Friday, 23 August 2019

गांधी को महात्मा बना दिया

सींच रैयत जब धरा रक्त से
बीज नील का बोता था।
तिनकठिया के ताल तिकड़म में
तार-तार तन धोता था।

आब-आबरू और इज़्ज़त की,
पाई-पाई चूक जाती थी।
ज़िल्लत भी ज़ालिम के ज़ुल्मों ,
शर्मशार झुक जाती थी।

बैठ बेगारी, बपही पुतही,
आबवाब गड़ जाता था।
चम्पारण के गंडक का,
पानी नीला पड़ जाता था।

तब बाँध कफ़न सर पर अपने,
पय-पान किया था हलाहल का।
माटी थी सतावरिया की,
और राजकुमार कोलाहल का।

कृषकों की करुणा-गाथा गा,
लखनऊ को लजवा-रुला दिया।
गांधी की काया-छाया बन,
अपना सब कुछ भुला दिया।

काठियावाड़ की काठी सुलगा,
चम्पारण में झोंक दिया।
निलहों के ताबूत पर साबुत
कील आखिरी ठोक दिया।

'सच सत्याग्रह का' सपना-सा,
भारत-भर ने अपना लिया।
राजकुमार न राजा बन सका,
गांधी को महात्मा बना दिया।

(शब्द-परिचय:-
राजकुमार - पंडित राजकुमार शुक्ल (१८७५-१९२९)
कोलाहल - श्री कोलाहल शुक्ल, राजकुमार शुक्ल के पिता
चम्पारण सत्याग्रह की नींव रखने वाले राजकुमार शुक्ल गांधी को
चम्पारण बुलाकर लाये और सबसे पहले सार्वजनिक तौर पर उन्हें 'महात्मा' संबोधित कर जनता द्वारा 'महात्मा गांधी की जय' के नारों से चम्पारण के गगन को गुंजित किया। आगे चल के महात्मा गांधी ही प्रचलित नाम बन गया।
तिनकठिया - एक व्यवस्था जिसमें किसानों को एक बीघे अर्थात बीस कट्ठे में से तीन कट्ठे में नील की खेती के लिए मजबूर होना।
आबवाब - जहांगीर के समय से वसूली जाने वाली मालगुजारी जो अंग्रेजो के समय में चम्पारण में पचास से अधिक टैक्सों में तब्दील हो गयी। जैसे:-
बैठबेगारी - टैक्स के रूप में किसानों से अंग्रेज ज़मींदारों द्वारा अपने खेत मे बेगार, बिना कोई पारिश्रमिक दिए, खटवाना,
बपही - बाप के मरने पर चूंकि बेटा घर का मालिक बन जाता थ, इसलिए अंग्रेजो को बपही टैक्स देना होता था।
पुतही- पुत्र के जन्म लेने पर अंग्रेज बाप से पुतही टैक्स लेते थे।
फगुआहि- होली में किसानों से वसूला जाने वाले टैक्स)