Tuesday, 13 April 2021

माँ, कुछ तुमसे कह न पाया!

 



अहर्निश आहुति बनकर,

जीवन की ज्वाला-सी जलकर,

खुद ही हव्य सामग्री बनकर,

स्वयं ही ऋचा स्वयं ही होता,

साम याज की तू उद्गाता।


यज्ञ धूम्र बन तुम छाई हो,

जल थल नभ की परछाई हो,

सुरभि बन साँसों में आई,

नयनों में निशि-दिन उतराई,

मेरी चिन्मय चेतना माई।


मंत्र मेरी माँ, महामृत्युंजय,

तेरे आशीर्वचन वे अक्षय,

पल पल लेती मेरी बलैया,

सहमे शनि, साढ़ेसाती-अढैया,

मैं ठुमकु माँ तेरी ठइयाँ।


नभ नक्षत्रो से उतारकर,

अपलक नयनों से निहारकर,

अंकालिंगन में कोमल तन,

कभी न भरता माँ तेरा मन,

किये निछावर तूने कण कण।


गूंजे कान में झूमर लोरी,

मुँह तोपती चूनर तोरी,

करूँ जतन जो चोरी चोरी,

फिर मैया तेरी बलजोरी,

बांध लें तेरे नेह की डोरी।


 तू जाती थी, मैं रोता था,

जैसे शून्य में सब खोता था,

अब तू हव्य और मैं होता था,

बीज वेदना का बोता था,

मन को आँसू से धोता था।


सिसकी में सब कुछ कहता था,

तेरी ममता में बहता था,

मेरी बातें तुम सुनती थी,

लपट चिता की तुम बुनती थी,

और नियति मुझको गुनती थी।


हुई न बातें अबतक पूरी,

हे मेरे जीवन की धुरी,

रह रह कर बातें फूटती हैं,

फिर मथकर मन में घुटती है,

फिर भी आस नहीं टूटती है।


कहने की अब मेरी बारी,

मिलने की भी है तैयारी,

लुप्त हुई हो नहीं विलुप्त!

खुद को ये समझा न पाया,

माँ, कुछ तुमसे कह न पाया!







Thursday, 8 April 2021

सफर

 प्राची के आँचल में नभ से,

उषा की पहली रश्मि आती।

पुलकित मचली विश्व-चेतना,

जीवन में उजियारी छाती।


मन के घट में, भोर प्रहर में,

जीवन-रंग बिखरता है।

जीव-जगत का जंगम जीवन,

मन अनंग निखरता है।


चहकी चिड़िया,कूजे कोकिल,

साँसों में बसंत मचलता है।

किरणों से ज्योतित जड़-चेतन,

भाव तरल- सा बहता है।


आसमान में इंद्रधनुष की,

चित्रकला-सी सजती है।

क्षितिज-छोर के उभय कोर से,

आलिंगन में लगती है।


प्रणय कला का यह अभिनय,

हर दिवस प्रहर भर चलता है।

प्रेमालाप के प्रखर ताप में,

डाह से सूरज जलता है।


फिर ईर्ष्या में धनका सूरज,

सरके सरपट अस्ताचल में।

दुग्ध-धवल-सी सुधा चांदनी,

उतरी विश्व के आंचल में।


आज अमावस और कल राका,

गति ग्रहण की आती है।

यही कला है समय चक्र की,

कालरात्रि दुहराती है।


जनम से अंतिम लक्ष्य बनी वह,

महाकाल की,रण भेरी।

हरदम हसरत में हंसती,

मनमीता है, वह मेरी।


एक वहीं जो,अभिसार की,

मदिरा हमें पिलाएगी।

आलिंगन में लेकर हमको,

शैय्या पर ले जाएगी।


अग्नि से नहलाकर हमको,

नए लोक में लाएगी।

शुरू सिफ्र से नया सफर फिर,

गीत गति का गायेगी।



Thursday, 1 April 2021

अहसास और निजता!

पत्ते पुलकित हैं। हिलते दिख रहे हैं। कौन है उत्तरदायी? हवा। पत्ते स्वयं। आँखें। कोई झकझोर तो नहीं रहा पेड़ को! या फिर, ‘हिलना’ स्वयं एक स्वतंत्र सत्ता के रूप में! किसी एक को हटा लें तो सारा व्यापार ख़त्म! और यदि सभी साथ इकट्ठे हों भी और मनस के चेतन तत्व को निकाल लिया जाय तो फिर वही बात – “ढाक के तीन पात”!

चेतना कुछ ऐसा अहसास छोड़ जाय जो समय, स्थान या किसी भी ऐसे भौतिक अवयव से जो बाँधते हों मुक्त हो जाय, तो वह अहसास रुहानी  हो जाता है। एक छोटी उम्र का बालक अपने खेलने-खाने की शैशव अवस्था में अहसास की उस उम्र में पहुँच जाए जहाँ से सन्यास के द्वार की साँकले खुलती हैं, तो वह फिर शंकराचार्य बन जाता है। मैथुन क्रीड़ा  में रत क्रौंची  के प्रेमी क्रौंच  की वधिक के  द्वारा हत्या से उपजा विषाद कल के एक लुटेरे को अभी उस अवस्था में धकेल देता है कि वह आदि कवि वाल्मीकि बन जाता है। यह भावनाओं के स्तर पर  महज़ एक मनुष्य के एक पक्षी से  जुड़ने की घटना नहीं है बल्कि रूहों के स्तर पर एक प्राणी के दूसरे प्राणी से एक हो जाने का संयोग है जिससे राम कथा का जन्म होता है।
प्रेम का संगीत भी मुक्ति के कुछ ऐसे ही राग छेड़ता है जो रूह को देह से छुड़ाकर परमात्मिक आकाश में छोड़ देता है। दादा-दादी, नाना-नानी बनी देह के भीतर  का मन प्रेम में पगकर अपने कैशोर्य की कमनीय कलाओं में रंगने लगे तो वह ‘विदेह’ हो जाता है। समय, स्थान, अवस्था, देह सबसे मुक्त हो जाता है। फिर चेतना के स्तर पर वह वृंदावन की गोपिकाओं के अहसास में समा जाता है जहाँ तर्क-वितर्क के खूँटे में बँधे उद्धव जड़वत दिखायी देते हैं।
इधर निजता की बातें ज़ोर-शोर से की जा रही हैं। संस्कृति का सभ्यता के सामने घुटने टेक देना समष्टि  के व्यष्टि  की ओर ताकने और व्यक्ति  द्वारा समाज  को घूरे जाने की कहानी कह रही है। यह सोचने का विषय है कि निजता आख़िर है क्या चीज़! यह कोई प्रकृति  प्रदत्त सम्पदा है या मनुष्य की अपनी निर्मित धारणा। सच पूछें तो निजता की सोच ही व्यक्ति के किसी बंधन में बँधे होने का अहसास है। किसी बंधन से मुक्त होने की छटपटाहट! अपने में दूसरों से इतर एक अलग सता के आरोपण का अहसास और पृथकता का भाव! टाइम और स्पेस के अनंत वितान में एक अलग घोंसले की चाह! वह घोंसला भी पूरी तरह से एक मानसिक परिकल्पना! आदमी भीड़ में भी तो अकेला हो जाता है। या फिर जब उसका आत्म अहसास के स्तर पर ऐकांतिकता के अनंत  में कुलाँचे भरने लगे जहाँ वह फैलकर स्वयं अनंत बन जाए तो वह स्वयं भी कहाँ रह पाता है। भला, अनुभवों की जलराशि में तैरते आर्किमिडिज को ‘युरेका, युरेका’ चिल्लाते नग्न अवस्था में सड़क पर दौड़ते समय निजता के इस भाव ने क्यों नहीं पकड़ा। या तो वह अपनी निजता को त्याज्य अनंत के अहसास में फैल गए थे या फिर निजता की चिर समाधि में विलीन होकर अपने भौतिक अस्तित्व से मुक्त हो गए थे। ‘कंचुकी सुखत नहीं सजनी, उर बीच बहत पनारे’ का प्रलाप करती मीरा अपने मोहन के मोहपाश में अपनी निजता कहाँ छोड़ आती है।
जहाँ अहसास रुहानी होता है वहाँ ‘अयं निज: परो वेत्ति’ की बात नेपथ्य में ही रह जाती है। वहाँ सब कुछ एक हो जाता है – ‘ तत् त्वम असि। सो अहं।। एकोअहं, द्वितियोनास्ति।।।‘