Friday, 6 November 2015

बापू

उठ न बापू जमुना तट पर
क्या करता रखवाली
तरणि तनुजा काल कालिंदी
बन गयी काली नाली।
राजघाट पर राज शयन!
ये अदा न बिलकुल भाती
तेरे मज़ार से राज पाठ
की मीठी बदबू आती।
वाम दाम के चकर चाल
में देश है जाके भटका
ब्रह्मपिशाच की रण भेरि
शैतान गले में अटका।
'हे राम'की करुण कराह
में राम-राज्य चीत्कारे
बजरंगी के जंगी बेटे
अपना घर ही जारे।
और अल्लाह की बात
न पूछ,दर दर फिरे मारे
बलवाई कसाई क़ाफ़िर
मस्ज़िद में डेरा डारे।
छद्म विचार विमर्श में जीता
बुद्धिजीवी पाखंडी
वाद पंथ की सेज पर
सज गयी ,विचारों की मंडी।
बनते कृष्ण ये द्वापर के
राम बने त्रेता के
साहित्य कला इतिहास साधक
याचक अनुचर नेता के
गांधीगिरी! अब गांधीबाजी!
बस शेष है गांधी गाली
उठ न बापू जमुना तट पर
क्या करता रखवाली!