विश्वमोहन उवाच
ज़िन्दगी की कथा बांचते बाँचते, फिर! सो जाता हूँ। अकेले। भटकने को योनि दर योनि, अकेले। एकांत की तलाश में!
Sunday, 11 October 2026
मोही और दद्दू
Tuesday, 29 September 2026
बस, यूँ ही थामे रहना।
हवा की बरजोरी,
शाखा का सिहरना।
टहनी की गलबाँही,
पलक मिलमिलाना।
पत्ते की छुअन,
बहारों का छाना।
दिल का फ़साना,
या कोई अफ़साना!
हवा, शाखा, टहनी,
पत्ता-पत्ता हम- तुम,
ये उल्फ़त का मंजर,
हुए हम तुम गुम- सुम।
साँसों की शोर,
मन सराबोर।
हिया की हुक हुक,
पिरितिया की डोर।
कासे कहूँ, जो
आया न हमें कहना।
भावों की भँवरी,
बस, यूँ ही थामे रहना।
Wednesday, 16 September 2026
नदी कोरी है।
कवयित्री नीरज सिंह अपनी आँखों में दुनियावी जीवन के यथार्थ को समझने-बुझने की अबूझ प्यास पाले हुए हैं। यहीं अबूझपन उनकी कविताओं में शब्द बनकर फूटता है। उनकी पुस्तक ‘नदी कोरी है’ अभी सामने है। धीमे-धीमे धूमिल होती आदर्श की आशाओं को अपनी मुट्ठी में थामे रखने के ‘ख़्वाब’ के साथ नीरज जी की यथार्थ के धरातल पर ‘वापसी’ में उनकी अंतर्भूत विरसता की अभिव्यक्ति को बहिर्मुख विस्तार मिलता है। यहाँ ज़िंदगी ख़ुद से जुदा होकर एक एलीयन की तरह खड़ी है। इनकी कविताएँ ज़िंदगी की विद्रूपताओं के त्रास से दंशित मनुष्य के आत्मिक विखंडन का आख्यान है, जहाँ :
“बनते बिगड़ते इन चेहरों में
एक ही आकार, एक ही बनावट है।“
कवयित्री की सकारात्मकता में यह साफ़ सफ़्फ़ाक झलकता है कि:
“भोर की नयी किरणों में गाएगी
जब यह धरती, नाचेंगे जब पवन
थिरकेंगे तेरे भी पाँव, उठना
तब तू भी हो मगन
सुन! ओ मेरे मन!”
नीरज जी संवेदना की गीतकार हैं। मानवीय अंतर्द्वंद्व की वह गहरी पड़ताल करती हैं और मुक्ति की आशा का राग गुनगुनाती हैं। जीवन के पग-पग की प्रतिकूलताओं से वह प्रतिहत तो होती हैं, किंतु हतोत्साहित किंचित नहीं! प्रत्युत, प्रकृति, अनुभव, इतिहास और मिथकों के गर्भ में बैठे तदनुकूल संदर्भों से वह ऊर्जा ग्रहण करती हैं और संघर्ष का शंखनाद करती हैं। निराशा के तम में लिपटे निविड़ अरण्य में उनकी कविताएँ आशा का सूर्योदय हैं। वह समस्यायों की नहीं, वरन समाधान की कवयित्री हैं। अपनी अभिव्यंजनाओं के प्रतीकार्थ जड़ पदार्थों में चेतना का आरोपण वह मानवीकरण अलंकार में करती हैं। कई बार ‘स्व’ से संवाद करती कवयित्री अपनी आत्मा से परा, पश्यंती और मध्यमा के पड़ावों को पार कर ‘सर्वात्म’ की वैखरी में बिखर जाती हैं। यही उनका काव्य सौंदर्य है।
पहली प्रतिध्वनि तो यही है, “ज्यों-ज्यों बुड़े स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जल होय।“
रश्मि प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित ‘नदी कोरी है’ उस सद्य:प्रशांत झील की तरह प्रतीत हो रही है जिनमे क्षण भर पूर्व ही प्रतिघाती पत्थरों ने अपने आपतन आघात से उथल-पथ मचा रखा हो।
अस्तु,
पुस्तक - नदी कोरी है ( कविता संग्रह )
प्रकाशक - रश्मि प्रकाशन, लखनऊ
Sunday, 13 September 2026
छन्द जिज्ञासा के
Friday, 4 September 2026
नील नायक
Tuesday, 25 August 2026
सरगोशियों के स्वर
Tuesday, 18 August 2026
फ़ितरत
अनवरत यात्रा है,
यह जिंदगी हर पल।
नई आदतों के बनने और
पुरानी आदतों के ढहने की ।
जमती जाती हैं हर,
परवर्ती परत-दर-परत।
कोटि बनकर,
समय की भुज पर।
फैलती - सिकुड़ती,
जीवन के आकाश में।
बन जाता है मन,
कभी-कभी पुरातत्वविद।
और मनन, तकनीक!
खोदने - शोधने की।
तलाशने की आयु,
उन परतों की।
इस कार्बन-डेटिंग में,
कभी-कभी तो !
छोड़ जाता है मन,
इस स्थूल काया को भी।
और सहेज लेता है जीवाश्म,
अपनी पुरानी आदतों के।
गाहे-बेगाहे उघेड़कर,
समय के छिलके को।
परतों की बुनियाद में,
जमती जाती आदतों की।
सीरत है इन आदतों की,
हमें भी बदल देना, पर!
एक चीज नहीं बदलती,
हमारी फितरत!
Friday, 14 August 2026
गिरमिटिया
Saturday, 11 July 2026
' क ' से कहानी
‘क’ से कहानी
(पुस्तक-समीक्षा)
पुस्तक का नाम – ‘क’ से कहानी
विधा – कहानी
कहानीकार – डॉक्टर उषा सिन्हा
प्रकाशक – स्पर्श प्रकाशन, ३०२ बी, श्री हरिराधा अपार्टमेंट, बोरिंग रोड, पटना
कहानी की कहानी उतनी ही पुरानी है जितनी इस धरती पर मानव जाति की कहानी। कहानियाँ पहले भावनाओं, भंगिमाओं, और व्यवहार के धरातल पर उपजीं; शब्दों की नाव पर भाषा के प्रवाह में बाद में बहीं। तदन्तर ये संस्कृति को उचारती रहीं और सभ्यताओं से टकराती रहीं। काल के ज्वार-भाटा से समकालीन जीवन-तत्वों को सहेजती रहीं। ‘जैसी करनी, वैसी कथनी’ बनकर ये अपने को उस परिवेश के ऋँगार से सँवारती रहीं। सरल समाज की सरल कहानी और क्लिष्ट समष्टि की विरल अभिव्यक्ति! सिकुड़ती संस्कृति और फैलती सभ्यता के दबाव में कहानियाँ भी सकुचाती और पसरती रहीं। आगे चलकर बौद्धिक वितण्डा और वाद-पंथ के प्रचण्ड ताप में झुलसने लगीं। पर्यावरण के प्रदूषण ने पदार्थ और प्रकृति को ही दमघोंटू नहीं बनाया, वरन वाद और पंथ के पाथेय ने कहानियों का भी दम घुटाया। दाम और वाम तथा उत्तर और दक्षिण की पंथ-विभाजन रेखा ने कहानियों की कहानी को भी बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसी स्थिति में यदि कथा रचती साहित्य-वीरांगना डॉक्टर उषा सिन्हा की ‘क से कहानी’ की ‘अपनी बात’ से यह संगीत निकलता हो कि “ मेरी कहानियाँ किसी वाद के चक्कर में न फँसकर नदी की उन्मुक्त धारा की तरह राह के कंकड़-पत्थर, सीपियाँ और शंख समेटती चलती हैं। जहाँ थाह मिले, थोड़ी देर के लिए रुक जाती हैं और फिर चल पड़ती हैं – असीम सम्भावनाओं के साथ”। - तो निश्चय की निराशा के घटाटोप तिमिर में यह आशा की ‘उषा’ का उन्मेष है। उषा जी की इन बातों के प्रतीकार्थ में दम है कि असल में कहानियों को आज दुनिया की दब्बू क़िस्म की मध्यवर्गीय वनिता रचनाकारों की ही सख़्त ज़रूरत है जो समाज की विसंगतियों को खुद जीती हैं। वही अपनी नित-नित की ज़िन्दगी में इस समाज को पढ़ती हैं, लिखती है, फाड़ती हैं, फेंक देती हैं, बटोरती हैं, छाँटती हैं और फिर सहेजकर सहजता से अनायास-अनवरत कहानियाँ बुनती चली जाती हैं। इस बुनावट में चारों ओर फैले उनकी ज़िंदगी के हर बिम्ब कहानियों के पात्र बनकर पाठकों से बतियाते रहते हैं।
‘क से कहानी’ उषा जी की दस कहानियों का संग्रह है। उनकी ही बोली में आस-पास की ज़िंदगी से ही इतने कथा सूत्र मिल जाते हैं कि कहीं भटकने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। सामाजिक जीवन का उनका विशद अनुभव, नारी सुलभ सूक्ष्मदर्शिता, विलक्षण विश्लेषण क्षमता और उनका जन-सरोकार – ये सभी तत्व इन कहानियों में आद्योपांत पाठक के साथ-साथ चलते हैं। कहानियों के पात्र आम ज़िंदगी के किरदार हैं, जीवट से भरपूर हैं और उम्मीदों के प्रकाश-पथ पर गतिमान हैं।
लेखन के क्षेत्र में डेगाडेगी देनेवाली महिलाओं के संरक्षण की आड़ में अपने निजी एजेंडा को साधने की गुप्त योजना को पोषित करने वाली साहित्यिक संस्था ‘साहित्य-मंजूषा’ की संस्थापक चन्द्रकान्ता जी आज के चलन को जस-का-तस प्रतिबिम्बित करती हैं – ‘हाथी के दाँत’ दिखाने के और, खाने के और! यह कहानी इतनी बड़ी सहजता से पाठकों के मन में उतर जाती है। लगता है कि रचनाकार स्वयं ऐसी किसी संस्था के प्रतिघात से उपजी पीड़ा की अपनी राम कहानी ही कथ रही हों। चलते-चलते बग़लगीर को रगड़ा मार जाने वाली उषा जी की कहन-शैली की मारक क्षमता अद्भुत है। लघु-कथा संगोष्ठी उन तमाम सद्विचारों का उद्घोष करती है जो संस्था के अपने आचरण के ठीक उलट है। कथा-वाचन में उच्चारण की तमाम अशुद्धियाँ श्रोताओं की तालियों की गूँज से होड़ ले रही हैं। संस्था में जाति अभी भी एक ऐसा सच है जिसे लोग सूँघकर पहचान लेते हैं, सरनेम से चाहे आप जितना भी ढक लें! लघुकथा का विचार-बिंदु है – पुरुष द्वारा स्त्री का शोषण। लेकिन ‘साहित्य- मंजूषा’ की अंदरूनी कहानी कुछ और ही बयान कर रही है। बाहर से कुछ और, अंदर से कुछ और। ऊपर से फ़िट-फाट, नीचे से मोकामा घाट! यहाँ तो स्त्री के द्वारा ही स्त्री शोषित है। चन्द्रकान्ता शोषक है और नीमा शोषित! संस्था के आचरण की यह दुविधा संकेत अर्थ में समूचे साहित्य-समाज का चरित्र है। ईमान की बात नहीं होती अब। अभिजात मुँह से निकली बात ही ईमान है। ‘क्यों रे, कितना खाता है? तेरा बाप कमा कर रख गया है क्या?’ मालकिन की इस बात पर कूड़ा बीनने वाला बच्चा खाने का पैकेट और पानी का बोतल पटक कर चला जाता है। उस लाचार बालक का यह विद्रोही स्वाभिमान नीमा को प्रतिरोध के एक नए तेवर के लिए हुलका जाता है। उषा जी की यह कहानी ‘हाथी के दाँत’ तथाकथित साहित्यिक संस्थाओं के चाल और चरित्र की सड़ान्ध के सफ़्फाक सच को सामने रखती है।
बिहार में पकडुआ बियाह अपने ज़माने का एक रोचक समाजशास्त्रीय सच है। ऐसे विवाहों में न केवल जाने-पहचाने परिजनों की साज़िश होती है, बल्कि कभी-कभी तो पकडुआ दूल्हा भी अपने को पकड़वाने की साज़िश में शामिल होता है। बढ़ते तिलक-दहेज की कुप्रथा के प्रतिकार बनकर ऐसी व्यवस्था उभरी जिसकी चपेट में वह क्षेत्र भी था जहाँ से कहानीकार का सरोकार है। ऐसे क्षेत्र की जन-प्रतिनिधि होने के नाते पकडुआ बियाह पर कहानीकार की समाजशास्त्रीय पकड़ अत्यन्त प्रगाढ़ है। इसलिए उनकी कहानी ‘और वह चली गयी’ में इस प्रसंग का विवरण अत्यन्त संजीदा होना स्वाभाविक है। ‘एक ही जाति, एक ही धर्म, दोनों कुँवारे, दोनों जवान, अच्छी जोड़ी, फिर दिक्कत कहाँ?’ बहुतायत विवाहों पर यह बात खरी उतरती है। ‘मात्र पाँचवीं पास फूलमती दिल और दिमाग़ की बात करती है। सिनेमा देखकर बौरा गयी है। शहर की हवा ने मानुष के तन-मन को कलुषित कर दिया है’।– फूलमती की माई की यह कारुणिक चीत्कार सिनेमायी दुष्प्रभाव और शहरों के बदसूरत संस्कार पर व्यंग्यात्मक प्रहार है। उषा जी की सतर्क दृष्टि पुरुष की कमज़ोरी को बड़ी सबलता से सामने रखती है जब अमिरका फूलमती के साथ अपने बच्चों को यह कहकर त्याग देता है, ‘साँप और सँपोलियों सबको बाहर करो’। यहाँ कहानीकार प्रकारांतर में नारी के पवित्र और उदात्त मातृत्व रूप का दिग्दर्शन करा देती हैं। यही रूप तो नारी को देवी बना देता है।
अपनी घोर अवैज्ञानिकता के आवरण में भी ‘ब्रह्म-पिशाच’ कहानी एक वैज्ञानिक संदेश छोड़ जाती है। यह पशु-पक्षी को मारने के विरुद्ध पाठकों को चेता जाती है।
‘इच्छा-मुक्ति’ एक बेबस पत्नी के आत्म-समर्पण में ही अपनी मुक्ति पाने की करुण कसमसाहट है। आज के विवाहेत्तर सम्बन्धों को कहानी अपना विचार-केन्द्र बनाती है जो बिलकुल सामयिक है। किन्तु, कहानी का अधूरापन अवश्य पाठकों को खलता है। समस्या की तह की तलाश में कहानी पाठक को बीच रास्ते पर ही छोड़ जाती है और सोद्देश्यता के स्तर पर कथानक काफ़ी हल्का हो जाता है।
‘सुनयना’ मध्यवर्गीय पुरुष मानसिकता के नपुंसक तत्व की त्रासदी की करुण गाथा है। स्वतन्त्रता के उषा काल की यह कहानी यही सन्देश देती है कि महिलाओं के प्रति मर्दों की मन:स्थिति तब भी वही थी और आज भी वही। मतलब ढाक के तीन पात! लाखों लुभावने नारों के बावजूद बेटियों की वेदना की तीव्रता ज्यों-की-त्यों है। अब नारा तो यह होना चाहिए कि ‘बेटा पढ़ाओ, बेटी बचाओ!’ अपने पात्रों के चरित्र में रंग भरने की कला की उषा जी चतुर चित्रकार हैं। उनकी कूँची अपने पात्र की संवेदना के हर स्पेक्ट्रम को पकड़ लेती है और अपने शब्द-चित्रों में उसे उतार लेती हैं। ‘श्रीधर की पत्नी रामरती ने देवरानी की लड़की को देखा तो आदतन पहले नाक-भौं सिकोड़ा … बड़ी बड़ी आँखों से ताई जी को ही देख रही थी … रामरती की आँखों में स्नेह उमड़ आया’। - ये पंक्तियाँ न केवल भारतीय संयुक्त परिवार के अंदरूनी मनोविज्ञान की पड़ताल करती प्रतीत होती हैं, प्रत्युत विश्वम्भर नाथ शर्मा कौशिक जी की कालजयी कहानी ‘ताई’ का स्मरण भी करा जाती है।
‘निरुपमा’ में सामाजिक आचरण की विकृतियों की घिनौनी गंदगी का बड़ी सफ़ाई से चित्रण हुआ है।
बेटे और बेटी के प्रति समाज के दोहरे रवैए का भण्डा फोड़ने वाली उषा जी की कहानी ‘अब पछताए होत क्या – एक पिता की डायरी’ संवेदना का सरगम है। एक सजग पाठक की आँखों को यह कहानी नम तो करती है, साथ में एक अपराध भाव भी छोड़ जाती है कि रोपे पेड़ बाबुल का तो आम कहाँ से होय! ‘शायद हमारे समाज में बेटों की कामना ही इसलिए की जाती है कि अन्तिम संस्कार में वे बाप को कन्धा और मुखाग्नि देकर उनकी आत्मा को तृप्त करें’। - यथार्थ में तो पिता के अरमानों की चिता में ये बेटे जीते जी ही आग लगा देते हैं। अमृता के पिता की डायरी इसी सत्य का अभिलेख है।
इस बनावटी दुनिया की मायावी चकाचौंध और जीवन के नग्न यथार्थ के दो पाटों के बीच हीन-भाव की ग्रन्थि में फँसी वीथिका के सत्य से साक्षात्कार और आत्म-बोध की कहानी है – ‘अम्मा’। “उसे मम्मी नहीं अम्मा चाहिए, अपनी अम्मा। होश सम्भालने के बाद पहली बार वह अम्मा से सर्वांग लिपट पड़ी। टप-टप गिरते आँसूओं के समुद्र में डूबती उतराती रही। अम्मा का भीगा आँचल उसने कस कर पकड़ लिया। तुम हमें छोड़ कर कहीं मत जाना अम्मा। कभी मत जाना”। कहानी के अवसान बिंदु पर पाठक के मन-आँगन में वीथिका की यह आवाज़ गूँजती रह जाती है।
यक़ीन कीजिए, ‘यह कहानी नहीं’ वाक़ई एक कहानी नहीं है। घोर भ्रष्टाचार, असभ्य और अशैक्षणिक आचरण से परिपूर्ण आज के विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों का यह आँखों देखा हाल है। एक प्रोफ़ेसर की लेखनी से निकली यह कहानी न्याय-दर्शन के सभी प्रमाणों पर सौ फ़ीसदी खरी उतरती है।
संग्रह की अंतिम कहानी ‘गुरुदीक्षा’ मनोवैज्ञानिक वेदना का विस्तृत वितान है। प्रकारांतर में ग़रीबी और जातीय असमानता से जुड़ी हैसियत की सामाजिक अवधारणा पर यह एक व्यंग्यात्मक प्रहार भी है – “एक तो ग़रीब, दूसरे जाति का कुर्मी! चौरहा बटईया जोतना और व्याह-शादी में पत्तल उठाना उसके परिवार का पुश्तैनी पेशा था … पर ‘परसुआ’ को यह सब कहाँ पता था … उसे ऊँच-नीच कहाँ मालूम था।“ नीलांजना के पत्थर से परसुआ के माथे पर लगी चोट में पाठकों को वही मर्मांतक आर्त्तनाद सुनायी देता है जो जैनेंद्र जी की कहानी ‘खेल’ में मनोहर द्वारा घरौंदे के ढाह देने से सूरबाला के दिल को लगे आघात में।
संग्रह की सारी कहानियों के अवयव आम जीवन की देखी सुनी है। सबकुछ स्वाभाविक, खरा और टटका! समाज के सच का चलचित्र है – ‘क’ से कहानी! कहानियों की धार बड़ी प्रखर है, कथानक बड़े संजीदे हैं, कहन का शिल्प बड़ी सुगठित है, शब्द-चित्र बड़े जीवंत हैं, घटनाएँ महज़ आख्यान नहीं बल्कि भोगे हुए अनुभव और देखे हुए सच हैं, बोली बड़ी सरल है और संदेश बड़े सीधे हैं। उषा जी, सच में, आम लोगों की बात आम भाषा में ही करती हैं। यहाँ भी भाषा उतनी ही प्रांजल और वेगमयी है। बस, भाषा के मनोहर प्रवाह में कहीं-कहीं स्पर्श प्रकाशन के प्रूफ़ शोधन की कोताही और वर्तनी की अशुद्धियाँ अवश्य रोड़े अटकाती हैं। पुस्तक का आवरण संयोजन एवं मुद्रण आकर्षक है। एक मनोहर और पठनीय कहानियों के इस सुशीर्षक संग्रह ‘क’ से कहानी’ के लिए सर्वतोमुखी प्रतिभा एवं उपलब्धि सम्पन्न प्रख्यात साहित्यकार प्रोफ़ेसर (डॉक्टर) उषा सिन्हा जी को साधुवाद एवं आत्मीय बधाई!!!
Wednesday, 27 May 2026
अविरल श्याम
Friday, 15 May 2026
सीखना
मैने कहा,
मुझे लिखना सिखा दो।
उसने कहा,
पहले सीखना सिखो।
मैने कहा,
वही सिखा दो।
...
...
मुझे लिखना आ गया।
सीखना अभी भी सीख रहा हूँ।
Thursday, 30 April 2026
आये हो, तो जाओगे।
है विदित जो जीव का,
प्रारब्ध और गंतव्य यही।
हर मिलन के बीज में है,
विरह का भवितव्य ही।
न रहा अपवाद कोई,
द्युलोक, अंतरिक्ष, पृथ्वी।
समय चक्र सब नाचते,
ग्रह गोचर और रवि।
आये हो, तो जाओगे।
फिर सोचते हो क्या?कवि!
सर्वं खलु ईदम ब्रह्म,
हो आहूत बन हवि।
Monday, 16 March 2026
जहाँ ना संशय, ना कोई डर!
Monday, 27 October 2025
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर
आज फिर थाम लिया है माँ ने,
छोटी सी सुपली में,
समूची प्रकृति को।
सृष्टि-थाल में दमकता पुरुष,
ऊंघता- सा, गिरने को,
तंद्रिल से क्षितिज पर पच्छिम के,
लोक लिया है लावण्यमयी ने,
अपने आँचल में।
हवा पर तैरती
उसकी लोरियों में उतरता,
अस्ताचल शिशु।
आतुर मूँदने को अपनी
लाल-लाल बुझी आँखें।
रात भर सोता रहेगा,
गोदी में उसके।
हाथी और कलशे से सजी
कोशी पर जलते दिए,
गन्ने के पत्तों के चंदवे,
और माँ के आंचल से झांकता,
रवि शिशु, ऊपर आसमान की ओर।
झलमलाते दीयों की रोशनी में,
आतुर उकेरने को अपनी किरणें।
तभी उषा की आहट में,
माँ के कंठों से फूटा स्वर,
'केलवा के पात पर'।
आकंठ जल में डूबी
उसने उतार दिया है,
हौले से छौने को
झिलमिल पानी में।
उसने अपने आँचल में बँधी
सृष्टि को खोला क्या!
पसर गया अपनी लालिमा में,
यह नटखट बालक पूर्ववत।
और जुट गया तैयारी में,
अपनी अस्ताचल यात्रा के।
सब एक जुट हो गए फिर
अर्घ्य की उस सुपली में
"क्षिति जल पावक गगन समीर।"





















