Tuesday, 9 August 2022

प्रणव ॐ कार!

जटा जाह्नवी खाती बल है।

नंदीश्वर नीरज, निर्मल हैं।।


विषधर कंठ बने माला हैं।

ग्रीवा गिरीश गरल हाला है।।


विरुपाक्ष, तवस, हंत्र, हर।

विश्व, मृदा, पुष्पलोकन, पुष्कर।।


भक्त पुकारे मन डोले हैं।

अनिरुद्ध, अभदन, भोले हैं।।


ॐ कार की उमा काया हैं।

कल्पवृक्ष उनकी छाया हैं।।


पार कराते सागर भव से।

होते शिव, शक्ति बिन, शव-से।।


भाषा भुवनेश, भाव भवानी।

अर्द्धनारीश्वर औघड़ दानी।।


सती श्रद्धा, विश्वास हैं अंतक।

अर्हत, अत्रि, अनघ, परंतप।।


पशुपति की परा शक्ति है।

चित शक्ति प्रकट होती है।।


चित आनंद, आनंद से इच्छा।

इच्छा, प्रत्यक्ष ज्ञान की शिक्षा।।


चित से नाद, आनंद से बिंदु, इच्छा शक्ति बने ' म ' कार।

ज्ञान से ' उ ' , क्रिया से ' अ ', प्रादुर्भुत प्रणव कार।।



Sunday, 31 July 2022

धनपत

 (आज प्रेमचंद जयंती पर लेखनी के धनी धनपत राय को याद करते हुए)


ताप उदर का जब लहके,

मन की पीड़ा सह-सह के।

ज्वार विचार का उठता है,

शब्द-शब्द वह गहता है।


शोषण, दमन व अत्याचार के,

दंभ, आडंबर,  कुविचार के।

दुर्ग दलन वह करता है,

धर्म धीर का धरता है।



करुणा का कातर कतरा,

कुछ अनकहा-सा कहता है।

ऊष्मा से आहत अंतस के,

तप्त तरल-सा बहता है।


स्व की कुक्षी से बाहर आ,

अखिल अलख जगाता है।

तब रचना का प्रथम बीज,

मन-मरू में अंकुराता है।


भोग-विलास, धन कांटे जो,

बालुकूट में पलते हैं।

तप्त धरा पड़ते पावों के,

छालों को भी छलते हैं।


तभी वेदना की वीथी से,

जज़्बात का ज़मज़म जगता है।

डरे ईमान न कभी बिगाड़ से,

पंच परमेश्वर पगता है।


पांचजन्य के क्रांति नाद में,

विषमता खो जाती है।

धन्य-धन्य 'धनपत' की लेखनी

लहालोट हो जाती है।

Friday, 8 July 2022

लभ 'मिरेज' (लघुकथा)

 

दोनों के अंदर की कड़वाहट अब उबलकर बाहर आने लगी थी। अब न पत्नी शब्दों को चलनी में चालती, न ही पति उन्हे छनौते में छानता। पत्नी की जुबान पर कैंची और पति के मुख पर आत्मदर्प का तेज कुछ ज्यादा ही था।

आज फिर कैंची चल गई थी। रक्त की ऊष्मा भी आत्मदर्प में दमकने लगी। 'देखो जी, थोड़ी जुबान पर कंट्रोल करो।'

कैंची फिर छिटकी, '' ये तो तब कंट्रोल करना था न, जब तुम्हारा सौदा चार लाख में अरेंज कर दिया था, तुम्हारे बाप ने।''

'फिर तो कैंची वहीं चलाओ जहाँ  भुगतान किया था। मुझे तो तुम्हारे फादर से एक रेजगारी भी नहीं मिली थी।'

कामवाली बाई बड़ी रस लेकर किचेन में यह आँखों  देखा हाल पड़ोसन की उस नई नवेली बहू को सुना रही थी,  जिसे उसका खसम इसी खरमास में भगा के ले आया था।

'सुनो, ये चार लाख वाली बात माँ  जी के सामने मत बकना। मुँह पर ताला लगा लो अब! और, यह भी गठरी बांध लो कि हमारा अरेंज नहीं, लव मैरेज है।'

'भगवान आपका लभ 'मिरेज' बनाए रखे', यह कहते हुए  बाई तेजी से निकल गई।



Sunday, 19 June 2022

पत्नीटॉप


(छवि - साभार पत्नी)



 दिन ओदे आषाढ़ के,

बादल ऊपर चढ़ आए।

मानों यक्षी की पाती का,

हर हर्फ  वे पढ़ आए।


पर्वत बुत बन अड़े खड़े,

सड़कें सर्पीली लेटी हैं।

वायु शीतलता से सिहुरी,

ज्यों पर्जन्य की चेटी हैं।


बदरी भी छाकर छतरी,

छूती नीले अंबर को।

धोती अधोवस्त्रहीन वह,

देवदार दिगंबर को।


चीड़ ताने शंकु सी चूनर,

चिर यौवना बहकी है।

चमन चतुर्दिक चूँ-चूँ, चींचीं,

चिड़िया चकई चहकी है।


उनिंदी-सी सोई शांत चित्त,

सानासर की झील झिलमिल है।

नत्था टॉप से टिप टिप टीपती,

जलधाराओं की हिलमिल है।


पत्नी टॉप, ये हसीन वादियाँ!

हमदम मेरे! एतबार है।

हसरतों की हँसी  खुशी का,

पावस का पहिलौटा प्यार है।



(पत्नीटॉप - जम्मू कश्मीर का एक रमणीक पर्वतीय स्थान।

नत्था टॉप - वहां की सबसे ऊंची पर्वत चोटी)

सानासर झील - नत्था टॉप से थोड़ी दूरी पर एक मनोरम झील!)




Monday, 13 June 2022

न ब्रुयात, सत्यं अप्रियम

सत्यं ब्रुयात, ब्रुयात प्रियम,

कभी साँच को आँच नहीं।

न ब्रुयात, सत्यं अप्रियम,

भले ख़िलाफ़त, बाँच सही।


बड़ा ताप है, इन बातों में,

कहना कोई खेल नहीं है।

ढोंगी, पोंगी वाजश्रवा का,

नचिकेता से मेल नहीं है।


भले लोक परधाम गया,

पर आख़िर तक सच बोला।

ज्ञान-स्नात शिशु के सच से,

यमराज का मन डोला।


भले प्रताड़ित होता पल को,

नहीं पराजित होता है।

भू, द्यौ  और अंतरिक्ष में,

कालजयी यह होता है।


सत्य ढका हो, कनक कवच से,

उसे अनावृत करना है।

परम तत्व से सज्जित होकर,

भव-सागर को तरना है।


सत्यमेव जयते की लय पर,

मृत्यु देव ने किया समर्पण।

जुग-जुग से यह गूँजे जग में,

सत्य नूपुर के सुर की खन-खन।


Thursday, 2 June 2022

आइस पाइस

खिलना चाहूँ जब फूलों में,

काँटों ने नजर गड़ाई।

झूमूँ  तनिक तरु लता संग,

मौसम  की कड़ी कड़ाई।


घोलूँ  मलय सुगंध पवन में,

हो गई, हवा हवाई।

मिले मिलिंद मकरंद चमन में,

हमको मिली तन्हाई।


आफताब भी तनहा-तनहा

आसमान में घूमे।

तन्हाई की ज्वाला जलती,

किरणें धरती को चूमें।


तरणि से तपती धरती की,

जर्जर, जीर्ण - सी काया।

उबड़ - खाबड़ जीवन पथ पर,

कहीं धूप,  कहीं छाया।


ताके तृषित, नयन गगन घन,

दंभ दामिनी दमकी।

मन की लहरें दूर व्योम में

चंद्रप्रभा - सी चमकी।


चाँद - से चंचल मन उपवन में,

कभी ज्वार, कभी भाटा।

भाव -भँवर - जाल से भड़के

अराजक सन्नाटा!


आफरीन में मेहताब की,

मायूसी घुलती मन में।

अमा राका की आइस पाइस,

चेतन-अवचेतन  में।




Thursday, 26 May 2022

सो अहं, तत् त्वं असि'!

 धू-धू कर, मैं चिता में जल रही,

धूम्र बनकर, वायु तुम  मंडरा रहे हो।

देही थे तुम, देह अपनी छोड़कर,

नष्ट होने पर मेरे इतरा रहे हो!


सुन लो, हे अज, नित्य और शाश्वत!

चेतना का, दंभ तुम जो भर रहे हो!

छोड़ मुझ जर्जर सरीखी देह को,

भव सागर, आज जो तुम तर रहे हो!


तुम पुरुष हिरण्य बनकर आ गिरे,

मुझ प्रकृति का  ही गर्भ पाए थे।

घोल अपनी चेतना जीव द्रव्य में,

गीत मेरे संग सृजन के  गाए थे।


मुक्ति का जो भाव लेकर जा रहे,

हम निरंतर उस धारा में बह रहे।

पंच मात्रिक  तत्वों की मैं प्रकृति,

राख बन अपने स्वरूप ही दह रहे।


फिर, कोई तुम - सा भ्रमित पथिक,

अहंकार चेतना का लायेगा।

पांच तत्वों की मुझ प्रकृति में,

अपनी बुद्धि और मन को पाएगा।


हे पुरुष, भटके तुम जंगम, सुन लो!

स्थावर रूप मेरा, ही तुम्हारा वास है।

न मैं बंधी, और न हो, मुक्त तुम!

सहवास हमारा, ही समय आकाश है।


मेरी प्रकृति के अणु परमाणु में,

होता पुरुष विराट का विस्तार है।

'सो अहं, तत् त्वं असि', यह मंत्र ही,

सृष्टि की, अद्भुत छटा का सार है।





Monday, 23 May 2022

स्नेह की डोर (लघुकथा)

 

साथ - साथ गिरते - दौड़ते, चौकड़ी भरते दोनों पिछले दो फागुन से एक दूसरे के जीवन मेंअपने स्नेह और अपनापन का रंग भर रहे थे। यह देख-महसूस कर उसका बाल मन अघा जाता कि पिता ने भी उन दोनों पर अपने प्राण निछावर कर दिए थे। 

मेमने के मुँह  की  हरी घास  उसके मुँह में स्वाद भर देती। घंटी टुनटुनाती उसके गले की रस्सी हमेशा मनु थामे रहता। घंटी की रुनझुन पर झूमते दोनों  के सामने न जाने ये तीसरा फागुन  दस्तक देने कब पहुंच गया!  ...........

मनु पछाड़े मारकर रो रहा था। कसाई के हाथों में मेमने का पगहा था। पिता के हाथों में गुलाबी रुपए, मुख पर मुस्कुराहट और आंखों में चमक थी। मेमने की निरीह आँखों में मायूस मनु था। गंगा-जमुना की  धार  मनु की आंखों से बह रही थी।  एक अज्ञात भय उसके मन को कँपा रहा था; कहीं अपने स्नेह से उसको बांधने वाली डोर भी पिता किसी और के हाथों में न थमा दें!

Tuesday, 17 May 2022

फदगुदी

 

(चित्र आधारित कविता, बच्चों के लिए)


फुदक फुदक कर फदगुदी ने,

फड़ फड़ पर पसराए।

ठोक चोंच तृण नोकों पर,

लोल लाल लसराए।


घासों की हरियाली में,

कीट हरित खप जाए।

चतुर चंचला गौरैया ये,

झट से गप कर जाए।


गौरैया की नानी ने 

दादी का दाल चुराया।

बेगारी में मिले अन्न को

खूंटे में गिराया।


जब खूंटे ने ना कर दी

तो गौरैया गुस्साई।

बढ़ई, सिपाही, राजा, रानी

सबको व्यथा सुनाई।


सांप, लाठी, आगी, समुंदर

हाथी, जाल, घर पहुंची।

चट से दाल दिला दे चूहा

 बिल्ली चूं चूं चीं चीं!


आगे की सब बात पता है

कैसे बढ़ी कहानी।

बड़ी मुश्किल से दाल को पाई,

गौरये की नानी।


करके याद नानी की बातें,

पाते चट कर जाए।

फुदक-फुदक कर फदगुदी ने,

फड़ फड़ पर पसराए।






Sunday, 15 May 2022

तुभ्यमेव समर्पयामि

ख्वाहिशों का घर गिरा हो,

घोर निराशा तम घिरा हो।

तो न जीवन को जला तू,

खोल अंतस अर्गला तू।


मन  प्रांगण में बसे हैं,

जीवन ज्योति धाम ये।

तिमिर से बाहर निकल,

आशा का दामन थाम ले।


ले वसंत का अज्य तू और,

ग्रीष्म की हो सत समिधा।

हव्य समर्पण हो शिशिर का,

पुरुष सूक्त की यज्ञ विधा।


सृष्टि के आदि पुरुष का,

दिव्य भाव मन अवतरण।

हो प्रकृति के तंतुओं का,

कण -कण सम्यक वरण।


अणु प्रति के परम अणु,

सौंदर्य दिव्य विस्तार हैं।

सृष्टि है एक पाद सीमित,

तीन अनंत अपार हैं।


उस अनंत में घोलो मन को

त्राण तृष्णा से तू पा लो।

 ' तुभ्यमेव समर्पयामि '

कातर कृष्णा-सा तू गा लो।


Saturday, 7 May 2022

हँसना है मजबूरी।

सच कहते हो, मैं हँसता हूँ ,

हँसना  है  मजबूरी।

धुक-धुक दिल की मेरी सुध लो,

इसकी साध अधूरी।


नहीं गोद अब इसे मयस्सर,

जिसमें यह खो जाए!

आँचल उसका  गीला  कर दे, 

मन भर यह रो जाए।


सुबक-सुबक कर जी भर  बातें, 

दिल में उसके बोले ।

हर सिसकी पर उर में उसके, 

भाव भूचाल-सा डोले।


फिर क्रोड़ से करुणा की, 

भागीरथी भर आए।

मन के कोने-कोने को, 

शीतल तर  कर  जाए।


बस मन रखने को मेरा, 

चाँद पकड़ वह  लाए।

उसकी  दूधिया चाँदनी में,

सूरज को नहलाए।


ग्रह-नक्षत्र, पर्वत, नदियाँ, 

चिड़िया, परियों की रानी।

दुलराए और मुझे सुनाए, 

‘माँ, कह एक कहानी’।


मंद-मंद मुन्ने की मुस्की,

माँ का मन अघाए।

पुलकित संपुट के प्रसार में, 

सभी कला छितराए।


अब चंदोवा-सी उस गोदी से ,

दीर्घ काल की दूरी।

छिन  गयी गोदी, अब क्यों रोना?

हँसना  है  मजबूरी!


Thursday, 5 May 2022

पहले पतझड़, फिर बसंत

सूखा सैकत सूर्यसुता का,

वृंदावन भी ख़ाली है।

कालिय के कालकूट से 

हुई कालिन्दी काली है।



गुल चमन  नहीं खिलते हैं, 

अलि आली भी  नहीं मिलते हैं।

बाग बीज विरह बोया है,

जीवन का सौभाग्य सोया है।


चाँद चुप और शांत पौन है,

पर्वत थिर और नदी  मौन है।

ठंडी किरणें सूरज काला,

जहर जुन्हाई माहूर हाला।


काली रात कर्कश काटी है,

धरती की छाती फाटी है।

अंतरिक्ष पर्जंय सूखा है,

मन का अंतर्भाव भूखा है।


पल पर परलय का पहरा है,

तिमिर विश्व पसरा गहरा है।

आशा का किंतु, कहाँ अंत है!

पहले पतझड़ फिर बसंत है।


Thursday, 14 April 2022

सतुआनी


 मीन महल से निकले सूरज,

किया मेष प्रवेश।

आग उगलने लगी किरणें,

हुआ गृष्मोन्मेष!


कतर मिर्च हरी प्याज संग,

सत्तू अमिया की चटनी।

ऊपर रवि आगी में धनके,

नीचे रबी की कटनी।


गंगा जल में डुबकी मारे,

साधक, ज्ञानी, दानी।

खरमास खतम, वैशाखी बिहू,

पुथांडू, सतुआनी।


Sunday, 3 April 2022

कर प्यार गोरिया


सरेह हरिहर बा, देखअ  पतवार गोरिया
पाछे पोखरा में मछरी गुलजार गोरिया।

पावस मनवा ओदाइल, फुहार गोरिया।
कर ल अँखियाँ हमरा संग, तू चार गोरिया।

देखअ  खेतवा में बदरा बा ठार गोरिया।
मनवा मारे इ गजबे के धार गोरिया।

छोड़अ  नखड़ा, ना रुसअ, न रार गोरिया।
हम गइनी  इ हियवा अब हार गोरिया।

देखअ  मिलिंदवा के मिलल, मकरंद गोरिया।
आव बहिंयाँ, तू अँखियाँ कर ल बंद गोरिया।

ई बा माटी के देहिया, निस्सार गोरिया।
चरदिनवा के चाँदनी,  कर  ल प्यार गोरिया।


शब्दार्थ :
सरेह - गाँव के बाहर खेत-पथार  वाली खुली जगह 
पतवार - पत्ते । पाछे - पीछे । पावस - बरसात। ओदाइल - भीगा हुआ।
बदरा - बादल। ठार - खड़ा ।रूसना  - रूठना । रार -तकरार । हियवा- दिल।
मिलिंद -भौंरा । मकरंद - पराग।देहिया - देह। चरदिनवा के चाँदनी - चार दिन की चाँदनी।

Monday, 7 March 2022

'द ऑरिजिनल फेमिनिस्ट्स'

झाँक रही

क्षितिज से 

अँजोर  में, उषा के।


खोल अर्गला 

इतिहास की,

पंचकन्याएँ!


लाल भुभुक्का हो गया है

लजा कर निर्लज्ज

'सूरज'!


सिहुर रहा है 

सहमा शर्म से

'समीर'!


पीला फक्क!

पाण्डु-सा, पड़ा 

'यम'!


मुँह लुकाये बैठा है

अलकापुरी का भोगी

'सहस्त्रभगी' !


जम गया है हिम में 

प्रस्तर बन पाखण्डी, अन्यायी!

बुदबुदाता-सा,


न्याय दर्शन को,

आत्मग्लानि में,

'तम'!


टेढा किये,

लटका है,

औंधे मुँह!


खूंटी से गगन की।

गवाक्ष का गवाह,

'अत्रिज'!


मधुकरी-सी परोसी गयी,

पाँच जुआरियों में

निक्षा भोग के लिए।


मर्यादा की गलियों में,

गूंजती गाली।

पांचाली!


अंगद पाँव 

जमाये कूटनीति, 

किष्किंधा की।


ऋष्यमुख पर,

तार-तार बेबस,

तारा!


दसों दिशाओं,

 खोले मुँह, 

भीषण अट्टहास!


मंद-मंद,

सिसकती हया,

मयतनया!


नरनपुंसक नाद, 

पंचेंद्रिय आह्लाद,

पौरुष पतित डंक।

 

नग्न, शमीत, ध्वस्त, 

होते अस्त, 

अनुसूया के अंक!



 पुरुष-प्रताड़ित,

जीने को  अभिशप्त, 

छद्म मूल्यों की धाह।

 

पकती, परितप्त, 

कंचन नारी मन,

बन कुंदन!


देती आभा,

कनक कुंडल को, 

नारी उद्धारक।


शिपिविष्ट पुरुषोत्तम,

चीर  प्रदायक, 

घनश्याम!  


प्रात: स्मरणीय, 

कांत-कमनीय,

वामा अग्रगण्या।


पिलाती संजीवनी सुधा,  

सृष्टि के सूत्र को, पंचकन्याएँ।

‘द ऑरिजिनल फेमिनिस्ट्स!’

Thursday, 10 February 2022

राम अटारी

 सुर सरोवर में 

मानस के, 


जीव हंस-सा 

हँसता है।


माया-मत्सर 

पंकिल जग के,


मोह-पाश में 

फँसता है।



लहकी लहरी 

ललित लिप्सा-सी,


मन भरमन 

भरमाया है।


लाल चमकता 

गुदड़ी अंदर,


ऊपर से 

भ्रम छाया है।



कंचन काया 

काम की छाया 


प्रेम सुधा 

लहराती।


अभिसार की 

मादक गंध 


मकरंद मिलिंद 

संग लाती।



किंतु बनती 

जननी  ज्योंही,


मनोयोग नारी 

निष्काम-सा।


पर लोभी नर,  

निरे चाम का,


नहीं जीव में 

रमे राम का!



रत्ना रंजित  

प्रीत की सीढ़ी 


शरण  सियावर 

राम की।


बजरंगी 

बलशाली  बाँहें ,


तीरथ  

तुलसी धाम की।



बड़े जतन से 

मानुस तन-मन, 


इस जीवन 

जन पाया है।


चल मानुष तू 

राम अटारी,


यह जग तो 

बस माया है।




Monday, 31 January 2022

वसंत



जीवन  घट  में  कुसुमाकर  ने,  
रस  घोला है  फिर चेतन  का।
शरमायी सुरमायी कली में,  
शोभे  आभा  नवयौवन  का।

डाल-डाल  पर  नवल  राग में,
पवन मदिरा मृदु प्रकम्पन।
अठखेली लतिका ललना की, 
तरु-किशोर का नेह-निमंत्रण।

पत्र दलों की नुपुर-ध्वनि सुन,  
वनिता  खोले  घन केश-पाश।
उल्लसित पादप-पुंज वसंत में,
नभ तैरे उर का उच्छवास।

मिलिन्द उन्मत्त, मकरन्द मिलन में, 
मलयज बयार,   मदमस्त मदन  में।
चतुर  चितेरा,  चंचल  चितवन  में,  
कसके   हुक    वक्ष-स्पन्दन   में।

प्रणय  पाग  की  घुली  भंग,  
रंजित पराग पुंकेसर   रंग।
मुग्ध मदहोश सौन्दर्य-सुधा,  
रासे  प्रकृति  पुरुष  संग।

पपीहे  की प्यासी पुकार में,
चिर संचित  अनुराग अनंत है।
सृष्टि का यह  चेतन क्षण है,
आली! झूमो आया वसंत है।

विश्वमोहन   

Saturday, 22 January 2022

मन में माँ और माँ में मन (पुण्यस्मृति नमन)

अब भला,  क्या सूखेंगे?

भीगे  थे, जो कोर नयन के!

ये आँखें भी तभी जगी थीं,

प्रहर तेरे महाशयन के।


काश! जो उस दिन भरपेट रोता!

आज शून्य में यूँ न खोता।

दृग-कोष में आँसू बँध गए,

और कंठ के स्वर भी रुँध गए।


तब से हर रोज का सूरज,

तमस शीत पिंड लगता है।

इससे भला तो चंदा मामा,

याद में तेरी जगता है।


लिए कटोरा दूध हाथ में,

हमको रोज बुलाता है।

'बउआ के मुँह में घुटुक'

लोरी की याद दिलाता है।


यादें कण-कण घुली हुई हैं,

रुधिर जो बहता मेरी नस-नस।

मन में माँ और माँ में मन!

चाहे राका, या अमावस।




Tuesday, 11 January 2022

तटस्थ तट!

 आषाढ़ घटा घनघोर रही,

सरस सलिला धार बही।

तट भी आर्द्र सराबोर हुआ,

पवन-प्रणय का शोर हुआ।


तट अभिसार का ज्वार हुआ,

सरिता से पावस प्यार हुआ।

वह बार-बार टूट गिरता था,

अपनी सरिता में मिलता था।


सरिता होती मटमैली-सी,

पर उसकी अपनी शैली थी।

कभी तरु संग खिलती थी,

और पवन से मिलती थी।


वह तट से मुँहजोर बोली,

तट का दिल वह तोड़ चली।

 छोड़ तुम्हें अब जाऊँगी,

नहीं कभी फिर आऊँगी।


तट प्रतिहत, अंतस आहत,

मन में हाहाकार हुआ।

हाय! पाहुन पाहन से,

उसे क्यों ऐसा प्यार हुआ!


स्वभाव सरिता का बहना है,

उसे स्थिर नहीं रहना है।

छोड़-छाड़ कर सब अपना,

तट को प्रेयसी संग दहना है।


प्रबल प्रवाह ही सरिता का,

तट को तोड़ा करता है।

तट का स्वभाव है समर्पण,

वह नित सरिता पर मरता है।


किन्तु तट तो तट ही है,

वह निश्चल है निश्छल है!

उसमें तब तक जीवन है,

जब तक सरिता में जल है।


सूख जाने पर भी तटिनी के,

स्थावर है, जड़वत है।

बहने-रहने की वृथा व्यथा,

चिर तटस्थ-सा रहता तट है।