Thursday, 3 December 2020

वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध ------ (१५)

(भाग - १४ से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य - (ठ)

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)


हरियाणा की पुरु जनजाति के आवासीय स्त्रोत से प्रस्फुटित वैदिक धर्म के  इस विशाल आलोक-पुंज से समस्त भारत वर्ष का जगमग हो जाना किसी भी दृष्टिकोण से सांस्कृतिक आक्रमण की श्रेणी में वैसे ही नहीं आता जैसे  कि आगे चलकर ६०० ईसापूर्व के आस-पास बिहार में इक्ष्वाकुओं की भूमि से निःसृत पवित्र बौद्ध और जैन दर्शन की जल-लहरियों से इस देश के ही कोने-कोने का क्या कहना, प्रत्युत सीमा पार की सुदूर भूमि के पोर-पोर का  भी आप्लावित हो जाना!

और ऐसा भी नहीं है कि हिंदुत्व को ये सारे लक्षण उसे बाद में या बहुत आगे चलकर होनेवाले धार्मिक परिवर्तनों की प्रक्रिया के दौरान मिले जैसा कि बहुत लोग सोच लेते हैं। उदाहरण के तौर पर ऐसा माना जाता है कि वैदिक धर्म ही आगे चलकर उपनिषद के दर्शन के रूप में विकसीत हुआ। ऋग्वेद के ‘कर्मकाण्ड’ उपनिषदों के ‘उपनिषद-काण्ड’ में परिवर्धित हो गए। सच तो यह है कि धर्म के वैचारिक दर्शन की ज्ञानमयी धारा से सराबोर होने की यह प्रवृति पूरब के इक्ष्वाकुओं से आयी। ठीक वैसे ही, जैसे अग्नि-आहुति और ऋचाओं का मंत्रोच्चार उत्तर और उत्तर-पश्चिम के हड़प्पा क्षेत्र के पुरु-अणु-दृहयु जनजाति की संस्कृति के ख़ास लक्षण थे। उपनिषद के विचार-दर्शन से संबंधित विषयों पर सारगर्भित चर्चा के अनेक दृष्टांत पूरब के इक्ष्वाकु राजा जनक के राजदरबार में मिलते हैं। आगे चलकर उपनिषद की दृष्टि का विस्तार बुद्ध, जैन, व्रत्य और चार्वाक के दर्शनों में भी हुआ। शाकाहार को पुण्य और पवित्र मानना भी उसी विकास का विस्तार है। इक्ष्वाकुओं से  भी  पूरब की ओर  और आगे बढ़ने पर हमें धार्मिक परम्पराओं, रीति-रिवाज, लोकाचार तथा पूजा-पाठ पर तांत्रिक प्रभाव की गहरी छाप दिखायी देती है। उसी तरह जैसा कि पहले भी चर्चा की जा चुकी है कि दक्षिण के धर्म का मुख्य लक्षण मूर्ति-पूजा और  भव्य मंदिर-निर्माण की संस्कृति थी जो धीरे-धीरे समूचे भारत में भी फैल गयी।  

समूचे भारतवर्ष में पसरे धर्म और संस्कृति के ये हिंदू-तत्व  चाहे वे व्यापक हों या क्षेत्रीय,  भारतीय सभ्यता के संगठित होते जाने और बाद में रचे जाने वाले संस्कृत ग्रंथों में अपनी जगह पाए जाने के कारण यदा-कदा काल-शृंखला में  वे हिंदू धर्म में विकसित  अर्वाचीन लक्षण  या किसी नवीन धार्मिक परम्परा का भ्रम पैदा करते हैं। किंतु, ऐसा सोचना ठीक उसी तरह की भ्रांति पालना होगा जैसे इतिहास के कालक्रम में ‘अमेरिका’ और ‘औस्ट्रेलिया’ के आस्तित्व की खोज बाद में होने के आधार पर उन्हें यूरोप का कोई नया देश मान  लें। इसलिए कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदुत्व के  ये जितने भी धार्मिक तत्व भारत के विस्तृत भू मंडल पर दिखायी देते हैं, वे बहुत हद तक  हड़प्पा या ऋग्वेद-से प्राचीन काल के ही हो सकते हैं या हैं। उस संदर्भ में देखें तो यह कोरी कल्पना प्रतीत नहीं होती कि जैन धर्मावलंबी  अपने तीर्थंकरों की लम्बी परम्परा महावीर से काफ़ी पीछे ले जाते हैं और बुद्ध के अनुयायी भी अपने तथागत के अनेक पूर्व अवतारों की चर्चा करते हैं।


हिंदू धर्म के शास्त्रीय तत्व और समूचे भारत में छाए विविध धार्मिक तत्व आपस में मिलकर ‘अनेकता में एकता’ का बहुरंगी ताना-बाना बिनते हैं। भारत-भूमि की सभ्यता के इस समग्र स्वरूप और पारस्परिक अवगुंठन के ताने-बाने को इतिहासकारों द्वारा इस समावेशी  परिप्रेक्ष्य में पढ़ने और समझने की ज़रूरत है न कि वैदिक संस्कृति से या अन्य समकालीन या परवर्ती संकृतियों से उसके आपसी टकराव से उद्भूत-विकसित और स्थापित सत्ता के रूप में।

ध्यातव्य : अब यदि हम पूरब और दक्षिण में भी हु-ब-हु हड़प्पा के नगरों की अनुकृति ही खोजने लगें  तो संभवतः यह हमारी निरी घृष्टता  होगी। भारत के अन्य भागों के लोगों की सभ्यता और संस्कृति, चाहे वह उत्तर प्रदेश और बिहार  में इक्ष्वाकुओं की हो या फिर दक्षिण में बसी  अन्य जनजातियों की, ज़ाहिर तौर पर अपनी क्षेत्रीय विभिन्नताओं के सौंदर्य से सजी-धजी होंगी और उनका स्वरूप उत्तर तथा उत्तर पश्चिम के पुरु-दृहयु-अणु जनजाति से अलग होगा। समकालीन होने पर भी  इस सभ्याताओं के उत्खनन से प्राप्त सभ्यता और संस्कृति मूलक अवशेषों की प्रकृति में भिन्नता लाज़िमी है। 


जैसा कि हम देखते आ रहे हैं, सम्पूर्ण भारत वर्ष के धार्मिक और सांस्कृतिक तत्वों में अपने समाहरण और हिंदू धर्म का सर्वसमावेशी आकार पाने से पूर्व वैदिक धर्म और संस्कृति का स्वरूप पूरब और दक्षिण के धर्म और संस्कृति से सर्वथा भिन्न था। अब जैसा कि हिंदू विरोधी वामपंथी विचारधाराएँ सोचती हैं, क्या हिंदू धर्म की ये अनेकताएँ उन दिनों एक-दूसरे से बिल्कुल अनजान थीं या यहाँ तक कि परस्पर प्रतिघाती थीं? ऐसा मानने का कोई ठोस कारण नहीं है। ऐसे काल में जब कि पश्चिमी एशिया और वैदिक-हड़प्पा संस्कृति में सम्पर्क के प्रचुर सूत्र थे, हड़प्पा के जहाज़ों की पहुँच खाड़ी देशों के बंदरगाह तक ही सीमित न होकर उससे आगे भूमध्य-सागर को स्पर्श कर रही थी (Talgeri : The Elephant and the Proto-Indo-European Homeland), इस तरह की बात गले नहीं उतरती कि वे आपस में एक-दूसरे से अनजान थीं।

अब आइए हम इस बात की पड़ताल करें कि वैदिक और द्रविड़ सस्कृतियों में कितना सम्पर्क था? पहले यह देख लें कि ऋग्वेद में कोई द्रविड़ शब्द है कि नहीं! यदि हड़प्पा की भौगोलिक स्थिति और द्रविड़ भाषा के आज के भौगोलिक विस्तार-क्षेत्र की तुलना करें तो इस बात को मानना अत्यंत टेढ़ी खीर होगी कि इन दोनों के बीच भी आपस में कुछ लेन-देन हो सकता है।  बलूचिस्तान में ब्रहुई भाषी लोगों की उपस्थिति के आधार पर यह क़यास ज़ोरों से लगाया जाता रहा कि हड़प्पा के क्षेत्र में द्रविड़ लोगों का निवास था। लेकिन अब यह बात मान ली गयी है कि दक्षिण से ब्रहुई भाषी लोगों का अफगनिस्तान की ओर उत्प्रवासन अपेक्षाकृत बाद के दिनों की घटना है। विजेल ने भी स्वीकारा है कि “इनकी उपस्थिति बाद के उत्प्रवासन का परिणाम है, जो हाल की शताब्दियों में हुआ (एलफेंबाइम १९८७)(विजेल २०००: १)।" उसी तरह साउथवर्थ ने भी भले ही हड़प्पन क्षेत्र में द्रविड़ उपस्थिति की वकालत की है, परंतु उन्होंने भी बड़ी स्पष्टता से हॉक (१९७५:८७-८) एवं अन्य विद्वानों की इस उक्ति को स्वीकारा है कि  ब्रहुई, कुरूक्स और माल्टो लोगों की आज की स्थिति बहुत पुरानी न होकर हाल की ही है।“


यह बात भले ही आर्य-आक्रमण-अवधारणा के संस्कृत-प्रेमी आलोचक  न पचा पाएँ, लेकिन ऋग्वेद में दो शब्द ऐसे मिलते है जो निश्चित तौर पर द्रविड़ भाषा के शब्द हैं :

– क्रिया धातु ‘पूज’ ( आदर करना, अभ्यर्थना करना, पूजा करना, स्तुति करना)  की  उत्पति द्रविड़  परिवार की  तमिल भाषा के ‘पु’ (अर्थात फूल) से हुई है। यह आराधना की एक ऐसी पद्धति को इंगित करता है जिसका स्त्रोत दक्षिण के धर्मों में है और वैदिक संस्कृति के लिए यह पूरी तरह से नयी बात है।

– ‘काना’ शब्द भी स्पष्ट तौर पर तमिल शब्द ‘कन’ से उद्भूत है। ‘कन’ का अर्थ तमिल में ‘आँख’ होता है। वैदिक संस्कृत में ‘काना’ एक आँख वाले या तिरछी निगाह वाले व्यक्ति को कहते हैं।

यह बात भी उतनी ही सही है कि भारत के भिन्न-भिन्न भागों में सभ्यता और संस्कृति का विकास अलग-अलग तरीक़ों से हुआ। इसलिए ज़रूरी नहीं है कि ऋग्वेद के शुरू के मंडलों के रचे जाने के काल में पश्चिमोत्तर भारत की मिट्टी में शेष भारत की संस्कृति के वे समग्र तत्व मौजूद ही हों। लेकिन हड़प्पा-सभ्यता के परिपक्व अवस्था में आ जाने तक इस क्षेत्र के दूरगामी व्यापारिक विस्तार और तिज़ारती रिश्तों से हुए मेल-मिलाप के प्रभाव को भी ख़ारिज नहीं किया जा सकता है। २००८ में लिखी गयी तलगेरी की पुस्तक ‘ऋग्वेद और अवेस्ता : अंतिम सबूत (The Rigved and the Avesta : The Final Evidence)’ में इसका ज़िक्र कुछ यूँ मिलता है : “भले ही हम प्रारम्भ में वैदिक संस्कृत या शास्त्रीय संस्कृत पर अनार्य भाषाओं के प्रभाव से आतंकित हो इस पर अपनी आपत्ति दर्ज करते रहे हों लेकिन हमें यह मानना पड़ेगा कि भारतीय-आर्य भाषाओं में अपनी गहरी पैठ बनाने वाले कुछ शब्द द्रविड़ या औस्ट्रिक परिवार से भी आए हैं। उदाहरण के तौर पर ‘एक आँख वाले’ के लिए ‘काना’ शब्द द्रविड़ परिवार के ‘कन’ अर्थात ‘आँख’ शब्द की निष्पत्ति है। ‘दंड’ और ‘कूट’ जैसे अनेक अन्य शब्दों का दृष्टांत भी उपस्थित किया जाय तो तो उपर्युक्त तर्क की कोई अवहेलना नहीं होगी।“ (पृष्ट-२९२)

सही बात तो यह है कि ऋग्वेद के तत्वों और आँकड़ों की सही पड़ताल करने पर यह भली-भाँति ज़ाहिर होता है कि ऋग्वेद की संस्कृति द्रविड़ तन्तुओं से अछूती नहीं है।  अब ये भी यतना ही सत्य है कि ये द्रविड़ तंतु आर्यों के द्रविड़ हड़प्पा पर हमले के बाद पराजित और भागे द्रविड़ों की संस्कृति के कोई बचे-खुचे अंश या हमलावर आर्यों द्वारा रहन-सहन या संस्कृति के अपना लिए गए कुछ द्रविड़ तरीक़े नहीं थे, जैसा कि आर्य-आक्रमण अवधारणा के प्रतिपादक कहते हैं।  इस बात के प्रचुर सबूत हैं कि ये वे मूल द्रविड़ तत्व हैं जिसे उत्तर और पश्चिम-उत्तर के वैदिक आर्य बजाप्ता दक्षिण से सीख कर ले गए थे। इसके पक्ष में प्रबल तथ्य मौजूद हैं :

– पुराने मंडलों में इनका विवरण नहीं मिलता है। पुराने मंडलों के भौगोलिक तत्वों के नाम की पड़ताल करने पर पता चलता है कि द्रविड़ भाषी लोग हड़प्पा के क्षेत्र में चाहे वैदिक काल हो या उसक पहले का समय, कभी रहे ही नहीं।

– संयोग से, नए मंडलों में इन शब्दों से मुलाक़ात हो जाती है। नए मंडलों के रचे जाने समय तक समुद्री रास्तों से दूर-दूर तक वैदिक-आर्य लोगों के व्यापारिक रिश्ते बन चुके थे। उनका व्यापार मेसोपोटामिया तक जा पहुँचा था और इस क्रम में बेबिलोनिया के भी दो शब्द ‘’बेकनात’ अर्थात व्यापारियों को क़र्ज़ देने वाले महाजन (८/६६/१०) और  ‘मन’, जो भार मापने की आज तक प्रचलित ईकाई है (८/७८/२), ऋग्वेद में प्रवेश पा चुके थे। यह काल मित्तियों और अवेस्ता रचे जाने के काल से ठीक पहले का समय है। बाद में उन्हीं ग्रंथों के मंत्रों में इन द्रविड़ तत्वों के साथ-साथ अवेस्ता और मित्ती तत्वों की भी प्रचुर उपस्थिति मिलने लगती है। 

– भारतीय परम्परायें और भाषा-विज्ञान बड़ी सफ़ाई से और बिना किसी भ्रम के इन वैदिक तत्वों का संबंध दक्षिण की भूमि से द्रविड़ पहचान वाले वैदिक ऋषियों के रूप में जोड़ते हैं। और, ये लोग ऋग्वेद की संस्कृति के शत्रु-से न होकर इसके अभिन्न अंग-से हो गए थे।


मूल रूप से द्रविड़ बोलने वाले वैदिक ऋषियों की कम-से-कम दो धाराएँ तो  साफ़-साफ़ दिखायी देती हैं।

– अभी हमने देखा कि ऋग्वेद में दो ऐसे बहुत ही महत्वपूर्ण शब्द हैं जो अब आज की भारतीय-आर्य भाषाओं और संस्कृत में बहुत आम हो गए हैं और वे बिना किसी संदेह के द्रविड़ परिवार से ही लिए गए हैं। ये हैं क्रिया धातु ‘पूज’ और  ‘काना’ शब्द। ये दोनों शब्द नए मंडलों में इस प्रकार पाए जाते हैं :

– ऋग्वेद के ८/१७/१२ में प्रयुक्त शब्द ‘पूज’, जिसका संबंध 'इरिम्बिठि' ( कन्व ऋषि के कुल) से है,  और 

– ऋग्वेद के १०/१५५/१में प्रयुक्त शब्द ‘काना’, जिसका संबंध 'सिरिम्बिठ' (भारद्वाज ऋषि के कुल) से है  

अब यह महज़ इत्तफ़ाक़ नहीं है कि दो भिन्न-भिन्न ऋषि कूलों ने अलग-अलग जगहों पर इन शब्दों के लिए बड़े आश्चर्यजनक और असामान्य रूप से एक ही समान अनार्य भाषा परिवार की संज्ञाओं को चुना है। दसवें मंडल में ऋषियों के वर्णन का  बड़ी दुरुहता से आपस में घालमेल कर दिया जाता है। ‘ऋग्वेद – एक ऐतिहासिक विश्लेषण’ (तलगेरी :२०००) में पृष्ट २५-२६ पर यह उल्लेख मिलता है, “दसवाँ मंडल जो कि बहुत बाद में रचा गया, कई मामलों में अन्य मंडलों से काफ़ी अलग हटकर है। इसमें एक सबसे बड़ी बात अपने मंत्र के रचयिताओं के बारे में इसकी  अस्पष्टता है। ४४ मंत्रों और दो अन्य सूक्तों में तो यह भी पता नहीं चलता कि इनको रचा किसने!”  बस इतना स्पष्ट है कि दसवें मंडल के १५५ वें सूक्त और आठवें मंडल के १७वें सूक्त के रचनाकार एक ही ऋषि हैं – 'इरिम्बिठि कन्व'।

यह नाम द्रविड़ मूल का है। वास्तव में आज भी केरल में एक जगह का नाम है – 'इरिम्बिलियम'। कोई अचरज की बात नहीं कि यही जगह या संभवतः इसी के आसपास की कोई जगह आज से ४००० वर्ष से भी पहले ऋग्वेद की ऋचाओं के रचनाकार की रिहाईश हो! यह बात उल्लेखनीय है कि आठवें मंडल के १७वें (८/१७) मंत्र में ही दो और शब्द आते हैं जो एक बार फिर से द्रविड़ व्युत्पति वाले शब्द माने गए हैं। 

अ  – ‘खंड’ (८/१७/१२) और 

– ‘कुंड’ (८/१७/१३)

और इन सबका सिरमौर शब्द ‘मुनि’ पूरे ऋग्वेद में नहीं भी तो कम से कम पाँच बार (दसवें मंडल के एक ही सूक्त में तीन बार) आया है। इस शब्द का स्पष्ट संकेत भारत के अंदर ही पूरब और दक्षिण के अ-वैदिक क्षेत्रों के पवित्र व्यक्तियों से है। ‘कुंड’ वाले मंत्र के अगले ही मंत्र (८/१७/१४) में ही यह फिर से आता है। भले ही, इन तीन लगातार मंत्रों में निहित संकेतों पर हमें सहसा विश्वास न हो, किंतु अपने आप में वे गहरे अर्थ समेटे हुए हैं।

एक बात तो साफ़ है कि यह ‘इरिम्बिठि’ ऋषि दक्षिण के द्रविड़ थे जो अपने क्षेत्र से चलकर विकसित और समृद्ध हड़प्पा क्षेत्र में आ बसे थे और कालांतर में ऋग्वेद की रचना करने वाले ऋषि बन गए। आज भी भारत में  ढेर ऐसे सनातनी साम्प्रदायिक समुदाय हैं जो अपनी मूल भूमि से विस्थापित होकर किसी अन्य क्षेत्र में बसे पाए जाते हैं। 


– भारतीय परम्परा में एक अन्य अति महत्वपूर्ण और  महान ऋषि के दर्शन होते हैं जो समान रूप से उत्तर और दक्षिण दोनों में न केवल पूजे जाते हैं, बल्कि दोनों की परम्पराओं में अपनी गहरी जड़ जमाए हुए हैं। यह महान ऋषि महर्षि 'अगस्त्य' हैं जिनके बारे में किंवदंती है कि वह उत्तर से चलकर दक्षिण में आ बसे। आइए देखें उनके बारे में विकिपीडिया क्या बताता है, 

“अगस्त्य हिंदू धर्म के एक अत्यंत आदरणीय वैदिक ऋषि थे। वह भारतीय भाषाओं के प्रकांड विद्वान और एक अनन्य वैरागी तपस्वी थे। अपनी अर्धांगिनी ‘लोपमुद्रा’ के साथ मिलकर उन्होंने ऋग्वेद के पहले मंडल में १६५ से १९१ सूक्तों (१/१६५ – १/१९१) की रचना की। इसके अलावे अनेक वैदिक साहित्य उनके द्वारा रचे गए। रामायण और महाभारत सहित अनेक वैदिक और पौराणिक प्रसंगों में अगस्त्य  का वृतांत मिलता है। एक ओर सबसे महत्वपूर्ण सात या आठ वैदिक ऋषियों (सप्तर्षि) में उनका नाम आता है तो दूसरी ओर, द्रविड़  शैव परम्परा के वह प्रख्यात तमिल सिद्ध हैं। उन्होंने प्राचीन तमिल व्याकरण ‘अगत्तियम’ की रचना की, ‘तांप्रपर्णियन’ नामक औषधि बनायी और श्री लंका तथा दक्षिण भारत के अनेक जगहों पर शैव साधना केंद्रों की स्थापना की। पुराणों की शाक्त और वैष्णव  परम्परा के वह अत्यंत आदरणीय हस्ताक्षर हैं।  प्राचीन प्रस्तर-प्रतिमाओं और दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया सहित जावा-सुमात्रा तक के शिव मंदिरों में उत्कीर्ण क़सीदों में उपस्थित होने वाले वह दुर्लभ भारतीय ऋषि हैं। जावा के प्राचीन ग्रंथ ‘अगस्त्यपर्व’ के वह प्रमुख नायक किरदार और गुरु हैं। इस ग्रंथ का ११वीं शताब्दी का संस्करण आज भी सुरक्षित है। अगस्त्य ने ढेर सारे ग्रंथों की रचना की, जिसमें  ‘वाराह-पुराण’, और 'स्कन्द-पुराण' के भाग ‘अगस्त्य-संहिता’ तथा ‘द्वैत-निर्णय-तंत्र ग्रंथ’ प्रमुख  हैं। अपनी पौराणिक व्युत्पतियों के आधार पर  ‘मन’, ’कलसज’, ‘कुंभज’, ‘कुंभयोनि’ और ‘मैत्रवारूणी’ आदि कई नामों से उन्हें अभिहित किया गया है।

‘अगस्त्य’ शब्द की व्युत्पति को लेकर अनेक मान्यताएँ हैं। एक मान्यता यह है कि इसका  मूल शब्द एक फलदार वृक्ष ‘अगति गंडिफ़्लोरा’ से निष्पन्न है। यह भारतीय उपमहाद्वीप का स्थानीय पौधा है और इसे तमिल में ‘अकट्टी’ कहते हैं। अगट्टी से ही ‘अगस्ति’ शब्द निकला और इस प्रकार यह इस वैदिक ऋषि के नाम के द्रविड़ मूल की व्याख्या होती है। वह एक अनार्य-द्रविड़ हैं जिनके विचारों से समूचा उत्तर भारत आप्लावित-आंदोलित हुआ। उनका आश्रम तिरुनेलवेली, पोथियाल की पहाड़ी और तंजावर सहित तमिलनाडु के अनेक जगहों पर अवस्थित है।

हालाँकि बाद के पौराणिक वृतांतों में उन्हें उत्तर का एक ऋषि बताया गया है जो चलकर दक्षिण में बस जाता है। किंतु, यह सर्वमान्य और ऐतिहासिक रुप से स्थापित तथ्य है कि अगस्त्य मूलतः दक्षिण के निवासी एक द्रविड़ ऋषि थे। वह और बाद में,  उनके वंशज, दक्षिण से चलकर उत्तर में बस गए और ऋग्वेद की रचना करने वाले ऋषि-कूलों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और स्वतंत्र ऋषि-परिवार की उन्होंने स्थापना की। 

– ऋषि कुल परम्पराओं में अगस्त्य एक विलक्षण और अपवाद-से ऋषि हैं।  वह एक ऐसे तपस्वी सन्यासी हैं जो नगरों की चकाचौंध और राजप्रासाद के अनुग्रह से कोसों दूर जंगल की अपनी कुटिया में एक वैराग्यपूर्ण वितरागी का  जीवन बिताते हैं।

– वह स्वयं पूरी तरह से ऋग्वेद के वृहतांश से अनुपस्थित हैं। उनके वंशजों का योगदान बाद के मंडल १ के सूक्तों की रचना में मिलता है जिसमें ढेर-से द्रविड़ शब्दों का प्रयोग मिलता है। किंतु ऋगवैदिक परम्पराओं में न केवल ऋग्वेद के बाहर बल्कि ऋग्वेद के अंदर (८/३३/१०) भी अगस्त्य को एक पुरातन ऋषि के रूप में अत्यंत प्रतिष्ठित पद मिलता है। इस मंत्र  में वह वशिष्ठ के समकालीन और उनके साथ-साथ चर्चित हुए हैं।

– नए मंडलों  में १ और ८ {१/(११७/११, १७०/३, १७९/६, १८०/८, १८४/५), ८/(५/२६)} को छोड़कर बस एक जगह अगस्त्य का विवरण मिलता है। यह पुनर्संशोधित सातवें सूक्त में पाया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह सूक्त, ७/३३/११,  उनके ही वंशज के द्वारा पुनर्संशोधित किया गया। इसी सूक्त के ठीक बाद वाले मंत्र में ‘दंड’ नामक द्रविड़ शब्द उपस्थित होता है।  हड़प्पा की सभ्यता के परिपक्व प्रहर में 'इरिम्बिठि' और 'अगस्त्य' के प्रवेश ने ऋग्वेद की धरा पर द्रविड़ शब्दों की लघु-धार बहायी। इस धारा ने  कालांतर में  वैदिक शास्त्रीय संस्कृत को भिगोते हुए एक प्रचंड सैलाब का रूप धारण कर लिया। ऋग्वेद में ऐसे कथित द्रविड़ शब्दों की एक लम्बी सूची है : ‘वैला’, ‘कियांबु’, ‘वृष’, ‘चल’, ‘बिल’, ‘लीप’, ‘कटुक’, ‘पिंड’, ‘मुख’, ‘कूट’, ‘कुट’, ‘खल’, ‘उलुखला’, ‘कानुक’, ‘सिर’, ‘नद’/’नल’, ‘कलफ़’, ‘उखा’, ‘कनारू’, ‘कलाया’, ‘लांगल’। ये शब्द ऋग्वेद के केवल नए मंडलों में और उनके पुनर्संशोधित सूक्तों  में ही पाये  जाते हैं। अपवाद-स्वरूप ही कहें तो, ‘मुख’ शब्द चौथे मंडल के ३९वें सूक्त के छठे मंत्र (४/३९/६) में, ‘कलाया’ शब्द सातवें मंडल के ५० वें सूक्त के पहले मंत्र (७/५०/१) में  और ‘कलफ’ शब्द सातवें मंडल के ५० वें सूक्त के दूसरे मंत्र (७/५०/२) में पाया जाता है। हॉक की निगाहों में इस विषय के प्रखर विशेषज्ञ अर्नौल्ड ने छंद-योजना के परिप्रेक्ष्य में चौथे और सातवें मंडल के इन पुनर्संशोधित श्लोकों का वर्गीकरण किया है। अतः इन द्रविड़ शब्दों में एक के भी दर्शन हमें पुराने मंडलों में नहीं होते! ऊपर के सूक्तों (७/३३/१०, ४/३९ और ७/५०) के अलावा ऐसे संदर्भ हमें निम्नांकित सुतों या श्लोकों में भी देखने को मिलते हैं : 


पुनर्संशोधित सूक्त :





यहाँ पर यह भी बात उतना ही ध्यान आकर्षित करनेवाली है कि जिन नए मंडलों में इन द्रविड़ शब्दों और द्रविड़ ऋषि-कूलों का विवरण आता है, ये सभी ईसा से २००० वर्ष पूर्व लिखे गए थे। इसके बहुत बाद में आगे चलकर हमें सीरिया-इराक़ में मित्ती संस्कृति के और ईरान में भारोपीय-ईरानी संस्कृति (पर्सियन, पर्थियन और मिडियन) के दर्शन होते हैं। साथ में हमें यह भी नहीं विस्मृत करना चाहिए कि ‘तमिल-संगमों’ की रचना का काल भी क़रीब दो शताब्दी बाद ही आ जाता है। इस आधार पर अब और किसी शक की गुंजाइश नहीं रह जाती कि वैदिक और द्रविड़ संस्कृतियों का संबंध न केवल अत्यंत प्राचीन है, प्रत्युत उनका माधुर्य भी अत्यंत प्रगाढ़ है। 


26 comments:

  1. सार्थक लेखन। मेहनत के लिये साधुवाद।

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  2. सारगर्भित लेखन

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  3. बहुत ही ज्ञानवर्धक सारगर्भित लेख...
    वैदिक एवं द्रविड़ का आपसी सम्बंध वह भी इतने प्राचीन समय से!!!
    साधुवाद एवं नमन आपको एवं आपकी लेखनी को जो इतने महत्वपूर्ण और विस्तृत लेख से आने वाली नवयुगों को अपने इतिहास की संस्कृतियों के शुरुआत की जानकारी देगी।
    अनंत शुभकामनाएं एवं बधाई।

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  4. सादर नमस्कार ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (8-12-20) को "संयुक्त परिवार" (चर्चा अंक- 3909) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    कामिनी सिन्हा

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    1. जी, बहुत आभार हृदय से!

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  5. अगली पीढ़ी हेतु सार्थक लेखन
    साधुवाद

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  6. बहुत महत्वपूर्ण शोधात्मक आलेख ।
    साधुवाद 🌹🙏🌹

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  7. बहुत रोचक जानकारी

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  8. बेहद उपयोगी जानकारी

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  9. आदरणीय सर,
    सादर प्रणाम। आपका लेख पढ़ कर बहुत आनंद आता है। सारी बातें इतनी नयी और ज्ञानवर्धक लगतीं हैं की मैं विस्मित हो जाती हूँ , एकदम भौंचक।
    मेरी दो जिज्ञासाएँ हैं :-
    १. आपने इक्ष्वाकु जाती का वर्णन किया है जिनमें आपने महाराज जनक का भी नाम लिया, क्या ये वही जनक जी हैं जो हमारी माँ जानकी के पिता बने ? दशरथ जी और प्रभु राम को भी इक्षवाकु के वंशज बताया जाता है। यदि यह वे ही महाराज जनक हैं जिन से हम लोग रामायण में परिचित हैं तो क्या पौराणिक काल और वैदिक काल एक ही था ? क्या पुराणों की रचना वेदों के साथ हुई थी और वेदों में जनक जी का कैसा वर्णन है? और हमारे भगवान जी कब अवतार लिए, उनका लीला काल क्या था:- वैदिक या पौराणिक ?

    २. आपने वैदिक और द्रविड़ संस्कृति में अंतर बताया है। जितना मैंने अपने विद्यालय में पढ़ा तो यही जाना की वैदिक संस्कृति भारत में हर और फैली हुई थी। वेद सबसे पुराने हिन्दू ग्रन्थ हैं और वैदिक परंपरा हिन्दू धर्म का आदि स्वरुप। यहाँ जो आपने भेद किया है, उसे मैंने आर्य और द्रविड़ के रूप में जाना तो क्या द्रविड़ में वेद नहीं पढ़े जाते थे और क्या वहां पूजा करने की पद्धति अलग थी ? क्या वेद आर्य संस्कृति की दें है ? और द्रविड़ में कौन सी आस्था थी , वे किसे पूजते थे ?

    आपके लेख पढ़ क्र बहुत कुछ सीखने को मिलता है। आपका हृदय से आभार कि आप हम सब तक हमारी प्राचीन संस्कृति की जानकारी दे कर हमें जागरूक कर रहे हैं, नहीं तो हमारी मूल संस्कृति की कितनी साड़ी बातें हमसे छुपा दी गयीं हैं और उनका स्थान विकृति ने ले लिया। मैं जानती हूँ की दो जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए मैंने आपसे बहुत सारे प्रश्न क्र लिए हैं। आपका इतना सारा समय लेने के लिए क्षमा चाहती हूँ। एक बार पुनः प्रणाम।

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    1. यदि आप श्रृंखला को एकदम शुरू अर्थात पहली कड़ी से पढ़ें तो ढेर शंकाओ के बारे में स्थिति साफ होने लगेगी। आपके प्रश्न अत्यंत रोचक और सार्थक हैं। वेदों के बहुत बाद पुराणों की रचना हुई। 'इक्ष्वाकु' ऋग्वेद में एक जनजाति के रूप में उपस्थित होते हैं। यह पूरब की जनजाति थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वैवस्वत मनु सूर्य (विवस्वान) के अमैथुन पुत्र थे। उनके पुत्रों में कुक्षी के कुल में इक्ष्वाकु और राम हुए। और इसी कुल में इक्ष्वाकु के एक अन्य पुत्र निमि विदेह के कुल में राजा जनक हुए। इसलिए दशरथ और जनक दोनों इक्ष्वाकु कुल के और सूर्यवंशी राजा हुए। जैन मान्यताओं में 24 में 22 तीर्थकर भी इक्ष्वाकु वंश के ही थे। बौद्ध मान्यताओं में स्वयं भगवान बुद्ध इसी कुल के थे क्योंकि लिच्छवी और शाक्य विदेह के कुल के ही माने जाते हैं। वैदिक संस्कृति का उदय पश्चिमी भारत में हुआ मानते हैं। आपके दूसरे प्रश्न में तो इस श्रृंखला में भी थोड़ा प्रकाश है। लेकिन इसे आप पहली कड़ी से पढ़िए और आगे की श्रृंखलाओं में साथ साथ चलिए तो हम और सार्थक चर्चा के पाएंगे। फिलहाल आर्य और द्रविण दोनों अलग प्रजाति न होकर एक ही हैं। यह केवल भौगोलिक पहचान है। आपका बहुत आभार आपकी इस रुचि के लिए। आपके विमर्श और प्रश्न का हृदय से आभार।

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  10. बहुत रोचक लेख

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  11. वैदिक संस्कृति में शाकाहार, सुसंस्कार और लोकाचार पर लेखक का गहन शोध प्रभावित करता है। वही 'पुज' धातु और' काना' शब्द पर खोजबीन हैरान करती हैं। वैदिक वांगमय के सशक्त हस्ताक्षर ' ऋषि 'अगस्त्य' और उनकी पत्नी 'लोपमुद्रा' के बारे में जानना आह्लादित कर गया । सटीक जानकारी से बहुत ज्ञानवर्धन हुआ। कोटि आभार इस सांगोपांग अनुवाद के लिए🙏🙏

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  12. बहुत सारगर्भित, विस्तृत चर्चा ... कितने ही हिन्दू समाज के आयाम एक पोस्ट में समेटे हैं आपने ... समाज के विकास और प्रचलित मान्यताओं का विकास कैसे धर्म, संस्कृति का विस्तार और विकास करता है ये अनूठा विषय है ...

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    1. जी, अत्यंत आभार आपका।

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