Wednesday, 17 December 2014

इंसान की दरकार !

मज़हब के पेशेवरों ने पेशावर
में किया मज़हब को शर्मशार।
मरघट में मची हाहाकार,
पथरायी मासूम आँखे ,
चीखते बच्चों के भर्राये स्वर।
जेहादी जानवरो का खौफनाक मंज़र ,
इंसानियत करे चीत्कार।
लहू में सने सलोने
सपने स्याह !
उजड़ी कोखों की कातर कराह,
इंशा अल्लाह!
तेरी इस रहनुमाई को धिक्कार!
रख अपने मज़हबी पैगम्बरों को अपने ही घर
हमें तो सिर्फ एक इंसान की दरकार !