Wednesday, 24 February 2021

कासे कहूँ- समीक्षा डॉ प्रोफेसर उषा सिन्हा

 



(कृपया आठ मिनट बीतने के बाद के अंश का श्रवण करें। असुविधा के लिए खेद है।)

Tuesday, 23 February 2021

काल-चक्र की क्रीड़ा-कला!

कई दिनों से रूठी मेरे,

अंतर्मन की कविता।

मनहूसी, मायूसी, मद्धम,

मंद-मंद मन मीता।


शोर के अंदर सन्नाटा है,

शब्द, छंद सब मौन।

कांकड़-पाथर-से भये आखर,

भाव हुए हैं गौण।


थम गई पत्ती, चुप है चिड़िया,

और पवन निष्पंद।

पर्वत बुत-से बने पड़े हैं,

नदियों का बहना बंद।


हिमकाल के मनु-से मेरे,

मन में बैठी इड़ा।

बुद्धि की बेदिल देवी, क्या!

परखे पीव की पीड़ा?


अभिसार-से सुर श्रद्धा के,

नहीं सुनाई देते।

सुध धरा की व्याकुलता का,

बादल भी नहीं लेते।


चाँद गगन में तनहा तैरे,

आसमान है बेदम।

जुगनू जाकर जम गए तम में,

करे पलायन पूनम।


नि:शक्त शिव शव स्थावर,

निश्चेतन जीव जगत है।

समय चक्र की सतत कला का,

यही नियति आगत है।


प्रलय काल में क्षय के छोर पर,

हो, शक्ति की आहट।

स्फुरण में चेतन के फिर,

जागेंगे शिव औघट।


शिव के डमरू से निकलेगा,

प्रणव-नाद का गान।

और कन्हैया की मुरली से,

प्रणय-रास की तान।


अक्षर वर्ण शब्दों में ढलकर,

गढ़े ज्ञान की गीता।

अनहद चेतन अंतर्मन में,

मानेगी मेरी कविता!!!


राह निहारूँ उस पहरी की,

मनमीता मोरी मानें।

काल-चक्र की क्रीड़ा-कला,

जड़-चेतन सब पहचानें।













Thursday, 11 February 2021

कृष्ण-कन्हैया

 पल-पल पुलकित पलकों में,

जो,  प्रीत तू अबतक पाली।

नित नयनों में तेरे उतराए,

वह बिम्ब कौन री व्याली!


उर की धडकन में धक-धक,

जो धड़क-धड़क कर बोले।

चतुर-चितेरा, चहक-चहक,

 मन वेणी,   तेरी  खोले।


कूल-कालिंदी से कलकल,

कलरव करती किल्लोलें।

हिय वह हौले-हौले तेरे,

नेह मधुर रस  घोले।


मूंदे दृग-पट अपना तू,

करता वह  नैन बसेरा।

आँखों के आँगन में,

तेरे, डाला उसने डेरा।


चमके चिर चितवन चंचल,

वह, तेरे कपोल की लाली।

कौन! कहाँ? वह कृष्ण-कन्हैया!

तू,  किस हारिल की डाली!


वैलेंटाइन सप्ताह

11.2.2021

पटना


Monday, 1 February 2021

वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध ------ (१९)

(भाग - १८ से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य - (त)

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)


शीतोष्ण, अर्द्ध-शीतोष्ण और भारतीय प्राणी एवं वानस्पतिक जगत 

इन खंडन-मंडन करने वाले भाषाविदों के लिए सबसे अधिक विडम्बना और उससे भी अधिक दुर्भाग्य का विषय तो यह है कि प्रोटो-भारोपीय भाषाओं में पुनर्रचित प्राणी-जगत के कुछ ऐसे नाम हैं जो भारत में तो पाए जाते हैं किंतु यूरोप के मैदानी भागों में नहीं पाए जाते। इस आधार पर तो यह बिल्कुल साफ़ हो जाता है कि इनकी मूल भूमि भारत है न कि दक्षिणी रूस का मैदानी भाग या यहाँ तक कि अनाटोलिया भी! दृष्टांत के लिए ये जानवर हैं – बाघ, सिंह, चीता, लंगूर और हाथी। सामान्य तौर पर विवेचनाओं में इस बिंदु की अवहेलना कर ये ‘खंडन-मंडन-पारंगत’ विद्वान आगे बढ़ जाते हैं :

बाघ : ‘*विहाघ्रस’, तीन शाखाओं में इसके रुप इस प्रकार हैं –

भारतीय आर्य : व्याघ्र, ईरानी (पारसी) : बब्र, अर्मेनियायी : वग्र ( इसी शब्द को आभारोपीय भाषा कौकेसियन जौरजियन        में ‘विग्र’ के रूप में लिया गया है।

सिंह : ‘*सिंघोस’, दो शाखाओं में इसके रूप इस प्रकार हैं –

भारतीय-आर्य : सिंह, अर्मेनियायी : इंज ( यहीं नाम चीता के लिए है)

चीता : ‘*पर्ड’, चार शाखाओं में इसके नाम इस प्रकार हैं – 

भारतीय-आर्य : प्रदाक़ु, ग्रीक : पार्डस/पर्डलिस, ईरानी पारसी : फ़र्स-, अनाटोलियन (हित्ती) : पर्सना 

बंदर : ‘*क्व्हे/ओप्फ’, चार शाखाओं में इसके रूप इस प्रकार हैं –

शुरू के ‘क्व्हे’ को लेकर भारतीय-आर्य भाषा में कपि-, ग्रीक : केपोस, बिना ‘क्व्हे’ को लिए जर्मन और आइसलैंड की प्राचीन भाषा में ‘अपि’, स्लावी : ओपिका 

और इन सभी में सबसे महत्वपूर्ण हाथी है।

हाथी : ‘*लहभो-न्थ-‘ या ‘*हभो-न्थ’। इसके रूप कम-से-कम चार शाखाओं में प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं –

भारतीय-आर्य : इभा-, ग्रीक : एलिफ़स, (माइसिनियन ग्रीक : एरेपा), इटालिक (लैटिन) : एबर, हित्ती : लहफ़ा (इनके वैकल्पिक अर्थ भी हैं और एक अर्थ ‘हाथी का दाँत भी है)। ऊँट के अर्थ में यह शब्द दो भाषाओं में प्रयुक्त होता है – जर्मन (गोथिक) : उलबंदुस और स्लावी : वेलिबोदु 

जानवरों के ये प्रोटो-भारोपीय अपभ्रंश नाम इस अवधारणा को पूरी तरह ख़ारिज करते हैं कि इनसे ताल्लुक़ रखने वाली वानस्पतिक आबोहवा या प्राणिक जलवायु उत्तर का ठंडा या शीतोष्ण परिवेश ही रहा होगा। इसलिए आर्य-आक्रमण अवधारणा के अधिकांश पैरोकार अपनी दलीलों में मात्र भारत में पाए जानेवाले इस महत्वपूर्ण बिंदु को नज़रंदाज़ करते हुए कुटिलता से केवल उन्ही प्राणियों या पेड़-पौधों के नामों की चर्चा करते हैं जो शीतोष्ण जलवायु वाले प्रदेशों के साथ-साथ ‘भारत में भी’ पाये  जाते हैं। 

लेकिन इन सभी नामों में सबसे ज़्यादा प्रमुख हाथी का नाम है :

१ – यह शब्द समूची भारोपीय शाखाओं के पटल पर छाया हुआ मिलता है। यह 

क - एशिया और यूरोप, दोनों में पाया जाता है, 

ख – दक्षिण-पूर्वी सीमांत शाखा, भारतीय-आर्य और पश्चिमोत्तर सीमांत शाखा, जर्मन दोनों में पाया जाता है,

ग – भारोपीय परिवार की प्राचीनतम दर्ज भाषाओं, हित्ती, माइसेनियन ग्रीक और पुरातन भारतीय-आर्य भाषाओं, में पाया जाता है (मल्लोरी-आडम्स २००६ : ९९)

घ – साथ ही, समूचे यूरोप में पुरातन काल की प्रामाणिक यूरोपीय शाखा की लैटिन, गोथिक और गिरिजाघरों में बोली जाने वाली स्लावी भाषाओं में पाया जाता है।

मल्लोरी और आडम्स के अनुसार किसी शब्द के पक्के तौर पर प्रोटो भारोपीय होने की बस एक ही कसौटी है कि ‘यदि अनाटोलियन और किसी भी एक भारोपीय भाषा में उस शब्द के सपिंडी या सजातीय शब्द पाए जाते हों तो वह शब्द निश्चित तौर पर भारोपीय ही है।‘ इसमें आगे वह यह जोड़ देते हैं कि ‘भले ही यह नियम सबको नहीं रुचे लेकिन यहाँ पर यहीं लागू होता है (मल्लोरी-आडम्स २००६:१०९-११०)।‘ यहाँ पर हाथी के सजातीय या सपिंडी शब्द अनाटोलियन  के साथ-साथ पाँच अन्य भारोपीय भाषाओं में पाए जाते हैं।

२ – ऊपर वर्णित अन्य जानवरों के विपरीत, ऐतिहासिक भारोपीय पर्यावास के मात्र एक ही ठिकाने पर हाथी पाया जाता है – वह है ‘भारतीय-आर्य भूमि।‘ हाथी की दो स्पष्ट प्रजातियाँ हैं। पहली प्रजाति है - भारतीय हाथी (इलेफ़स मैक्सिमस) जो सिर्फ़ भारत और इसके पूरब स्थित दक्षिण एशिया के क्षेत्रों में पाया जाता है। दूसरी प्रजाति है – अफ़्रीकी हाथी (लोक्सोडोंटा अफ़्रीकाना) जो अफ़्रीका के सहारा के आस-पास के क्षेत्रों में पाया जाता है। दोनों प्रजातियों की रिहाईश भारोपीय भाषा की ऐतिहासिक भूमि से सुदूर भारतीय-आर्य भाषी भूमि है।

हाथी और अन्य चार जानवरों के ऊपर दिए गए दृष्टांत की विवेचना से निष्पन्न तथ्य पूरी तरह से न केवल भारत की मूलभूमि होने की अवधारणा को स्थापित करते हैं, प्रत्युत दक्षिणी रूस के मैदानी भाग में इनकी मातृभूमि की परिकल्पना को पूरी तरह से नकारते भी हैं। ऋग्वेद में भी हाथियों का वर्णन देशी पशु के रूप में एक पालतू प्राणी की तरह मिलता है। किंतु, दुर्भाग्य से पूर्वाग्रही विद्वानों की एक जमात ने इस तथ्य से यूँ अनभिज्ञता प्रकट की है, मानों हाथी कभी इस भूमि में रहा ही नहीं!

विद्वानों  द्वारा हाथियों के इस तथ्य को नज़रंदाज़ करेने के पूर्वाग्रही और पुरज़ोर प्रयासों की विशद विवेचना श्रीकांत तलेगरी ने अपनी पुस्तक ‘The Elephant and the Proto-Indo-European Homeland (हाथी और प्रोटो-भारोपीय मूलभूमि)’  में की है। उसी पुस्तक में हाथियों के अत्यंत प्राचीन काल से भारत भूमि में विचरने के प्रमाण ऋग्वेद की ऋचाओं में तलाशे गए हैं। ऋग्वेद के प्राचीन और अर्वाचीन, दोनों मंडलों में हाथियों का उल्लेख मिलता है। इनके स्पष्ट रूप से तीन नाम पाए जाते हैं – इभा-, वार्णा और हस्तिन। आगे चलकर ऋग्वेद में ही कुछ और भी नामों, जैसे गज, मतंग, कुंजर, दंती, नाग, करी आदि का उल्लेख मिलता है। ग्रिफ़िथ और विल्सन ने हाथी के लिए दो और शब्दों को ऋग्वेद में खोजा है – अप्स: (८/४५/५६) और श्रणी (१०/१०६/६)। 

स्पष्ट तौर पर यह वैदिक लोगों का एक जाना-पहचाना जानवर है जो पूरी तरह से उनके संस्कारों और वैदिक वातावरण में घुला-मिला है। ४/१६/१४ में इंद्र की ताक़त की तुलना हाथी से की गयी है। तीन ऋचाओं (१/६४/७, १/१४०/२ और ८/३३/८) में जंगली हाथी के द्वारा जंगल में घनी झाड़ियों को कुचलते विचरता दिखाया गया है। इसमें तीसरी ऋचा में ‘भीषण ताप से उन्मत्त हाथी इधर-उधर भटक रहा है (ग्रिफ़िथ)’। १०/४०/४ में दो जंगली हाथियों का पीछा करते शिकारियों की टोली दिखायी दे रही है। १/८४/१७ में धनिक व्यक्ति के दरवाज़े पर उसका पालतू हाथी उसके परिवार के सदस्य की भाँति खड़ा है। ४/४/१ में शक्तिशाली राजा के राज जुलूस में सवारी के रूप में शक्तिशाली हाथी का विवरण मिलता है। ९/५७/३ में एक भव्य समारोह में सज़ा-धजा हाथी मिलता है। ६/२०/८ में लड़ाई के मैदान में डटी गज-सेना का ज़िक्र मिलता है। वैदिक संस्कृति और अर्थतंत्र में हाथी और हाथी के दाँतों के महत्व के सिलसिले में तुग्र, भुज्य, इभ्य, वेतसु, दशनी, ऋभु आदि शब्दों का उल्लेख मिलता है।

हाथी और उसके दाँतों के लिए प्रयुक्त शब्द अपनी व्युत्पति के गर्भ में ही गहरे अर्थ समेटे हुए हैं। प्रोटो भारोपीय भाषा के अपभ्रंश स्वरूप में हाथी के लिए ‘*लभ/*ल्भोंथ-‘ शब्द है। इसकी व्युत्पति का मूल संस्कृत का ‘ऋभ/लभ’ है। ‘भारत-मूलभूमि-परिकल्पना' में न केवल भारोपीय भाषाओं के इस भूमि से बिछुड़कर बाहर चले जाने के समय से, बल्कि उससे भी बहुत पहले के काल से हाथी इस भूमि के अत्यंत महत्वपूर्ण सदस्य रहे हैं। इसलिए इनके नामों के शब्द ऋग्वेद के ज़माने से भी बहुत पहले के और भारोपीय भाषा से भी पहले के शब्द हैं।  यह इस बात से भी सिद्ध होता है कि ‘इभ-‘ शब्द की व्युत्पति का स्त्रोत अज्ञात है। पाणिनि ने इस शब्द के उद्भव का कोई आधार नहीं दिया है। ‘ऊणादि-सूत्र' में ऐसे शब्दों की सूची है जिनकी  व्युत्पति का आधार मालूम नहीं है। वहाँ पर इस शब्द का अर्थ ‘हस्ति’ अर्थात हाथी बताया गया है। सामन्य तौर पर ‘आर्य-आक्रमण-परिकल्पना’ के पैरोकार इसे आक्रांता आर्यों के अपनी स्थानीय बोली से लाया गया शब्द बता देते हैं, लेकिन इस शब्द का ज़िक्र किसी भी अभारोपीय भारतीय भाषा में नहीं मिलता है, हालाँकि इसके सपिंडी और सजातीय शब्द अनेक भारोपीय भाषाओं में मिला जाते हैं। फिर तो यही मानने को बच जाता है कि ‘इभ’ एक असाधारण कोटि का शब्द है जो ऋग्वेद के युग से भी काफ़ी पुरातन है और ऋग्वेद के रचे जाने तक वह अपने प्राकृत रूप को प्राप्त कर चुका था। तार्किक रूप से ‘इभ’ अपनी प्राकृत अवस्था पाने से पूर्व ‘ऋभ’ रूप में ही रहा होगा, जैसा कि आम लहजे में नियमित रूप से ‘ऋभ’ का प्रचलन हाथी की सूँड़ या उसके दाँतों के अर्थ में होता रहा है। हित्ती भाषा में इसके लिए ‘लहफ़ा-‘, लैटिन में ‘एबर-‘ और माइसेनियन ग्रीक में ‘एरेपा-‘ है। ग्रीक भाषा के ‘एलिफ़स’ और ऋग्वेद के ‘इभ’ शब्दों के दो अर्थों में एक अर्थ हाथी ही है। ग्रीक शब्द ‘एलिफ़ंता’ और जर्मन शब्दों (‘उलबंद’ आदि और उनसे संबंधित शब्दों) के प्रत्यय की व्याख्या हम ‘–वंता’ जैसे प्रत्यय शब्दों में ढूँढ सकते हैं। ‘*ऋभ-वंत’ का अर्थ हाथी होता है।

ऋग्वेद में हमारा परिचय ‘ऋभु’ शब्द से होता है। इसका संबंध पारलौकिक शिल्पकारों की एक प्रजाति से है। अपनी पौराणिक व्युत्पति में ये जर्मनी की पौराणिक लोककथाओं में पायी जाने वाली योगिनियों के समकक्ष बैठती हैं। मैकडौनेल के अनुसार ‘ऋभु’ शब्द का उद्भव ‘रभ’ शब्द अर्थात ‘मुट्ठी’ से हुआ है जिसका मतलब होता है हाथों की निपुणता (मैकडौनेल १८९७ :१३३)। वैदिक भाषा में ‘र’ और ‘ल’ शब्द के आपसी अदला-बदली की प्रवृत्ति के कारण इस मूल शब्द के ऋग्वेद में दो रूप पाए जाते हैं –‘रभ’ और ‘लभ’। दोनों का एक ही अर्थ होता है। ‘रभ’ का अर्थ होता है – पकड़ना, मुट्ठी में बाँधना, आलिंगन (मोनियर-विलियम्स १८९९ : ८६७) और ‘लभ’ का अर्थ होता है – लेना, ज़ब्त कर लेना, पकड़ना (मोनियर- विलियम्स १८९९ : ८९६)। ‘ऋभु’ शब्द के लिए प्रचलित विशेषण ‘सु-हस्त:’ है जिसका अर्थ होता है ‘कुशल हाथों वाला’ (४/३३/८, ३५/३/९, ५/४२/१२, १०/६६/१०)। इस तरह से ‘इभा’ और ‘ऋभा’ दोनों शब्द ‘रभ’ और ‘लभ’ से व्युत्पन्न हैं। इस मामले में हमें पाणिनि की तुलना में एक अतिरिक्त सहूलियत यह है कि बाक़ी भारोपीय भाषाओं में प्राप्त शब्दों की तुलना से प्राप्त अर्वाचीन साक्ष्य हमारे सामने मौजूद हैं। यह ‘इभ’ शब्द की वैदिक व्युत्पति पर तो प्रकाश डालता ही है, साथ-साथ प्रोटो-भारोपीय भाषा के व्युत्पति-विज्ञान की भी स्पष्ट समझ दे देता है जैसे कि ग्रीक और हित्ती संस्करणों में ‘ल’ तत्व की व्याख्या (और प्रोटो भारोपीय के अपभ्रंश रूप में ‘लेभ-’ शब्द!)। [ यहाँ यह ग़ौर करने वाली बात है कि ‘इभ’ शब्द की व्युत्पति भी ‘कुशल हाथ’ वाले अर्थ से ही हुई है और इसका भी भाव वहीं है जो ‘हस्तिन’ शब्द का है। लेकिन विडम्बना का विषय तो यह बेजान और बेस्वाद तर्क है कि इस साफ़-साफ़ समझ में आने वाले ‘हस्तिन’ शब्द का अर्थ भी आक्रमणकारी आर्यों द्वारा अपने साथ लाए एक नए जानवर के रूप में परोस दिया गया]।

भारत में हाथियों के दाँत के व्यापार के प्राचीन महत्व से ‘इभ-‘ शब्द के दो अर्थ प्रकट होते हैं। ऋग्वेद में ‘इभ-‘ का अर्थ  ‘हाथी/हाथी का दाँत (‘रभ’, ‘लभ’ से व्युत्पन्न ‘ऋभा’) है। ‘इभ्य’ का अर्थ धनवान, धनिक या अमीर (रभ्य, लभ्य) है। मूल शब्द ‘लभ’ बाद में लाभ, धन-दौलत या समृद्धि के अर्थ में प्रकट होने लगा। धन की देवी ‘लक्ष्मी’ को हाथियों से घिरा प्रदर्शित किया जाने लगा और यहाँ तक कि उनके नाम का विस्तार कर उन्हें ‘लाभ-लक्ष्मी’ और ‘गज-लक्ष्मी’ भी कहा जाने लगा। 

“ठीक वैसे ही ‘ऋभु’ को ‘धन या सम्पत्ति भी कहा जाता है जैसा कि ऋग्वेद के ४/३७/५ और ८/९३/३४ में हम पाते हैं’(मोनियर विलियम्स १८९९ : २२६) और दो सूक्तों (४/३७/५ और ८/९३/३४) में इसका अनुवाद धन-दौलत के रूप में किया गया है (विल्सन और ग्रिफ़िथ)।

“ सारत:, अकेले हाथी ही इस बात का पर्याप्त सबूत दे देता है कि आर्य बाहर से नहीं आए बल्कि अपनी मूल जन्मभूमि  भारत से ही बाहर की ओर फैले थे। 

२ – ऋग्वेद और वैदिक ग्रंथों में वर्णित पूर्वी बनाम पश्चिमी क्षेत्र 

ऋग्वेद के पुराने और नए मंडलों में वर्णित प्राणी और वानस्पतिक जगत का अवलोकन अत्यंत शिक्षाप्रद है।  

 पूर्वी जगत  

 सबसे पहले तो पूर्वी भारत के भीतरी भागों में बसने वाले ऐसे प्राणियों पर ध्यान केंद्रित करें जो सामान्य तौर पर पश्चिमोत्तर सीमा या उससे सटे अफगनिस्तान और अन्य पश्चिमी भागों के बाशिंदे नहीं हैं। जैसे – हाथी (इभा-, वारण, हस्तिन), भारतीय बाइसन या बिजोन या गवल (गौर), मोर (मयूर), भैंस (महिष) और धारीदार हिरण या चीतल (पृष्टि/पृश्दश्व)


पश्चिमी जगत

 ऋग्वेद के संदर्भ में पश्चिमी जगत के प्राणियों से तात्पर्य उन जंतुओं से है जो भारत के पश्चिम अर्थात कश्मीर और इसके आस-पास के क्षेत्रों से उत्तर की ओर, पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेशों में और अफ़ग़ानिस्तान में पाए जाते हैं।  वैसे तो जंगली बकरियाँ पूर्वी हिमालय में, नीलगिरी तहर (जंगली बकरियों की एक प्रजाति) तमिलनाडु में नीलगिरी की पहाड़ियों के दक्षिण में और जंगली सुअर दक्षिण तथा पूरब के भूभागों में भी पाए जाते हैं। पश्चिमी जगत के जंतुओं में पहाड़ी बकरी (छग), भेड़ (मेष), मेमना (ऊरा), बैक्ट्रियायी ऊँट (ऊष्ट्र), अफ़ग़ानी घोड़ा (मथ्र) और जंगली सुअर (वराह) आदि उल्लेखनीय हैं। पश्चिमोत्तर में पाए जाने वाले इन जंतुओं में से अधिकांश, जैसे कि ‘माएस’(भेड़), ‘ऊरा’(मेमना), ‘ऊष्ट्र’(ऊँट) और ‘वराज’(सुअर), का विवरण अवेस्ता में भी मिलता है। ठीक इसके उलट, जिन पूर्वी जंतुओं का ऊपर हमने ज़िक्र किया उसमें किसी का भी विवरण अवेस्ता में नहीं मिलता। 

अब इन पश्चिमी जंतुओं का ज़िक्र भी नए मंडलों में ही मिलता है। यहाँ तक कि नए मंडलों में भी जो सबसे पुराना पाँचवाँ मंडल है, उसमें भी ये नदारद हैं। इससे एक बात तो साफ़ हो जाती है कि जबतक वैदिक आर्य अपनी मूल पूरबिया भूमि से पश्चिमोत्तर की ओर नहीं बढ़े थे तबतक वे इन पश्चिमोत्तर प्राणियों से बिल्कुल अनजान ही थे। इन जंतुओं की चर्चा का ऋग्वेद में वितरण इस प्रकार है :

१ – पुराने मंडल २, ३, ४, ६ और ७ : कोई सूक्त नहीं और कोई ऋचा नहीं 

२ – पुराने मंडल २, ३, ४, ६ और ७ के पुनर्संशोधित सूक्तों में : कोई सूक्त नहीं और कोई ऋचा नहीं।

३ – नए मंडल १, ५, ८, ९ और १० : ३३ सूक्त, ३५ मंत्र या ऋचायें 


यदि हम तथ्यों की थोड़ी और गहरायी में जाकर पड़ताल करें तो पश्चिमी पालतू जानवरों में गदहों (गर्दभ, रासभ) और सुअरों (सुकर) का ज़िक्र तो हमें पुनर्संशोधित और नए मंडलों में तो मिलता है लेकिन पुराने मंडलों में नहीं मिलता। यहाँ पर अवेस्ता के ‘हुकर’ और टोकारिया के ‘केर्चापो’ की चर्चा भी समीचीन होगा। गदहे के लिए अवेस्ता का शब्द ‘क्षर’  सूत्रों में ‘खर’ के रूप में पाया जाता है।

पुनर्संशोधित मंडल :

तीसरा मंडल – ५३/(५, २३)

सातवाँ मंडल – ५५/४

नए मंडल :

पहला मंडल – ३४/९, ११६/२, १६२/२१

आठवाँ मंडल – ८५/७

यद्यपि पूरब के वैदिक आर्य भेड़ों से परिचित नहीं थे किंतु पश्चिम से आयातित ऊन से वे अवश्य परिचित थे जिसमें वे ‘सोम’ को छानकर पीते थे। जैसे-जैसे पश्चिम की ओर वे बढ़ते गए उनका यह परिचय गहराता गया। ‘भेड़’ के लिए प्रोटो-भारोपीय भाषा में नियमित शब्द ‘आवि-’ है। ऋग्वेद में सोमरस को छानने के लिए ऊनी कपड़े के लिए ‘आवि-‘ और इससे व्युत्पन्न शब्द ‘आव्य-‘, ‘आव्यय-’ और ‘अव्याय-‘ का प्रयोग हुआ है। ‘ऊन’ के लिए प्रोटो भारोपीय शब्द ‘ऊर्ण-’ या ‘ऊर्णा-‘ है, जिसके सजातीय और सपिंडी शब्द अधिकांश भारतीय-आर्य भाषाओं में मिल जाते हैं। ‘आवि-‘ शब्द का प्रयोग हमें ऋग्वेद में इस प्रकार मिलता है – तीन सबसे पुराने मंडल ६, ३ और ७ के पुराने सूक्तों में यह शब्द कहीं नहीं मिलता। केवल बीच के मंडल ४ और २ के पुराने सूक्तों, पुनर्संशोधित मंडलों और नए मंडलों में ही यह शब्द पाया जाता है।

पुराने सूक्त (मंडल ४ और २)  :

चौथा मंडल – २/५, २२/२

दूसरा मंडल – ३६/१

पुनर्संशोधित मंडल :

छठा मंडल – १५/१६

नए मंडल : 

                                                                                                                               (क्रमशः)



Friday, 15 January 2021

वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध ------ (१८)

(भाग - १७ से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य - (ण)

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)


प्राणी और वनस्पति  जगत के नामों के साक्ष्य 

 प्रोटो-भारोपीय भाषाओं के मूल स्थान से संबंधित भाषायी गवेषणाओं और शास्त्रार्थों में वनस्पति एवं जीव-जंतुओं के समाविष्ट स्वरूप की चर्चा एक विशेष स्थान रखती है। मल्लोरी और ऐडम्ज़ का विचार है कि “अमूमन हाथ में शब्दकोश थामकर  भारोपीय मूलभूमि की तलाश में निकले लोग प्राणी और वनष्पति जगत से मिले सबूतों पर ही अमल करते हैं।“ [मल्लोरी-ऐडम्ज़  :२००६:१३१]

इन सबूतों की जाँच हम नीचे करेंगे :

१ – शीतोष्ण बनाम ऊष्ण- कटिबंधीय क्षेत्र  

२ – ऋग्वेद और वैदिक ग्रंथों में वर्णित पूर्वी बनाम पश्चिमी क्षेत्र 

३ – पश्चिमोत्तर और उसके आगे का प्रोटो(प्राक/आद्य) भारोपीय क्षेत्र 

४ – सोम का सबूत 

५ – शहद का सबूत 

६ – सुरा और जंगली भैंसों का सबूत 

७ – घोड़ों का सबूत 

८ – गायों का सबूत 

[तलगेरी जी की पुस्तक ‘हाथी और आद्य-भारोपीय मूलभूमि (The elephant and the Proto Indo-European Homeland)’ में उपरोक्त सबूतों का वृतांत विस्तार में मिलता है।]

१- शीतोष्ण बनाम ऊष्ण- कटिबंधीय क्षेत्र  

शीतोष्ण क्षेत्र का प्राणी और वनष्पति जगत 

साधारण तौर पर यह दलील दी जाती है कि प्राणियों और पेड़-पौधों के नाम पर आधारित सबूत यहीं स्थापित करते हैं कि भारोपीय भाषाओं का मूल-स्थान भारत के बाहर के मैदानी भाग हैं। इसका कारण यह है कि भारोपीय परिवार की भिन्न-भिन्न शाखाओं में जीव-जंतुओं और पौधों के वही एक तरह के नाम हैं जो शीतोष्ण क्षेत्रों के नाम हैं न कि भारत जैसे ऊष्ण-कटिबंधीय या उप-ऊष्ण-कटिबंधीय क्षेत्रों वाले नाम। 

उदाहरण स्वरूप हम विजेल की इन बातों का स्मरण कर सकते हैं कि “सामान्यतया, आद्य-भारोपीय प्राणी-जगत और पौधों का संसार शीतोष्ण जलवायु का है [विजेल २००५:३७२] और ऋग्वेद में ‘भेड़िये’ और ‘बर्फ़’ के लिए आने वाले शब्द ठंडी आबोहवा की भाषायी यादों की ओर इशारा करते हैं [विजेल २००५ :३७३]

विजेल और आगे बढ़कर यह भी जोड़ते हैं कि ‘चाहे वह पड़ोस में सटा पुराना इरान हो या पूर्वी या पश्चिमी यूरोप का कोई क्षेत्र, दक्षिण एशिया से बाहर कोई भी पुराना खाँटी भारतीय शब्द हमें कहीं नहीं मिलता है। आर्यों के भारत से बाहर जाने के परिदृश्य में आम धारणा यह ज़रूर बनती है कि शेर, बाघ, हाथी, चीता, कमल, बाँस और स्थानीय भारतीय वृक्षों के लिए भारतीय शब्दों में कम-से-कम कुछ तो यहाँ भी बचे रहते [विजेल २००५:३६४-३६५]। अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए विजेल कहते हैं, ‘पश्चिम में कमल, बाँस और अन्य भारतीय पौधों के भारतीय नाम (अश्वत्थ, बिल्व, जंबु आदि) को खोजने पर कुछ भी हाथ नहीं लगता। ये नाम तो क्या, अन्य अर्थों में भी ऐसे नाम वहाँ कदापि नहीं मिलते।‘

इस बात में इस तथ्य को बिलकुल नज़र अन्दाज़ कर दिया गया है कि अधिकांश भाषाएँ सामान्य तौर पर उन्हीं जंतुओं और पौधों के नाम को बचा कर रखती हैं जो उसी भाषायी क्षेत्र में पाये जाते हैं। उन प्राणियों या पौधों के नाम वे संरक्षित नहीं कर पाती जो उनके क्षेत्र में नहीं पाए जाते या फिर बाहर के क्षेत्रों में पाए जाते हैं।  संक्षेप में हम यह भी कह सकते हैं कि दक्षिणी रूस के मैदानी भाग में पाए जाने वाले या फिर भारतीय भूभाग में नहीं पाए जाने वाले किसी भी प्राणी या पौधों के नाम भारतीय आर्य भाषाओं में नहीं पाए जाते। विजेल की बातों को हम दूसरे रूप में ऐसे भी व्यक्त कर सकते हैं कि ‘भारत में स्टेपी (दक्षिणी रूस के मैदानी भाग) के प्राणियों या पौधों के नाम खोजने पर कुछ भी हाथ नहीं लगता। ये नाम तो क्या, अन्य अर्थों में भी ऐसे नाम यहाँ कदापि नहीं मिलते।‘

अब जहाँ तक भेड़ियों और बर्फ़ का सवाल है, तो यह बात भी उतना ही सच है कि ये दोनों भारत के एक बड़े भूभाग में उतने ही स्थानीय और देसी हैं जितना उन मैदानी भागों की ठंडी आबोहवा वाले क्षेत्रों में। रुडयार्ड किप्लिंग ने अपनी किताब ‘जंगल-बुक’ में जब एक बच्चे का भेड़ियों के द्वारा पाल-पोस कर बड़ा किए जाने की कहानी लिखी तो उनका संदर्भ भारतीय बालक, भारत का जंगल और भारतीय भेड़िया था न कि उनकी भाषायी स्मृतियों में संचित कोई ब्रितानी भेड़िया। यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि किप्लिंग वास्तव में ब्रिटेन के निवासी थे।

बर्फ़ का भी वजूद भारत में भी उतना ही है जितना पश्चिम में। ‘इंसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ के अनुसार ध्रुवीय क्षेत्रों से बाहर स्थित यदि कोई ऐसा भूभाग है जिसका अधिकतम क्षेत्र स्थायी रूप से बर्फ़ से आच्छादित रहता है, तो वह है भारत का हिमालय। ऐसे भी ‘बर्फ़’ ऋग्वेद में अतीत की किसी भाषायी स्मृति के चिर प्रतिबिम्ब के रूप में चित्रित नहीं है। यह शब्द इसके नए मंडलों में मात्र एक या दो बार आता है जब वैदिक आर्य अपनी मूल भूमि हरियाणा से पश्चिम की ओर पंजाब होते हुए पशिमोत्तर में हिमालय का स्पर्श करते हुए अफ़ग़ानिस्तान की ओर बढ़ते हैं। ‘हिम’ शब्द ऋग्वेद के दस सूक्तों में जाड़े के मौसम के रूप में आया है। ये दस सूक्त १/३४/१, १/६४/१४, १/११६/८, १/११९/६, २/३३/२, ५/५४/१५, ६/४८/८, ८/७३/३, १०/३७/१० और १०/६८/१० है। जाड़े की ऋतु भारत के सभी भागों में आती है। मराठी में इसके लिए ‘हिवाला’ शब्द है। अतः ‘जाड़ा’ भी कोई ऐसा शब्द नहीं है जिसे हम ख़ास अर्थों में किसी भाषायी स्मृति के रूप में मान लें।  उसमें भी ऊपर के दस सूक्तिय संदर्भों से चार में तो इसका वर्णन भीषण गरमी से निजात दिलाने वाले मौसम के रूप में आया है न कि किसी सर्द मौसम की याद के रूप में! तीन सबसे पुराने मंडलों में तो बस एक ही जगह ६/४८/८ में यह शब्द आया है, जो कि पुनर्संशोधित मंडल है। इसका अत्यंत अर्वाचीन संदर्भ १०/१२१/४ में है, जहाँ इसका मतलब बर्फ़ है जो पश्चिमोत्तर में हिमालय की चोटियों को चादर की तरह लपेटे हुए हैं। नए मंडल में ८/३२/२६ में इस शब्द का एक और विवरण मिलता है जो बर्फ़ से बने हथियार के अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। 

अब आइए हम विजेल द्वारा प्रस्तुत तर्कों की तनिक छानबीन कर लें :

विजेल का कहना है कि ‘भारतीय जंतुओं और फूल-पौधों के नाम भारत के बाहर की किसी भारोपीय भाषा में नहीं मिलते हैं। इसलिए, यह बात ख़ारिज हो जाती है कि इन भारोपीय भाषाओं का उद्गम स्थल भारत था।‘ दूसरी ओर वह यह भी कहते हैं कि ‘भारत के बाहर के किसी भी भारोपीय प्राणी या पौधों के नाम भारत में नहीं मिलते।‘ लेकिन, यहाँ इसका कारण वह ढूँढ लेते हैं कि इन नामों का प्रयोग नहीं होने के कारण इस भारत भूमि से ये नाम लुप्त हो गए। फिर तो, इसी कारण को अपने पहले वक्तव्य में न लागू करने के पीछे उनका पूर्वाग्रही कुतर्क ही दिखायी पड़ता है। हम अब यह भी देखेंगे कि कुछ भारतीय जंतुओं यथा – सिंह, हाथी, चीता, लंगूर के नाम बाहर की भाषाओं में भी पाए जाते हैं।  कहीं-कहीं तो विजेल का तर्क अत्यंत हास्यास्पद हो जाता है। वह कहते हैं कि ‘ख़ानाबदोश जिप्सी लोगों ने बहुत हद तक भारतीय-आर्य भाषा के काफ़ी शब्दों (फ़राल ‘ब्रदर’, पानी ‘वाटर’, करल ‘वह करता है’ आदि) को पिछले हज़ार सालों से संजो कर रखा है। इस दौरान वह पूर्वोत्तर, उत्तरी अफ़्रीका और यूरोप में भटकते रहे (विजेल २००५:३६६)। भारत के काफ़ी भीतरी हिस्से से निकलकर जिप्सी हज़ारों साल पहले बाहर चले गए और उनकी भाषा, रोमानी, एक भारतीय आर्य भाषा है। अब यहाँ तक कि यदि रोमानी भाषा अपने सारे शब्दों को बचा कर नहीं रख पायी, तो भला भारोपीय परिवार की उन अन्य ग्यारह शाखाओं से, जो अपनी पश्चिमोत्तर भारत की बाहरी छोर की भूमि छोड़कर काफ़ी हज़ार साल पहले बाहर चली गयीं, कैसे आशा की जा सकती है कि वे अपने सारे शब्दों को संजो कर रखें! 

भारोपीय भाषाओं को बोलने वाले अलग-अलग समुदाय अपने जंतुओं और पेड़-पौधों के उन्ही नामों को संजो पाए जो उनके अपने मौलिक और भौगोलिक आवास में पाए जाते थे। वहाँ से बाहर के नामों को बचाए रखने में वे असमर्थ थे। इसीलिए, सामान्य तौर पर सिर्फ़ प्राणियों और वनस्पति जगत के नामों के विश्लेषण के आधार पर हम भारोपीय भाषाओं की मूल जन्मभूमि का निर्धारण नहीं कर सकते। 

शीतोष्ण क्षेत्र में पाए जाने वाले जानवरों के नाम (भेड़िया, भालू, बनबिलाव, लोमड़ी, गीदड़, हिरन, मृग, साँड़, गाय, ख़रगोश, चमगादड़, ऊद, ऊदबिलाव, मूषक, हंस, बत्तख़, कुत्ता, बिल्ली, घोड़ा, भेड़, सुअर आदि) भारतीय-आर्य और भारोपीय दोनों भाषाओं में एक जैसे ही हैं। इसका एक कारण तो यह है कि इसमें से सभी जानवर भारतीय भूभाग में पाए जाते हैं। दूसरी बात यह है कि जो जानवर (या नाम) यदि भारतीय भूभाग में नहीं पाए जाते तो वे निश्चित तौर पर भारत के उन पश्चिमोत्तर प्रांतों में तो अवश्य ही पाए जाते हैं जिन्हें पूरी तरह से भारतीय संस्कृति का ही गुरुत्व-क्षेत्र कहा जा सकता है। साथ ही इन पश्चिमोत्तर क्षेत्रों के साथ यह भी उतना ही सच है कि भारत से बाहर निकलने वाले समुदाय इसी रास्ते अपने नए ठिकानों की ओर प्रस्थान किए थे। 

इस विषय में डाइन्स (Dyens) की बातें भी ध्यान आकर्षित करती हैं, “प्रोटो-भारोपीय भाषाओं के बोले जाने वाली जगहों के बारे में पर्याप्त संकेत भारोपीय भाषाओं में प्राणी जगत एवं वानस्पतिक जगत के नामों के लिए प्रयुक्त शब्दों में मिल जाते हैं। जानवरों में ‘भालू’ और वृक्षों में ‘बीच’ के पेड़ इसके सुपरिचित उदाहरण हैं। औषधीय महत्व वाले पौधों के प्राकृतिक पर्यावास का वानस्पतिक  मानचित्र खींचने के उपरांत भाषाविदों ने यह साबित कर दिया है कि इन पौधों की क़ुदरती पैदाइश और असली रिहाईश शीतोष्ण आबोहवा की ज़मीन ही है। (ड़ाइंस १९८८:४)”

अब इस वक्तव्य में चर्चित उदाहरण ‘बीच’ के पेड़ और ‘भालू’ पर विचार करें जिनका मूल आवास शीतोष्ण क्षेत्र बताया गया है :

१ – ‘बीच’ का पेड़ केवल यूरोप में पाया जाता है और ‘इसके लिए तथाकथित प्रोटो-भारोपीय शब्द भी सिर्फ़ यूरोप में ही पाया जाता है!’ मात्र पाँच ही ऐसी यूरोपीय भाषाएँ (इटालिक, सेल्टिक, जर्मन, बाल्टिक और स्लावी) हैं, जिसमें ‘बीच’ के सजातीय और इसके यूरोपीय अपभ्रंश ‘बा:को’ से बने शब्दों का प्रचलन मिलता है। यहाँ तक कि इसके लिये प्रयुक्त बाल्टिक और स्लावी भाषाओं के शब्द भी जर्मन से ही लिए गए लगते हैं (गमक्रेलिज १९९५ :५३४)। ग्रीक और अल्बानी भाषा में ‘बीच’ के लिए अलग शब्द हैं। वे शब्द भी जो अपभ्रंश ‘बा:को’ से व्युत्पन्न प्रतीत होते हैं, उनका मतलब ‘ओक’ के वृक्ष से है। एशियायी शाखाओं की अनाटोलियन, टोकारियन, अर्मेनियायी, ईरानी और भारतीय-आर्य भाषाओं में ऐसे  शब्द की कोई आहट मात्र भी नहीं है। फिर भी, ‘बीच’ के वृक्ष और शीतोष्ण जलवायु को आधार बनाकर यह दलील सदियों से दी जाती रही है कि यूरोप ही भाषाओं की मूलभूमि है।

२ – शीतोष्ण जलवायु को भाषाओं की मूलभूमि होने के तर्क के समर्थन में ‘भालू’ को भी खड़ा किया जाता रहा है। मूल तथ्य यह है कि:

क – इस संसार में भालुओं की आठ प्रजातियाँ हैं। उसमें तीन तो अपनी ऐतिहासिक भारोपीय मूलभूमि से बाहर के क्षेत्रों तक ही सीमित हैं। और, पाँच भारत में रहने वाले। भूमंडल में इन सभी प्रजातियों की बसावट को इस सारणी से समझा जा सकता है : 

ऊपर की सारणी से यह स्पष्ट होता है कि आधी से अधिक प्रजातियाँ तो बहुलता में भारत में ही पायी जाती हैं। इसमें आलसी भालू तो प्रमुखता से केवल भारत में ही पाया जाता है। दूसरी ओर इस जनसंख्या वितरण पर बारीकी से ग़ौर करें तो मुख्य रूप से एक ही प्रजाति ‘शीतोष्ण’ जलवायु वाले क्षेत्र में पायी जाती है। इस आधार पर ‘शीतोष्ण- जलवायु में भालू’ वाली दलील दम तोड़ती नज़र आ रही है। 

ख – साथ ही, ‘भालू’ के सजातीय शब्दों की व्युत्पति के जो साझे स्त्रोत हैं वे बाक़ी की ग्यारह शाखाओं में नहीं पाये जाते हैं।

(क्रमशः )


Friday, 1 January 2021

वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध ------ (१७)


(भाग - १६ से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य - (ढ)

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)


दशमलव के विकास की चौथी अवस्था 

दशमलव पद्धति के विकास की चौथी अवस्था मात्र उत्तर भारत की भारतीय आर्य भाषाओं को ही प्राप्त हुई।  यहाँ तक कि सिंहली सरीखी उत्तर भारत की वे आर्य भाषाएँ जो यहाँ कि मिट्टी से बाहर चली गयी, वे भी विकास की इस अवस्था से वंचित रहीं। इस अवस्था में भाषाओं में १ से १० तक की संख्याएँ, दहाई की २० से ९० तक की संख्याएँ और १०० की संख्या के लिए शब्दों की उपलब्धता है। ११ से १९ तक की संख्यायों के लिए एक ख़ास ढंग से शब्दों का गठन है। बाक़ी संख्यायों ( २१-२९, ३१-३९, ४१-४९, ५१-५९, ६१-६९, ७१-७९, ८१-८९ और ९१-९९) के लिए शब्दों का गठन दूसरे प्रकार का है। गठन का यह तरीक़ा न तो सीधे-सीधे ढंग से ही है और न ही इनकी कोई नियमित व्यवस्था ही है।  पूरी दुनिया में अपने आप में यह ढंग इतना अनोखा है कि इसमें १ से १०० तक की संख्यायों को रटने के सिवा और कोई चारा शेष नहीं रहता है। उदाहरण के लिए हम हिंदी, मराठी और गुजराती भाषाओं में संख्यायों के लिए प्रयुक्त शब्दों के गठन पर विचार करें।

 हिंदी   

१-९ : एक, दो तीन, चार, पाँच, छः, सात, आठ, नौ, दस। 

११-१९ : ग्यारह, बारह, तेरह, चौदह, पंद्रह, सोलह, सत्रह, अठारह, उन्नीस।

दहाई अंक १०-१०० : दस, बीस, तीस, चालीस, पचास, साठ, सत्तर, अस्सी, नब्बे, सौ।

अन्य संख्याएँ ‘इकाई रूप + दहाई रूप’ के संयोग से बनाती हैं। जैसे २१ : एक + बीस = इक्क-ईस। यहाँ पर ‘एक’ का ‘इक्क’ और ‘बीस’ का ‘ईस’ में रूपांतरण हो जाता है। इस तरह के रूपांतरण २१ से लेकर ९९ तक की संख्यायों में देखे जा सकते हैं :


दहाई रूप 

२० बीस : -ईस (२१, २२, २३, २५, २७, २८), -बीस (२४, २६) 

३० तीस : -तीस (२९, ३१, ३२, ३३, ३४, ३५, ३६, ३७, ३८)

४० चालीस : -तालीस (३९, ४१, ४३, ४५, ४७, ४८), -यालीस (४२, ४६), -वालीस (४४)

५० पचास : -चास (४९), -वन (५१, ५२, ५४, ५७, ५८), -पन (५३, ५५, ५६)

६० साठ :  -सठ (५९, ६१, ६२, ६३, ६४, ६५, ६६, ६७, ६८)

७० सत्तर :  -हत्तर (६९, ७१, ७२, ७३, ७४, ७५, ७६, ७७, ७८)

८० अस्सी :  -आसी (७९, ८१, ८२, ८३, ८४, ८५, ८६, ८७, ८८, ८९)

९० नब्बे  :  -नवे (९१, ९२, ९३, ९४, ९५, ९६, ९७, ९८, ९९)


इकाई रूप 

१ एक : इक्क- (२१), इकत- (३१), इक- (४१, ६१, ७१), इकी- (८१), इक्या- (५१, ९१)

२ दो : बा- (२२, ५२, ६२, ९२), बत- (३२), ब- (४२, ७२), बे- (८२)

३ तीन : ते- (२३), तें- (३३, ४३), तिर- (५३, ६३, ८३), ति- (७३), तीरा- (९३)

४ चार : चौ- (२४, ५४, ७४), च- (४४), चौं- (३४, ६४), चौर- (८४), चौरा- (९४)

५ पाँच : पच्च- (२५), पै- (३५, ४५, ६५), पच- (५५, ७५, ८५), पंचा- (९५)

६ छः : छब- (२६), छत- (३६), छी- (४६, ७६), छप- (५६), छिया- (६६, ९६), छिय- (८६)

७ सात : सत्ता- (२७, ५७, ९७), सै- (३७, ४७), सड़- (६७), सत- (७७), सत्त- (८७)

८ आठ : अट्ठा- (२८, ५८, ९८), अड़- (३८, ४८, ६८), अठ- (७८, ८८)

९ नौ :  उन- (२९, ३९, ५९, ६९, ७९), उनन- (४९), नव- (८९), निन्या- (९९)


मराठी  

१-९ : एक, दों, तीन, चार, पाँच, सहा, सात, आठ, नौ 

११- १९ : अकरा, बारा, तेरा, चौदा, पंढरा, सोला, सतरा, अठरा, एकोनिस 

दहाई अंक १०-१०० : दहा, वीस, तीस, चालीस, पन्नास, साठ, सत्तर, अईसी, नव्वद, शम्भर 

अन्य संख्याएँ इकाई और दहाई रूपों के संयोग से बनाती हैं। जैसे – २१ : एक + वीस = एक-वीस 

२१-९९ तक की संख्यायों के इकाई और दहाई रूपों में भी रुप-परिवर्तन के तत्वों को देखा जा सकता है :

दहाई रूप 

२० वीस : -वीस (२१, २२, २३, २४, २५, २६, २७, २८)

३० तीस : -तीस (२९, ३१, ३२, ३३, ३४, ३५, ३६, २७, ३८)

४० चालीस : -चालीस (३९, ४१, ४२, ४३, ४४, ४५, ४६, ४७, ४८)

५० पन्नास : -पन्नास (४९), -वन्न (५१, ५२, ५५, ५७, ५८), -पन्न (५३, ५४, ५६)

६० साठ : -साठ (५९), -सश्ठ (६१, ६२, ६३, ६४, ६५, ६६, ६७, ६८)

७० सत्तर : -सत्तर (६९), -हत्तर (७१, ७२, ७३, ७४, ७५, ७६, ७७, ७८)

८० अईसी : -अईसी ( ७९, ८१, ८२, ८३, ८४, ८५, ८६, ८७, ८८)

९० नव्वद : -नव्वद (८९), -न्नव (९१, ९२, ९३, ९४, ९५, ९६, ९७, ९८, ९९)  

इकाई रूप १ एक : एक- (२१, ३१, ६१), एक्क- (४१), एक्क्या- (८१, ९१), एक्का- (५१, ७१)

२ दों : बा- (२२, ५२, ६२, ७२), बत- (३२), बे- (४२), बया- (८२, ९२)

३ तीन : ते- (२३), तेह- (३३), तरे- (४३, ५३, ६३), तरया- (७३, ८३, ९३)

४ चार : चो- (२४), चौ- (३४, ५४, ६४), चव्वे- (४४), चौरया- (७४, ८४, ९४)

५ पाच : पंच- (२५), पस- (३५), पंचे- (४५), पंचा- (५५), पा- (६५), पंच्या- (७५, ८५, ९५)

६ सहा : सव- (२६), छत- (३६), सेहे- (४६), छप- (५६), सहा- (६६), शहा- (७६, ८६, ९६)

७ सात : सत्ता- (२७, ५७), सड़- (३७), सत्ते- (४७), सड़ु- (६७), सत्तया- (७७, ८७, ९७)

८ आठ : अट्ठा- (२८, ५८), अड़- (३८), अट्ठे- (४८), अड़ु- (६८), अट्ठया- (७८, ८८, ९८)

९ नौ : एकोन- (२९, ३९, ४९, ५९, ६९, ७९, ८९), नव्वया- (९९)


गुजराती 

१-९ : एक, बे, त्रन, चार, पाँच, छ, सात, आठ, नव 

११-१९ : अग्यारअ , बारअ , तेरअ, चौदा, पंधरा, सोला, सतरा, अठरा, एकोनिश 

दहाई १०-१०० : दहा, वीस, तीस, चालीस, पन्नास, साठ, सत्तर, अईसी, नव्वद, शम्भर 

बाक़ी संख्यायों का गठन इकाई और दहाई के संयोग से होता है। जैसे – २१ : एक +वीस = एक-वीस।

अब २१-९९ तक की संख्यायों के इकाई और दहाई रूपों के गठन में होने वाले परिवर्तन पर हम थोड़ी दृष्टि डाल लें :

दहाई रूप   

२० वीस : -ईस (२५), -वीस (२१, २२, २३, २४, २६, २७, २८)

३० त्रीस : -त्रीस (२९, ३१, ३२, ३३, ३४, ३५, ३६, ३७, ३८)

४० चालीस : -तालीस (४१, ४२, ४३, ४४, ४५, ४६, ४७, ४८), -चालीस (३९), -आलीस (४४)

५० पचास : -पचास (४९), -वन (५१, ५२, ५५, ५७, ५८), -पन (५३, ५४, ५६)

६० साठ  : -साठ (५९), -सठ (६१, ६२, ६३, ६४, ६५, ६६, ६७, ६८)

७० सित्तर : -सित्तर (६९), -ओतेर (७१, ७२, ७३, ७४, ७५, ७६, ७७, ७८)

८० ईसी : -ईसी (७९), -आसी (८१, ८२, ८३, ८४, ८५, ८६, ८७, ८८, ८९)

९० नेवु : -नु (९१, ९२, ९३, ९४, ९५, ९७, ९८, ९९), -न्नु (९६)


इकाई रूप 

१ एक : एक्- (२१, ४१, ६१, ७१), एक- (३१), एका- (५१, ९१), एकी- (८१)

२ बे : बा- (२२, ५२, ६२, ७२), ब- (३२), बे- (४२), ब् - (७२), बय- (८२)

३ त्रन : ते- (२३, ३३), तरे- (४३, ५३, ६३), तय- (८३), त्- (७३), तरा- (९३)

४ चार :  चो- (२४, ३४, ५४, ६४), चम- (४४, ७४), चोरय- (८४), चोरा- (९४)

५ पांच : पच्च- (२५), पा- (३५, ६५), पिस- (४५), पंच- (७५, ८५), पंचा- (५५, ९५)

६ छ: : छ- (२६, ३६, ९६), छे- (४६), छप- (५६), छा- (६६), छय- (८६), छ्- (७६)

७ सात : सत्ता- (२७, ५७, ९७), सद- (३७), सुड- (४७), सड़- (४७), सित्य- (७७, ८७)

८ आठ : अट्ठा- (२८, ५८, ९८), अड़- (४८, ६८), अड़ा- (३८), इठ्य- (७८, ८८)

९ नव : ओगण- (२९, ३९, ४९, ५९), अगणो- (६९), ओगणा- (७९), नेवय- (८९), नव्वा- (८९) 


२१ से ९९ तक की संख्यायों के लिए शब्दों के गठन में इसी तरह की अनियमितता और लचीलेपन की जटिलता से उत्तर भारत की सारी आर्य-भाषाएँ संक्रमित हैं। यह स्थिति सुदूर उत्तर की कश्मीरी भाषाओं में तो है ही, पश्चिम में अफगनिस्तान की ‘पश्तो’ भाषा भी इस लक्षण से अछूती नहीं है जबकि पश्तो भाषा ‘ईरानी-शाखा’ की भाषा है। किंतु साथ ही ध्यान देने वाली बात यह है कि इस तरह का कोई भी लक्षण भारत से बाहर की किसी भाषा में नहीं मिलता है। यह बात भी उतनी ही उल्लेखनीय है कि शब्दों के संयोजन की एक भारतीय-आर्य भाषा की शैली दूसरी भारतीय-आर्य भाषा की शैली से किंचित मेल नहीं खाती है।  उदाहरण के तौर पर २१, ३१ और ६१ में मराठी में १ के लिए एक ही रूप ‘एक-‘ है। हिंदी में इनके लिए तीन अलग-अलग रूप हैं। २१(इक्कीस) के लिए ‘इक्क-‘, ३१(इकतीस) के लिए ‘इकत-‘ और ६१(इकसठ) के लिए ‘इक-‘ शब्दों के रूप हैं। गुजराती में दो शब्द-रूप आते हैं। ‘एक्-‘ (२१ और ६१) में  तथा ‘एक-‘ (३१) में। उसी तरह पाँच के लिए:

हिंदी में एक रूप ‘पै-‘ ३५ (पैंतीस), ४५ (पैतालीस) और ६५ (पैसठ) के लिए।

गुजराती में दो रूप – ‘पा-’ ३५ और ६५ में  तथा ‘पिस-‘ ४५ में। और 

मराठी में तीन रूप – ‘पस-’ ३५ में, ‘पंचे-‘ ४५ में तथा ‘पा-‘ ६५ में।

हमने इन तीन भारतीय आर्य भाषाओं में २१ से ९९ तक की संख्यायों के लिए शब्द-रूपों गठन को ऊपर की सारणियों में दर्शाया है। लेकिन इन शब्दों को प्रयोग हेतु याद रखने के लिए इन सारणियों से कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हैं और इन्हें रटने के सिवा और कोई चारा भी नहीं है। दुनिया की बाक़ी भाषाओं में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। वहाँ ज़्यादा से ज़्यादा १ से १० या १९ और दहाई संख्यायों (२०, ३०, ४०, ५०, ६०, ७०, ८०, ९०) को बस हृदयंगम करने की ज़रूरत है। इनकी ही  सहायता से संयोजन के कुछ ख़ास तरीक़ों से २१ से ९९ तक की बाक़ी संख्याएँ अपने आप दिमाग़ में घुस जाती हैं। यह बात बाहर की भाषाओं के साथ-साथ भारत के अंदर की ग़ैर भारोपीय भाषाओं ( द्रविड़, औस्ट्रिक, चीनी-तिब्बती, बुरूशासकी) पर भी लागू होती है। अंडमान की भाषाओं में तो ३ और ५ के अलावा कोई शब्द ही नहीं है। भारत के बाहर बोली जाने वाली आभारतीय आभारोपीय भाषाओं और यहाँ तक कि भारतीय-आर्य परिवार की ही सिंहली भाषा का भी यही हाल है।

भारोपीय भाषाओं के भारत की भूमि में उद्भव होने की अवधारणा के संदर्भ में निस्संदिग्ध तौर पर निनलिखित बातें स्पष्ट होती हैं : 

१ – मौलिक प्रोटो (प्राक) भारोपीय भाषाओं का प्राचीनतम स्वरूप दशमलव-पद्धति के विकास की पहली अवस्था का है। दशमलव के विकास की दूसरी अवस्था नहीं आने तक हमारे पास इस बात के साफ़-साफ़ सबूत नहीं हैं कि १० के बाद की संख्याएँ वजूद में कैसे आयीं।

२ – निश्चित तौर पर दशमलव के विकास की दूसरी अवस्था में ही पहली दो शाखाओं ने अपनी मूलभूमि को छोड़ा होगा। अनाटोलियन (हित्ती) भाषा में १० से ऊपर की संख्यायों के हमारे पास कोई प्रामाणिक अभिलेख मौजूद नहीं है, लेकिन टोकारियन बी भाषा में इसके प्रमाण उपलब्ध हैं। प्राचीनतम भारतीय-आर्य भाषा संस्कृत और बोल-चाल की सिंहली भाषा में भी हमारे पास लिखित प्रमाण मौजूद हैं। बताते चले कि सिंहली भी अत्यंत प्राचीन भारतीय-आर्य भाषा है जिसने ‘वाटर’ के लिए ‘वतुर’ शब्द को अभी तक बचाए रखा है जबकि संस्कृत से इस शब्द का लोप हो गया है।

३ – बाक़ी सभी नौ भारोपीय शाखाएँ (इटालिक, सेल्टिक, जर्मन, बाल्टिक, स्लावी, अल्बानियायी, ग्रीक, अर्मेनियायी और ईरानी) तथा भारत भूमि से बाहर निकलने वाली सिंहली भाषा  दशमलव-विकास की तीसरी अवस्था में पहुँच गयी। यहाँ पर यह बताना उचित होगा कि दक्षिण-पश्चिम यूरोप में सेल्टिक भाषा ने बास्क-भाषा के प्रभाव में आकर विंशमलव पद्धति को अपना लिया।  इससे एक बात साफ़ होती है कि संस्कृत के मानक रूप प्राप्त कर लेने के बाद और दशमलव-विकास की दूसरी अवस्था में हित्ती और टोकारियन भाषा के बाहर निकल जाने के बाद इन सारी नवों भारोपीय शाखाओं और सिंहली भाषा के उद्भव की उत्तरोत्तर प्रक्रिया साथ-साथ दशमलव विकास के तीसरे चरण में जारी रही।

४ – अपनी ख़ुद की भारतीय-आर्य भाषा सिंहली के साथ-साथ अन्य ग्यारहों  शाखाओं के भारतीय ज़मीन छोड़ देने के बाद यहाँ बची रह  गयी।  भारतीय आर्य भाषा ने अब दशमलव के विकास की चौथी अवस्था में प्रवेश कर लिया है।


संख्या ‘१’ पर कुछ ख़ास बात  

भारोपीय भाषाओं की पहली संख्या ‘१’ पर हम थोड़ी नज़रें गड़ाएँ और देखें कि इसके साथ जुड़ी कुछ ख़ास बातें क्या हैं। भारोपीय भाषाओं में ‘१’ के लिए प्रयुक्त शब्दों में अधिकांश की उत्पत्ति का मूल दो संयोजित प्रोटो भारोपीय शब्द हैं – ‘ओई-नो’ और ‘ओई-को’! ये दोनों शब्द ग़ैर-भारतीय-ईरानी और भारतीय-ईरानी, दोनों शाखाओं, में क्रमशः समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। इन दो शब्द-विभाजनों पर भाषाशास्त्रियों ने ‘प्राचीन भारोपीय’ शब्दों की पड़ताल करने के लिए ज़्यादा ज़ोर दिया है। भारतीय-ईरानी शाखा में ‘ओई-नो’ शब्द के प्रतिनिधित्व का कोई नामो-निशान नहीं है। उसी तरह ग़ैर-भारतीय-ईरानी शाखा में भी ‘ओई-को’ शब्द का कोई अस्तित्व नहीं है (जबतक कि अर्मेनियायी शब्द ‘मेक’ को हम प्रतिनिधि शब्द न मान लें)। 

किंतु, एक भाषा ऐसी है जिसमें इन दोनों, ‘ओई-नो’ और ‘ओई-को’ की तुलना में वैकल्पिक शब्द-रूप मौजूद हैं। यह अभारोपीय भाषा बुरूशासकी है जो उत्तर में पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले कश्मीर में बोली जाती है। बुरूशासकी में ‘वन’ = ‘हिन’ (या हेन) और ‘हिक’। ‘ओई-नो’ से मिलता जुलते शब्द द्रविड़-शाखाओं में पायी जाती है जैसे – तमिल में ‘ओन-रु’, मलयालम में ‘ओन-नु’ और कन्नड़ में ‘ओन-डु’। दूसरी ओर तेलगु में ‘’ओक-टी’ शब्द पाया जाता है। कहने का अर्थ यह है कि इन दोनों  शब्द-युग्मों ‘ओई-नो’ और ‘ओई-को’ की उपस्थिति की साफ़-साफ़ आहट  आज भी भारत की भूमि में सुनायी दे रही है।  कहीं यह इस बात का प्रमाण तो नहीं कि वह क्षेत्र जहाँ से ग़ैर भारतीय-ईरानी और भारतीय ईरानी शाखाएँ क्रमशः अपना ‘ओई-नो’ और ‘ओई-को’ साथ लेकर एक दूसरे से बिछुड़ गयीं, वह यही भारत की भूमि है। 

कुछ ऐसी भी भारोपीय भाषाएँ हैं जिनमें ‘वन’ शब्द की व्युत्पति में ‘ओई-नो’ और ‘ओई-को’ का कोई योगदान नहीं है। परंतु, ये सभी भाषाएँ इस शब्द के लिए संस्कृत के शब्द ‘सम’ और ‘एव’  से किसी-न-किसी रूप में जुड़ी हैं। इन दोनों शब्दों का अर्थ ‘वही/वहीं (अंग्रेज़ी में सेम) होता है। कश्मीर के उत्तर की टोकारियन ए भाषा में ‘सस’ (पुल्लिंग) और ‘साम’ (स्त्रीलिंग) शब्द आते हैं। टोकारियन बी भाषा में दोनों लिंगों के लिए एक ही शब्द ‘से’ आता है। यूनानी पूलिंग शब्द ‘हेस’ तो टोकारियन शब्द ‘सेंस’ का सपिंडी ही है। भारत से पश्चिम अवेस्ता में ‘एव’ और प्राचीन पारसी भाषा में ‘ऐव’ शब्द है। कुछ अत्याधुनिक ईरानी भाषाओं और दारदी/दर्दु/पिसाच भाषाओं ( यह भाषा मुख्य रूप से उत्तरी पाकिस्तान के गिलगित, बालतिस्तान, खाइबर पख़्तूनखवाँ, उत्तर भारत की कश्मीर घाटी और पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान की चेनब घाटी में बोली जाती है) में ‘एव’ शब्द पाया जाता है और ईरानी पश्तो भाषा में ‘यव’ शब्द पाया जाता है। हालाँकि आधुनिक पारसी भाषा सहित अत्याधुनिक ईरानी और दारदी भाषाओं के शब्द ‘यक’, बलूचि शब्द ‘यक’ तजिक शब्द ‘यक’, कर्दिस शब्द ‘येक’ और कश्मीरी शब्द ‘अख’, ये सभी व्युत्पति में ‘ओई-को’ स्वरूप वाले ही हैं। इन सब बातों की पड़ताल करने के उपरांत सारे सबूत तो भारत के ही मूलभूमि होने की ओर संकेत करते हैं। 

दो और शब्द हैं जो हमारा ध्यान खिंचते हैं। पहला शब्द है – ‘मिअ’ जो यूनानी अर्थात ग्रीक भाषा का है। और दूसरा शब्द अर्मेनियायी भाषा का ‘मी’ या ‘मेक’ है। अब इन दोनों शब्दों की तुलना हम औस्ट्रिक परिवार की इन भाषाओं में ‘१’ के लिए आने वाले शब्दों से करें। संथाली में ‘मित’, मुंडारी में ‘मी’, कोरकु में ‘मीअ’, खरिया में ‘मोइ’, सवारा में ‘मि’, जुआंग में ‘मिन’ और गड़बा में ‘मुइरो’। कहीं ग्रीक और अर्मेनियायी भाषा के ये  समानार्थक शब्द औस्ट्रिक परिवार से ही व्युत्पन्न तो नहीं हैं?  जहाँ तक औस्ट्रिक परिवार के शब्दों की मौलिकता का प्रश्न है, तो उनकी निर्विवादता की पुष्टि इस बात से भी मिलती है कि उनका सपिंडी शब्द ‘मोत’ औस्ट्रिक परिवार की वियतनामी भाषा और ‘मुएय’ ख्मेर कंबोडियायी भाषा में मिलता है।


Wednesday, 23 December 2020

काव्य-संग्रह 'कासे-कहूँ' का आभासी लोकार्पण

रविवार दिनांक २० दिसम्बर २०२० को अपराह्न ११ बजे मेरे द्वारा रचित काव्य- संकलन ‘कासे कहूँ’ का प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था ‘लेख्य-मंज़ुषा’ के चौथे वार्षिकोत्सव में आभासी लोकार्पण किया गया। सभा की अध्यक्षता पटना विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष, हिंदी एवं अंग्रेज़ी के मूर्धन्य साहित्यकार, कवि एवं उत्कृष्ट चित्रकार श्री शैलेश्वर सती प्रसाद ने की। ‘हस्ताक्षर’ पत्रिका की संस्थापक-संपादक और ‘लाड़ली मीडिया अवार्ड’ से सम्मानित चर्चित साहित्यकार श्रीमती प्रीति अज्ञात, विश्वगाथा प्रकाशन परिवार की लब्धप्रतिष्ठ गुजराती और हिंदी साहित्यकार श्रीमती भावना भट्ट और कवयित्री पूनम मोहन ने इस अवसर पर अपने बहुमूल्य विवेचनात्मक विचार रखे। ‘लेख्य-मंज़ुषा’ परिवार की प्रमुख श्रीमती विभा रानी श्रीवास्तव ने कैलिफ़ोर्निया से दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया और अतिथियों का स्वागत किया। अपोलो अस्पताल, नयी दिल्ली की वरिष्ठ चिकित्सक डॉक्टर रश्मि ठाकुर के सुमधुर स्वर में पुस्तक के शीर्षक गीत ‘कासे कहूँ हिया की बात ….’  के गायन के साथ कार्यक्रम का प्रारम्भ और समापन हुआ। श्रीमती विभा रानी श्रीवास्तव द्वारा संचालित पूरे कार्यक्रम का सजीव प्रसारण फ़ेसबुक लाइव पर हुआ। 

इस पुस्तक की भूमिका प्रसिद्ध साहित्यकार श्री शिवदयाल ने लिखी है।

इस पुस्तक का कवर डिजाइन चित्रकार श्री राकेश कुमार ने किया है।

हम अपने पाठकों का हृदय से आभार व्यक्त करते हैं जिनकी बहुमूल्य प्रेरणा एवं प्रोत्साहन ने हमारे अंदर सृजन के संस्कार को पुष्ट किया।


पुस्तक का अमेजन लिंक: AMAZON.IN

                                    Kase kahu



Friday, 18 December 2020

वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध ------ (१६)

(भाग - १५ से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य - (ड)

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)


भारतीय-यूरोपीय संख्यायों के सबूत 

‘भारत-भूमि अवधारणा’ के पक्ष में एक और अप्रत्याशित और निर्णायक सबूत बनकर  हमारे सामने  भारतीय-यूरोपीय संख्यायों की व्यवस्था का सच आता है। इसकी विस्तार से चर्चा श्री तलगेरी ने अपनी पुस्तक “संख्यायों और अंकों की दुनिया में भारत का अनोखा स्थान’ ( India’s Unique Place in the world of Numbers and Numerals) में की है। संक्षेप में हम उनकी यहाँ चर्चा करेंगे। भारोपीय भाषाओं में संख्यायों की व्यवस्था दशमलव- प्रणाली में परिचालित होती हैं। इनका आधार अंक १० (दस) होता है। दुनिया की सारी भाषाओं में क़रीब-क़रीब यहीं व्यवस्था दिखायी देती है और शायद इसका एक कारण क़ुदरत की वह व्यवस्था हो सकती है कि उसने मनुष्य के दोनों हाथों में गिनने के लिए कुल मिलाकर दस अंगुलियाँ दी है। ऐसे तो आप हाथ और पैर दोनों की अंगुलियों को गिनने के लिए ले लें तो कुल मिलाकर बीस अंगुलियाँ हो जाती हैं, और इसी कारण कहीं-कहीं दस आधार अंक वाली  ‘दशमलव-प्रणाली’ की जगह बीस आधार अंक वाली ‘विंशमलव-प्रणाली’ के प्रचलन के भी दृष्टांत मिलते हैं। भारोपीय भाषाओं के आने से पहले दक्षिण-पश्चिम यूरोप में बोली जाने वाली बास्क भाषा के प्रभाव में ‘आइरिश’ और ‘वेल्श’ जैसी सेल्टिक भाषाओं में भी यह ‘विंशमलव-प्रणाली’ विकसीत हो गयी थी और यहाँ तक कि इटालिक और फ़्रेंच भाषाओं पर भी इसके छिटपुट प्रभाव देखने को मिल जाते हैं।

यूस्करा (बास्क) 

१–१० : बट, बिगा, हिरूर, लौर, बोर्त्ज़, से, जजपी, ज़ोर्टजी, बेडेरटजि, हमर 

११-१९ : हमेक, हमबि, हमहिरर, हमबोर्टज, हमसे, हमजजपी, हमज़ोर्टजी, हमरेटजि 

२०, ४०, ६०, ८०, १०० : होगे, बेर्रोगे, हिरुएटनोगे, लुएटनोगे, एहुन 

अन्य संख्या : विंशमलव + टा + १-१९

अतः २१ : होगे टा बट (२० +टा +१), 

९९ : लुएटनोगे टा हमरेटजि (८० + टा + १९)

वेल्श ( भारोपीय – सेल्टिक)

१-१० : उन, दौ, त्रि, पेडवर, पम्प, छवेच, सैथ, वय्ठ, नव, देग 

११-१५ : उन-अर-द्देग, देद्देग, त्रि-अर-द्देग, पेडवर-अर-द्देग, ब्य्म्थेग  

१६-१९ : उन-अर-ब्य्म्थेग, दौ-अर-ब्य्म्थेग, त्रि-अर-ब्य्म्थेग, पेडवर-अर-ब्य्म्थेग 

२०, ४०, ६०, ८०, १०० : हुगैं, देगैं, त्रिगैं, पेडवरगैं, सेंट 

२१ से लेकर ९९ तक की संख्यायों के बनने के लिए नियमित व्यवस्था इस प्रकार है – १-१९ + अर + विंशमलव (पुरानी अंग्रेज़ी भाषा की तरह यहाँ भी पहले इकाई संख्या आती है। जैसे २१ के लिए – उन अर हगैं (१ + अर +२०) और ९९ के लिए – पेडवर-अर- ब्य्म्थेग अर पेडवरगैं (१९ + अर + ८०)

आइरिश (भारोपीय-सेल्टिक)

१-१० : आओं, दो, त्रि, केथैर, कूइग, से, सीख़्त, ओख्ट, नोई, देख 

११-१९ : आओं-देग (१ + १०), आदि।

२०, ४०, ६०, ८०, १०० : फिखे, दा-फिखिद, , त्रि-फिखिद, खेथ्रे-फिखिद, कीद 

अन्य संख्याएँ : १-१९ + इस + विंशमलव ( यहाँ भी इकाई संख्या पहले आएगी)

अतः २१ : आओं इस फिखे, ९९ : नोई-देग इस खेथ्रे-फिखिद (१९ + इस + ८०)

[ किंतु इस भाषा में वैकल्पिक तौर पर दशमलव-प्रणाली का भी चलन पाया जाता है। १०, २०, ३० आदि : देख, फिखे, त्रोखा, देखीद, काओगा, सीसका, सीखटो, ओखटो, नोखा, कीद ]

फ़्रांसीसी (भारोपीय-इटालिक) (किंतु आंशिक तौर पर ही)

१-१० : उन, डू, त्रोईस, कुआत्रे, सिंक, सिक्स, सेप्ट, हुईट, नेफ़, दिक्ष 

११-१९ : ओंजे, डौज़े, ट्रेजे, कुआतोरजे, कुइंजे, सीज़, दिक्ष-सेप्ट, दिक्ष-हुईट, दिक्ष-नेफ़ 

२०-१०० : विंग्ट, त्रेनते, कुआरंते, सिंकुआंते, सोईक्षांते, सोईक्षांते-दिक्ष,  कुआत्रे-विंग्ट्स,  कुआत्रे-विंग्ट-दिक्ष, सेंट 

२१ से लेकर ९९ तक की संख्याएँ इस प्रकार  से लिखी जाती हैं : 

२० : विंग्ट, १ : उन, २१: विंग्ट एट उन 

‘एट’ (और) सिर्फ़ ‘उन’ के पहले आता है। २२ : विंग्ट-डू  आदि। 

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि ७०, ८० और ९० के लिए ‘६०+१०’, ‘४*२०’ और ‘(४*२०)+१०’ का प्रचलन है। इसलिए ७१ से लेकर ७९ तक की संख्यायों के लिए सोईक्षांते-एट-ओंजे, सोईक्षांते-डौजे ……… सोईक्षांते-दिक्ष नेफ़ क्रमशः लिखे जाते हैं। उसी तरह ९१ से ९९ के लिए कुआत्रे-विंग्ट-ओंजे, कुआत्रे विंग्ट डौजे (४*२०+११,४*२०+१२) आदि तथा ८१ से ८९ के लिए कुआत्रे-विंग्ट-उन, कुआत्रे-विंग्ट-डू आदि लिखे जाते है।

बाक़ी भारोपीय भाषाओं में तीन चरणों वाली दशमलव पद्धति का चलन है। सही मायने में तो दशमलव पद्धति के विकसित होने की चार अवस्थाएँ हैं, लेकिन विकास के पहले चरण का भारोपीय भाषाओं में कोई उल्लेख नहीं मिलता। यह कुछ-कुछ अनजानी प्राक-भारोपीय भाषा वाली स्थिति है। फिर भी, कुछ ग़ैर-भारोपीय भाषाओं में इसका विवरण अवश्य मिलता है और प्राचीनतम प्रोटो-भारोपीय भाषाओं में इसके उपस्थित होने के पर्याप्त तर्क हैं। 

क – दशमलव-पद्धति की पहली अवस्था : 

दशमलव पद्धति के विकास के प्रथम चरण में मात्र ग्यारह संख्यायों १ से १० और १०० के लिए शब्द थे। बीच की संख्यायों का निर्माण सीधे इन्हीं ग्यारह संख्यायों की मदद से या फिर घुमा-फिराकर किसी दूसरे तरीक़े से किया जाता है। यह पद्धति प्रमुख रूप से साइनो-तिब्बती भाषा (चीनी, तिब्बती, थाई आदि) और औस्ट्रिक परिवार की कुछ भाषाओं (वियतनामी आदि) में पायी जाती है। भारत की संथाली भाषा के साथ-साथ दुनिया की अनेक भाषाओं में भी यह प्रणाली देखने को मिलती है।

संथाली (औस्ट्रिक- कोल, मुंडा)

१ से १० : मित, बार, पे, पॉन, मोरे, तरुई, इया, इरे, आर, जेल 

दहाई २०-९० : बार-जेल, पे-जेल, पॉन-जेल, मोरे-जेल, तरुई-जेल, इया-जेल, इरे-जेल, आर-जेल। १००: मित-साए।

अन्य संख्याएँ : दहाई + खान + इकाई 

जैसे ११ : जेल खान मित, २१ : बार-जेल खान मित, ९९ : आर-जेल खान आदि।

और चाहे तो ‘खान’ को लगाए बिना भी लिख सकते हैं। (अब यदि अंग्रेज़ी में इस प्रणाली का प्रयोग किया जाता तो बड़ी सहजता से ११ के लिए ‘दस-एक’, बीस के लिये ‘दो-दस’ २१ के लिए ‘दो-दस-एक’, ९९ के लिए ‘नौ-दस-नौ’ लिखा जाता।)

ख – दशमलव पद्धति के विकास की दूसरी अवस्था 

दशमलव के विकास की दूसरी अवस्था में भाषाओं में १ से १०, २० से ९० के दहाई अंकों और  सैकड़ा १०० के लिए शब्दों का इजाद हो गया था। बीच की संख्यायों का निर्माण सीधे इन बीस शब्दों से या फिर घुमा-फिराकर किसी अन्य तरीक़े से कर लिया जाता है। यह पद्धति मूल रूप से अटलांटिक परिवार की भाषाओं ( तुर्की, मंगोलियाई, मंचु, कोरियाई, जापानी)  के साथ- साथ दुनिया की कुछ अन्य भाषाओं में भी पाया जाता है। भारोपीय भाषाओं की जहाँ तक बात की जाय तो यह सिर्फ़ संस्कृत भाषा में ही पाया जाता है और वहाँ भी अपनी लचकदार शैली में यह कहीं-कहीं भाषा की संधियों के छलजाल में जाकर मिल जाती है। साथ में इनका चलन दक्षिण की सिंहली और उत्तर की टोकारियन भाषा में भी देखने को मिलता है।

संस्कृत : 

१-९ : एक, द्वि, त्रि, चतुर, पंच, षट्, सप्त, अष्ट, नव 

दहाई अंक  ९० तक : दस, विंशती, त्रिंशत, चत्वारिमशत, पंचशत, षष्ठी, सप्तति, असीती, नवती, शतम।

अन्य संख्याएँ : इकाई रूप + दहाई। 

संयुक्त होने की प्रक्रिया में दहाई अंकों में कोई परिवर्तन नहीं होता है। बस केवल एक अपवाद सोलह (षोडस) का है, जहाँ ‘द’ का ‘ड’ हो जाता है।  संस्कृत-उच्चारण के नियमानुसार शब्दों के संयोजन में ‘अ’ और ‘अ’ की संधि ‘आ’ हो जाती है और ‘इ तथा ‘आ’ की संधि ‘या’ हो जाती है। ८१ के लिए ‘एकासीति’, ८२ के लिए ‘दव्यशीति’ आदि।

इकाई स्वरूप  

१ – एक : एका – (११), एक – (२१, ३१, ४१, ५१, ६१, ७१, ८१, ९१)

२ – द्वि : द्वा – (२२, ३२), द्वि – (४२, ५२, ६२, ७२, ८२, ९२)

३ - त्रि : त्रयो – (१३, २३, ३३), त्रि – (४३, ५३, ६३, ७३, ८३, ९३)

४ – चतुर : चतुर – (१४, २४, ८४, ९४), चतुस – (३४), चतुष – (४४), चतु: - (५४, ६४, ७४)

५ – पंच : पंच (१५, २५, ३५, ४५, ५५, ६५, ७५, ८५, ९५)

६ – षट् : षो (१६), षड (२६, ८६), षट् (३६, ४६, ५६, ६६, ७६), षण  (९६)

७ – सप्त : सप्त - (१७, २७, ३७, ४७, ५७, ६७, ७७, ८७, ९७)

८ – अष्ट : अष्टा – (१८, २८, ३८, ४८, ५८, ६८, ७८, ८८, ९८)

९ – नव : ऊन – (१९, २९, ३९, ४९, ५९, ६९, ७९, ८९), नव (९९)

[ नोट - यहाँ पर यह बताना उचित होगा कि आज की संस्कृत-गिनती में ‘एकोन’ (अर्थात एक पहले) शब्द का प्रचलन बढ़ गया है। जैसे १९ के लिए एकोनविंश। एकोन (१९, २९, ३९, ४९, ५९, ६९, ७९, ८९, ९९) - विश्वमोहन]

बोलचाल की सिंहली भाषा : 

१ - ९ एक, डेक, टुना, हतरा, पसा, हया, हता, अटा, नवय 

दहाई – १० से १०० :  -दहया-, -विस्सा-, -टिसा-, -हतलिस-, -पनस-, -हेटा-, -हेट्टे-, -असु-, -अनु-, सिया-

बाक़ी संख्याएँ दहाई + इकाई मिलकर बनाती है। जैसे ११ : दह-एक, २१ : विसि-एक, ९९ : अनु-नवय 

टोकारियन :

१ – १०  : से, वि, त्राई, सत्वेर, पिष, स्क, सुक्त, ओक्त, न, षक 

११ – १९ : दहाई + इकाई। जैसे,  ११ षक से 

२० : इकम 

[ अब चूँकि यह भाषा लुप्तप्रायः हो गयी है और अब कुछ पुरातात्विक अभिलेखों तक ही ही सीमित है, इसलिए अन्य संख्यायों की जानकारी अब उपलब्ध नहीं है।]

यदि अंग्रेज़ी ने इस प्रणाली को स्वीकारा होता तो संभवतः इसका सरलतम स्वरूप ऐसा होता कि ११ = टेन-वन, २० = ट्वेंटी, २१ = ट्वेंटी-वन, ९९ = नाइनटी नाइन 

दशमलव के विकास की तीसरी अवस्था  

उत्तर-पश्चिम में बुरुशासकी और पूरब की तुरी एवं साओरा सरीखी औस्ट्रिक जैसी विंशमलव संख्या-पद्धति वाली पड़ोसी अभारोपीय भाषाओं के प्रभाव में दशमलव प्रणाली के विकास का तीसरा चरण इस मायने में उल्लेखनीय रहा कि ग्यारह से लेकर उन्नीस तक की संख्यायों का स्वरूप अपने बाद की संख्यायों के समूह अर्थात २१ से २९, ३१ से ३९, ४१ से ४९, ५१ से ५९, ६१ से ६९, ७१ से ७९, ८१ से ८९ और ९१ से ९९, के स्वरूप से भिन्न हो गया। दशमलव के विकास की इस तीसरी अवस्था में भाषाओं में एक से दस, दहाई अंकों बीस से नब्बे और सौ के लिए संख्याएँ आ गयी। ग्यारह से उन्नीस तक की संख्यायों का गठन एक ख़ास ढंग से था। अन्य संख्याएँ ( २१-२९, ३१-३९, ४१-४९ आदि) या तो सीधे या परोक्ष रूप से  अन्य पद्धतियों के सहारे किसी दूसरे तरीक़े से बनती थीं। यह व्यवस्था संसार के दो भाषा परिवारों की ख़ासियत है।  पहला परिवार है - भारोपीय परिवार और दूसरा परिवार है - द्रविड़ परिवार। हालाँकि, संसार की अन्य भाषाओं में भी अलग-अलग छिटपुट तौर पर यह प्रवृत्ति पायी जाती है।

इस मामले में सबसे अनोखी बात तो यह है कि भारतीय-आर्य शाखा और टोकारियन एवं सेल्टिक शाखाओं के अलावा  भारत के बाहर यह प्रणाली समान रूप से भारोपीय भाषाओं की आठ शाखाओं में पायी जाती है। भारतीय-आर्य, टोकारियन और सेल्टिक शाखाओं में पाए जाने का कारण हम पहले ही तलाश चुके हैं कि ये शाखाएँ बास्क की विंशमलव पद्धति को  पहले से ग्रहण कर चुकी थी। भारतीय-आर्य शाखा में भी जिस एक भाषा में यह पद्धति मिलती है वह भाषा है - भारत भूमि के उत्तर से बाहर निकल चुकी साहित्यिक सिंहली भाषा। अब आइए हम भारोपीय परिवार की इन शाखाओं और साहित्यिक सिंहली भाषा के इन लक्षणों की तनिक तुलना कर के देखें।



दशमलव पद्धति के विकास की यह तीसरी अवस्था अपनी दूसरी अवस्था से पूरी तरह रूपांतरित हो गयी थी। इस बात को यदि ठीक-ठीक समझना है तो हम इस बात पर अपना ध्यान केंद्रित करें कि ११ और १२  की संख्यायों  के लिए संस्कृत भाषा में कैसे शब्द-रूप हैं और इन  संख्यायों के लिए बाक़ी भारोपीय भाषाओं या द्रविड़ भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों का रूप क्या है।


हम यहाँ स्पष्ट तौर पर यह देखते हैं कि संस्कृत में ११ और १२ के लिए शब्दों का रूप सीधे-सीधे क्रमशः ‘एक और दस’ तथा ‘दो और दस’ के शब्दों का संयोजन है।  आगे भी लगभग यहीं क्रम रहता है। जैसे, एक (१) + विंश (२०) = एकविंश (२१)।

दूसरी ओर, ऊपर की सारणी में यदि हम ध्यान दें तो संस्कृत के अलावा बाक़ी सभी भाषाओं में ११ और १२ के लिए बिलकुल स्वतंत्र शब्द हैं जिनमें उनके अवयव अंकों १, २ और १० के लिए बने शब्दों का कोई योगदान नहीं है।  कहने का सरलार्थ यह है कि संस्कृत के शब्दों (एकादश और द्वादश) में हम १, २ और १० की उपस्थिति आराम से ढूँढ सकते हैं लेकिन अन्य भारोपीय और द्रविड़ भाषाओं में यह सुविधा हमें नहीं मिलेगी।

साथ ही, संस्कृत, दूसरे चरण की बोलचाल की सिंहली भाषा, टोकारियन बी, और विकास के चौथे चरण की भारतीय-आर्य भाषाओं के अलावा अन्य सभी भारोपीय भाषाओं एवं द्रविड़ परिवार की भाषाओं में भी एक बात समान रूप से पायी जाती है।  बाद की संख्याओं (२१-२९, ३१-३९, ४१-४९, ५१-५९, ६१-६९, ७१-७९, ८१-८९ और ९१-९९) के लिए शब्दों के गठन की प्रक्रिया अत्यंत नियमित  शैली में एक वैज्ञानिक तरीक़े से है। उनका यह स्वरूप ११-१९ की शब्द-शैली से बिलकुल अलग है।


Thursday, 3 December 2020

वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध ------ (१५)

(भाग - १४ से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य - (ठ)

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)


हरियाणा की पुरु जनजाति के आवासीय स्त्रोत से प्रस्फुटित वैदिक धर्म के  इस विशाल आलोक-पुंज से समस्त भारत वर्ष का जगमग हो जाना किसी भी दृष्टिकोण से सांस्कृतिक आक्रमण की श्रेणी में वैसे ही नहीं आता जैसे  कि आगे चलकर ६०० ईसापूर्व के आस-पास बिहार में इक्ष्वाकुओं की भूमि से निःसृत पवित्र बौद्ध और जैन दर्शन की जल-लहरियों से इस देश के ही कोने-कोने का क्या कहना, प्रत्युत सीमा पार की सुदूर भूमि के पोर-पोर का  भी आप्लावित हो जाना!

और ऐसा भी नहीं है कि हिंदुत्व को ये सारे लक्षण उसे बाद में या बहुत आगे चलकर होनेवाले धार्मिक परिवर्तनों की प्रक्रिया के दौरान मिले जैसा कि बहुत लोग सोच लेते हैं। उदाहरण के तौर पर ऐसा माना जाता है कि वैदिक धर्म ही आगे चलकर उपनिषद के दर्शन के रूप में विकसीत हुआ। ऋग्वेद के ‘कर्मकाण्ड’ उपनिषदों के ‘उपनिषद-काण्ड’ में परिवर्धित हो गए। सच तो यह है कि धर्म के वैचारिक दर्शन की ज्ञानमयी धारा से सराबोर होने की यह प्रवृति पूरब के इक्ष्वाकुओं से आयी। ठीक वैसे ही, जैसे अग्नि-आहुति और ऋचाओं का मंत्रोच्चार उत्तर और उत्तर-पश्चिम के हड़प्पा क्षेत्र के पुरु-अणु-दृहयु जनजाति की संस्कृति के ख़ास लक्षण थे। उपनिषद के विचार-दर्शन से संबंधित विषयों पर सारगर्भित चर्चा के अनेक दृष्टांत पूरब के इक्ष्वाकु राजा जनक के राजदरबार में मिलते हैं। आगे चलकर उपनिषद की दृष्टि का विस्तार बुद्ध, जैन, व्रत्य और चार्वाक के दर्शनों में भी हुआ। शाकाहार को पुण्य और पवित्र मानना भी उसी विकास का विस्तार है। इक्ष्वाकुओं से  भी  पूरब की ओर  और आगे बढ़ने पर हमें धार्मिक परम्पराओं, रीति-रिवाज, लोकाचार तथा पूजा-पाठ पर तांत्रिक प्रभाव की गहरी छाप दिखायी देती है। उसी तरह जैसा कि पहले भी चर्चा की जा चुकी है कि दक्षिण के धर्म का मुख्य लक्षण मूर्ति-पूजा और  भव्य मंदिर-निर्माण की संस्कृति थी जो धीरे-धीरे समूचे भारत में भी फैल गयी।  

समूचे भारतवर्ष में पसरे धर्म और संस्कृति के ये हिंदू-तत्व  चाहे वे व्यापक हों या क्षेत्रीय,  भारतीय सभ्यता के संगठित होते जाने और बाद में रचे जाने वाले संस्कृत ग्रंथों में अपनी जगह पाए जाने के कारण यदा-कदा काल-शृंखला में  वे हिंदू धर्म में विकसित  अर्वाचीन लक्षण  या किसी नवीन धार्मिक परम्परा का भ्रम पैदा करते हैं। किंतु, ऐसा सोचना ठीक उसी तरह की भ्रांति पालना होगा जैसे इतिहास के कालक्रम में ‘अमेरिका’ और ‘औस्ट्रेलिया’ के आस्तित्व की खोज बाद में होने के आधार पर उन्हें यूरोप का कोई नया देश मान  लें। इसलिए कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदुत्व के  ये जितने भी धार्मिक तत्व भारत के विस्तृत भू मंडल पर दिखायी देते हैं, वे बहुत हद तक  हड़प्पा या ऋग्वेद-से प्राचीन काल के ही हो सकते हैं या हैं। उस संदर्भ में देखें तो यह कोरी कल्पना प्रतीत नहीं होती कि जैन धर्मावलंबी  अपने तीर्थंकरों की लम्बी परम्परा महावीर से काफ़ी पीछे ले जाते हैं और बुद्ध के अनुयायी भी अपने तथागत के अनेक पूर्व अवतारों की चर्चा करते हैं।


हिंदू धर्म के शास्त्रीय तत्व और समूचे भारत में छाए विविध धार्मिक तत्व आपस में मिलकर ‘अनेकता में एकता’ का बहुरंगी ताना-बाना बिनते हैं। भारत-भूमि की सभ्यता के इस समग्र स्वरूप और पारस्परिक अवगुंठन के ताने-बाने को इतिहासकारों द्वारा इस समावेशी  परिप्रेक्ष्य में पढ़ने और समझने की ज़रूरत है न कि वैदिक संस्कृति से या अन्य समकालीन या परवर्ती संकृतियों से उसके आपसी टकराव से उद्भूत-विकसित और स्थापित सत्ता के रूप में।

ध्यातव्य : अब यदि हम पूरब और दक्षिण में भी हु-ब-हु हड़प्पा के नगरों की अनुकृति ही खोजने लगें  तो संभवतः यह हमारी निरी घृष्टता  होगी। भारत के अन्य भागों के लोगों की सभ्यता और संस्कृति, चाहे वह उत्तर प्रदेश और बिहार  में इक्ष्वाकुओं की हो या फिर दक्षिण में बसी  अन्य जनजातियों की, ज़ाहिर तौर पर अपनी क्षेत्रीय विभिन्नताओं के सौंदर्य से सजी-धजी होंगी और उनका स्वरूप उत्तर तथा उत्तर पश्चिम के पुरु-दृहयु-अणु जनजाति से अलग होगा। समकालीन होने पर भी  इस सभ्याताओं के उत्खनन से प्राप्त सभ्यता और संस्कृति मूलक अवशेषों की प्रकृति में भिन्नता लाज़िमी है। 


जैसा कि हम देखते आ रहे हैं, सम्पूर्ण भारत वर्ष के धार्मिक और सांस्कृतिक तत्वों में अपने समाहरण और हिंदू धर्म का सर्वसमावेशी आकार पाने से पूर्व वैदिक धर्म और संस्कृति का स्वरूप पूरब और दक्षिण के धर्म और संस्कृति से सर्वथा भिन्न था। अब जैसा कि हिंदू विरोधी वामपंथी विचारधाराएँ सोचती हैं, क्या हिंदू धर्म की ये अनेकताएँ उन दिनों एक-दूसरे से बिल्कुल अनजान थीं या यहाँ तक कि परस्पर प्रतिघाती थीं? ऐसा मानने का कोई ठोस कारण नहीं है। ऐसे काल में जब कि पश्चिमी एशिया और वैदिक-हड़प्पा संस्कृति में सम्पर्क के प्रचुर सूत्र थे, हड़प्पा के जहाज़ों की पहुँच खाड़ी देशों के बंदरगाह तक ही सीमित न होकर उससे आगे भूमध्य-सागर को स्पर्श कर रही थी (Talgeri : The Elephant and the Proto-Indo-European Homeland), इस तरह की बात गले नहीं उतरती कि वे आपस में एक-दूसरे से अनजान थीं।

अब आइए हम इस बात की पड़ताल करें कि वैदिक और द्रविड़ सस्कृतियों में कितना सम्पर्क था? पहले यह देख लें कि ऋग्वेद में कोई द्रविड़ शब्द है कि नहीं! यदि हड़प्पा की भौगोलिक स्थिति और द्रविड़ भाषा के आज के भौगोलिक विस्तार-क्षेत्र की तुलना करें तो इस बात को मानना अत्यंत टेढ़ी खीर होगी कि इन दोनों के बीच भी आपस में कुछ लेन-देन हो सकता है।  बलूचिस्तान में ब्रहुई भाषी लोगों की उपस्थिति के आधार पर यह क़यास ज़ोरों से लगाया जाता रहा कि हड़प्पा के क्षेत्र में द्रविड़ लोगों का निवास था। लेकिन अब यह बात मान ली गयी है कि दक्षिण से ब्रहुई भाषी लोगों का अफगनिस्तान की ओर उत्प्रवासन अपेक्षाकृत बाद के दिनों की घटना है। विजेल ने भी स्वीकारा है कि “इनकी उपस्थिति बाद के उत्प्रवासन का परिणाम है, जो हाल की शताब्दियों में हुआ (एलफेंबाइम १९८७)(विजेल २०००: १)।" उसी तरह साउथवर्थ ने भी भले ही हड़प्पन क्षेत्र में द्रविड़ उपस्थिति की वकालत की है, परंतु उन्होंने भी बड़ी स्पष्टता से हॉक (१९७५:८७-८) एवं अन्य विद्वानों की इस उक्ति को स्वीकारा है कि  ब्रहुई, कुरूक्स और माल्टो लोगों की आज की स्थिति बहुत पुरानी न होकर हाल की ही है।“


यह बात भले ही आर्य-आक्रमण-अवधारणा के संस्कृत-प्रेमी आलोचक  न पचा पाएँ, लेकिन ऋग्वेद में दो शब्द ऐसे मिलते है जो निश्चित तौर पर द्रविड़ भाषा के शब्द हैं :

– क्रिया धातु ‘पूज’ ( आदर करना, अभ्यर्थना करना, पूजा करना, स्तुति करना)  की  उत्पति द्रविड़  परिवार की  तमिल भाषा के ‘पु’ (अर्थात फूल) से हुई है। यह आराधना की एक ऐसी पद्धति को इंगित करता है जिसका स्त्रोत दक्षिण के धर्मों में है और वैदिक संस्कृति के लिए यह पूरी तरह से नयी बात है।

– ‘काना’ शब्द भी स्पष्ट तौर पर तमिल शब्द ‘कन’ से उद्भूत है। ‘कन’ का अर्थ तमिल में ‘आँख’ होता है। वैदिक संस्कृत में ‘काना’ एक आँख वाले या तिरछी निगाह वाले व्यक्ति को कहते हैं।

यह बात भी उतनी ही सही है कि भारत के भिन्न-भिन्न भागों में सभ्यता और संस्कृति का विकास अलग-अलग तरीक़ों से हुआ। इसलिए ज़रूरी नहीं है कि ऋग्वेद के शुरू के मंडलों के रचे जाने के काल में पश्चिमोत्तर भारत की मिट्टी में शेष भारत की संस्कृति के वे समग्र तत्व मौजूद ही हों। लेकिन हड़प्पा-सभ्यता के परिपक्व अवस्था में आ जाने तक इस क्षेत्र के दूरगामी व्यापारिक विस्तार और तिज़ारती रिश्तों से हुए मेल-मिलाप के प्रभाव को भी ख़ारिज नहीं किया जा सकता है। २००८ में लिखी गयी तलगेरी की पुस्तक ‘ऋग्वेद और अवेस्ता : अंतिम सबूत (The Rigved and the Avesta : The Final Evidence)’ में इसका ज़िक्र कुछ यूँ मिलता है : “भले ही हम प्रारम्भ में वैदिक संस्कृत या शास्त्रीय संस्कृत पर अनार्य भाषाओं के प्रभाव से आतंकित हो इस पर अपनी आपत्ति दर्ज करते रहे हों लेकिन हमें यह मानना पड़ेगा कि भारतीय-आर्य भाषाओं में अपनी गहरी पैठ बनाने वाले कुछ शब्द द्रविड़ या औस्ट्रिक परिवार से भी आए हैं। उदाहरण के तौर पर ‘एक आँख वाले’ के लिए ‘काना’ शब्द द्रविड़ परिवार के ‘कन’ अर्थात ‘आँख’ शब्द की निष्पत्ति है। ‘दंड’ और ‘कूट’ जैसे अनेक अन्य शब्दों का दृष्टांत भी उपस्थित किया जाय तो तो उपर्युक्त तर्क की कोई अवहेलना नहीं होगी।“ (पृष्ट-२९२)

सही बात तो यह है कि ऋग्वेद के तत्वों और आँकड़ों की सही पड़ताल करने पर यह भली-भाँति ज़ाहिर होता है कि ऋग्वेद की संस्कृति द्रविड़ तन्तुओं से अछूती नहीं है।  अब ये भी यतना ही सत्य है कि ये द्रविड़ तंतु आर्यों के द्रविड़ हड़प्पा पर हमले के बाद पराजित और भागे द्रविड़ों की संस्कृति के कोई बचे-खुचे अंश या हमलावर आर्यों द्वारा रहन-सहन या संस्कृति के अपना लिए गए कुछ द्रविड़ तरीक़े नहीं थे, जैसा कि आर्य-आक्रमण अवधारणा के प्रतिपादक कहते हैं।  इस बात के प्रचुर सबूत हैं कि ये वे मूल द्रविड़ तत्व हैं जिसे उत्तर और पश्चिम-उत्तर के वैदिक आर्य बजाप्ता दक्षिण से सीख कर ले गए थे। इसके पक्ष में प्रबल तथ्य मौजूद हैं :

– पुराने मंडलों में इनका विवरण नहीं मिलता है। पुराने मंडलों के भौगोलिक तत्वों के नाम की पड़ताल करने पर पता चलता है कि द्रविड़ भाषी लोग हड़प्पा के क्षेत्र में चाहे वैदिक काल हो या उसक पहले का समय, कभी रहे ही नहीं।

– संयोग से, नए मंडलों में इन शब्दों से मुलाक़ात हो जाती है। नए मंडलों के रचे जाने समय तक समुद्री रास्तों से दूर-दूर तक वैदिक-आर्य लोगों के व्यापारिक रिश्ते बन चुके थे। उनका व्यापार मेसोपोटामिया तक जा पहुँचा था और इस क्रम में बेबिलोनिया के भी दो शब्द ‘’बेकनात’ अर्थात व्यापारियों को क़र्ज़ देने वाले महाजन (८/६६/१०) और  ‘मन’, जो भार मापने की आज तक प्रचलित ईकाई है (८/७८/२), ऋग्वेद में प्रवेश पा चुके थे। यह काल मित्तियों और अवेस्ता रचे जाने के काल से ठीक पहले का समय है। बाद में उन्हीं ग्रंथों के मंत्रों में इन द्रविड़ तत्वों के साथ-साथ अवेस्ता और मित्ती तत्वों की भी प्रचुर उपस्थिति मिलने लगती है। 

– भारतीय परम्परायें और भाषा-विज्ञान बड़ी सफ़ाई से और बिना किसी भ्रम के इन वैदिक तत्वों का संबंध दक्षिण की भूमि से द्रविड़ पहचान वाले वैदिक ऋषियों के रूप में जोड़ते हैं। और, ये लोग ऋग्वेद की संस्कृति के शत्रु-से न होकर इसके अभिन्न अंग-से हो गए थे।


मूल रूप से द्रविड़ बोलने वाले वैदिक ऋषियों की कम-से-कम दो धाराएँ तो  साफ़-साफ़ दिखायी देती हैं।

– अभी हमने देखा कि ऋग्वेद में दो ऐसे बहुत ही महत्वपूर्ण शब्द हैं जो अब आज की भारतीय-आर्य भाषाओं और संस्कृत में बहुत आम हो गए हैं और वे बिना किसी संदेह के द्रविड़ परिवार से ही लिए गए हैं। ये हैं क्रिया धातु ‘पूज’ और  ‘काना’ शब्द। ये दोनों शब्द नए मंडलों में इस प्रकार पाए जाते हैं :

– ऋग्वेद के ८/१७/१२ में प्रयुक्त शब्द ‘पूज’, जिसका संबंध 'इरिम्बिठि' ( कन्व ऋषि के कुल) से है,  और 

– ऋग्वेद के १०/१५५/१में प्रयुक्त शब्द ‘काना’, जिसका संबंध 'सिरिम्बिठ' (भारद्वाज ऋषि के कुल) से है  

अब यह महज़ इत्तफ़ाक़ नहीं है कि दो भिन्न-भिन्न ऋषि कूलों ने अलग-अलग जगहों पर इन शब्दों के लिए बड़े आश्चर्यजनक और असामान्य रूप से एक ही समान अनार्य भाषा परिवार की संज्ञाओं को चुना है। दसवें मंडल में ऋषियों के वर्णन का  बड़ी दुरुहता से आपस में घालमेल कर दिया जाता है। ‘ऋग्वेद – एक ऐतिहासिक विश्लेषण’ (तलगेरी :२०००) में पृष्ट २५-२६ पर यह उल्लेख मिलता है, “दसवाँ मंडल जो कि बहुत बाद में रचा गया, कई मामलों में अन्य मंडलों से काफ़ी अलग हटकर है। इसमें एक सबसे बड़ी बात अपने मंत्र के रचयिताओं के बारे में इसकी  अस्पष्टता है। ४४ मंत्रों और दो अन्य सूक्तों में तो यह भी पता नहीं चलता कि इनको रचा किसने!”  बस इतना स्पष्ट है कि दसवें मंडल के १५५ वें सूक्त और आठवें मंडल के १७वें सूक्त के रचनाकार एक ही ऋषि हैं – 'इरिम्बिठि कन्व'।

यह नाम द्रविड़ मूल का है। वास्तव में आज भी केरल में एक जगह का नाम है – 'इरिम्बिलियम'। कोई अचरज की बात नहीं कि यही जगह या संभवतः इसी के आसपास की कोई जगह आज से ४००० वर्ष से भी पहले ऋग्वेद की ऋचाओं के रचनाकार की रिहाईश हो! यह बात उल्लेखनीय है कि आठवें मंडल के १७वें (८/१७) मंत्र में ही दो और शब्द आते हैं जो एक बार फिर से द्रविड़ व्युत्पति वाले शब्द माने गए हैं। 

अ  – ‘खंड’ (८/१७/१२) और 

– ‘कुंड’ (८/१७/१३)

और इन सबका सिरमौर शब्द ‘मुनि’ पूरे ऋग्वेद में नहीं भी तो कम से कम पाँच बार (दसवें मंडल के एक ही सूक्त में तीन बार) आया है। इस शब्द का स्पष्ट संकेत भारत के अंदर ही पूरब और दक्षिण के अ-वैदिक क्षेत्रों के पवित्र व्यक्तियों से है। ‘कुंड’ वाले मंत्र के अगले ही मंत्र (८/१७/१४) में ही यह फिर से आता है। भले ही, इन तीन लगातार मंत्रों में निहित संकेतों पर हमें सहसा विश्वास न हो, किंतु अपने आप में वे गहरे अर्थ समेटे हुए हैं।

एक बात तो साफ़ है कि यह ‘इरिम्बिठि’ ऋषि दक्षिण के द्रविड़ थे जो अपने क्षेत्र से चलकर विकसित और समृद्ध हड़प्पा क्षेत्र में आ बसे थे और कालांतर में ऋग्वेद की रचना करने वाले ऋषि बन गए। आज भी भारत में  ढेर ऐसे सनातनी साम्प्रदायिक समुदाय हैं जो अपनी मूल भूमि से विस्थापित होकर किसी अन्य क्षेत्र में बसे पाए जाते हैं। 


– भारतीय परम्परा में एक अन्य अति महत्वपूर्ण और  महान ऋषि के दर्शन होते हैं जो समान रूप से उत्तर और दक्षिण दोनों में न केवल पूजे जाते हैं, बल्कि दोनों की परम्पराओं में अपनी गहरी जड़ जमाए हुए हैं। यह महान ऋषि महर्षि 'अगस्त्य' हैं जिनके बारे में किंवदंती है कि वह उत्तर से चलकर दक्षिण में आ बसे। आइए देखें उनके बारे में विकिपीडिया क्या बताता है, 

“अगस्त्य हिंदू धर्म के एक अत्यंत आदरणीय वैदिक ऋषि थे। वह भारतीय भाषाओं के प्रकांड विद्वान और एक अनन्य वैरागी तपस्वी थे। अपनी अर्धांगिनी ‘लोपमुद्रा’ के साथ मिलकर उन्होंने ऋग्वेद के पहले मंडल में १६५ से १९१ सूक्तों (१/१६५ – १/१९१) की रचना की। इसके अलावे अनेक वैदिक साहित्य उनके द्वारा रचे गए। रामायण और महाभारत सहित अनेक वैदिक और पौराणिक प्रसंगों में अगस्त्य  का वृतांत मिलता है। एक ओर सबसे महत्वपूर्ण सात या आठ वैदिक ऋषियों (सप्तर्षि) में उनका नाम आता है तो दूसरी ओर, द्रविड़  शैव परम्परा के वह प्रख्यात तमिल सिद्ध हैं। उन्होंने प्राचीन तमिल व्याकरण ‘अगत्तियम’ की रचना की, ‘तांप्रपर्णियन’ नामक औषधि बनायी और श्री लंका तथा दक्षिण भारत के अनेक जगहों पर शैव साधना केंद्रों की स्थापना की। पुराणों की शाक्त और वैष्णव  परम्परा के वह अत्यंत आदरणीय हस्ताक्षर हैं।  प्राचीन प्रस्तर-प्रतिमाओं और दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया सहित जावा-सुमात्रा तक के शिव मंदिरों में उत्कीर्ण क़सीदों में उपस्थित होने वाले वह दुर्लभ भारतीय ऋषि हैं। जावा के प्राचीन ग्रंथ ‘अगस्त्यपर्व’ के वह प्रमुख नायक किरदार और गुरु हैं। इस ग्रंथ का ११वीं शताब्दी का संस्करण आज भी सुरक्षित है। अगस्त्य ने ढेर सारे ग्रंथों की रचना की, जिसमें  ‘वाराह-पुराण’, और 'स्कन्द-पुराण' के भाग ‘अगस्त्य-संहिता’ तथा ‘द्वैत-निर्णय-तंत्र ग्रंथ’ प्रमुख  हैं। अपनी पौराणिक व्युत्पतियों के आधार पर  ‘मन’, ’कलसज’, ‘कुंभज’, ‘कुंभयोनि’ और ‘मैत्रवारूणी’ आदि कई नामों से उन्हें अभिहित किया गया है।

‘अगस्त्य’ शब्द की व्युत्पति को लेकर अनेक मान्यताएँ हैं। एक मान्यता यह है कि इसका  मूल शब्द एक फलदार वृक्ष ‘अगति गंडिफ़्लोरा’ से निष्पन्न है। यह भारतीय उपमहाद्वीप का स्थानीय पौधा है और इसे तमिल में ‘अकट्टी’ कहते हैं। अगट्टी से ही ‘अगस्ति’ शब्द निकला और इस प्रकार यह इस वैदिक ऋषि के नाम के द्रविड़ मूल की व्याख्या होती है। वह एक अनार्य-द्रविड़ हैं जिनके विचारों से समूचा उत्तर भारत आप्लावित-आंदोलित हुआ। उनका आश्रम तिरुनेलवेली, पोथियाल की पहाड़ी और तंजावर सहित तमिलनाडु के अनेक जगहों पर अवस्थित है।

हालाँकि बाद के पौराणिक वृतांतों में उन्हें उत्तर का एक ऋषि बताया गया है जो चलकर दक्षिण में बस जाता है। किंतु, यह सर्वमान्य और ऐतिहासिक रुप से स्थापित तथ्य है कि अगस्त्य मूलतः दक्षिण के निवासी एक द्रविड़ ऋषि थे। वह और बाद में,  उनके वंशज, दक्षिण से चलकर उत्तर में बस गए और ऋग्वेद की रचना करने वाले ऋषि-कूलों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और स्वतंत्र ऋषि-परिवार की उन्होंने स्थापना की। 

– ऋषि कुल परम्पराओं में अगस्त्य एक विलक्षण और अपवाद-से ऋषि हैं।  वह एक ऐसे तपस्वी सन्यासी हैं जो नगरों की चकाचौंध और राजप्रासाद के अनुग्रह से कोसों दूर जंगल की अपनी कुटिया में एक वैराग्यपूर्ण वितरागी का  जीवन बिताते हैं।

– वह स्वयं पूरी तरह से ऋग्वेद के वृहतांश से अनुपस्थित हैं। उनके वंशजों का योगदान बाद के मंडल १ के सूक्तों की रचना में मिलता है जिसमें ढेर-से द्रविड़ शब्दों का प्रयोग मिलता है। किंतु ऋगवैदिक परम्पराओं में न केवल ऋग्वेद के बाहर बल्कि ऋग्वेद के अंदर (८/३३/१०) भी अगस्त्य को एक पुरातन ऋषि के रूप में अत्यंत प्रतिष्ठित पद मिलता है। इस मंत्र  में वह वशिष्ठ के समकालीन और उनके साथ-साथ चर्चित हुए हैं।

– नए मंडलों  में १ और ८ {१/(११७/११, १७०/३, १७९/६, १८०/८, १८४/५), ८/(५/२६)} को छोड़कर बस एक जगह अगस्त्य का विवरण मिलता है। यह पुनर्संशोधित सातवें सूक्त में पाया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह सूक्त, ७/३३/११,  उनके ही वंशज के द्वारा पुनर्संशोधित किया गया। इसी सूक्त के ठीक बाद वाले मंत्र में ‘दंड’ नामक द्रविड़ शब्द उपस्थित होता है।  हड़प्पा की सभ्यता के परिपक्व प्रहर में 'इरिम्बिठि' और 'अगस्त्य' के प्रवेश ने ऋग्वेद की धरा पर द्रविड़ शब्दों की लघु-धार बहायी। इस धारा ने  कालांतर में  वैदिक शास्त्रीय संस्कृत को भिगोते हुए एक प्रचंड सैलाब का रूप धारण कर लिया। ऋग्वेद में ऐसे कथित द्रविड़ शब्दों की एक लम्बी सूची है : ‘वैला’, ‘कियांबु’, ‘वृष’, ‘चल’, ‘बिल’, ‘लीप’, ‘कटुक’, ‘पिंड’, ‘मुख’, ‘कूट’, ‘कुट’, ‘खल’, ‘उलुखला’, ‘कानुक’, ‘सिर’, ‘नद’/’नल’, ‘कलफ़’, ‘उखा’, ‘कनारू’, ‘कलाया’, ‘लांगल’। ये शब्द ऋग्वेद के केवल नए मंडलों में और उनके पुनर्संशोधित सूक्तों  में ही पाये  जाते हैं। अपवाद-स्वरूप ही कहें तो, ‘मुख’ शब्द चौथे मंडल के ३९वें सूक्त के छठे मंत्र (४/३९/६) में, ‘कलाया’ शब्द सातवें मंडल के ५० वें सूक्त के पहले मंत्र (७/५०/१) में  और ‘कलफ’ शब्द सातवें मंडल के ५० वें सूक्त के दूसरे मंत्र (७/५०/२) में पाया जाता है। हॉक की निगाहों में इस विषय के प्रखर विशेषज्ञ अर्नौल्ड ने छंद-योजना के परिप्रेक्ष्य में चौथे और सातवें मंडल के इन पुनर्संशोधित श्लोकों का वर्गीकरण किया है। अतः इन द्रविड़ शब्दों में एक के भी दर्शन हमें पुराने मंडलों में नहीं होते! ऊपर के सूक्तों (७/३३/१०, ४/३९ और ७/५०) के अलावा ऐसे संदर्भ हमें निम्नांकित सुतों या श्लोकों में भी देखने को मिलते हैं : 


पुनर्संशोधित सूक्त :





यहाँ पर यह भी बात उतना ही ध्यान आकर्षित करनेवाली है कि जिन नए मंडलों में इन द्रविड़ शब्दों और द्रविड़ ऋषि-कूलों का विवरण आता है, ये सभी ईसा से २००० वर्ष पूर्व लिखे गए थे। इसके बहुत बाद में आगे चलकर हमें सीरिया-इराक़ में मित्ती संस्कृति के और ईरान में भारोपीय-ईरानी संस्कृति (पर्सियन, पर्थियन और मिडियन) के दर्शन होते हैं। साथ में हमें यह भी नहीं विस्मृत करना चाहिए कि ‘तमिल-संगमों’ की रचना का काल भी क़रीब दो शताब्दी बाद ही आ जाता है। इस आधार पर अब और किसी शक की गुंजाइश नहीं रह जाती कि वैदिक और द्रविड़ संस्कृतियों का संबंध न केवल अत्यंत प्राचीन है, प्रत्युत उनका माधुर्य भी अत्यंत प्रगाढ़ है। 


Thursday, 26 November 2020

वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध ------ (१४)


(भाग - १३ से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य - (ट)

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)


भारत में वैदिक धर्म के प्रसार की प्रकृति 

अब तक यह स्पष्ट हो चुका है कि भारोपीय भाषा परिवार का उद्गम स्थल भारत ही था और यहीं से वे सारी भाषाएँ उत्प्रवासित होकर बाहर की ओर गयीं। कहीं से भी कोई आर्य-आक्रमण नहीं हुआ। सिंधु-सरस्वती घाटी का हड़प्पा-क्षेत्र ही सभ्यता के शैशव काल का  वह भू-भाग  था,  जहाँ से शेष ग्यारह भाषायी शाखाओं ( इटालिक, सेल्टिक, जर्मन, बाल्टिक, स्लावी, अल्बेनियायी, ग्रीक, अनाटोलियन, अर्मेनियायी, टोकारियन और ईरानी) को बोलने वाले लोग पश्चिम की ओर चले गए। 

अब कुछ यक्ष प्रश्न हमारे समक्ष उठ खड़े होते हैं। पश्चिमी उत्तरप्रदेश और हरियाणा में उपजी वैदिक संस्कृति, धर्म और भाषा यदि पश्चिम की ओर फैलकर अफ़ग़ानिस्तान तक पहुँच गयी तो फिर पूरब की ओर पसरने वाली संस्कृति की प्रकृति क्या थी? जैसा कि दोनों अवधारणाओं (हमलावर आर्यों का बाहर से आना और स्थानीय आर्यों का बाहर की ओर उत्प्रवासन) के पैरोकार फ़रमाते हैं कि हमारी शास्त्रीय और पारम्परिक भारतीय/हिंदू सभ्यता का उद्भव भी वैदिक संस्कृति की कोख से ही हुआ है? क्या आधुनिक भारतीय-आर्य भाषाओं की धाराएँ भी पुरुओं की वैदिक भाषा से ही निकली हैं? क्या भारतीय धर्म के मूलभूत तत्व ऋग्वेद के बाद रचे गए ग्रंथों (अथर्ववेद, उपनिषद, पुराण एवं अन्य महाकाव्यों) में पाए जाते हैं? क्या धर्म, दर्शन और संस्कृति की दिशा में बाद में हुए परिवर्धन के बीज भी वैदिक संस्कृति में ही मिलते हैं? इन तमाम बिंदुओं पर सांगोपांग विश्लेषण कर एक सही समझ विकसित करने की आवश्यकता है।  

भाषा  

भारोपीय भाषाओं की ग्यारह शाखाएँ अणु और दृहयु जनजाति की भाषाओं से पनपी हैं। ये जनजातियाँ पुरु जनजाति के पश्चिम में रहती थीं। पुरु जनजाति की भाषा वैदिक भाषा थी। भारत से बाहर की इन अर्वाचीन ग्यारह शाखाओं और भारत-भूमि के अंदर की बारहवीं वैदिक शाखा की तुलना पर ही तमाम भारोपीय मिसाल टिकी हुई है। 

तथापि, आज की भारतीय-आर्य भाषाएँ जो उत्तर भारत में बोली जाती हैं उनका उद्गम पुरुओं की वैदिक भाषा न होकर अन्य भारोपीय भाषाएँ हैं जो पुरुओं के पूरब और दक्षिण में बसी इक्ष्वाकु, यदु, तुर्वसु और अन्य जनजातियों के द्वारा बोली जाती थीं। इसका साक्ष्य हमें ढेर सारे भाषायी कारकों में मिलता है :

– पूर्वी भारत की प्राकृत भाषा और भारतीय-आर्य बोलियों में ‘र’ और ‘ल’ के भेद का क़ायम रहना। यह तकनीकी रूप से भारतीय-ईरानी भाषा से भी पहले की अवस्था का लक्षण है, क्योंकि बाद के ऋग्वेद, ईरानी और मिती ग्रंथ यह दर्शाते हैं कि भारतीय-ईरानी भाषा ने ‘र’ और ‘ल’ का आपस में विलय कर उसे ‘र’ में आत्मसात कर लिया था।

– उत्तराखंड की पहाड़ियों में अलग-थलग पड़ी बाँगनी भाषा में केंटुम भाषा के लक्षण पाए जाते हैं। बताते चलें कि भारोपीय भाषाओं के वर्गीकरण में केंटुम परिवार (इटालिक, सेल्टिक, जर्मन, ग्रीक और टोकारियन) और सैटेम परिवार (बाल्टिक, स्लावी, ईरानी और भारतीय-आर्य) प्रमुख परिवार हैं।

– कुछ ऐसे प्राचीन शब्द हैं जो सिंहली भाषा में तो संरक्षित पाए जाते हैं, किंतु वैदिक या संस्कृत में वे नहीं मिलते। जैसे – ‘वटुर’ (अंग्रेज़ी और हित्ती, दोनों में ‘वाटर’)

– पूर्वी और दक्षिणी प्राकृत भाषाओं में कुछ ऐसे अति प्राचीन शाब्दिक लक्षण पाए जाते हैं जो आश्चर्यजनक रूप से संस्कृत और ईरानी भाषाओं में नदारद हैं। भारतीय आर्य भाषाओं को तीन विभागों में बाँटा जा सकता है – प्राचीन भारतीय-आर्य, मध्यकालीन भारतीय-आर्य और अर्वाचीन भारतीय-आर्य। प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय-आर्य भाषाओं की लाक्षणिक भिन्नताओं का अध्ययन करने के उपरांत के आर नौरमन ने मध्यकालीन बोलियों में अनेक शब्द-रूपों की पहचान की। ये सारे रूप भारतीय आर्य या यहाँ तक कि भारोपीय स्त्रोत से संबंध तो रखते थे लेकिन संस्कृत में इनका कोई समतुल्य शब्द नहीं मिला। उदाहरण के तौर पर संस्कृत में उपसर्गों का प्रयोग बिरले ही होता है। कुछ ऐसे शब्द भी मिले जिनका उद्भव संस्कृत के मूल से अलग था, लेकिन उन्हें मध्यकालीन अन्वेषण या खोज भी नहीं माना जा सकता है क्योंकि या तो वे मध्यकाल से भी पहले के ध्वन्यात्मक विकास से अपने निर्माण की अवस्था को इंगित करते हैं या फिर संस्कृत से इतर  अन्य भारोपीय भाषाओं में ही उनके समतुल्य मिलते हैं। (नौरमन १९९५:२८२)

प्राकृत भाषा के वैयाकरणों ने प्राकृत भाषा, अर्वाचीन भारतीय-आर्य भाषा और यहाँ तक कि समृद्ध संस्कृत-शब्दकोशों में भी ऐसे ढेरों शब्दों की पड़ताल की है जो पूरी तरह से देशज हैं और वे तत्सम तथा तद्भव शब्दों से सर्वथा भिन्न हैं। तत्सम शब्द वे शब्द हैं जो सीधे वैदिक भाषा या संस्कृत से लिए गए हैं जबकि तत्सम शब्दों से बने देशी शब्द तद्भव कहलाते हैं। भाषा के जानकारों और भारतविदों ने भरसक कोशिश की है कि वे इस बात का कोई पुख़्ता सबूत ढूँढ सके कि ये शब्द औस्ट्रिक या द्रविण भाषा परिवारों से लिए गए हैं, किंतु उन्हें सफलता नहीं मिल सकी। हार-पाछ कर उन्होंने एक परिकल्पना गढ़ ली कि ये शब्द अनार्य और अज्ञात मूल के हैं और उत्तर भारत में आर्यों के आक्रमण से पूर्व किसी अज्ञात अनार्य जनजाति की भाषा से लिए गए हों। ध्यातव्य है कि ये सारे शब्द अर्वाचीन भारतीय-आर्य भाषा के अति प्रचलित शब्द हैं। दृष्टांत के तौर पर इन ‘नए’ शब्दों की एक बानगी देखिए – घोटक (घोड़ा), कुक्कुर (कुत्ता), प्रस्तर (पत्थर), पानी (जल) आदि। इनके लिए वैदिक संस्कृत में प्रयुक्त शब्द क्रमशः अश्व, श्वान, अश्म और ऊद या आप हैं।

ये शब्द किंचित अनार्य नहीं हैं, बल्कि  वैदिक पुरुओं से पूरब और दक्षिण के क्षेत्र के अंदरूनी भागों में बोली जाने वाली भीतरी भारोपीय भाषाओं के ये शब्द हैं। जैसा कि नौरमन ने ऊपर संकेत भी किया है कि इनमें से कुछ शब्दों के समतुल्य संस्कृत छोड़कर अन्य भारोपीय भाषाओं में पाए जाते हैं, लेकिन यह सभी शब्दों और सभी भारोपीय भाषाओं के लिए भी  सच नहीं है। इसका कारण यह है कि भले ही वे भारोपीय शब्द हों, लेकिन उनकी उत्पति का मूल पूरब में भीतरी भारोपीय भाषाओं को बोलने वाली  इक्ष्वाकु, यदु, तुर्वसु आदि जनजातियों की बोली में है, न कि पश्चिम और उत्तर के बाशिंदे उन दृहयु, अणु, पुरु आदि जैसी जनजातियों की उस भाषा से है जिस भाषा की संतति के रूप में बारह भाषा-परिवारों की अवधारणा गढ़ ली गयी है और उन्ही बारह शाखाओं के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर प्राक-भारोपीय भाषा की संरचना को नया रुप दिया गया है। ऋग्वेद के बाद के काल में ये शब्द संस्कृत भाषा में प्रवेश कर गए। ऋग्वेद के रचना-काल के अंतिम चरण में ‘रात्रि’ जैसे पूर्वी भारोपीय शब्दों का वैदिक भाषा में प्रवेश करना एक उदाहरण है। सही बात तो यह है कि कुछ विरले द्रविण शब्द भी इस काल में वैदिक संस्कृत में प्रवेश कर गए। उदाहरण के तौर पर ऋग्वेद के दसवें मंडल में १५५वें सूक्त की पहली ऋचा (१०/१५५/१) में एक आँख या तिरछी आँख वाले कनडेर या भेंगे व्यक्ति के लिए ‘काना’ शब्द का प्रयोग हुआ है जिसकी उत्पति का मूल द्रविण शब्द ‘कन्न’ (आँख) है। उसी तरह ऋग्वेद के ८/१७/१२ में ‘पूज’ शब्द का भी मूल द्रविण शब्द ‘पू’ (फूल) है। यह वैदिक और द्रविण लोगों के बीच के परस्पर-आचार की प्रगाढ़ता को प्रदर्शित करता है। बाद के दिनों में भीतरी क्षेत्रों के भारोपीय शब्दों सहित द्रविण और औस्ट्रिक परिवार के प्रचुर शब्दों का वैदिक और भारतीय संस्कृत-शब्दकोश में प्रवेश हुआ। जैसे – हेरंब (भैंस) का द्रविण मूल ‘एरम’। 

यहाँ तक कि ‘आर्य-आक्रमण अवधारणा’ के प्रबल समर्थक और महान भाषाशास्त्री श्री एस के चटर्जी भी यही लिखते हैं कि “मध्यकालीन और अर्वाचीन भारतीय-आर्य भाषाओं का उद्गम ऋग्वेद और शास्त्रीय संस्कृत कदापि नहीं है।“ (चटर्जी १९२६:३६)

……….पूरब की पट्टी में बसे ये आर्य बीचवाले भूखंड के वैदिक आर्यों से कई मामलों में सर्वथा भिन्न हैं – धार्मिक रीति-रिवाजों में, लोकाचारों में, बोलियों में” (चटर्जी १९२६:४०)।

………. ये आर्य पश्चिम के उन आर्यों से जिनके यहाँ वैदिक संस्कृति फली-फूली अपने धर्म और अपनी परम्पराओं में बिल्कुल  अलग थे“ (चटर्जी १९२६:४५)।

अपनी पहली पुस्तक में यह बात श्री तलगेरी ने  पहले भी रखी है कि भारतीय-यूरोपीय अर्थात भारोपीय भाषाओं का सबसे पुराना रूप जिसे आप प्राक-प्राक-भारोपीय भाषा कह सकते हैं, सबसे पहले भारत के अंदरूनी और बहुत भीतरी हिस्सों में बोला गया जहाँ से यह उत्तर और पश्चिम की ओर फैलते हुए कश्मीर और अफ़ग़ानिस्तान तक पहुँचा (तलगेरी १९९३:२२९)।  यह  भाषा अभिवर्द्धित  होकर भिन्न-भिन्न बोलियों और भाषाओं में विकसित हो गयी और सबसे बाहरी किनारों में बसे दृहयु और अणु जनजातियों की यही विकसित बोली भारत से बाहर यूरोप, पश्चिमी एशिया, और तुर्कीस्तान  में फैल गयी।  अर्वाचीन भारतीय-आर्य-भाषाएँ ऋग्वेद या पुरु की बोलियों की संतति न होकर उन इक्ष्वाकु, यदु और तुर्वसु जनजातियों की अन्य समकालीन ऋगवैदिक बोलियों से निष्पन्न धाराएँ हैं। इनका संबंध भीतरी भारोपीय भाषाओं से था। वैदिक बोलियों ने वैदिक साहित्य को ढोया जिसने आगे चलकर ऋग्वेद को जन्म दिया। शीघ्र ही आगे चलकर प्राचीन भारतीय व्याकरण-शास्त्रियों ने शास्त्रीय संस्कृत की रचना की। पाणिनि ने अपने अष्टाध्यायी में अपने से पहले के भी सैकड़ों अन्य आचार्यों की उपस्थिति का संकेत किया है। भीतरी भागों की बोलियों का उनके समकालीन अन्य भाषाओं जिसमें द्रविण भी शामिल है के साथ उत्तरोत्तर पल्लवन, परिष्करण और क्रमिक विकास की प्रक्रिया सहस्त्रों वर्ष तक चलती रही। इन भाषाओं के जड़ और धड़ बिल्कुल स्वतंत्र थे और संरचनात्मक स्तर पर भी ये वैदिक संस्कृत से सर्वथा पृथक थे। इन भाषाओं और वैदिक संस्कृत के मध्य वैयाकरणों द्वारा निर्मित कृत्रिम और शास्त्रीय संस्कृत ने एक संयोजक आवरण का कार्य किया। अनंतर, प्राकृत भाषा जो फिर भीतरी बोलियों के प्रभाव-पाश में बंधी थी प्रचलन में आ गयी। विकास की इस क्रमिक अवस्था को पार कर भीतरी बोलियाँ शनै:-शनै: अर्वाचीन भारतीय आर्य भाषाओं के भिन्न -भिन्न रूपों में अपने स्वतंत्र अस्तित्व में आ गयीं। इस प्रक्रिया में द्रविण सहित इन सभी भाषाओं का बड़े पैमाने पर संस्कृतकरण  हो गया। हज़ारों वर्ष पहले से आज तक यह भाषायी यात्रा निरंतर जारी है और जिन अनेकानेक रूपों में इन्होंने एक दूसरे को प्रभावित किया है और आज भी प्रभावित किए और होते जा रही हैं, वह एक इतनी जटिल और अस्पष्ट प्रक्रिया है कि उसकी विवेचना करना एक टेढ़ी खीर है (तलगेरी १९९३:२३०)। 

 धर्म और संस्कृति  

दुनिया के शेष हिस्सों की तरह भारत में भी धर्म एक जनजातीय मामला था। दुनिया की अन्य बसावटों की भाँति भारत के भी भिन्न-भिन्न खंडों में बसे जनजातीय समूह अलग-अलग जनजातीय धर्मों के अनुयायी थे। समकालीन विश्व के सामाजिक जीवन में हो रही प्रगति की लय  में ही भारत में भी सुसंगठित और नागरीय सभ्यता का विकास होने लगा। इस विकास ने धार्मिक क्षेत्र में भी एक संगठित संरचना को उद्भूत किया जिसके विस्तार की भौगोलिक सीमा पश्चिम और पश्चिमोत्तर की ओर पसरती हुए पश्चिमी उत्तर-प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब को पार कर आज के पाकिस्तान के ऊपरी किनारे तक को छू आयी। इन क्षेत्रों में अनेक जनजातियों का निवास था, जिन्हें भारत के पौराणिक इतिहास में दृहयु, अणु और पुरु के नाम से जाना जाता है।

इस क्षेत्र में पल्लवित-विकसित होने वाले धर्मों का मुख्य ज़ोर प्रकृति के शक्ति-रूप तत्वों यथा- सूर्य, चंद्रमा, मेघ, वर्षा, अंतरिक्ष, नदी आदि की अभ्यर्थना करना था। प्रकृति में स्थित उन ब्रह्मांडीय और खगोलीय बिम्ब, जिनमें वे इन शक्ति रूप तत्वों के मूर्त रूप का दर्शन करते थे उन्हें अग्नि को साक्षी बना पवित्र ऋचाओं के उद्घोष के साथ अर्पण करते थे। धर्म के इस स्वरूप के दर्शन हमें पुरुओं के ग्रंथ, ऋग्वेद, अफ़ग़ानिस्तान के पश्चिम की ओर बढ़ गए अणुओं के धर्मग्रंथ, जेंद-अवेस्ता, और सेल्टिक ड्रूयड (दृहयु जनजाति के यूरोपीय उत्प्रवासी) के प्राचीन यूरोपीय पुजारियों की पूजा-पद्धति में होते हैं। लिथुयानिया के एक ख़ास वर्ग ने तो अपने प्राचीन  धर्म को पुनर्जीवित कर  लिया है जिसे ‘डर्न’ कहते हैं। सच कहें तो इस ‘डर्न’ में भी वे दो मूल तत्व अग्नि और मंत्रोच्चार शामिल हैं। वेद के प्रकृति-पुराण से उद्भूत और विकसित इस तरह की पौराणिक परम्पराएँ और धार्मिक लोकाचार अन्य यूरोपीय धर्मों (ग्रीक, ट्यूटोनिक, स्लावी, लिथुयानियन आदि) में भी मिलते हैं।

भारत से अणु और दृहयु जनजाति के बाहर चले जाने के बाद पुरुओं के धर्म का विस्तार वैदिक संस्कृति के साथ समूचे देश में हुआ। इसका मुख्य कारण इस धर्म का पौरिहत्य, मंत्रोच्चार, पूजा-पद्धति और परम्पराओं के स्तर पर एक सुव्यवस्थित, सुगठित और अत्यंत सुदृढ़ संरचना का होना था। इस धर्म का प्रभाव धीरे-धीरे इतना व्यापक होने लगा कि भारत भूमि की  शेष जनजातियों के धर्म भी अपने आपको उसमें समाहित करने लगे और पुरुओं का वैदिक धर्म एक  प्रमुख मुख्यधारा का धर्म बन गया जिसके लोकाचार, धार्मिक परम्पराएँ, पूजा-पद्धति, रीति-रिवाज और पौराणिक कथायें  सामाजिक व्यवस्था की सबसे ऊपरी परत बनकर छा गयीं और नीचे की परत वाले अन्य धर्म उसकी छाया में आ गये। इस तरह पुरुओं के वैदिक धर्म का वितान फैलकर समूचे भारत पर छा गया। इसमें कोई विवाद नहीं कि इस अखिल भारतीय वितान वाले धर्म को ही ‘हिंदू’ कहा गया किंतु, ऐसा कब से कहा जाने लगा, यह विवाद और भ्रम में लिपटा हुआ है।

हिंदू धर्म के भारत में प्रसार और अब्राहम के रिलीजन के समूचे संसार में विस्तार में एक बड़ा भारी अंतर था।  जिन धर्मों को अब्राहमी रिलीजन तहस-नहस और उनका मुलोच्छेद कर उसकी जगह पर अपने को स्थानापन्न करना चाहते थे, सबसे पहले उनके देवी-देवताओं को वे दैत्य और उनके धार्मिक लोकाचार को आसुरी आचरण घोषित करते थे। दूसरी ओर अपने में समाहित होने वाले और घुलने-मिलने वाले जनजातीय धर्मों को हिंदुत्व सम्मान, समादर और सह-आस्तित्व की दृष्टि से देखता था तथा उनके देवी-देवताओं को भी वहीं भक्ति और आदर-भाव समर्पित करता था जो अपने देवी-देवताओं को करता था। उनकी  धार्मिक मान्यताओं को वह अपना तक लेता था। इसका परिणाम यह हुआ कि आज भारत के कोने-कोने में जो सबसे लोकप्रिय देवी-देवता हैं वे या तो जनजातियों के देवी देवता हैं या फिर उन्होंने अपना जीवन और जीवन-मूल्य जनजातियों को समर्पित कर दिया  है। आप दृष्टांत के रूप में केरल के अयप्पा, तमिलनाडु के मुरगन, आन्ध्र के बालाजी, कर्नाटक के विट्ठल, महाराष्ट्र के विठोबा और खंडोबा, ओडिशा के जगन्नाथ आदि को ले सकते हैं या फिर हज़ारों नामों से भारत के कोने-कोने में पूजी जाने वाली मातृ-शक्ति का स्मरण कर सकते हैं। हर क्षेत्र के स्थानीय देवी या देवता वहाँ की कुल/ग्राम/गृह-देवी/देवता के रूप में पूजे जाते हैं। पौराणिक कथाओं में  इन स्थानीय देवी/देवताओं का संबंध और संदर्भ प्रमुख वैदिक देवी या देवता जैसे विष्णु या रुद्र के साथ ऐसे पिरो दिया जाता है कि ये जनजातीय देवता भी उन वैदिक देवताओं के अंशावतार या विस्तार के रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं और मुख्य धारा में जगह पा लेते हैं। किंतु सबसे अधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सारी प्रक्रिया लोक-कथाओं और लोकाचार के माध्यम से एक सहज स्वाभाविक प्रवाह में होती हैं। कहीं भी ऊपर से आरोपण या ज़बरन थोपे जाने का लेश मात्र भी न होता है, न दिखता है। स्थानीय देवता अपना मूल नाम ही रखते हैं, उनकी उपासना की पद्धति भी वहीं मूल स्थानीय ही होती है, किंतु उनका स्वरूप और उनकी महिमा अखिल भारतीय हो जाती है। वह समूचे भारतवर्ष के भक्तों के तीर्थ-स्थान बन जाते हैं।

हिंदू धर्म की यह विलक्षणता केवल देवी-देवताओं के ही संदर्भ में ही नहीं है, बल्कि हिंदुत्व की विचार परम्परा, उसके दर्शन और उसके अन्य सभी धार्मिक तत्वों में समाहित उदारता और लचीलेपन की दक्षता के साथ भी है जिससे उसने समस्त भारतवर्ष के स्थानीय और जनजातीय धर्मों के तत्वों को अपने में सहेजा है।  हिंदू धर्म की छतरी का प्रतिनिधित्व करने वाले पुरुओं के उसी मौलिक वैदिक धर्म को ही कमोवेश व्यापक स्तर पर अखिल भारतीय धर्म के रूप में मान्यता मिली है जो ऋग्वेद का धर्म है। इंद्र, वरुण, मित्र, अग्नि, सोम और मरुत पूजे जाने वाले मुख्य वैदिक देवता हैं। बाद में विष्णु और रुद्र सबसे प्रमुख देवताओं में शामिल हो जाते हैं। अग्नि-पूजा (होम और यज्ञ की विधि) तथा सोम की पूजा पूजा-पद्धति के  सबसे महत्वपूर्ण अंग  हैं। आज के दिनों में सोम का तत्व ग़ायब हो गया है। सही मायने में सोम की पहचान और प्रकृति सदा से विवाद का विषय रही  है। अग्नि-आहुति या हवन-अनुष्ठान  का प्रचलन आज भी है किंतु यह जन्म, मृत्यु और परिणय-संस्कारों से लेकर गृह-प्रवेश जैसे कुछ ख़ास अवसरों तक ही सीमित है। वेद के ये अधिकांश देवता छोटी-छोटी पौराणिक कहानियों में प्रकट होते हैं।

आचरण के धरातल पर वे सारे तत्व जो हम आज के हिंदुत्व में पाते हैं, वे सभी भारतवर्ष के सभी हिस्सों के निवासियों, मूलतः वृहत भूखंड में फैले जनजातियों की धार्मिक परम्पराओं, उनके रीति-रिवाज, लोकाचार और आराधना-पद्धतियों के तन्तुओं का समाहार हैं। मूर्ति-पूजा या प्रतिमाओं की आराधना हिंदू धर्म का एक ख़ास चरित्र है। यह भौतिक वस्तुओं में पराभौतिक शक्तियों और सगुण स्वरूप में निर्गुण की स्थापना का द्योतक है। शिला-खंडों में आँख की आकृति का चित्र बनाकर उन्हें ‘लिंग’ रूप में पूजा जाता है। ये लिंग सुंदर गढ़े हुए पत्थरों, धातुओं या अन्य पदार्थों के भी बने हो सकते हैं। इन लिंगों में प्राण-स्थापना कर इन्हें एक सजीव सत्ता के रूप में पूजा जाता है। इन्हें नहलाया-धुलाया जाता है। चंदन, सुंदर वस्त्र, आभूषण और  फूलों से इनका श्रिंगार  किया जाता है। इनके ऊपर नारियल, केले, अन्य फल-मूल, मिष्टान्न आदि का अर्पण  किया जाता है,  सुगंधित धूप, अगरबत्ती जलाकर इन प्रतिमाओं की बड़े श्रद्धा-भाव से आरती की जाती है और भक्ति-भाव-विहवल भक्त भक्ति-संगीत में सराबोर हो अपनी आराध्य देव-प्रतिमा के समक्ष कीर्तन-भजन और नृत्य में लीन हो जाते हैं। देव-प्रतिमा पर अर्पित प्रसाद को वे पूजनोपरांत ग्रहण करते हैं और लोगों में वितरित करते हैं।  इन प्रतिमाओं के आवास के रूप में सुंदर नक्काशियों  से उत्कीर्णित भव्य प्रस्तर-स्तम्भों पर टीके  आलीशान देवालयों का निर्माण करते हैं। उनमें सुंदर और पवित्र जलाशयों और भक्तों को ठहराने के लिए उत्तम धर्मशालाओं की व्यवस्था होती  है।  सुंदर घाट, शुभ मुहूर्तों पर मंदिरों में भव्य उत्सव, देवता को ढोने के लिए अत्याकर्षक पालकी, रथ आदि इन देवालयों की विशेषता है। देव प्रतिमा के मस्तक  पर चंदन के लेप, हल्दी और सिंदूर का टीका या त्रिपुंड लगाया जाता है। ये सारे लक्षण अन्य विविधताओं के साथ भारत भूमि के उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम में फैले विशाल क्षेत्र और चतुर्दिक दिशाओं में बसी विशाल जनसंख्या के समस्त सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक  तत्वों का समाहार है। 

उसी तरह हिंदू धर्म के दार्शनिक तन्तुओं का ताना-बाना भी समस्त भारतीय भूखंड पर फैले जनजातीय समाज की लोक-मान्यताओं से बुना हुआ है। इसमें आत्मा का देहांतरण, पुनर्जन्म, पंचांग और तिथि पर आधारित शुभ मुहूर्त की अवधारणा, विशेष प्रकार के वृक्षों, पौधों, पशु-पक्षियों, कीड़ों-मकोड़ों, जंगलों, पहाड़ों और नदी-नालों और पुरखे-पूरनियों की पूजा इसकी अद्भुत मिसाल है।  


Monday, 16 November 2020

वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध ------ (१३)

(भाग - १२ से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य - ()

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)


मूल-भूमि की अंतिम शाखा 


 भारतीय-आर्य शाखा ही उन बारह भारोपीय और तीन अन्य  शाखाओं में  एक मात्र शाखा रही  जो अपनी  मूलभूमि में बची रह गयी। यहीं वैदिक आर्य या पुरुओं की भाषा थी।अन्य पूर्वी जनजातियों के मुक़ाबले इस वैदिक सभ्यता का अध्ययन करने से पहले हमें अणु तथा दृहयु जैसी पश्चिमी जनजातियों के सापेक्ष इनकी स्थिति का आकलन करना होगा। ऐसा करना इस परिप्रेक्ष्य में  भी वांछित होगा कि ये जनजातियाँ भारत से बाहर चली जाने वाली अन्य भाषायी शाखाओं के आद्य स्वरूप को बोलने वाली जनजातियाँ थीं। 

‘आर्य-आक्रमण-अवधारणा’ के परिप्रेक्ष्य में वैदिक भारतीय-आर्य विरासत को तीन चरणों में बाँटा जाता है। 

–  अपनी मूलभूमि, दक्षिणी रूस,  की  अन्य ग्यारह शाखाओं के साथ साझी भारोपीय विरासत, 


– अन्य दस शाखाओं से ईरानी और भारतीय-आर्य शाखाओं के अलग होकर पूरब की ओर बढ़ने के बाद मध्य एशिया में ईरानी शाखाओं की साझीदार भारतीय-ईरानी विरासत, और

 

– ईरानी से पृथक होकर भारत में प्रवेशोपरांत स्वतंत्र रूप से विकसित होनेवाली भारतीय-आर्य विरासत। 


अब दूसरी ओर ‘भारत से निकली’ या ‘भारत ही मूलभूमि’ की अवधारणा के परिप्रेक्ष्य में भी भारोपीय शाखा के यात्रा-पथ के आधार पर उसी प्रकार भारतीय-आर्य विरासत को तीन चरणों में बाँटा जाता है।

– उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत की एक ही कोख में जन्मी सभी बारह शाखाओं की साझीदार भारतीय-यूरोपीय विरासत,


– बाक़ी दस शाखाओं के प्रस्थान के पश्चात ईरानी और भारतीय-आर्य शाखाओं की साझीदार भारतीय-ईरानी विरासत, और

 

– ईरानियों के अप्रवासन और उनके चले जाने के बाद अपने दम पर फली-फूली भारतीय-आर्य विरासत।  


अब यदि ‘आर्य-आक्रमण-अवधारणा’ को सही मान लिया जाय तो फिर जिस वैदिक संस्कृति का चित्र ऋग्वेद में उभरता है, वह इतने गाढ़े रूप में न होकर अपनी कल्पित जन्मभूमि की तथाकथित मौलिक ‘आद्य-भारोपीय’ संस्कृति के अत्यंत फीके और क्षीण स्वरूप को ही प्रतिबिम्बित करता। हमने जैसा कि देखा है कि वैदिक भाषा अन्य भाषाओं की जननी न होकर बस भाषा परिवार की अन्य बारह शाखाओं में से एक शाखा मात्र है। अब आप ही यह तय करें कि दक्षिणी रूस की कोख से निकलकर हज़ारों कोस की यात्रा शताब्दियों में तय करने के बाद भारत-भूमि के उत्तरी छोर  तक पहुँचते-पहुँचते उस भारोपीय  संस्कृति के कितने अंश बच पाते और जो थोड़े बचते भी  उसकी थोड़ी-बहुत छाप ही बस  ऋग्वेद में झलकनी चाहिए थी। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से ऋग्वेद में आद्य-भारोपीय-भाषा का कोई फीका-सा अंश नहीं मिलता है और न ही ऋचा के रचयिताओं ने अपनी किसी ऐसी स्मृति का उद्घाटन किया है जो उन्हें किसी परदेशी अतीत में बाँधता हो।

सच तो यह है कि ऋग्वेद की भाषा और इसके सांस्कृतिक तंतु आद्य-भारोपीय भाषायी संस्कारों से इतने घनिष्ट हैं कि लगता है मानों उसी की कुक्षी का यह नवांकुर बीज हो। ऋग्वेद के अपने अनुवाद की प्रस्तावना में ग्रिफ़िथ लिखते हैं कि “सच कहें तो ऋग्वेद में इसकी काव्यात्मकता से भी ज़्यादा अगर कोई चीज़ रुचि जगाती है तो वह इसकी ऐतिहासिकता है। एक तरफ़ इसकी मौलिक भाषा में ग्रीक, लैटिन, केल्ट, ट्यूटन और स्लावी भाषाओं के जड़ और धड़ तो दिखायी देते ही हैं, दूसरी तरफ़ ईसाईयत के पैदा होने से पहले के यूरोप के देवी-देवता, पौराणिक गल्प-कथायें, धार्मिक आस्थाएँ, वहाँ के लोकाचार और उनकी परम्परायें वेद के प्रचंड प्रकाश-पुंज से जगमग हैं।“ 

-  ऋग्वेद की कथाओं में भारोपीय कथा-परम्परा के प्राचीनतम स्वरूप के दर्शन होते हैं। उदाहरण के तौर पर हम मैकडोनेल की इन बातों पर ग़ौर कर सकते हैं कि “वेद के देवी-देवता अपने रूपकों में अन्य किसी भी भारोपीय कथाओं के नायक देवी -देवताओं की तुलना में भौतिक जगत और सांसारिक घटनाओं के ज़्यादा क़रीब हैं“ ( मैकडोनेल १९६३:१५)। सही मायने में, अधिकांश कथाओं में तो हम कपोल-कल्पित उन पौराणिक सत्ताओं और उनसे जुड़ी प्राकृतिक लीलाओं की सही पहचान उनके उन स्वरूपों में  ही कर लेते हैं जिस रूप में ये चरित्र वेद के कथानक में प्रकट होते हैं। बाक़ी भारोपीय भाषाओं की जितनी भी पौराणिक कथाएँ हैं उन सबमें ऐसे अनगिन तत्व हैं जो वेद की कथाओं से मेल खाते हैं। हालाँकि उन सभी में आपसी समानताएँ बहुत थोड़ी ही हैं और वे जो भी थोड़ी उनकी पारस्परिक समानताएँ हैं वे भी ऋग्वेद में बख़ूबी पायी जाती हैं। अपवाद में बस वे ही तत्व हैं जिनका पड़ोसी भाषाओं से उन्होंने आपस में लेन-देन किया है। इस संबंध में हम ग्रीक देवता अपोलो का दृष्टांत दे सकते हैं जिन्हें रोमन कथाओं ने भी अपना लिया है।(तलगेरी १९९३:३७७-३९५)

उदाहरण के तौर पर हम नीचे दी गयी सूची पर एक नज़र फेर सकते हैं जो भारोपीय भाषाओं की एक से अधिक शाखाओं में वर्णित लगभग सम्पूर्ण पौराणिक देवताओं को प्रतिबिम्बित करती है :

द्यौस पितर (वैदिक), ज़्यूस पेटर (ग्रीक), जूपिटर (रोमन), डे पटरौस (इलिरीयन), डी ईव्स (बाल्टिक) 

उषा (वैदिक), इयोस (ग्रीक), औरोरा (रोमन), औश्रीण (बाल्टिक)

वरुण (वैदिक), ओडिन/वोडन (जर्मन), ओऊरानूस (ग्रीक), वेलिनस (बाल्टिक)

असुर (वैदिक), ऐसिर (जर्मन), अहुर (अवेस्ता)

मारुत (वैदिक), अरेस (ग्रीक), मार्स (रोमन)

पर्जन्य (वैदिक), परकुंस (बाल्टिक), पेरनु (स्लावी), जौर्गिन (जर्मन)

त्रैतं (वैदिक), थ्रेताओं (अवेस्ता), ट्रायटॉन (ग्रीक)

आर्यमान (वैदिक), ऐर्यमान (अवेस्ता), अरीयोमांस/ एरेमों (सेल्टिक)

सरमा/ सारमेय (वैदिक), हर्मिस (ग्रीक)

पूसन/पाणि (वैदिक), पन (ग्रीक), वाणीर (जर्मन)

रूद्र (वैदिक), रुगलु (स्लावी)

दनु (वैदिक), दनु (आइरिश)

इंद्र (वैदिक), इंद्र (अवेस्ता), इनर (हित्ती)

सर्वर (वैदिक), करबरोस (ग्रीक)

श्री (वैदिक), सीरीज़ (ग्रीक), फ़्रेयर/फ़्रेअ (जर्मन)

भग (वैदिक), बग (अवेस्ता), बाओग (स्लावी)

अपाम नपात (वैदिक), अपाम नपात (अवेस्ता), नेपचुनस (रोमन), नेचतें (सेल्टिक)

ऋभु (वैदिक), एल्ब (जर्मन = अंग्रेज़ी में ‘एल्फ़’)

यम (वैदिक), यिमा (अवेस्ता), यमिर (जर्मन)

ऊपर की तालिका में वर्णित कुल १९ सूचियों में वैदिक १९, ग्रीक ९, अवेस्ता ७, जर्मन ७, रोमन ४, बाल्टिक ४, स्लावी ३, सेल्टिक २, हित्ती १ और अल्बानी १ हैं। इन सारे देवताओं में अवेस्ता की समान साझेदारी है। यह भी स्पष्ट है कि सबके देवताओं की तुलना का मार्ग ऋग्वेद के देवताओं से ही होकर जाता है। आगे थोड़ा ग़ौर करें तो हम पाएँगे कि अवेस्ता धर्म और पौराणिकता के एक ऐसे रूप को गढ़ता है जो अत्यंत विकसित, मानवरूपांकित और परिवर्धित है। यहाँ यह भी देखने को मिलता है कि ऋग्वेद से इसकी अलंकारिक तुलनाओं को यदि छोड़ दें तो अवेस्ता का प्राकृतिक घटनाओं से कुछ कम ही लेना-देना है।

मात्र वैदिक चरित्र ही इस मामले में अनोखे हैं कि उनके सजातीय और सहोदर चरित्र बाक़ी सभी शाखाओं में उपस्थित हैं। लेकिन दो अलग-अलग शाखाओं के पौराणिक चरित्रों का आपस में तुलना करना तब तक असंभव प्रतीत होता है जब तक कि उन्हें हम संबद्ध वैदिक चरित्र के आलोक में न देखें। दृष्टांत के तौर पर ट्यूटोनिक (जर्मन) ‘वाणीर’ और ग्रीक के ‘हर्मिस’ और ‘पन’ आपस में जुड़े हैं लेकिन इनके आपसी संबंधों को हम तबतक समझ नहीं समझ पाएँगे जब तक कि हम वेद के शर्मा और पाणि को न समझें। जहाँ तक अवेस्ता के पौराणिक चरित्रों का सवाल है तो वे बाक़ी भारोपीय  भाषाओं से इस मायने में बिल्कुल  अलग-थलग हैं कि उनके चरित्र मात्र वैदिक चरित्रों से ही तालमेल रखते हैं। 

– भाषायी तौर पर देखें तो वैदिक भाषा इस मामले में विलक्षण है कि इसने भिन्न-भिन्न भारोपीय भाषाओं के सजातीय मूल क्रिया-पदों को अभी तक बचाए रखा है। इस बिंदु की ओर सबसे पहले निकोलस कजनस ने ध्यान खींचा। बाद में कोएनराड एल्स्ट ने इसको और विस्तार दिया। उन्होंने बताया कि वैदिक संस्कृत में ऐसे ढेरों अतिप्रचलित और मूलभूत सजातीय शब्द हैं, जिनके उद्भव स्त्रोत नए शब्दों की व्युत्पति में अब भी वैसे ही सक्रिय और उर्वर हैं। उदाहरण के तौर पर पिता, पुत्र, पुत्री, भालू, भेड़िया आदि के लिए वेद में प्रयुक्त शब्द। दूसरी ओर इनके लिए अन्य शाखाओं मेंजो सजातीय शब्द आए हैं उनकी व्युत्पति के संबंध में कोई प्रामाणिक शास्त्रीय स्त्रोत नहीं मिलता है।

ऋग्वेद की थोड़ी और पड़ताल करने पर पता चलता है कि भारोपीय, भारतीय-ईरानी और भारतीय-आर्य, ये तीनों चरण ग्रंथ के इतिहास में ही समाहित हैं। भौगोलिक रूप से भी ये तीनों चरण भारत-भूमि में ही विद्यमान हैं। सच कहें तो, क्रम से ऋग्वेद के सबसे प्राचीन मंडल ६, ३ और ७ की रचना-भूमि हरियाणा और उससे पूरब सरस्वती के पूरबी तट के  क्षेत्रों तक में ही फैली हैं। साथ ही, इस क्षेत्र का पश्चिमोत्तर विस्तार भी वेदों की रचना के साथ ही पसरता रहा। मात्र एक शब्द ‘रात्रि’ के इतिहास पर ही दृष्टिपात कर इस प्रक्रिया को समझा जा सकता है।

– ‘रात्रि’ के लिए प्रचलित भारोपीय शब्द है ‘नक्त’। क़रीब-क़रीब अन्य सभी शाखाओं में भी ऐसे ही शब्द का का प्रचलन है। जैसे, ग्रीक – नौक्स (आधुनिक ग्रीक में – निक़्त), लैटिन – नौक्टिस, फ़्रांसीसी – नुइट, स्पैनिश – नौक, हित्ती – नेकुज, टोकारियन – नेकाई, जर्मन – नाक्ट, आइरिश- अनौक्त, रूसी – नौक, लिथुआनियन – नक्तिस, अल्बानियन – नते आदि-आदि। 

– आम चलन में कम आने वाला एक भारतीय-ईरानी शब्द है – ‘क्षप’, जिसका समूचे ऋग्वेद में प्रयोग हुआ है। यह अवेस्ता में भी ‘क्षाप’ के रूप में पाया जाता है, जहाँ ‘नक्त’ से संबधित शब्द का पूर्ण अभाव है। अपवाद स्वरूप, मात्र एक उप वाक्य में ‘उप-नक्षतरूसु’ शब्द मिलता है जिसका अर्थ ‘रात्रि के समीप’ रूप में प्रकट होता है। आधुनिक फ़ारसी में भी एक शब्द आता है ‘शब’, जिससे उर्दू का शब्द ‘शब-नम’ अर्थात रात्रि की नमी, ओस निकलता है।

– ऋग्वेद के बाद के अंशों में पहली बार कहीं-कहीं ‘रात्रि’ शब्द उपस्थित होता है। यही शब्द बाद के ग्रंथों में ‘नक्त’ के बदले स्थायी रूप से प्रयोग होता है। बाद की भारतीय-आर्य भाषाओं और उन सभी भाषाओं में भी जिनका उद्गम संस्कृत है, ‘रात्रि’ शब्द ही प्रयोग होता है। किंतु, भारतीय भूभाग के बाहर की उन सभी भारोपीय भाषाओं में जिनका प्रस्थान इस भूमि से ‘रात्रि’ शब्द के उद्भव के पहले ही हो गया था, इस शब्द का कोई चिह्न नहीं मिलता है। वही स्थिति जल के लिए आने वाले शब्द ‘आप’, ‘ऊद’ और ‘पानी’ की भी है। 

“ऋग्वेद की भाषा इस बात को बख़ूबी प्रदर्शित करती है कि ईसाईयत के पैदा होने से पहले के समस्त भारोपीय भाषाओं के जड़-धड़, देवी-देवता, पौराणिक गल्प-कथायें, धार्मिक आस्थाएँ, वहाँ के लोकाचार और उनकी परम्परायें वेद के प्रचंड प्रकाश-पुंज से जगमग हैं।“ ऐसा इसलिए है कि समस्त बारह शाखाओं सहित ऋग्वेद की भी जन्मभूमि उत्तरी भारत ही है। हालाँकि, ऋग्वेद में उन शाखाओं में से बस एक, केवल भारतीय आर्य-शाखा ( पुरुओं की जनजाति की भाषा और धर्म) का ही प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद का रचना प्रवाह अन्य भारोपीय भाषाओं के यहाँ से प्रस्थान के उपरांत भी काफ़ी लम्बे समय तक अपनी ज्न्म्भूमि को सिंचित करते रहा। और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह रही  कि इस क्षेत्र के इतिहास और परम्पराओं की मौलिकता न केवल ऋग्वेद की कालजयी ऋचाओं में चिरंतन  सजीव बनी रही, बल्कि उनकी भाषिक और पौराणिक धारा को परवर्ती पौराणिक रचनायें आगे भी बहाए रखी।