Sunday, 15 May 2022

तुभ्यमेव समर्पयामि

ख्वाहिशों का घर गिरा हो,

घोर निराशा तम घिरा हो।

तो न जीवन को जला तू,

खोल अंतस अर्गला तू।


मन  प्रांगण में बसे हैं,

जीवन ज्योति धाम ये।

तिमिर से बाहर निकल,

आशा का दामन थाम ले।


ले वसंत का अज्य तू और,

ग्रीष्म की हो सत समिधा।

हव्य समर्पण हो शिशिर का,

पुरुष सूक्त की यज्ञ विधा।


सृष्टि के आदि पुरुष का,

दिव्य भाव मन अवतरण।

हो प्रकृति के तंतुओं का,

कण -कण सम्यक वरण।


अणु प्रति के परम अणु,

सौंदर्य दिव्य विस्तार हैं।

सृष्टि है एक पाद सीमित,

तीन अनंत अपार हैं।


उस अनंत में घोलो मन को

त्राण तृष्णा से तू पा लो।

 ' तुभ्यमेव समर्पयामि '

कातर कृष्णा-सा तू गा लो।


Saturday, 7 May 2022

हँसना है मजबूरी।

सच कहते हो, मैं हँसता हूँ ,

हँसना  है  मजबूरी।

धुक-धुक दिल की मेरी सुध लो,

इसकी साध अधूरी।


नहीं गोद अब इसे मयस्सर,

जिसमें यह खो जाए!

आँचल उसका  गीला  कर दे, 

मन भर यह रो जाए।


सुबक-सुबक कर जी भर  बातें, 

दिल में उसके बोले ।

हर सिसकी पर उर में उसके, 

भाव भूचाल-सा डोले।


फिर क्रोड़ से करुणा की, 

भागीरथी भर आए।

मन के कोने-कोने को, 

शीतल तर  कर  जाए।


बस मन रखने को मेरा, 

चाँद पकड़ वह  लाए।

उसकी  दूधिया चाँदनी में,

सूरज को नहलाए।


ग्रह-नक्षत्र, पर्वत, नदियाँ, 

चिड़िया, परियों की रानी।

दुलराए और मुझे सुनाए, 

‘माँ, कह एक कहानी’।


मंद-मंद मुन्ने की मुस्की,

माँ का मन अघाए।

पुलकित संपुट के प्रसार में, 

सभी कला छितराए।


अब चंदोवा-सी उस गोदी से ,

दीर्घ काल की दूरी।

छिन  गयी गोदी, अब क्यों रोना?

हँसना  है  मजबूरी!


Thursday, 5 May 2022

पहले पतझड़, फिर बसंत

सूखा सैकत सूर्यसुता का,

वृंदावन भी ख़ाली है।

कालिय के कालकूट से 

हुई कालिन्दी काली है।



गुल चमन  नहीं खिलते हैं, 

अलि आली भी  नहीं मिलते हैं।

बाग बीज विरह बोया है,

जीवन का सौभाग्य सोया है।


चाँद चुप और शांत पौन है,

पर्वत थिर और नदी  मौन है।

ठंडी किरणें सूरज काला,

जहर जुन्हाई माहूर हाला।


काली रात कर्कश काटी है,

धरती की छाती फाटी है।

अंतरिक्ष पर्जंय सूखा है,

मन का अंतर्भाव भूखा है।


पल पर परलय का पहरा है,

तिमिर विश्व पसरा गहरा है।

आशा का किंतु, कहाँ अंत है!

पहले पतझड़ फिर बसंत है।


Thursday, 14 April 2022

सतुआनी


 मीन महल से निकले सूरज,

किया मेष प्रवेश।

आग उगलने लगी किरणें,

हुआ गृष्मोन्मेष!


कतर मिर्च हरी प्याज संग,

सत्तू अमिया की चटनी।

ऊपर रवि आगी में धनके,

नीचे रबी की कटनी।


गंगा जल में डुबकी मारे,

साधक, ज्ञानी, दानी।

खरमास खतम, वैशाखी बिहू,

पुथांडू, सतुआनी।


Sunday, 3 April 2022

कर प्यार गोरिया


सरेह हरिहर बा, देखअ  पतवार गोरिया
पाछे पोखरा में मछरी गुलजार गोरिया।

पावस मनवा ओदाइल, फुहार गोरिया।
कर ल अँखियाँ हमरा संग, तू चार गोरिया।

देखअ  खेतवा में बदरा बा ठार गोरिया।
मनवा मारे इ गजबे के धार गोरिया।

छोड़अ  नखड़ा, ना रुसअ, न रार गोरिया।
हम गइनी  इ हियवा अब हार गोरिया।

देखअ  मिलिंदवा के मिलल, मकरंद गोरिया।
आव बहिंयाँ, तू अँखियाँ कर ल बंद गोरिया।

ई बा माटी के देहिया, निस्सार गोरिया।
चरदिनवा के चाँदनी,  कर  ल प्यार गोरिया।


शब्दार्थ :
सरेह - गाँव के बाहर खेत-पथार  वाली खुली जगह 
पतवार - पत्ते । पाछे - पीछे । पावस - बरसात। ओदाइल - भीगा हुआ।
बदरा - बादल। ठार - खड़ा ।रूसना  - रूठना । रार -तकरार । हियवा- दिल।
मिलिंद -भौंरा । मकरंद - पराग।देहिया - देह। चरदिनवा के चाँदनी - चार दिन की चाँदनी।

Monday, 7 March 2022

'द ऑरिजिनल फेमिनिस्ट्स'

झाँक रही

क्षितिज से 

अँजोर  में, उषा के।


खोल अर्गला 

इतिहास की,

पंचकन्याएँ!


लाल भुभुक्का हो गया है

लजा कर निर्लज्ज

'सूरज'!


सिहुर रहा है 

सहमा शर्म से

'समीर'!


पीला फक्क!

पाण्डु-सा, पड़ा 

'यम'!


मुँह लुकाये बैठा है

अलकापुरी का भोगी

'सहस्त्रभगी' !


जम गया है हिम में 

प्रस्तर बन पाखण्डी, अन्यायी!

बुदबुदाता-सा,


न्याय दर्शन को,

आत्मग्लानि में,

'तम'!


टेढा किये,

लटका है,

औंधे मुँह!


खूंटी से गगन की।

गवाक्ष का गवाह,

'अत्रिज'!


मधुकरी-सी परोसी गयी,

पाँच जुआरियों में

निक्षा भोग के लिए।


मर्यादा की गलियों में,

गूंजती गाली।

पांचाली!


अंगद पाँव 

जमाये कूटनीति, 

किष्किंधा की।


ऋष्यमुख पर,

तार-तार बेबस,

तारा!


दसों दिशाओं,

 खोले मुँह, 

भीषण अट्टहास!


मंद-मंद,

सिसकती हया,

मयतनया!


नरनपुंसक नाद, 

पंचेंद्रिय आह्लाद,

पौरुष पतित डंक।

 

नग्न, शमीत, ध्वस्त, 

होते अस्त, 

अनुसूया के अंक!



 पुरुष-प्रताड़ित,

जीने को  अभिशप्त, 

छद्म मूल्यों की धाह।

 

पकती, परितप्त, 

कंचन नारी मन,

बन कुंदन!


देती आभा,

कनक कुंडल को, 

नारी उद्धारक।


शिपिविष्ट पुरुषोत्तम,

चीर  प्रदायक, 

घनश्याम!  


प्रात: स्मरणीय, 

कांत-कमनीय,

वामा अग्रगण्या।


पिलाती संजीवनी सुधा,  

सृष्टि के सूत्र को, पंचकन्याएँ।

‘द ऑरिजिनल फेमिनिस्ट्स!’

Thursday, 10 February 2022

राम अटारी

 सुर सरोवर में 

मानस के, 


जीव हंस-सा 

हँसता है।


माया-मत्सर 

पंकिल जग के,


मोह-पाश में 

फँसता है।



लहकी लहरी 

ललित लिप्सा-सी,


मन भरमन 

भरमाया है।


लाल चमकता 

गुदड़ी अंदर,


ऊपर से 

भ्रम छाया है।



कंचन काया 

काम की छाया 


प्रेम सुधा 

लहराती।


अभिसार की 

मादक गंध 


मकरंद मिलिंद 

संग लाती।



किंतु बनती 

जननी  ज्योंही,


मनोयोग नारी 

निष्काम-सा।


पर लोभी नर,  

निरे चाम का,


नहीं जीव में 

रमे राम का!



रत्ना रंजित  

प्रीत की सीढ़ी 


शरण  सियावर 

राम की।


बजरंगी 

बलशाली  बाँहें ,


तीरथ  

तुलसी धाम की।



बड़े जतन से 

मानुस तन-मन, 


इस जीवन 

जन पाया है।


चल मानुष तू 

राम अटारी,


यह जग तो 

बस माया है।




Monday, 31 January 2022

वसंत



जीवन  घट  में  कुसुमाकर  ने,  
रस  घोला है  फिर चेतन  का।
शरमायी सुरमायी कली में,  
शोभे  आभा  नवयौवन  का।

डाल-डाल  पर  नवल  राग में,
पवन मदिरा मृदु प्रकम्पन।
अठखेली लतिका ललना की, 
तरु-किशोर का नेह-निमंत्रण।

पत्र दलों की नुपुर-ध्वनि सुन,  
वनिता  खोले  घन केश-पाश।
उल्लसित पादप-पुंज वसंत में,
नभ तैरे उर का उच्छवास।

मिलिन्द उन्मत्त, मकरन्द मिलन में, 
मलयज बयार,   मदमस्त मदन  में।
चतुर  चितेरा,  चंचल  चितवन  में,  
कसके   हुक    वक्ष-स्पन्दन   में।

प्रणय  पाग  की  घुली  भंग,  
रंजित पराग पुंकेसर   रंग।
मुग्ध मदहोश सौन्दर्य-सुधा,  
रासे  प्रकृति  पुरुष  संग।

पपीहे  की प्यासी पुकार में,
चिर संचित  अनुराग अनंत है।
सृष्टि का यह  चेतन क्षण है,
आली! झूमो आया वसंत है।

विश्वमोहन   

Saturday, 22 January 2022

मन में माँ और माँ में मन (पुण्यस्मृति नमन)

अब भला,  क्या सूखेंगे?

भीगे  थे, जो कोर नयन के!

ये आँखें भी तभी जगी थीं,

प्रहर तेरे महाशयन के।


काश! जो उस दिन भरपेट रोता!

आज शून्य में यूँ न खोता।

दृग-कोष में आँसू बँध गए,

और कंठ के स्वर भी रुँध गए।


तब से हर रोज का सूरज,

तमस शीत पिंड लगता है।

इससे भला तो चंदा मामा,

याद में तेरी जगता है।


लिए कटोरा दूध हाथ में,

हमको रोज बुलाता है।

'बउआ के मुँह में घुटुक'

लोरी की याद दिलाता है।


यादें कण-कण घुली हुई हैं,

रुधिर जो बहता मेरी नस-नस।

मन में माँ और माँ में मन!

चाहे राका, या अमावस।




Tuesday, 11 January 2022

तटस्थ तट!

 आषाढ़ घटा घनघोर रही,

सरस सलिला धार बही।

तट भी आर्द्र सराबोर हुआ,

पवन-प्रणय का शोर हुआ।


तट अभिसार का ज्वार हुआ,

सरिता से पावस प्यार हुआ।

वह बार-बार टूट गिरता था,

अपनी सरिता में मिलता था।


सरिता होती मटमैली-सी,

पर उसकी अपनी शैली थी।

कभी तरु संग खिलती थी,

और पवन से मिलती थी।


वह तट से मुँहजोर बोली,

तट का दिल वह तोड़ चली।

 छोड़ तुम्हें अब जाऊँगी,

नहीं कभी फिर आऊँगी।


तट प्रतिहत, अंतस आहत,

मन में हाहाकार हुआ।

हाय! पाहुन पाहन से,

उसे क्यों ऐसा प्यार हुआ!


स्वभाव सरिता का बहना है,

उसे स्थिर नहीं रहना है।

छोड़-छाड़ कर सब अपना,

तट को प्रेयसी संग दहना है।


प्रबल प्रवाह ही सरिता का,

तट को तोड़ा करता है।

तट का स्वभाव है समर्पण,

वह नित सरिता पर मरता है।


किन्तु तट तो तट ही है,

वह निश्चल है निश्छल है!

उसमें तब तक जीवन है,

जब तक सरिता में जल है।


सूख जाने पर भी तटिनी के,

स्थावर है, जड़वत है।

बहने-रहने की वृथा व्यथा,

चिर तटस्थ-सा रहता तट है।