Sunday, 20 May 2018

ज़िंदगी या मैं- वीथिका स्मृति


मेरी छोटी पुत्री वीथिका स्मृति (सह-शोधार्थी, आई आई टी, दिल्ली) की कविता

 " ज़िंदगी या मैं! "


मैं कुछ मन से चाहूँ
ज़िन्दगी उसे मुझसे छीने,
मैं हार कर गिर जाऊं
और ज़िंदगी मुझपे हंसने लगे.
मैं फिर से खड़ी हो जाऊं
और ज़िंदगी पे हंसने लगूं.

ऐसा फिलहाल
दो तीन बार ही हुआ है
कि कुछ मन ने चाहा है
पर ज़िन्दगी ने
मना कर दिया है.

मज़ा आने लगा है
छीना-झपटी के
इस खेल में.
इस बार और मन से चाहूंगी ,
देखती हूँ
कौन जीतता है
ज़िंदगी या मैं !
     _____ वीथिका स्मृति

Saturday, 12 May 2018

माँ, सुन रही हो न......


माँ,
सुनो न!
रचती तुम भी हो
और 
वह.
ईश्वर भी!
सुनते है, 
तुमको भी,
उसीने रचा है!
फिर! 
उसकी
यह रचना,
रचयिता से 
अच्छी क्यों!
भेद भी किये 
उसने 
रचना में,
अपनी !
और, 
तुम्हारी रचना!
.....................
बिलकुल उलटा!
फिर भी तुम
लौट गयी 
उसी के पास !
कितनी 
भोली हो तुम!
माँ, सुन रही हो न......
माँ............!!!

Monday, 7 May 2018

पर्याय कवयित्री नारी की


जड़ भूत संजोती कुक्षी में,
तत्व-प्राण, कण-कण तर्पण.
प्रणव पुरुष चिन्मय मानस,
चेतन अमृत अक्षत अर्पण.

पल-पल का पलकों पर पालन,
प्रसवन पल्लव फुलवारी की.
श्वास सुवास सृष्टि शोभित,
पर्याय कवयित्री नारी की.

अंकों में सृजन ब्रह्म चितवन,
सिंचित पयधार आनन उपवन.
शिरा शोणित धमनी धक् धक्,
रचती सुर तार सृष्टि सप्तक.

अहर्निशं उर की धड़कन बन,
अनहद अक्षर अकवारी सी.
प्रवहमान शब्द सुरसरी सी,
पर्याय कवयित्री नारी की.

काया प्रतिछाया माया की,
प्रतिभास पराये अपनों की.
अहक एकाकी अंतस का,
सतरंग कल्पना सपनों की.

भाव संजोये शब्दों में,
लय ताल लहर किलकारी सी.
रचे ऋचा संजीवन सी,
पर्याय कवयित्री नारी की.