र सांप में बदल जाता है. इस घटना द्वारा मानों लेखक अपने बाल-पाठकों को जीव विज्ञान में कोशिका विभाजन 'मिओसिस' और 'माईटोसिस' की सम्मिलित प्रक्रिया का भान करा रहा है. फिर उस तलवार की विशेषता भी जान लीजिये. 'ये कोई साधारण तलवार नहीं है. ये एक विशेष धार वाली तलवार है. इसको गर्म कोयले की आंच पर तपाया हुआ है. अति सूक्ष्म कार्बन के कण इसकी सतह पर हैं.'
सर से आग के गोला के उछालने का एक अन्य प्रसंग भी ध्यातव्य है, 'तब वो प्राणी बोला, मुर्ख! न तो ऊर्जा का नाश हो सकता है और न ऊर्जा उत्पन्न ही हो सकती है. ऊर्जा सिर्फ रूप बदलती है.' कितनी सहजता से ऊर्जा के संरक्षण के सिद्धांत को इस तिलस्मी घटना में पिरो दिया गया है! प्रकाश के परावर्तन के सिद्धांत को ये पंक्तियाँ बखूबी व्याख्यायित कराती हैं, 'आग का गोला दर्पण के सीसे से टकराकर वापस डायनासोर की ओर परावर्तित हो जाता है.' कथा धारा अपने अविरल प्रवाह में किसिम-किसिम के किरदारों के साथ फंतास और तिलस्म के जाल को बुनते और सुलझाते चल रही है. राजा कड़क सिंह द्वारा अपने उचित उत्तराधिकारी चुनने की अग्नि परीक्षा में अपने सभी भाइयों में अपेक्षाकृत सबसे निर्बल छोटू-मोटू उपन्यासकार की तिलस्मी योजना के तीर पर सवार होकर सांप, परी, चुड़ैल, भालू, डायनासोर, कछुआ, हाथी, कौआ, दरियाई घोड़ा और बन्दर सहित अन्य चरित्रों से रूबरू होता रोमांच के कई तालो को लांघता एक जादुई छड़ी के विलक्षण टाइम-सूट पर सवार हो जाता है, जहाँ से अब वह अप्रत्याशित रूप से समय के पीछे की ओर जा सकता है. आज के विज्ञान के लिए भी 'स्पेस-टाइम-स्लाइस' में समय को पीछे की ओर काटना सबसे बड़ी चुनौती है जिसमें प्रवेश कर वह अतीत की यात्रा पर निकल सकता है.
कथा की मजेदार इति-श्री रवि के मस्तिष्क की उन हलचलों के रहस्योद्घाटन से होती है जिसे बीजगणित के अध्याय 'परमुटेशन और कम्बीनेशन' की उलझाऊ समस्यायों ने मचा रखा है. व्यवस्था के संभावित समस्त क्रम और व्यतिक्रम के भ्रम और विभ्रम का जंजाल है यह अध्याय जिसमें जकड़ा है रवि का मन. लोमड़ी की उठी और गिरी पूंछ की संभावनाओं के सवाल ने उसे सपनों के उस लोक में धकेल दिया जहाँ वह स्वयं 'छोटू-मोटू' बनकर कुँए के एक तल से दुसरे तल में अपने जीवन के समतल की तलाश कर रहा है. यह उलझनों में भटकते बाल-मनोविज्ञान का मनोहारी आख्यान है.
                                                              विश्वमोहन
                                    साहित्यकार, कवि एवं ब्लॉगर
                                        पटना     





   
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Monday, 8 July 2019

जड़-चेतन

अम्बर के आनन में जब-जब,
सूरज जल-तल से मिलता है।
कण-कण वसुधा के आंगन में,
सृजन सुमन शाश्वत खिलता है।

जब सागर को छोड़ यह सूरज,
धरती के ' सर चढ़ जाता है!'
ढार-ढार  कर धाह धरा पर,
तापमान फिर बढ़ जाता है।

त्राहि- त्राहि के तुमुल रोर से,
दिग-दिगंत भी गहराता है।
तब सगर-सुत शोधित सागर
जल-तरंग संग  लहराता है।

गज-तुण्ड से काले बादल,
जल भरकर छा जाते हैं।
मोरनी का मनुहार मोर से,
दादुर बउरा जाते हैं।

दमक दामिनी दम्भ भरती,
अंतरिक्ष के आंगन में।
वायु में यौवन लहराता,
कुसुम-कामिनी कण-कण में।

सूखा-सूखा मुख सूरज का,
गगन सघन-घन ढ़क जाता।
पश्चाताप-पीड़ा में रवि की,
'आंखों का पानी' छलक जाता।

पहिले पछुआ पगलाता,
पाछे पुरवा पग लाता ।
सूखी-पाकी धरती को धो,
पोर-पोर प्यार भर जाता ।

सोंधी-सोंधी सुरभि से,
शीतल समीर सन जाता है।
मूर्छित-मृतप्राय,सुप्त-द्रुम भी,
पुलकित हो तन जाता है।

पुरुष के प्राणों के पण में,
प्रकृति लहराती है।
शिव के सम्पुट खोलकर शक्ति,
स्वयं बाहर आ जाती है।

तप्त-तरल और शीतल  ऋतु-चक्र,
आवर्ती यह रीत सनातन।
शक्ति में शिव, शिव में शक्ति,
चेतन में जड़, जड़ में चेतन।



Saturday, 22 June 2019

मेरा पिया त्रिगुणातीत!

मेरे कण-कण को सींचते,
सरस सुधा-रस से।
श्रृंगार और अभिसार के,
मेरे वे तीन प्रेम-पथिक।

एक वह था जो तर्कों से परे,
निहारता मुझे अपलक।
छुप-छुपकर, अपने को भी छुपाये,
मेरे अंतस में, अपने चक्षु गड़ाए।

मैं भी धर देती 'आत्म' को अपने,
छाँह में शीतल उसकी, मूंदे आंखें।
'मन' मीत  बनकर अंतर्मन मेरा,
गुनगुनाता सदा राग 'सत्व' - सा!

और वह,दूसरा,'बुद्धि'मान!
यूँ झटकता मटकता।
मेरा ध्यान उसके कर्षण में भटकता,
निहारती चोरी-चोरी उसे निर्निमेष।

किन्तु तार्किक प्रेमाभिव्यक्ति उसकी,
मुझे तनिक भी नही देखती!
परोसती रहती मैं अपना परमार्थ,
उसके स्वार्थी 'रजस'-बुद्धि-तत्व को।

.... और उसकी तो बात ही न पूछो!
प्रकट रूप में पुचकारता, प्यार करता।
छुपने-छुपाने के आडंबर से तटस्थ
'मैं' मय हो जाता 'अहंकार'-सा!

बन अनुचरी-सी-सहचरी उसकी,
एकाकार हो उसके महत 'तमस' में।
महत्तम तम के महालिंगन-सा, सर्वोत्तम!
पसर जाती 'स्व' के अस्तित्व-आभास में।

आज जा के हुई हूँ 'मुक्त' मैं,
इस त्रिगुणी प्रेम त्रिकोण से ।
'अर्द्धांग' का मेरा तुरीय प्रेम-नाद,
 हिलकोरता प्रीत का आह्लाद।

रचाया है आज महारास,
मुझ बिछुड़ी भार्या  'आत्मा' से।
निर्विकार-सा वह निराकार
पूर्ण विलीन, तल्लीन, निर्विचार।

अनंत-विराट 'परम-आत्मा',
गाता चिर-मिलन का  गीत।
शाश्वत-सत्य,' सत-चित-आनंद'
मेरा पिया त्रिगुणातीत!!!









Wednesday, 5 June 2019

'लेख्य मञ्जूषा' में गद्य-पाठ : आलोचना की संस्कृति

'लेख्य मञ्जूषा' के गद्य-पाठ साहित्यिक समागम  कार्यक्रम में भारतीय साहित्य में आलोचना की संस्कृति पर मेरा उद्बोधन ! 

Saturday, 1 June 2019

सेनुर की लाज ( चम्पारण सत्याग्रह के सूत्रधार राजकुमार शुक्ल से जुड़ी एक सत्य लघुकथा)

राम बरन मिसतिरि अपनी पगड़ी उतार के शुकुल जी के गोड़ पर रख दिये। सिसकते-सिसकते मुंह मे घिघ्घी बंध गयी थी। आवाज नहीं निकल पा रही थी। आंखों में उस जानवर एमन साहब की घिनौनी शक्ल घूम रही थी। बड़ी मुश्किल से रामबरन ने एक कट्ठा का कोला बन्धकी रख के बेटी का बिआह ठीक किआ था। रात ही हाथ पीले किये थे उसके।  बिदाग़री की तैयारी कर ही रहा था कि कलमुहें एमन का फरमान लेकर उसके जमदूत उतर  गए थे। उस पूरे जोवार में किसी गरीब की बेटी की डोली उठती तो वह पहले एमन की हवेली होकर जाती जहां रात कुंआरी तो चढ़ती  लेकिन उतरती नहीं। इस अँगरेज दरिंदे की हबस में पूरा जोवार सिसकता था। निलहे साहब की  वहशी कहानियों को सुनकर ब्याहता बनने की कल्पना मात्र से क्वांरियों का रक्त नीला पड़ जाता।
'मालिक, पूरे गांव की आबरू का सवाल है। बचा लीजिये।' रोते-रोते रामबरन ने निहोरा किया।
शुकुल जी खेत का पानी काछते-काछते थम से गये। पूरा माज़रा समझते उन्हें देर न लगी। निलहों के विरुद्ध उन्होंने बिगुल पहले से ही फूंक रखा था। एमन उनसे खार खाता था और बराबर इस जोगाड़ में रहता कि उनको  मौका मिलते ही धोबिया पाठ का मज़ा चखाये। किन्तु शुकुलजी के ढीठ सत्याग्रही मिज़ाज़ के आगे उसकी योजनाएं धरी रह जाती।
रामबरन की कहानी सुन उनका खून खौल उठा। हाथ धोया। गमछे से मुंह पोछा। फेंटा कसा। सरपट घर पहुंचे और मिरजई ओढ़ने लगे। अंगौछे को कंधा पर रख घर से बहरने ही वाले थे कि शुकुलाइन को भनक लग गयी और दौड़ के आगे से उनका रास्ता छेंक ली। शुकुलजी ने उनको सारी बात बताई और एमन से इस बार गांव की लाज के खातिर जै या छै करने की ठान ली। एमन के नाम से समूचे जिला जोवार का हाड़ कांपता था। मार के लास खपा देना उसके बाएं हाथ का खेल था। पुलिस, हाकिम, जज, कलक्टर सब उसी की हामी भरते थे।
शुकुलाइन ने उनको भर पांजा छाप लिया और अपने सुहाग की दुहाई देकर उनको नहीं जाने की चिरौरी करने लगी। उनकी मांग का सेनुर उनकी आंखों के पानी मे घुलकर शुकुलजी के मिरजई में लेभरा गया। शुकुलजी के खौलते खून को भला शुकुलाइन कब तक रोकती।
वह हनहनाते हुए एमन की हवेली पर चढ़ बैठे। पूरी उत्तेजना में एमन को ललकार दिया शुकुल जी ने। गांव वाले भी जोश में आ गए थे। रामबरन की बेटी की विदाई हो गयी। कुटिल एमन कसमसा के रह गया।
शुकुल जी को फुसला के बैठा लिया और उसने पुलिस बुला ली। शुकुलजी पर रामबरन की बेटी के साथ बलजोरी का आरोप लगा। उनकी मिरजई में लिपटी सुकुलाइन के सेनुर के दाग को साक्ष्य बनाया गया। शुकुल जी को इक्कीस दिन की सजा हो गयी।
आज इक्कीस दिन का जेल काटकर शुकुलजी घर पहुंचे थे। शुकुलाइन ने टहकार सेनुर लगाकर शुकुलजी की आरती उतारी।आखिर इसी सेनुर ने तो गांव की बेटी के सेनुर की लाज रख ली थी।




आंचलिक शब्दों के अर्थ :
                                       सेनुर- सिन्दूर,   गोड़ - पैर,   कोला - खेत,  बिआह- व्याह,  बिदाग़री -विदाई,  जोवार - क्षेत्र,  निहोरा - आग्रह, जै या छै  - अंतिम रूप से निपटारा,  भर पांजा छाप लेना - पूरी तरह से दोनों बाहों में भर लेना, टहकार - गाढ़ा

Saturday, 11 May 2019

फूल और कांटा

सूख रहा हूँ मैं अब
या सूख कर
हो गया हूँ कांटा।
उसी की तरह
साथ छोड़ गया जो मेरा।
गड़ता था
सहोदर शूल वह,
आंखों में जो सबकी।
सच कहूं तो,
होने लगा है अहसास।
अलग अलग बिल्कुल नही!
वजूद 'वह' और 'मैं ' का।
कल अतीत का  खिला
फूल था मैं,
और आज सूखा कांटा
वक़्त का!
फूल और काँटे
महज क्षणभंगुर आस्तित्व हैं
पलों के अल्पविराम की तरह।
मगर चुभन और गंधों की मिठास!
मानो चिरंजीवी
समेटे सारी आयु
मन और बुद्धि के संघर्ष का।