Thursday, 15 July 2021

दीपशिखा

आशाओं की दीपशिखा,

रुक-रुक कर काँप रही थी।

पवन थपेड़ों से लड़-लड़ कर,

हर हर्फ पर हाँफ रही थी।


प्राणों के कण-कण को अपने,

प्रिय पर वह वार रही थी।

हो आलोकित पथ प्रियतम का,

सब कुछ अपना हार रही थी।


आने की उनकी मधुर कल्पना,

लौ को लप-लप फैलाती थी।

सूखा तिल-तिल, तेल भी तल का,

प्रतिकूलता अकुलाती थी।


अहक में अपनी बहक-बहक जो,

कभी बुझी-सी,  कभी धधकती।

नेह राग का न्योता लेकर,

झंझा को देती चुनौती।


आस सुवास में कभी महकती,

और दहकती पिया दाह में।

तन्वंगी टिमटिम-सी रोशनी,

लगी सिमटने विरह राह में।


दमन वायु की निर्दयता ने,

दीपशिखा का तोड़ा दम है।

सूखा दीपक, बुझ गयी बाती

अब तो पसरा गहरा तम है।


58 comments:

  1. मंत्रमुग्ध करती रचना - -

    बहुत सुन्दर सृजन।

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  2. विरह में सब ओर निराशा ही दिखती शायद ।
    खूबसूरती से उकेरे हैं ये भाव ।

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  3. ये सच है दमन कारी हाव दीपशिखा का दम तोड़ने की कोशिश करती है ...
    कई बार वो सफल होती है कई बार नहीं ... शायद जीवन इसी आशा निराशा में झूलता है ...

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  4. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १६ जुलाई २०२१ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  5. इक न इक शम्मा
    अंधेरे में जलाए रखिये!
    जाने कब आए वो
    माहौल बनाए रखिये !

    एक शमा का हाल ए दिल बेहद खूबसूरती से बयां किया आपने।👌👌

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    1. आपकी सुंदर काव्यात्मक टिप्पणी का आभार।

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    2. प्रिय रश्मि जी, सुंदर पंक्तियाँ जो उम्मीद से भरी हैं!आपकी पंक्तियों से मुझे भी अपनी डायरी के पन्ने पर दर्ज पंक्तियाँ याद अ गयीं -
      दीप मेरे  जलता चल
       आँधियों से बच निकल 
      शांत हैं लहरें तट की 
      और एकाकी  मन विकल !
       ले साथ अपने श्रद्धा ,अनुराग मेरा,
      बह जाना संग  मंद  प्रवाह के
      देखो !नाविक  ना भूले पथ कहीं
      बनना दिग्दर्शक भटकी नाव के !
      सस्नेह शुभकामनाएं|
       

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    3. Well said Renu ji!!With love as oil ,and faith as the wick,an ordinary lamp can turn out to be a beacon.

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  6. शानदार
    सूखा दीपक, बुझ गयी बाती
    अब तो पसरा गहरा तम है।
    आभार..
    सादर..

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  7. बहुत बहुत सुन्दर सराहनीय रचना

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  8. आशाओं की दीपशिखा,
    रुक-रुक कर काँप रही थी।
    पवन थपेड़ों से लड़-लड़ कर,
    हर हर्फ पर हाँफ रही थी।
    पवन थपेड़ों से लड़ती आशाओं की दीपशिखा!!!
    वाह!!!!
    दमन वायु की निर्दयता ने,
    दीपशिखा का तोड़ा दम है।
    सूखा दीपक, बुझ गयी बाती
    अब तो पसरा गहरा तम है।
    आह!!!
    बहुत ही मर्मस्पर्शी....वाह से आह तक सब समेटे
    लाजवाब सृजन।


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    1. जी, बहुत आभार आपके आशीष का।

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  9. दमन वायु की निर्दयता ने,

    दीपशिखा का तोड़ा दम है।

    सूखा दीपक, बुझ गयी बाती

    अब तो पसरा गहरा तम है।..दिल से निकले सुंदर भावों का सृजन,सुंदर रचना।

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  10. प्राणों के कण-कण को अपने,

    प्रिय पर वह वार रही थी।

    हो आलोकित पथ प्रियतम का,

    सब ही कुछ अपना हार रही
    बहुत खूबसूरत रचना है

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  11. वेदना की मर्मस्पर्शी रचना

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  12. दीपशिखा के माध्यम से एक जीवंत आध्यात्मिकता से भरपूर शब्द चित्र रचा है आपने आदरणीय विश्वमोहन जी |एक भावपूर्ण प्रणय कथा जो आशा और उत्साह से शुरू हो अंत में दुखद परिणिति को पहुँचती हैं |सुधा जी शब्दों में वाह से आह तक !हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं सरस, आलंकारिक रचना के लिए|

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    1. जी, आपकी और सुधाजी की विशेष टिप्पणी अत्यंत प्रेरक है। आभार।

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  13. सुप्रभात
    उम्दा रचना |पढ़ने में आनंद आया |

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    1. जी, बहुत आभार आपके सुंदर शब्दों का।

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  14. जूझने का मन और दमनचक्र...
    प्रभावी शब्द।

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  15. "प्राणों के कण-कण को अपने,

    प्रिय पर वह वार रही थी।

    हो आलोकित पथ प्रियतम का,

    सब ही कुछ अपना हार रही"


    बहुत सुंदर मर्मस्पर्शी सृजन......सादर नमस्कार

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  16. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (20-7-21) को "प्राकृतिक सुषमा"(चर्चा अंक- 4131) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    --
    कामिनी सिन्हा

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  17. बहुत सुंदर! मुग्ध करता सृजन ।
    दीपशिखा सा प्रज्वलित।

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  18. बुझती बाती की पलकों पर
    उजली स्मृतियों का डेरा है
    जलना-बुझना या जन्म-मरण
    मायावी जग तो रैन बसेरा है।
    ----
    आदरणीय विश्वमोहन जी,
    अत्यंत प्रभावशाली भावों से सजी मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति।
    आपकी रचनाओं का शब्द शिल्प सदैव निःशब्द कर जाता है।

    प्रणाम
    सादर।

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    1. गहरे अर्थों को समेटती आपकी काव्यात्मक टिप्पणी का सादर आभार, हृदय तल से!

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  19. बेहद हृदयस्पर्शी रचना।

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  20. बेहतरीन रचना

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  21. दमन वायु की निर्दयता ने,

    दीपशिखा का तोड़ा दम है।

    सूखा दीपक, बुझ गयी बाती

    अब तो पसरा गहरा तम है।---अनुपम सृजन।

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  22. अकथनीय तृप्ति ...

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  23. आस सुवास में कभी महकती,

    और दहकती पिया दाह में।

    तन्वंगी टिमटिम-सी रोशनी,

    लगी सिमटने विरह राह में।

    बहुत सुन्दर सृजन

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  24. Good 👌👌👌👌👌🙏🙏🙏

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