Sunday, 30 May 2021

नीड़





यह नीड़ नहीं, दिल मेरा है
आंगन में तेरे उकेरा है।

अवनि से अम्बर के घट में,
पलक झपकते उड़ती चट में।
गहराता तम का जब घेरा,
खिंचे बांधे मोह बसेरा।
चिड़ा-चिड़ी की चिर चूँ-चूँ,
ये, सप्तपदी का फेरा है।
यह नीड़ नहीं, दिल मेरा है,
आंगन में तेरे उकेरा है।

जंगल झाड़ी वन-वन घूम-घूम,
खर, पात और टहनी चुन चुम।
चोंच-सी सुई में गूँथ गूँथ कर,
आर्द्र उर ऊष्मा से तर कर।
पलकों में पलते सपनों का,
मेरा रैन बसेरा है।
यह नीड़ नहीं, दिल मेरा है,
आंगन में तेरे उकेरा है।

माँ चिड़िया का दाना चुगना,
लौट घोंसले को फिर आना।
चूजे के फैले चोंचों में
डलता है जीवन का दाना।
कल जो चूजा आज वह चिड़िया,
नीड़ का गिरना और फिर छाना।
जीव-जगत की तिजारत यह,
चंद दिनों का डेरा है।

तेरे नीम के गाछ पर,
छा छतरी-सा मेरा घोंसला।
दिल की आकृति में सजती,
मेरी नीड़-निर्माण-कला।
मोहक महक मेरी चहकों ने,
मन-आँगन तेरा घेरा है।
यह नीड़ नहीं, दिल मेरा है
आंगन में तेरे उकेरा है।

बस पल थोड़ा बीत जाने दे,
खुशियों के गीत चंद गाने दे।
क्षणभंगुर ही सही, हमें बस!
बन बसंत तू छा जाने दे।
फिर कालग्रास बन जाएंगे,
आँगन छोड़ यह जाएंगे।
आज बसंत, फिर कल पतझड़,
यही! यहाँ का फेरा है।

यह नीड़ नहीं, दिल मेरा है,
आंगन में तेरे उकेरा है।















 

Wednesday, 26 May 2021

हँसा के पिया अब रुला न देना.

तथागत यशोधरा के द्वार पधारते हैं और उन्हें बोधिसत्व की ज्ञान आभा से ज्योतित कर अपनी करुणा से सराबोर करते हैं:-
   प्रीता प्राणों के पण में,
       राजे चंदा का संजीवन/
       बोधिसत्व पावन सुरभि, 
       महके तेरा तन-मन हर क्षण/

       तू चहके प्रति पल चिरंतन,
        भर बाँहे जीवन आलिंगन/
        मै मूक पथिक नम नयनो से. 
       कर लूँगा महाभिनिष्क्रमण !

यशोधरा अपने सन्यासी पिया के चिन्मय ज्ञान का पान कर फूले नहीं समाती. भवसागर से मुक्ति की यात्रा में उनकी सहगामिनी बनने को तत्पर होती है और मन ही मन अपनी भावनाओं से तरल हो रही है:-
    यह कैसा चिर स्पंदन!
    देखो, जागे ये निर्मल मन.

    उर पवित्र मंद मचले कम्पन,
    उतरे परिव्राजक मन दर्पण.

    बोधिसत्व कपिलायिनी भद्रा बन,
    तरल अंतस पसरे छन छन.

    उपवासी अन्तेवासी हूँ,
    प्रेम पींग की झुला न देना .

    मैं जागी अब सुला न देना ,
    हँसा के पिया अब रुला न देना.   


Monday, 17 May 2021

वैदिक वांगमय और इतिहास बोध-२२

वैदिक वांगमय और इतिहास बोध-२२

(भाग – २१ से आगे)

ऋग्वेद और आर्य सिद्धांत: एक युक्तिसंगत परिप्रेक्ष्य (ध)

(मूल शोध - श्री श्रीकांत तलगेरी)

(हिंदी-प्रस्तुति  – विश्वमोहन)


५ - शहद के सबूत 


ऋग्वेद में शहद का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। हर भाषा में इसके सजातीय शब्द हैं। इससे यही झलकता है कि प्रोटो भारोपीय संस्कृति में शहद का केंद्रीय स्थान था, चाहे इस संस्कृति की मूल भूमि जो भी हो। अनेक विद्वानों का यही मत है कि मधुमक्खी-पालन और शहद का उत्पादन मिस्त्र (इजिप्ट) और भू-मध्यसागरीय क्षेत्र में फला-फूला और सुदूर पूरब ईरान तक फैल गया। इसलिए प्रोटो-भारोपीय संस्कृति का जो वितान बुना गया उसमें शहद का स्थान बहुत महत्वपूर्ण दिखाया गया और यहीं बताया गया कि इन मधुमक्खियों के प्रदेश में ही भारीपीय लोगों का या तो मूल निवास था या फिर प्राक-ऐतिहासिक काल में वे इन प्रदेशों से होकर गुज़रे थे। एक अन्य विद्वान हड्जु का हवाला देते हुए परपोला का कहना है कि ‘बहुत हाल तक एशिया माइनर, सीरिया, पर्सिया, अफ़ग़ानिस्तान, तिब्बत और चीन को छोड़कर एशिया में मधुमक्खियों की कोई जानता भी नहीं था। दूसरी तरफ़ पूर्वी यूरोप में यूराल पर्वत के पश्चिम में मधुमक्खियाँ पायी जाती थी (परपोला २००५:११२)।‘ वह आगे जोड़ते हैं कि “‘एपीस मेल्लिफेरा’ का मूल क्षेत्र अफ़्रीका, अरब और उसके समीप पूरब में ईरान तक, यूरोप में यूराल पर्वत के पूरब तक, दक्षिणी स्वीडन और उत्तर में एस्टोनिया तक फैला था। उत्तर में यह अर्क्टिक के शीत प्रदेश की शीतलहरी और पूरब में मरुभूमि और पहाड़ों के अवरोध के कारण थम जाता था। इसके प्रसार की दूसरी अवरोधक कारक थे - यूराल तक फैले शीत और समशीतोष्ण प्रदेशों के कँटीले जंगल और फिर  साइबेरिया में उनका नहीं उगना। १६०० इस्वी तक ‘एपीस मेल्लिफोरा’ इसी क्षेत्र तक सीमित थे जहाँ से उनका अन्य जगहों के लिए उत्प्रवासन प्रारम्भ हुआ (परपोला २००५:११२)।“

उसी ढर्रे पर ग़मक्रेलिज का भी कहना है कि, “भारोपीय देशों में मधुमक्खी पालन के बूते मज़बूत अर्थव्यवस्था वाले विकसित देशों में मधु के लिए प्रयुक्त ‘हनी’ शब्द और प्राचीन प्रोटो भारोपीय धर्मों में शहद के महत्व के आलोक में इस बात में कोई दुविधा नहीं कि मधुमक्खी पालन और मधुमक्खी के लिए ‘बी’ शब्द भी पूरी आर से प्रोटो भारोपीय व्युत्पति के ही हैं (ग़मक्रेलिज १९९५:५१६-५१७)।“ वह इसे खिंचकर भू-मध्यसागरीय क्षेत्रों तक ले जाते हैं – “ यह भू-मध्यसागरीय क्षेत्र ही था जहाँ मधुमक्खी पालन की प्रविधि ने अपने प्राथमिक अवस्था से निकलकर उन्नत स्वरूप को प्राप्त करने की दिशा में पहला क़दम उठाया। यहाँ हम विकास की दूसरी अवस्था पाते हैं जहाँ जंगलों  में मधुमक्खी पालन की तकनीक इजाद की गयी।जंगल के पेड़ों में और उनके मोटे तनों में खोखले कोटर बनाकर उसमें मधुमक्खियों को पाला जाता था। फिर हम तीसरी अवस्था भी पाते हैं जब घरेलू मोर्चे पर कृषि कार्य परम्परा का सूत्रपात होता है और घरों में या घरों के पास ही बनाए कोटरों और घोसलों में मधुमक्खियों को पालने की तकनीक और परम्परा का उन्मेष हुआ (ग़मक्रेलिज १९९५:५२२)। और अंत में वह हमें ‘हनी’ शब्द के बारे में सूचित करते हैं कि “ भारोपीय जनजातियाँ पूरब की ओर अपने बढ़ने के क्रम में शहद और मधुमक्खी पालन के साथ-साथ ‘हनी’ शब्द भी लेकर पूर्वी एशिया में घुसीं (गमक्रेलिज १९९५:५२४)।“ 

अब आइए ऊपर लिखी गयी बातों के बारे में हम सही सबूतों और तर्कसंगत बातों का वलोकन करें :

१ – विकिपीडिया हमें ‘हनी- बी’ (मधुमक्खी) के बारे में बताता है कि “मधुमक्खियों की उत्पति  का स्थान फ़िलिपींस समेत दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया प्रतीत होता है।  एपीस मेल्लिफेरा को छोड़कर बाक़ी वजूद वाली मधुमक्खियों का यह क्षेत्र ही गृह-प्रदेश प्रतीत होता है। सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि मधुमक्खियों की प्राचीनतम प्रजाति जिससे अन्य प्रजातियाँ निकली उसके जीवित अवशेष (‘एपीस फ्लोरी’ और ‘एपीस एड्रेनिफोरमिस’) के उद्भव का भी स्थान यहीं है।“  

इन साक्ष्यों की पड़ताल करने वाले विद्वानों ने पश्चिमी मधुमक्खी, एपीस मेल्लिफेरा, के भौगोलिक परास (सीमा), मधुमक्खी-पालन की प्राथमिक अवस्था से उन्नत अवस्था तक उनके क्रमगत विकास, इस तकनीक में मिस्त्र तरथ भू-मध्यसागरीय क्षेत्रों में रहने वाली मधुमक्खियों के योगदान और प्रोटो भारोपीय शाखाओं में शहद के विशद महत्व की पूरी विवेचना की है और इसके आधार पर यही निष्कर्ष निकाला है कि प्रोटो भारोपीय जनजातियों की भिन्न-भिन्न शाखायें  इन्हीं उन्नत अवस्थाओं को भू-मध्यसागरीय क्षेत्रों से एंकर अपनी मूल भूमि में गयीं। तथापि, :

क – इस बात का कोई भी सबूत नहीं है कि प्रोटो भारोपीय या वैदिक संस्कृति में अपना ख़ास स्थान रखने वाला शहद ‘एपीस मेल्लिफोरा’ प्रजाति की ही मधुमक्खी से प्राप्त शहद  था। भू-मध्यसागरीय मधुमक्खी-पालन के सम्पूर्ण इतिहास को उकटने के बाद परपोला बड़ी साफ़गोई से कहते हैं कि “खोडरों और कोटरों में घोंसला बनाकर रहनेवाली मधुमक्खी की प्रजाति ‘एपीस सेराना’ पूर्वी एशिया, दक्षिणी पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, चीन, कोरिया और जापान की मूल निवासी है (परपोला २००५:१२३)। “आकार में सबसे बड़ी मधुमक्खी की प्रजाति ‘एपीस डोर्सटा’ भारत और उससे भी पूरब में पायी जाती है।

ख – ये पूर्वी मधुमक्खियाँ अत्यंत पुरातन काल से ही भारत में मधु संग्रह का स्त्रोत रही हैं। शहद का इकट्ठा किया जाना समूचे भारत और इसके सुदूर आदिवासी और दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में भी अति प्राचीन परम्परा रही है। मध्य प्रदेश के भीमबेटका और पंचमढ़ी में पाए गए ८०००-६००० ईसा पूर्व प्राचीन पाषाणयुगीन प्रस्तर-चित्रकला (रॉक-पेंटिंग) सारी बात बोल देते हैं, “पंचमढ़ी की तीन चित्रकलाओं और भीमबेटका की एक कलाकृति में मधु का संग्रह करते दिखाया गया है।जंबूद्वीप आश्रय की एक पेंटिंग में एक पुरुष को मधु निकालते तथा एक स्त्री को शहद पात्र लेके उसके समीप जाते दिखाया गया है। दोनों सीढ़ियों पर खड़े हैं। इमलिखो आश्रय की एक अन्य पेंटिंग में महिला मधुमक्खियों को उड़ा रही है। सोनभद्र आश्रय की तीसरी पेंटिंग में मधुमक्खियों से घिरे दो पुरुष लकड़ी कसे बने ढाँचों पर खड़े हैं। भीम बेटका की पेंटिंग में एक पुरुष मधुमक्खियों के छाते को एक गोल माथे वाले छड़ी से छेद रहा है। उसकी पीठ पर एक टोकरी है और वह एक रस्सी के सहारे लटका हुआ प्रतीत होता है। उसके नीचे तीन लोग खड़े हैं।उसमें से एक दूसरे के कंधे पर चढ़ा हुआ है (मथपाल १९८५:१८२)।“ ये प्रस्तर-चित्रकलाकृतियाँ सारे एशिया में शहद बटोरने की कला दर्शाने वाली प्राचीनतम कलाकृति है। इसकी तुलना स्पेन और औस्ट्रेलिया की बस कुछ वैसी ही समकालीन कला कृतियों से की जा सकती है।

२ – सच कहा जाए तो उपलब्ध भाषाई साक्ष्य प्रोटो-भारीपीय शहद संस्कृति और मिस्त्र तथा भू-मध्यसागरीय क्षेत्रों में पनपे घरेलू मधुमक्खी पालन के बीच किसी भी तरह के ताल-मेल को पूरी तरह से नकारते हैं। हालाँकि कुछ खास ऐतिहासिक भारीपीय शाखाओं की शहद संस्कृति भी प्रोटो-भारोपीय शहद संस्कृति से बिलकुल हटकर है जिसपर हम आगे प्रकाश डालेंगे।

क – जहाँ शहद (हनी) के लिए प्रोटो भारोपीय संसार में एक ही तरह के शब्द हैं, वहीं मधुमक्खी, मधुमक्खी के छत्ते, मोम और मधुमक्खी पालन के लिए शब्दों में कोई साझेदारी नहीं है और ऐसी संस्कृति में जहाँ मधुमक्खी पालन या उससे शहद निकालने  की प्राविधि का क्रमिक विकास हुआ हो, ऐसी स्थिति की कल्पना कतई नहीं की जा सकती है। कमोवेश ऐसी ही स्थिति ऋग्वेद से भी प्राप्त सबूतों के साथ है जबकि यह  भारोपीय  भाषाई ग्रंथों में सबसे पुराना उपलब्ध दस्तावेज़ है। ऋग्वेद के पुराने मंडलों से ही शहद के लिए ‘मधु-‘ और ‘सारघ-‘ शब्द चले आ रहे हैं। पुराने मंडलों से बहुत बाद में नए मंडल रचित हुए और जहाँ तक पश्चिमी एशिया में दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के पूर्वार्द्ध में मित्ती और हित्ती भारतीय-आर्यों का    प्रश्न है तो उनका भी नए मंडलों की संस्कृति से सैकड़ों वर्ष बाद उदय हुआ। ऋग्वेद में भी मधुमक्खियों के संदर्भ बहुत थोड़े ही ‘मक्ष’ और ‘मक्षिका’ के रूप में आए हैं। मधुमक्खी के छत्तों या मोम जैसी किसी भी वस्तु का कोई वृतांत नहीं मिलता जो इस बात का कोई प्रमाण प्रस्तुत कर सके कि मधुमक्खी पालन की कोई उन्नत प्राविधि उस समय अस्तित्व में हो।

ख – शहद के लिए प्रोटो-भारोपीय शाखाओं  के भाषायी सबूत तो और खलबली पैदा कर देते हैं। शहद के लिए सामान्य अपभ्रंश प्रोटो-भारोपीय शब्द ‘मधु-‘ है। यह दो स्पष्ट अर्थों में प्रयुक्त होता है। पहला अर्थ तो शहद ही है। दूसरा अर्थ पेय पदार्थ/शराब या कोई भी मादक मद्य पदार्थ है। इन दोनों अर्थों में यह शब्द भारतीय-आर्य, ईरानी, टोकारियन, स्लावी और बाल्टिक – इन पाँचों शाखाओं में पाया जाता है। यूनानी (ग्रीक), जर्मन और सेल्टिक, इन तीन शाखाओं में यह मात्र मादक पेय पदार्थ(सुरा)/शराब/अन्य पेय पदार्थों के अर्थ में ही प्रयुक्त किया जाता है। इन शाखाओं में नये शब्द ‘*मेलिथ-‘ ने ‘*मधु-‘ का स्थान ले लिया है जिसका अर्थ शहद या मधु होता है। अन्य चार शाखाओं, हित्ती (अनाटोलियन), अर्मेनियायी, अल्बानी और इटालिक में ‘*मधु-‘ शब्द पूरी तरह लुप्त हो गए हैं किंतु यहाँ पर भी ‘*मेलिथ-“ शब्द का अभिप्राय केवल शहद ही है और पेय पदार्थ/सुरा/शराब के लिए अन्य नए शब्द हैं।

यह सबूत तो वाक़ई अचरज में डालने वाला है कि पुरानी शाखा टोकारियन, यूरोपीय शाखा स्लावी और बाल्टिक तथा सबसे अंतिम शाखा भारतीय-आर्य  और ईरानी – इन सभी शाखाओं में मात्र *मधु-‘ शब्द है। दूसरी ओर पुरानी शाखा अनाटोलियन, यूरोपीय शाखा इटालिक और अंतिम शाखाएँ अर्मेनियायी और अल्बानी – इन शाखाओं में केवल *मेलिथ-‘ शब्द है। संक्षेप में,       समरूप रूप भाषायी लक्षणों को दर्शाती यह समवाक रेखा भारोपीय शाखाओं के भिन-भिन्न कालानुक्रमी समूहों का आलिंगन करती दिखायी देती है। तो फिर वे साझे तत्व कौन-से हैं?

जवाब बड़ा सरल है। यह पूरब और और पश्चिम का विभाजन है :

१ – तीनों समूहों (प्राचीन, यूरोपीय और अंतिम) में वे पाँच शाखायें जो ज़्यादा पूर्वी हैं, टोकारियन, स्लावी, बाल्टिक, भारतीय-आर्य और ईरानी, इन्होंने मूल शब्द ‘*मधु-‘ को संजोये रखा किंतु ‘*मेलिथ-‘ को नहीं अपनाया।

२ – तीनों समूहों की बाक़ी सात शाखाओं, जो ज़्यादा पश्चिमी हैं, ने नए शब्द ‘*मेलिथ-‘ को ग्रहण कर लिया। इन सात में से पाँच शाखाएँ मिस्त्र और भू-मध्यसागरीय क्षेत्र से सटे हुए हैं। इन पाँच में से चार, अनाटोलियन, अर्मेनियायी, अल्बानी और इटालिक, से मूल शब्द, *मधु-‘ बिलकुल ग़ायब है। बाक़ी एक प्राचीन यूनानी (ग्रीक) ने ‘*मधु-‘ शब्द को पेय/शराब/सुरा के रूप में संजो लिया किंतु शहद के लिए इसने इस शब्द ‘*मधु-‘ के बदले ‘*मेलिथ-‘ शब्द को अपना लिया। इसका कारण मिस्त्र और भू-मध्यसागरीय क्षेत्र में पनपे मधुमक्खी पालन की संस्कृति का गहन प्रभाव है।

३ – ठीक ऊपर वाली बात ही बाक़ी बची दो पश्चिमी शाखाओं, जर्मन और सेल्टिक, के साथ भी है। ये दोनों शाखाएँ मिस्त्र-भूमध्यसागर-क्षेत्र के अत्यंत निकट रहने के कारण उनके असर से बच नहीं पायी और इन्होंने भी पेय/शराब/सुरा के लिए ‘*मधु-‘ शब्द को तथा शहद के लिए ‘*मेलिथ-‘ शब्द को अपना लिया।

४ – उसी तरह सभी पाँचों यूरोपीय शाखाओं (इटालिक, सेल्टिक, जर्मन, बाल्टिक और स्लावी) ने मिस्त्र से ‘बी’ या उसका अपभ्रंश ‘भी’ ले लिया। थोड़ा दक्षिण-पूर्व की ओर बढ़ने पर ग्रीक, अर्मेनियायी और अल्बानी शाखाओं ने ‘*मेलिथ-‘ (शहद) से ही मधुमक्खी के लिए भी शब्द ले लिया। मधुमक्खी के लिए हित्ती शब्द ज्ञात नहीं हैं। ग्रंथों में सुमेरि लिपि के चिह्न मिलते हैं। इससे अन्दाज़ मात्र लगाया जाता है कि हित्ती शब्द भी कुछ वैसे ही होंगे। इससे यह बात साफ़ हो जाती है कि भारतीय-आर्य, ईरानी और टोकारियन यही मात्र तीन शाखाएँ हैं जो मधुमक्खी के लिए अपने शब्द मिस्त्र से या ‘*मेलिथ-“ से किंचित नहीं लेती।

[टिप्पणी (१) – संयोग से, फ़िन्नो-युग्रिक भाषा में भारतीय-ईरानी शब्दों की तर्ज़ पर विद्वानों ने कुछ कुतर्क भी प्रस्तुत किए हैं। गमक्रेलिज का कहना है कि प्रोटो-भारोपीय शब्द ‘*मधु-‘ यहूदी शब्द ‘*म्वतक-‘ अर्थात ‘मीठा’ से निकला है। मधुमक्खी के शहद के लिए घरेलू भारोपीय शब्द ‘*मेलिथ-‘ से हटकर किसी भी मीठे मादक पेय के लिए भारीपीय शाखाओं में यहूदी से निकले शब्द ‘*मधु-‘ का प्रचलन होने लगा (गमक्रेलिज १९९५:७७१)। जैसा कि हमने देखा है कि –

१ – यहूदियों से अनुदान के रूप में लिए गए जिस शब्द का वह दावा करते हैं वह ‘ मादक पेय’ और ‘शहद’ दोनों अर्थों में इन पाँच शाखाओं, भारतीय-आर्य, ईरानी, टोकारियन, बाल्टिक और स्लावी में पाया जाता है। इन क्षेत्रों का ऐतिहासिक पर्यावास यहूदी प्रभाव से पूरी तरह अछूता था। दूसरी ओर पूर्ण यहूदी प्रभाव में वे जो पाँच शाखाएँ, इटालिक, अल्बानी, ग्रीक (यूनानी), अर्मेनियायी और हित्ती, थीं, उनमें से चार में यह ‘यहूदी अनुदान’ बिलकुल नदारद है। केवल एक ग्रीक शाखा में यह ‘मादक पेय’ के रूप में पाया जाता है। साथ ही जिस शब्द को वह ‘घरेलू भारोपीय’ कहते हैं, वह भी न केवल यहूदी क्षेत्र के प्रभाव के पार वाली पाँच शाखाओं के पहले समूह से ग़ायब हैं, बल्कि मात्र उन सात शाखाओं में ही पायी जाती हैं जो पूरी तरह से यहूदी प्रभाव क्षेत्र में थीं!

२ – इस मानव जीवन में शहद और मधुमक्खियों के इतिहास के बारे में थोड़े और विस्तार में यदि हम चर्चा करें तो पाएँगे कि सभ्यता के उषा काल में शहद इकट्ठा करने के पीछे शहद पाने के साथ-साथ उस नशीले और मादक पेय द्रव के पान का सुख  भोगने का भी सामान उद्देश्य था जिसे शहद से ही तैयार किया जाता था। बाद में मधुमक्खी पालन के घरेलू तकनीक विकसित हो जाने पर शहद का व्यापारिक महत्व बढ़ गया और इससे बना सुरा गौण हो गया।  मधुमक्खी पालन के यहूदी क्षेत्र के प्रभाव से अछूते और सुदूर इलाक़ों में बोली जाने वाली पाँचों यूरोपीय शाखाओं  में ‘सुरा’ और ‘शहद’ दोनों के लिए प्रयुक्त होने वाला शब्द ‘*मधु-‘ वस्तुतः स्थानीय और घरेलू भारोपीय शब्द ही था। ‘* मेलिथ-‘ शब्द उन अर्थों में सिर्फ़ ‘शहद’ का अर्थ लिए मधुमक्खी पालन के यहूदी प्रभाव क्षेत्र के सात भारोपीय शाखाओं में ही पाया जाता है। इन सात में भी चार वैसी शाखाओं में जो क़रीब-क़रीब या तो यहूदी क्षेत्र में ही हैं या फिर इससे सटे क्षेत्रों में, मादक पेय द्रव (सुरा) के लिए कोई सजातीय शब्द नहीं है। यह स्पष्ट रूप से ‘यहूदी अनुदान’ वाली बात को साबित करता है। अब जबकि ‘शहद और सुरा’ पुराने अर्थ में एक साथ व्यक्त होते थे और नयी स्थिति में यहूदी प्रभाव में यह सिर्फ़ ‘शहद’ के अर्थ तक ही सीमित रह गया, इस तथ्य से प्रमाणित होता है कि इरान के सबसे पश्चिमी किनारे की ओस्सेटिक भाषा जो मधुमक्खी पालन के यहूदी क्षेत्र के प्रबल प्रभाव में थी उसने ‘*मधु-‘शब्द को तो ग्रहण कर लिया किंतु ‘*मेलिथ-‘ को छोड़ दिया। तथापि, “’*मधु-‘ शब्द की ओस्सेटिक झलक उसके शहद अर्थ वाले शब्द ‘म्यद’ में मिलती है (गमक्रेलिज १९९५:५२०)।]


[टिप्पणी २ – प्रोटो-भारोपीय शब्द ‘*मधु-‘ ऐतिहासिक रूप से टोकारियन भाषा के रास्ते चीनी भाषा में भी आ गया और ठीक उसी तरह भारतीय-आर्य अप्रवासियों के रास्ते यह फ़िन्नो-युग्रिक भाषा में प्रवेश कर गया।]

पश्चिमी शाखाओं का ही इस मिस्त्र-भूमध्यासागरीय-पश्चिमी एशियायी क्षेत्र की मधुमक्खी पालन संस्कृति से प्रभावित होना भारोपीय अप्रवासन के संबंध में इस एक मौलिक बात की पुष्टि करता है कि अप्रवासन की दिशा पूरब से पश्चिम की ओर रही। इसलिए मध्य एशिया (पश्चिमी एशिया-अनाटोलिया-कौकेसियन) क्षेत्र और भाषाओं (यहूदी और कौकेसियन) के शब्द पश्चिमी शाखाओं में तो पाए जाते हैं किंतु इस क्षेत्र से ठीक पूरब की शाखाओं में नहीं पाए जाते हैं। कहने का मतलब है की इन मध्य देशांतरो को पार कर पूरब से जो लोग पश्चिम की ओर बढ़े वे इन शब्दों को भी अपने साथ लेकर बढ़ते चले और जो अप्रवासन की इस प्रक्रिया से अछूते रहकर पूरब में ही रह गए उन्होंने इन शब्दों का स्वाद ही नहीं चखा।

अब हम जल्दी से इस सिद्धांत की वैधता को जाँचने के लिए दो और महत्वपूर्ण दृष्टांतों पर अपनी दृष्टि दौड़ा लें।


Tuesday, 4 May 2021

समय की चाल

 कभी नहीं होता कुछ जग में,

 अकारण अकाल!

समय सदा से चलता आया,

अपनी अद्भुत चाल।


जब दिखता है जहां ये सूरज,

कहते हुआ है भोर।

होता हरदम पथ परिक्रमा, 

कहीं ओर न छोर।


और ओझल होते ही इसके,

रजनी धरा पर छाती।

पूनम अमा की चक्र कला में, 

अंधियारा फैलाती।


निहारिकाओं को निहार कर,

जब चंदा मुस्काता।

चंदन-सी चूती चांदनी,

चट चकोर पी जाता।


फिर छाते ही नभ में मेघिल,

घटाटोप घनघोर।

कुंज वीथिका विहंसे मयूरी,

वन नाचे मन-मोर।


लट काली नागिन-सी बदरी,

पवन प्रचंड इठलाती।

प्रेम पिपासु प्यासी धरती,

पानी को अकुलाती।


विरह-व्यथा में विगलित बादल,

 गरज-गरज कर रोता।

अविरल आँसू से अपनी,

आहत अवनि को धोता।


पीकर पिया के पीव-पीयूष,

धरती रानी हरियाती। 

रेश-रेश और पोर-पोर में,

तरुणाई अँखुआती।


वसुधा के उर में फिरसे,

नव जीवन छा जाता।

कभी अकारण और अकाल,

नहीं काल यह आता।