Monday, 16 March 2026

जहाँ ना संशय, ना कोई डर!

 


हो किरणों पर न कोई पहरा,

चिड़ियों की चहक चिरंतन हो।
तर तुषार तृण फुनगी फुदके,
चेतन का स्वर- स्पंदन हो।

तरु  हरित पत्र गोल-गोल,
झूमें गायें डोल-डोल।
टहनी से डंठल लिपट-लिपट,
खुसुर-फुसूर फिर बोल-बोल।

कौओं की पंचायत से,
फदगुदियाँ ले रहीं होड़।
अपना हुक़ूक़ हैं जता रहीं,
गिलहरियाँ माटी कोड़-कोड़।

सन्नाटे का सुर सरोवर,
शकल दिल-सी रंगी नील।
जलतरंग में छाया नर्तन,
गोद गिरि गदरायी झील।

सभी स्वच्छंद हैं, सभी मुक्त हैं,
कण-कण चिन्मय अजर अमर।
हे पवन प्राण, सुन, ठहर यहीं,
जहाँ ना संशय, ना कोई  डर!