Tuesday, 30 November 2021

शोर नहीं, सन्नाटा!


सृष्टि, स्थिति
और प्रलय है।
जय में क्षय है,
क्षय में जय है।

कालरात्रि की
काली कोख है।
सभी मौन, पर
समय शोख है।

क्षितिज से छलका
भौचक्क! भोर है।
मौन को मथता
मचा रोर है।


शोर नहीं,
यह सन्नाटा है।
ज्वार अंदर,
बाहर भाटा है।

कल, आज, कल
यूँ घूमता है।
विरह मिलन के,
संग झूमता है।

शांत शर्वरी,
वाचाल दिवस है।
काल चक्र में,
सभी विवश हैं।

जो आगत है,
वही विगत है।
सृष्टि का बस,
यही एक सत है।

Tuesday, 9 November 2021

क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर

आज फिर थाम लिया है माँ ने,
छोटी सी सुपली में,
समूची प्रकृति को।
सृष्टि-थाल में दमकता पुरुष,
ऊंघता- सा, गिरने को,
तंद्रिल से क्षितिज पर पच्छिम के,
लोक लिया है लावण्यमयी ने,
अपने आँचल में।
हवा पर तैरती
उसकी लोरियों में उतरता,
अस्ताचल शिशु।
आतुर मूँदने को अपनी
लाल-लाल बुझी आँखें।
रात भर सोता रहेगा,
गोदी में उसके।
हाथी और कलशे से सजी
कोशी पर जलते दिए,
गन्ने के पत्तों के चंदवे,
और माँ के आंचल से झांकता,
रवि शिशु, ऊपर आसमान की ओर।
झलमलाते दीयों की रोशनी में,
आतुर उकेरने को अपनी किरणें।
तभी उषा की आहट में,
माँ के कंठों से फूटा स्वर,
'केलवा के पात पर'।
आकंठ जल में डूबी
उसने उतार दिया है,
हौले से छौने को
झिलमिल पानी में।
उसने अपने आँचल में बँधी
सृष्टि को खोला क्या!
पसर गया अपनी लालिमा में,
यह नटखट बालक पूर्ववत।
और जुट गया तैयारी में,
अपनी अस्ताचल यात्रा के।
सब एक जुट हो गए फिर
अर्घ्य की उस सुपली में
"क्षिति जल पावक गगन समीर।"