Tuesday, 25 August 2026

सरगोशियों के स्वर




सरगोशियों के स्वर 
कविता संग्रह 
(लेखक – सुशील कुमार जोशी)
प्रकाशक -न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन 
सी ५१५, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी, नयी दिल्ली - ११००१२



‘या  निशा सर्व भूतानां तस्यां जाग्रति संयमी’ – अर्थात जो सब जीवों के लिये  रात्रि है, वह आत्मविश्लेषी मुनियों के लिए दिन है। प्रोफ़ेसर (डॉक्टर) सुशील कुमार जोशी एक ऐसे ही साहित्यिक मनीषी हैं जो अपने ‘उलूक’ के साथ अपनी ‘सरगोशियों के स्वर’ में समकालीन समाज के   विश्लेषण को  अभिव्यक्ति देते हैं। उलूक अर्थात उल्लू एक निशाचर पक्षी है। यह मुख्य रूप से रात में सक्रिय होता है और अत्यन्त  सतर्क निगाहों से  बिना किसी आहट  के अपना आखेट ढूँढ लेता है। ज़ाहिर है, अपने ‘उलूक’ के साथ विचरण और कानाफूसी करते डॉक्टर जोशी आज के समाज की उन तमाम विसंगतियों को बड़ी आसानी से पकड़ लेते हैं और अत्यन्त  सूक्ष्मता से उसका तार-तार उधेड़ देते हैं। कवि डॉक्टर जोशी का प्रस्तुत कविता संग्रह ‘सरगोशियों के स्वर’ उसी तार-तार हुए समाज के सच का बड़ा मर्मस्पर्शी उद्गार है। सत्तर कविताओं का यह संग्रह अपने आस-पास के जीवन के कटु यथार्थ का दर्पण है। जोशी जी भौतिक रसायन में परास्नातक और रासायनिक बल गति विज्ञान में पी एच डी हैं। इन कविताओं में सोबन सिंह विश्वविद्यालय के इस प्रोफ़ेसर कवि की शोधार्थी दृष्टि भारतीय समाज की समकालीन भौतिकी, उसके लोकतंत्र की बलगति और उसकी राजनीति के रसायन की भीतरी तह तक का अन्वेषण अपने ‘उलूक’ के साथ अपनी सरगोशियों में कर रही हैं। ‘उलूक’ के साथ उनकी काव्यात्मक कानाफूसी के अल्फ़ाज़ और अन्दाज़ भी बड़े लाजवाब हैं। कवि बोलता है अभिधा में। ‘उलूक’ सुनता है लक्षणा में और पाठकों को मिलता है व्यंजना का स्वाद। यदि एक पंक्ति में कहें तो यही ‘सरगोशियों के स्वर’ का असली मिज़ाज है। कवि की यह बतकही शाब्दिक मसखरे में समाज के आडम्बर को परोसती है। 
यान्त्रिकता के निविड़  तम में विलुप्त होती जा रही मानवीय संवेदना पर कवि चेता रहा है – 
“कम्प्यूटर कुछ वर्षों में संवेदनशील भी हो जाएगा।
क्योंकि आदमी अब अपनी संवेदनाएँ खो चुका है
वास्तव में कम्प्यूटर हो गया है”।
मनुष्य लूटने-खसोटने में  लगा हुआ है। भगवान महावीर की यह भूमि  परिग्रह के कुसंस्कार की नागफनी से पट गयी है। ‘टका धर्म:, टका कर्म:, टका ही परमं तप:’ का मन्त्र गूँजने लगा है। सर्वत्र भ्रष्टाचार का बोलबाला है। मनुष्य की धन लोलुपता सुरसा की तरह मुँह बाए जा रही है। येन-केन-प्रकारेण कितना धन जमा कर लें, यही उसकी फ़ितरत हो गयी है –
“आदमी चावल के बोरे गिनती करते
कभी नहीं थकता”
बोरों की गिनती भी वह राम से ही शुरू करता है। राम अब उसके मन से उसके व्यवसाय में उतर गए हैं और फिर व्यवसाय से राजनीति में। ‘राम-राज्य’ की परिकल्पना का झुनझुना बजाते  मनुष्य ने राम को अपने ‘राज्य का राम’ बना लिया है। अब  राजनीति के राम के नाम के रोर में मन के राम रो रहे हैं। संस्कार की सीता सो गयी हैं। आम आदमी का अन्तस आकुल है। करे तो क्या करे!-
“बड़ी बेचैनी है
कोई इस बात को क्यों नहीं समझ रहा है
जब राम का हो रहा है यह हाल
तो बताइए…”!
कवि की दुनिया का चित्रपट बहुत विस्तृत है। बहुरंगी आभाएँ उभर रही हैं। जीवन की हर छटा छिटक रही है। सब अपने हिस्से का हर्फ़ हसोट रहे हैं। किसके जीवन के संगीत का मूल छन्द  समयाकाश के वितान पर किस तार में बज उठे, उसी की तलाश उसकी जिजीविषा है –
“किसी को नज़र आने शुरू हो जाते हैं
बहुत से अक्स आईने की माफ़िक़
तैरते हुए हों जैसे उसके अपने सपने
और कब अनजाने में निकल जाता है
उसके मुँह से – ‘वाह’!”
मज़हब के बदसूरत चेहरे की काली छाईयाँ कवि को आतंकित करती हैं। लालच, डाह, ईर्ष्या, मत्सरता, स्वार्थ, कटुता और वैमनस्य  के केंचुल से झाँकती क़ौम फुफकार मार रही है। चन्द कौड़ियों के मोल  बिकती अवाम अपने  आईन के  नंगेपन संग  नाच रही है –
“नियम, क़ानून, कोर्ट
नंगों के लिए नहीं होती
काश! कोई नंगा मेरा भी बाप होता
मैं भी शायद कहीं आबाद होता”।
रोज़मर्रे की जद्दोजहद से जूझते आदमी के लिए समय का गुज़रना अब उसकी आदत बनकर रह गयी है। काल की यह गति अब उसके जीवन का भोगा जानेवाला सत्य है न कि किसी कुतूहल, आश्चर्य, विस्मय, आशा व निराशा का कोई मसला। कवि मानव और आज के समाज के मनोविज्ञान का चतुर चित्रकार है। अब सब कुछ भेड़ियाधसान है।  समय भी और समय की धार में डूबता उतराता मनुष्य भी।
“पुराने साल को हाथ से फिसलते देख
अब रोना नहीं आता है
नए साल के आने की
कोई ख़ुशी नहीं होती है
हाथ में आता हुआ एक नया हाथ
जैसे पकड़ा जाता नहीं है।
मानवीय मूल्यों के पतन और समाज के निर्लज्ज होने की दुरावस्था पर कवि के व्यंग्य का प्रहार बड़ा तीखा है –
“लूट, खसोट, चूस और मुस्कुरा
और फिर कह दे सामने वाले से
‘मैं हूँ पानी’
 आज की दुनिया में इंसानी जज़्बातों की कोई जगह नहीं है। उसूलों की भी नहीं है। यहाँ ज़मीर और ज़मीन राजनीति की है। छल और कपट की कुशल बाज़ीगरी की है। ख़ुदगर्ज़ी की है। एक-दूसरे के पैर में लँगड़ी मार के आगे निकल जाने की है।  तिज़ारत की है। ख़रीद-फ़रोख़्त की है। यहाँ सब कुछ बाज़ारू है। इस बाज़ार का भी एक अलग ही दस्तूर है। वह नहीं बिकता, जो टिकता है। सच का कोई ख़रीददार नहीं। सिर्फ़ झूठ और फ़रेब बिकते हैं। मक्कारी का फ़ैशन है। फ़ैशन की दुनिया में गारण्टी का कोई वजूद नहीं। कवि अब अपने अन्दर  की दुनिया में बाहर के पसरे संसार को शोधता है।
“मेरे अपने ख़ुद के खुले आसमान
खो गए, पता नहीं कहाँ”?
छल-प्रपंच की इस दुनिया में जिजीविषा ने जिज्ञाषा को लील लिया है। केनोपनिषद की प्रतियाँ बाज़ार से ग़ायब हैं। वाजश्रवा का बहुमत है। शास्त्रार्थ की परम्परा वाला यह समाज अब प्रश्न पूछने वाले को बेवक़ूफ़ कहने लगा है-
“बेवक़ूफ़ों के ख़ाली दिमाग़ में उठे प्रश्न
होशियारों के उत्तरों का कभी भी
मुक़ाबला नहीं किया करते हैं
दुर्जनों के दुर्घर्ष तुमुल में इंसानियत की बोली दब गयी है-
“’उलूक’ कानों में अपने-अपने ही हाथ लगाए
अपना ही कहा अन्धेरे में ढूँढने की ख़ातिर
डोल रहा होता है”
समाज की इस विरूपता के सामने प्रकृति भी घुटने टेकने लगी है। पर्यावरण की मार झेलती प्रकृति अब कवि की कल्पना को भी झाड़ लगाती है। बहते ग्लेशियर से नंगे होते पहाड़ की कलौंछ में  कवि की कल्पना भी काली पड़ने लगी है। प्रकृति के सुकुमार कवि ‘पन्त’ की पुण्यतिथि के स्मरण-क्षणों  में कवि की वेदना सिसक उठती है –
“’सुमित्रानन्दन पन्त’
हिमालय में अब सफ़ेद बर्फ़
दूर से भी नज़र नहीं आती है
काले पड़ चुके पहाड़ों को शायद
रात भर अब नीन्द नहीं आती है”
बढ़ती महत्वाकांक्षाओं में मूल्यों का दम तोड़ना अचानक नहीं होता –
“सोन्धी मिट्टी से बनी रेत की
आँधियों में सब उड़ जाएगा
कुछ नहीं बचेगा
महत्वाकांक्षाओं के भूतों से लबालब
एक श्मशान हो जाएगा”
बदहाल शिक्षा जगत के वर्तमान परिदृश्य पर कवि का करुण विलाप फूट पड़ता है। शिक्षा के मन्दिर कलाली में तब्दील हो गए हैं। गुरुकुल से गुरु के  कुल, शील और लज्जा  का अपहरण हो गया है। छात्रों के वेश में गुण्डों का हुजूम उतर आया है –
“छात्रों का कालिख लगाना एक मास्टर के
और चुप रहना मास्टरों की जमात का
मास्टरों की सोच का पोस्टर
बेलगाम हो गयी है”
कवि के तंज की धार आगे भी फूटती है –
“पढ़ना पढ़ाना, लिखना लिखाना
पुराना हो चुका
सुना है, आगे से अब काम नहीं आएगा “
कविताएँ समसामयिक परिवेश और घटनाओं को समेटती प्रवाहमयी और परवाहमयी हैं। कहीं कहीं सुशील कुमार जोशी में मनोहर श्याम जोशी उतर आते हैं। उनका चुटीलापन कविताओं के भीतर से झाँकता है। सत्ता की सनक के ख़िलाफ़ कवि के अल्फ़ाज़ बड़े मारक हैं।  कभी- कभी अपनी सरगोशियों के दरम्यान कवि अपनी वेदना का भड़ास ‘उलूक’ पर उतार देता है, मानो  उलूक ही उस सता का प्रतीक हो, जो समाज की, सियासत की और उसकी मूल्यहीनता की लगाम थामे बैठा है और विसंगतियों की इस घनेरी रात में ख़ुद उलूक को ही  कुछ नहीं सूझ रहा है। मर्यादा की रक्षा में पौराणिक गाथाओं वाली इस धरती पर मर्यादा के क्षत-विक्षत होने की कहानी भी अब एक भ्रमित भविष्य गढ़ रही है। भ्रान्ति की इस काली रजनी में आशा के उन्मेष  का आह्वान करती कविता साहित्यकारों को जगाती है –
“डरो मत
बेधड़क लिख
अपने सभी सवाल
कुछ लिख”
 

Tuesday, 18 August 2026

फ़ितरत

 



अनवरत यात्रा है,

यह जिंदगी हर पल।

नई आदतों के बनने और

पुरानी आदतों के ढहने की ।

जमती जाती हैं हर,

परवर्ती परत-दर-परत।

कोटि बनकर,

समय की भुज पर।

फैलती - सिकुड़ती,

जीवन के आकाश में।


बन जाता है मन,

कभी-कभी पुरातत्वविद।

और  मनन, तकनीक! 

खोदने - शोधने की।

तलाशने की आयु,

उन परतों की।

इस कार्बन-डेटिंग में,

कभी-कभी तो !

छोड़ जाता है मन,

इस स्थूल काया को भी।


और सहेज लेता है जीवाश्म,

अपनी पुरानी आदतों के। 

गाहे-बेगाहे उघेड़कर,

समय के छिलके को।

परतों की बुनियाद में,

जमती जाती आदतों की।

सीरत है इन आदतों की,

हमें भी बदल देना, पर!

एक चीज नहीं बदलती,

हमारी फितरत!



Friday, 14 August 2026

गिरमिटिया




स्वतन्त्रता दिवस की इस सुनहली सुबह के पीछे ग़ुलाम भारत की अनगिन स्याह शामें हमारे अतीत की अतातायी यादों के साथ हमारे ज़ेहन में उतरती हैं। हम अपने उन पूर्वजों का स्मरण करते हैं जिनसे ग़ुलामी ने उनका वतन तक छीन  लिया। फिर भी, अपनी मिट्टी की सुगन्ध को अपने साथ लेकर गए और इसके संस्कार, इसकी भाषा, इसकी  चाल और इसके चरित्र को न केवल बचाए रखा बल्कि अपने पसीने से सींचकर इसे एक विशाल वटवृक्ष का आकार दिया। १९वीं शताब्दी में परतन्त्र भारत के ग़रीबों की कहानी लाचारी, सामन्ती शोषण, अमानुषिक दमन और एक लूटे तक़दीर की दास्तान  है।  औद्योगिक क्रान्ति  ने देश के परम्परागत कुटीर और घरेलू उद्योगों की रीढ़ तोड़ दी। सामन्ती  मानसिकता और जमीन्दारी  शोषण एवं दमन की ज्वाला में  गरीब धू-धू कर जल रहे थे। बड़ी जातियों का छोटी जातियों पर अत्याचार अपने चरम पर था। धार्मिक आडम्बर, पोंगापन्थी, अशिक्षा, सामाजिक  कुरीतियाँ और जातिगत भेद से समूचा भारतीय समाज बीमार था। ऊपर से ग़ुलामी और ब्रितानी साम्राज्य का भयंकर क़हर। बड़ी-बड़ी विदेशी कम्पनियाँ अपने गन्ने, रबर और चाय के बाग़ानों में अफ़्रीका से ग़ुलामों को लाकर मज़दूर रखती थीं। लेकिन १८०७ में ग़ुलामी प्रथा हटने के बाद कमोबेश १८३४ तक सारे ग़ुलाम छोड़ दिए गए थे। अब इन बाग़ानों को मज़दूर की ज़रूरत थी। भारत इन कम्पनियों के लिए मज़दूर बटोरने का सबसे अच्छा देश साबित हुआ। सामन्ती अत्याचार से पीड़ित ग़रीब और बेरोज़गार जनता का मन इस त्रासक  माहौल से पलायन करने को कुलबुलाते रहता। उधर १८५७ के सिपाही विद्रोह के बाद ढेर सारे भारतीय फ़ौजी बेरोज़गार हो गए थे। समाज के अन्दर  ऊँची जाति की विधवाओं की स्थिति भी बहुत दयनीय थी। इस माहौल का फ़ायदा इन कम्पनियों ने अपने एजेंट के माध्यम से भरपूर उठाया। कम्पनियों ने पहले इसे क़ानूनी जामा पहनाने के उद्देश्य से अग्रीमेंट (क़रार) पत्र तैयार करवाए, जिस पर मज़दूरों का अँगूठा लिया जाता। मज़दूरों को तरह-तरह के झूठे प्रलोभन देकर अपने छल-जाल में फँसाने के लिए एजेंटों  का एक जाल-सा था। कहीं ज़ोर-ज़बरदस्ती से भी काम लिया जाता। भला इस ग़ुलाम देश में इन बेबसों को सुनने वाला कौन था? ये एजेंट ‘अरकाटी’ कहलाते थे। मैथिली शरण गुप्त जी ने इस कुटिल ‘अरकाटी’ के प्रपंचों का बड़ा सजीव वर्णन किया है : 
“अधम अरकाटी कहता था फ़ीजी स्वर्ग है भू पर,
नभ के नीचे रहकर भी वह पहुँच गया है ऊपर।
मैं  कहता हूँ, फ़ीजी स्वर्ग है, तो नरक कहाँ है?
नरक कहीं है, किंतु नरक से बढ़कर दशा यहाँ है”।
‘अग्रीमेण्ट’ शब्द ‘गिरमेण्ट’ होता हुआ अपने देहाती रूप ‘गिरमिट’  में बदल गया और उस पर अँगूठा लगाकर अपने तक़दीर को नीलाम कर देने वाले ये बेबस ग़रीब अनपढ़ मज़दूर ‘गिरमिटिया’ बन गए। इन्हें जानवरों की तरह  जहाज़ में ठूँसकर  फ़ीजी, मारीच (मौरिशस), रियूनियन द्वीप, सेशेल्स, गुयाना, त्रिनिदाद और टोबैको, जमैका, सूरीनाम (श्री राम) आदि द्वीपों पर गिराया जाने लगा। 
“पाल के जहज़िया में रोई-धोई बईठी हो,
कैसी हो काला पानी पार रे बिदेसिया”।
जहाज़ पर जात-पात का टूटना लाचारी होती। ऐसे अरकाटी भी नीची जातियों के लोगों को ही फाँसते। फिर भी अपने व्यक्तिगत मजबूरियों से परेशान ऊँची जाति  के लोग भी इस जाल में फँस जाते।  पुरुषों में नीची जाति के लोगों का बाहुल्य होता जबकि महिलाएँ अधिकतर ऊँची जाति की होतीं। सवर्णों को खाना बनाने का काम दे दिया जाता। किन्तु, बीमार लोगों के मुँह में एक ही थर्मामीटर घुसाया जाता, चाहे वे किसी भी जाति के हों।  जातिगत दुराग्रह की अतिशयता से पीड़ित कई लोगों को यह छूत असह्य हो जाता। एक जहाज़ पर से तो कुछ क्षत्रियों ने इस बात पर समुद्र में कूदकर आत्महत्या कर ली कि वे दलितों से छूआ गए थे। कुछ अरकाटी तो जहाज़ पर चढ़ने से पहले ब्राह्मणों से जनेऊ तुड़वा लेते थे। ऐसे भी, अरकाटी कोमल हाथ वाले सवर्णों को लेने से परहेज़ करते क्योंकि उन्हें कठोर हथेली वाले श्रमिक अवर्णो की ज़रूरत  ज़्यादा थी। फिर भी पढ़ाने-लिखाने या अन्य ग़ैर श्रमिक कार्यों में सवर्ण कहीं-कहीं लग जाते। लेकिन आवश्यक रूप से उन्हें कूली का ही काम करना होता।
इन्हें ‘कूली’ कहा जाता। ‘कूली’ एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ होता है, ‘पैसे के लिए काम करना’। द्वीपों पर उतारने के बाद इन्हें ‘कूली-लाइंस’ (कूलियों की बस्ती) भेज दिया जाता। प्रवीण कुमार झा ने अपनी पुस्तक ‘कूली-लाइंस’ में बड़े विस्तार से  गिरमिटियों के इस अश्रु-सिक्त इतिहास का वर्णन किया है। यहाँ कूलियों के लिए बैरक बने थे जिसमें दस फ़ीट गुणा सात फ़ीट के कमरे में अमूमन चार कूली कोंच दिए जाते अपनी आगे की ज़िन्दगी बसर करने के लिए। यह इलाक़ा काफ़ी गन्दा इलाक़ा होता। गन्दी बजबजाती नालियों की दुर्गन्ध पूरे वातावरण में तैरती रहती।  पीने को पानी की क़िल्लत और उसके लिए भी छीना-छिनी, लड़ाई और झकझक। नहाने की तो बात ही दूर रही। बीमारियों का साम्राज्य! 
“काली कोठरिया में बीते नहीं रतिया हो,
किस के बतायी हम पीर रे बिदेसिया।
दिन-रात बीती हमरी दुःख में उमरिया हो,
सूखा सब नैन के नीर रे बिदेसिया।“
दिनभर काम करते मज़दूरों के हाथ-पैर छालों से भर जाते। ऊपर से कोड़ों की पिटायी। बड़ा कठोर दण्ड-विधान था। काम में थोड़ी भी कोताही करने पर चाबूकों की मार पड़ती। कई मर जाते। महिलाओं को पेड़ से बाँधकर उनके बच्चों के सामने नंगा किया जाता। महिलाओं को अपने छोटे बच्चे को खेत पर ले जाने की मनाही थी। एक बार एक माँ अपने बीमार शिशु को लेकर गयी। उस पर जम के कोड़े बरसे। अपने शिशु को अपनी गोद में चिपकाए उसकी चीत्कार आकाश में गूँजती रही। बेरहम मालिक ऊपर शिकायत होने पर भी गवाह के बग़ैर अपने रोबो-रुआब से बच जाते। महिलाओं की आबरू भी सुरक्षित नहीं थी। कई महिलाओं और उनके पतियों ने आत्महत्या कर ली।  गाँधी जी के मित्र एण्ड्रयुस ने लिखा, ‘हिन्दुस्तानी ग़रीबी और यातना झेल सकते हैं। पर किसी महिला की इज़्ज़त से खिलवाड़ कभी नहीं झेल सकते’।
 सात वर्ष से ऊपर का जो बच्चा गिरमिटिया के साथ आता, वह बिना किसी अग्रीमेण्ट के बारह साल का होते ही अपने आप गिरमिटिया बन जाता और पाँच साल की बँधुआ मज़दूरी करने के बाद ही इस ग़ुलामी से मुक्त हो पाता। प्रवीण झा के आँकड़ों के मुताबिक़ १९०६ में फ़ीजी द्वीप में ६२ प्रतिशत बच्चे मौत के मुँह में समा गए थे। फिर भी इन बेरहम मालिकों के भीषण अत्याचार का नंगा नृत्य होते रहा और लाचार गिरमिटिया अपने ख़ून-पसीने से उन बाग़ानों को सींचते रहे।
“ख़ून-पसीने से सींचे हम बगिया,
बैठे-बैठे हुकुम चलाए रे बिदेसिया”।
एक तो ग़रीबी और अत्याचार की मार। दूसरी परतन्त्रता का अभिशाप। ऊपर से अपनी माटी से विरह की व्यथा! ये सारी प्रतिकूलताएँ उन्हें अन्दर  से खाए जा रही थी। फिर भी इन गिरमिटियों ने अपनी माटी की महक को नहीं बिसारा। भारत के ये लाल अपनी जिजीविषा के साथ रामचरितमानस का गुटका और गीता का कर्मयोग भी लेकर गए थे।  शाम को अपनी ‘बैठकी’ में अपना रामायण बाँचते, कीर्त्तन गाते और अपनी ‘बिदेसिया’ के करुण गीतों में अपनी दिन भर की पीड़ा घोल देते।  उनकी यह सांस्कृतिक शाम अपनी जड़ों से शक्ति सहेजती और जीवन के कुरुक्षेत्र में अपने कलैव्य की तिलांजलि देकर नए जोश से जीवन का सूत्र तलाशने  में जुट जाती।  धीरे-धीरे गिरमिटियों की इस एकजुटता में संघर्ष के स्वर फूटने लगे।  वे संगठित होने लगे और विद्रोह का बिगुल बजने लगा।  एक पीड़िता ‘कुन्ती’ की लिखी चिट्ठी उनके संघर्ष के इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बनी और उनके संघर्ष की धमक द्वीप के पार भी सुनायी देने लगी। भारत में गोपाल कृष्ण  गोखले ने ब्रितानी साम्राज्य को इत्तिला दी। उधर फ़ीजी द्वीप के तोताराम सानिद्धय ने गाँधी जी को पत्र लिखा। गाँधी जी ने बैरिस्टर मणिलाल मगनलाल डॉक्टर को फ़ीजी भेजा। बाद में बदरी महाराज नामक गिरमिटिया को लेजिस्लेटिव काउन्सिल में जगह मिली। चार्ल्स एण्ड्रयुज भी फ़ीजी गए। बँधुआ मज़दूरी को ख़त्म करने में उनका संघर्ष उल्लेखनीय रहा। वे दीनबन्धु कहलाए। अन्तत: अपने कठिन संघर्ष और बलिदानों के बाद भारत माता के इन गिरमिटिया सपूतों ने १ जनवरी १९२० को अपनी आज़ादी पा ली। चतुर्दिक उत्सव का माहौल था। अब मज़दूरी बढ़ाने के लिए मणिलाल डॉक्टर की पत्नी की अगुयायी में हड़ताल हुयी। १३ फ़रवरी १९२० को हड़तालियों के पुलिस से संघर्ष में ‘फ़ीजी का जालियाँवाला बाग़’  हुआ। १५ अप्रिल १९२० को मणिलाल को देशद्रोह के आरोप में फ़ीजी द्वीप छोड़ना पड़ा। तब से आज तक फ़ीजी की फ़िज़ा में बहुरंगी बयार बह चुकी है।  
आज भिन्न-भिन्न द्वीपों पर  इन गिरमिटियों की चौथी-पाँचवीं पीढ़ी अपना परचम फहरा रही है। अपने  ख़ून-पसीने और अदम्य संघर्ष के बूते आज ये उत्कर्ष के शिखर पर हैं। कई द्वीपों की सियासत इनके क़ब्ज़े में आ चुकी है। भारतीयता, भोजपुरीपन और भोज-भात इन द्वीपों की जीवन-शैली बन गयी है। आकाश में बधाई, सोहर और छठियार के गीत गूँज रहे हैं। आज की पीढ़ियाँ भले ही  अपने ‘गिरमिटिया’ शब्द को  भूल रही हों, इतिहास उन्हें कभी विस्मृत नहीं करेगा। हम बार-बार इस बात को दुहराते हैं कि वे पीढ़ियाँ आभागी होती हैं, जिनका कोई इतिहास नहीं होता। किन्तु, उससे भी अधिक आभागी वह पीढ़ी होती है जिनका इतिहास तो होता है लेकिन अपने इतिहास को वह भूल जाती है। दुनिया की तवारीख में गिरमिटियों की दास्तान हमेशा जीवित रहेगी और आनेवाली पीढ़ियाँ उनसे प्रेरणा की ऊर्जा ग्रहण करेंगी। वतन की अपनी लड़ाई उन्होंने परदेस में लड़ी और अपने वतन की रूह के लिए जीत दर्ज की:
“शहीदों के मज़ारों पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का बाक़ी यही निशाँ होगा”।

 भारत के  स्वतन्त्रता-उत्सव की इस उषा-वेला में हम अपने उन गिरमिटिया पूर्वजों के अप्रतिम उत्सर्ग को अपने नम नयनों से श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सात समुन्दर पार भी अपनी बदहाली में वे भारत माता के अरुण-केतन को थामे रहे। अपनी आज़ादी की लड़ाई बिदेसी ज़मीन पर जीती और उस धरती को अपने आर्यावर्त के संस्कार में रंग दिया।

“ख़ून-पसीना, मानस, गीता, 
जय धोती, लोटा, खटिया।
भारत माँ के वीर सपूत वे,
जय बोलो, जय गिरमिटिया”।
























































Saturday, 11 July 2026

' क ' से कहानी

 


‘क’ से कहानी 

(पुस्तक-समीक्षा)

पुस्तक का नाम – ‘क’ से कहानी 

विधा – कहानी 

कहानीकार – डॉक्टर उषा सिन्हा 

प्रकाशक – स्पर्श प्रकाशन, ३०२ बी, श्री हरिराधा अपार्टमेंट, बोरिंग रोड, पटना 


कहानी की कहानी उतनी ही पुरानी है जितनी इस धरती पर मानव जाति की कहानी। कहानियाँ पहले भावनाओं, भंगिमाओं, और व्यवहार के धरातल पर उपजीं; शब्दों की नाव पर भाषा के प्रवाह में बाद में बहीं। तदन्तर ये संस्कृति को उचारती रहीं और सभ्यताओं से टकराती रहीं। काल के ज्वार-भाटा से समकालीन जीवन-तत्वों को सहेजती रहीं। ‘जैसी करनी, वैसी कथनी’ बनकर ये अपने को उस परिवेश के  ऋँगार से सँवारती रहीं। सरल समाज की सरल कहानी और क्लिष्ट समष्टि की विरल अभिव्यक्ति! सिकुड़ती संस्कृति और फैलती सभ्यता के दबाव में कहानियाँ भी सकुचाती और पसरती रहीं। आगे चलकर बौद्धिक वितण्डा और वाद-पंथ के प्रचण्ड ताप में झुलसने लगीं। पर्यावरण के प्रदूषण ने पदार्थ और प्रकृति को ही दमघोंटू नहीं बनाया, वरन वाद और पंथ के पाथेय ने कहानियों का भी दम घुटाया। दाम और वाम तथा उत्तर और दक्षिण की पंथ-विभाजन रेखा ने कहानियों की कहानी को भी बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसी स्थिति में यदि कथा रचती साहित्य-वीरांगना डॉक्टर उषा सिन्हा की ‘क से कहानी’ की ‘अपनी बात’ से यह संगीत निकलता हो कि “ मेरी कहानियाँ किसी वाद के चक्कर में न फँसकर नदी की उन्मुक्त धारा की तरह राह के कंकड़-पत्थर, सीपियाँ और शंख समेटती चलती हैं। जहाँ थाह मिले, थोड़ी देर के लिए रुक जाती हैं और फिर चल पड़ती हैं – असीम सम्भावनाओं के साथ”। - तो निश्चय की निराशा के घटाटोप तिमिर में यह आशा की ‘उषा’ का उन्मेष है। उषा जी की इन बातों के प्रतीकार्थ में दम है कि असल में कहानियों को आज दुनिया की दब्बू क़िस्म की मध्यवर्गीय वनिता रचनाकारों की ही सख़्त ज़रूरत है जो समाज की विसंगतियों को खुद जीती हैं। वही अपनी नित-नित की ज़िन्दगी में इस समाज को पढ़ती हैं, लिखती है, फाड़ती हैं, फेंक देती हैं, बटोरती हैं, छाँटती हैं और फिर सहेजकर सहजता से अनायास-अनवरत कहानियाँ बुनती चली जाती हैं। इस बुनावट में चारों ओर फैले उनकी ज़िंदगी के हर बिम्ब कहानियों के पात्र बनकर पाठकों से बतियाते रहते हैं।

‘क से कहानी’ उषा जी की दस कहानियों का संग्रह है। उनकी ही बोली में आस-पास की ज़िंदगी से ही इतने कथा सूत्र मिल जाते हैं कि कहीं भटकने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। सामाजिक जीवन का उनका विशद अनुभव, नारी सुलभ सूक्ष्मदर्शिता, विलक्षण विश्लेषण क्षमता और उनका जन-सरोकार – ये सभी तत्व इन कहानियों में आद्योपांत पाठक के साथ-साथ चलते हैं। कहानियों के पात्र आम ज़िंदगी के किरदार हैं, जीवट से भरपूर हैं और उम्मीदों के प्रकाश-पथ पर गतिमान हैं।  

लेखन के क्षेत्र में डेगाडेगी देनेवाली महिलाओं के संरक्षण की आड़ में अपने निजी एजेंडा को साधने की गुप्त योजना को पोषित करने वाली साहित्यिक संस्था ‘साहित्य-मंजूषा’ की संस्थापक चन्द्रकान्ता जी आज के चलन को जस-का-तस प्रतिबिम्बित करती हैं – ‘हाथी के दाँत’ दिखाने के और, खाने के और! यह कहानी इतनी बड़ी सहजता से पाठकों के मन में उतर जाती है। लगता है कि रचनाकार स्वयं ऐसी किसी संस्था के प्रतिघात से उपजी पीड़ा की अपनी राम कहानी ही कथ रही हों। चलते-चलते बग़लगीर को रगड़ा मार जाने वाली उषा जी की कहन-शैली की मारक क्षमता अद्भुत है। लघु-कथा संगोष्ठी उन तमाम सद्विचारों का उद्घोष करती है जो संस्था के अपने आचरण के ठीक उलट है। कथा-वाचन में उच्चारण की तमाम अशुद्धियाँ श्रोताओं की तालियों की गूँज से होड़ ले रही हैं। संस्था में जाति अभी भी एक ऐसा सच है जिसे लोग सूँघकर पहचान लेते हैं, सरनेम से चाहे आप जितना भी ढक लें! लघुकथा का विचार-बिंदु है – पुरुष द्वारा स्त्री का शोषण। लेकिन ‘साहित्य- मंजूषा’ की अंदरूनी कहानी कुछ और ही बयान कर रही है। बाहर से कुछ और, अंदर से कुछ और। ऊपर से फ़िट-फाट, नीचे से मोकामा घाट! यहाँ तो स्त्री के द्वारा ही स्त्री शोषित है। चन्द्रकान्ता शोषक है और नीमा शोषित! संस्था के आचरण की यह दुविधा संकेत अर्थ में समूचे साहित्य-समाज का चरित्र है। ईमान की बात नहीं होती अब। अभिजात मुँह से निकली बात ही ईमान है। ‘क्यों रे, कितना खाता है? तेरा बाप कमा कर रख गया है क्या?’ मालकिन की इस बात पर कूड़ा बीनने वाला बच्चा खाने का पैकेट और पानी का बोतल पटक कर चला जाता है। उस लाचार बालक का यह विद्रोही स्वाभिमान नीमा को प्रतिरोध के एक नए तेवर के लिए हुलका जाता है। उषा जी की यह कहानी ‘हाथी के दाँत’ तथाकथित साहित्यिक संस्थाओं के चाल और चरित्र की सड़ान्ध के सफ़्फाक सच को सामने रखती है।

बिहार में पकडुआ बियाह अपने ज़माने का एक रोचक समाजशास्त्रीय सच है। ऐसे विवाहों में न केवल जाने-पहचाने परिजनों की साज़िश होती है, बल्कि कभी-कभी तो पकडुआ दूल्हा भी अपने को पकड़वाने की साज़िश में शामिल होता है। बढ़ते तिलक-दहेज की कुप्रथा के प्रतिकार बनकर ऐसी व्यवस्था उभरी जिसकी चपेट में वह क्षेत्र भी था जहाँ से कहानीकार का सरोकार है। ऐसे क्षेत्र की जन-प्रतिनिधि होने के नाते पकडुआ बियाह पर कहानीकार की समाजशास्त्रीय पकड़ अत्यन्त  प्रगाढ़ है। इसलिए उनकी कहानी ‘और वह चली गयी’ में इस प्रसंग का विवरण अत्यन्त संजीदा होना स्वाभाविक है। ‘एक ही जाति, एक ही धर्म, दोनों कुँवारे, दोनों जवान, अच्छी जोड़ी, फिर दिक्कत कहाँ?’ बहुतायत विवाहों पर यह बात खरी उतरती है। ‘मात्र पाँचवीं पास फूलमती दिल और दिमाग़ की बात करती है। सिनेमा देखकर बौरा गयी है। शहर की हवा ने मानुष के तन-मन को कलुषित कर दिया है’।– फूलमती की माई की यह कारुणिक चीत्कार सिनेमायी दुष्प्रभाव और शहरों के बदसूरत संस्कार पर व्यंग्यात्मक प्रहार है। उषा जी की सतर्क दृष्टि पुरुष की कमज़ोरी को बड़ी सबलता से सामने रखती है जब अमिरका फूलमती के साथ अपने बच्चों को यह कहकर त्याग देता है, ‘साँप और सँपोलियों सबको बाहर करो’। यहाँ कहानीकार प्रकारांतर में नारी के पवित्र और उदात्त मातृत्व रूप का दिग्दर्शन करा देती हैं। यही रूप तो नारी को देवी बना देता है।

अपनी घोर अवैज्ञानिकता के आवरण में भी ‘ब्रह्म-पिशाच’ कहानी एक वैज्ञानिक संदेश छोड़ जाती है। यह पशु-पक्षी को मारने के विरुद्ध पाठकों को चेता जाती है।

‘इच्छा-मुक्ति’ एक बेबस पत्नी के आत्म-समर्पण में ही अपनी मुक्ति पाने की करुण कसमसाहट है। आज के विवाहेत्तर सम्बन्धों को कहानी अपना विचार-केन्द्र बनाती है जो बिलकुल सामयिक है। किन्तु, कहानी का अधूरापन अवश्य पाठकों को खलता है। समस्या की तह की तलाश में कहानी पाठक को बीच रास्ते पर ही छोड़ जाती है और सोद्देश्यता के स्तर पर कथानक काफ़ी हल्का हो जाता है।

‘सुनयना’ मध्यवर्गीय पुरुष मानसिकता के नपुंसक तत्व की त्रासदी की करुण गाथा है। स्वतन्त्रता के उषा काल की यह कहानी यही सन्देश देती है कि महिलाओं के प्रति मर्दों की मन:स्थिति तब भी वही थी और आज भी वही। मतलब ढाक के तीन पात! लाखों लुभावने नारों के बावजूद बेटियों की वेदना की तीव्रता ज्यों-की-त्यों है। अब नारा तो यह होना चाहिए कि ‘बेटा पढ़ाओ, बेटी बचाओ!’ अपने पात्रों के चरित्र में रंग भरने की कला की उषा जी चतुर चित्रकार हैं। उनकी कूँची अपने पात्र की संवेदना के हर स्पेक्ट्रम  को पकड़ लेती है और अपने शब्द-चित्रों में उसे उतार लेती हैं। ‘श्रीधर की पत्नी रामरती ने देवरानी की लड़की को देखा तो आदतन पहले नाक-भौं सिकोड़ा … बड़ी बड़ी आँखों से ताई जी को ही देख रही थी … रामरती की आँखों में स्नेह उमड़ आया’। - ये पंक्तियाँ न केवल भारतीय संयुक्त परिवार के अंदरूनी मनोविज्ञान की पड़ताल करती प्रतीत होती हैं, प्रत्युत विश्वम्भर नाथ शर्मा कौशिक जी की कालजयी कहानी ‘ताई’ का स्मरण भी करा जाती है।

‘निरुपमा’ में सामाजिक आचरण की विकृतियों की घिनौनी गंदगी का बड़ी सफ़ाई से चित्रण हुआ है। 

बेटे और बेटी के प्रति समाज के दोहरे रवैए का भण्डा फोड़ने वाली उषा जी की कहानी ‘अब पछताए होत क्या – एक पिता की डायरी’ संवेदना का सरगम है। एक सजग पाठक की आँखों को यह कहानी नम तो करती है, साथ में एक अपराध भाव भी छोड़ जाती है कि रोपे पेड़ बाबुल का तो आम कहाँ से होय! ‘शायद हमारे समाज में बेटों की कामना ही इसलिए की जाती है कि अन्तिम संस्कार में वे बाप को कन्धा और मुखाग्नि देकर उनकी आत्मा को तृप्त करें’। - यथार्थ में तो पिता के अरमानों की चिता में ये बेटे जीते जी ही आग लगा देते हैं। अमृता के पिता की डायरी इसी सत्य का अभिलेख है।

इस बनावटी दुनिया की मायावी चकाचौंध और जीवन के नग्न यथार्थ के दो पाटों के बीच हीन-भाव की ग्रन्थि में फँसी वीथिका के सत्य से साक्षात्कार और आत्म-बोध की कहानी है – ‘अम्मा’। “उसे मम्मी नहीं अम्मा चाहिए, अपनी अम्मा। होश सम्भालने के बाद पहली बार वह अम्मा से सर्वांग लिपट पड़ी। टप-टप गिरते आँसूओं के समुद्र में डूबती उतराती रही। अम्मा का भीगा आँचल उसने कस कर पकड़ लिया। तुम हमें छोड़ कर कहीं मत जाना अम्मा। कभी मत जाना”। कहानी के अवसान बिंदु पर पाठक के मन-आँगन में वीथिका की यह आवाज़ गूँजती रह जाती है। 

यक़ीन कीजिए, ‘यह कहानी नहीं’ वाक़ई एक कहानी नहीं है। घोर भ्रष्टाचार, असभ्य और अशैक्षणिक   आचरण से परिपूर्ण आज के विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों का यह आँखों देखा हाल है। एक प्रोफ़ेसर की लेखनी से निकली यह कहानी न्याय-दर्शन के सभी प्रमाणों पर सौ फ़ीसदी खरी उतरती है। 

संग्रह की अंतिम कहानी ‘गुरुदीक्षा’ मनोवैज्ञानिक वेदना का विस्तृत वितान है। प्रकारांतर में ग़रीबी और  जातीय असमानता से जुड़ी हैसियत की सामाजिक अवधारणा पर यह एक व्यंग्यात्मक प्रहार भी है – “एक तो ग़रीब, दूसरे जाति का कुर्मी! चौरहा बटईया जोतना और व्याह-शादी में पत्तल उठाना उसके परिवार का पुश्तैनी पेशा था … पर ‘परसुआ’ को यह सब कहाँ पता था … उसे ऊँच-नीच कहाँ मालूम था।“ नीलांजना के पत्थर से परसुआ के माथे पर लगी चोट में पाठकों को वही मर्मांतक आर्त्तनाद सुनायी देता है जो जैनेंद्र जी की कहानी ‘खेल’ में मनोहर द्वारा घरौंदे के ढाह देने से सूरबाला के दिल को लगे आघात में। 

संग्रह की सारी कहानियों के अवयव आम जीवन की देखी सुनी है। सबकुछ स्वाभाविक, खरा और टटका! समाज के सच का चलचित्र है – ‘क’ से कहानी! कहानियों की धार बड़ी प्रखर है, कथानक बड़े संजीदे हैं, कहन का शिल्प बड़ी सुगठित है, शब्द-चित्र बड़े जीवंत हैं, घटनाएँ महज़ आख्यान नहीं बल्कि भोगे हुए अनुभव और देखे हुए सच हैं, बोली बड़ी सरल है और संदेश बड़े सीधे हैं। उषा जी, सच में, आम लोगों की बात आम भाषा में ही करती हैं।  यहाँ भी भाषा उतनी ही प्रांजल और वेगमयी है। बस, भाषा के मनोहर प्रवाह में कहीं-कहीं स्पर्श प्रकाशन के प्रूफ़ शोधन की कोताही और वर्तनी की अशुद्धियाँ अवश्य रोड़े अटकाती हैं। पुस्तक का आवरण संयोजन एवं मुद्रण आकर्षक है। एक मनोहर और पठनीय कहानियों के इस सुशीर्षक संग्रह ‘क’ से कहानी’ के लिए सर्वतोमुखी प्रतिभा एवं उपलब्धि सम्पन्न प्रख्यात साहित्यकार प्रोफ़ेसर (डॉक्टर) उषा सिन्हा जी को साधुवाद एवं आत्मीय बधाई!!!

Wednesday, 27 May 2026

अविरल श्याम



 

पुस्तक – अविरल स्याम ( एक विस्मृत क्रांतिकारी की कथा) (नाटक)
लेखक – डॉ. किशोर सिन्हा, प्रकाशक – नोशन प्रेस, चेन्नई 



नाटक सर्वदा से मेरे लिए जन-सरोकार का विषय रहे हैं। यह एक स्वतंत्र साहित्यिक विधा है, जिसके हृदय में लोक कल्याण और लोकरंजन दोनों भाव साथ-साथ धड़कते हैं। इसके मूल में सर्वकल्याणकारी लोक संदेश की अनुगूँज होती है जो श्रव्य तो होती ही है, साथ में दृश्य भी। नाटकों का चाक्षुष प्रभाव दीर्घजीवी  होता है। हमें सदा से नाटकों की भारतीय परंपरा पाश्चात्य परंपरा से ज़्यादा शास्त्रीय और सुसंगत लगी हैं। कारण, पश्चिमी दृष्टि जहाँ नाटकों को भौतिक आवश्यकता और उसकी पूर्ति के साधन दोनों रूप में आँकती है, वही भारतीय दृष्टि इसे जीवन के अंतरंग दर्शन की प्रस्तुति और पड़ताल दोनों रूपों में निहारती है। इसीलिए भारतीय दृष्टि इसके  रमणीक तत्व को रेखांकित करती है –
‘काव्येषु नाटकं रम्यम’।
 यह सनातन साहित्य का पंचम वेद है। भरत मुनि का भारतीय नाट्यशास्त्र नाटक को नृत (ताल/लय), नृत्य (भाषाश्रित) और नट (अभिनय) की त्रिवेणी के स्वरूप में प्रतिष्ठित करता है। यहाँ ऋग्वेद से पठनीयता, सामवेद से गेयता, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद  से  रस-श्रिंगार के भाव-तत्व की समग्रता को समाहित किया गया है। 
“त्रैलोकस्य अस्य सर्वस्य नाट्यं भाव अनुकीर्त्तनं”
ये भाव नाटककार, रंगमंच और दर्शक को एक भाव-धारा में बहा ले जाते हैं। रंगमंच मूल पात्र को साधारण रूप में प्रस्तुत कर दर्शक को उस पात्र की असाधारणता से जोड़ देता है और दर्शक स्वयं को उस पात्र की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति मान बैठता है। कुल मिलाकर, नाटक गद्य-विधा का दृश्य काव्य है जिससे दर्शकों में ललित आनंद और सात्विक परिष्कार का पारावार लहराता है। सोद्देश्यता इसकी आत्मा होती है।
किशोर सिन्हा जी की नाट्य कृति ‘अविराम श्याम’ एक विस्मृत क्रांतिकारी की कथा का पुनित पाठ है। यह न मात्र हमारी महान विरासत को सहेजता है, प्रत्युत पाठकों के उर को संवेदना के एक अविराम प्रवाह से तर करता है। हम बार-बार इस बात को दुहराते हैं कि वे पीढ़ियाँ बड़ी आभागी होती हैं, जिनकी कोई विरासत नहीं होती, जिनका कोई महान इतिहास नहीं होता! किंतु, उससे भी बड़-आभागी पीढ़ियाँ तो वे होती हैं जो अपने  गौरवमय अतीत को विस्मृत कर देती हैं। तवारीखें उन्हें कभी भी माफ़ नहीं करती और अपनी अस्मिता की तलाश में एक-न-एक दिन वे भटकने को बेबस हो जाती हैं। हमें याद है कि भीष्म साहनी की पुस्तक ‘तमस’ पर दूरदर्शन ने एक धारावाहिक बनाया था। उसके दृश्यपट पर आरंभ में ही एक पंक्ति उभरती थी, ‘ वे जो इतिहास को भूल जाते हैं, इसे दुहराने को अभिशप्त हैं ‘। किशोर जी की इस कृति में पीढ़ियों को उस अभिशाप से मुक्त कराने की छटपटाहट दिख रही है। विशेषकर अपने उदात्त संस्कारों की लीक से भटकी आज की तथाकथित जेन-जी पीढ़ी को अपने अतीत के आलोक से भविष्य के पथ को प्रकाशित कर आगे बढ़ने की दिशा में इस तरह की कृतियाँ मील का पत्थर होने की क्षमता रखती हैं।  
नाटक की दृश्य-व्यवस्था का श्री गणेश दिन के उन्मेष से होता है। दादा और पोते की बतकही के मीठेपन से कथ्य अपनी चित्रात्मकता के साथ उभरना शुरू होता है। दोनों की वेश-भूषा उनके पीढ़ीगत परिवेश और मूल्यों का गणवेश है – सत्तर साल के दद्दु कुर्ते-पैजामे में कंधे पर गमछा डाले और चौदह-पंद्रह साल का किशोर पोता, रमन अपने जींस, टी-शर्ट में कंधे पर एक बैग डाले और टी-शर्ट में चश्मा खोंसे! यही से नाटककार पाठकों को अपने पाश में बाँधता, अपनी गलबहियाँ में लेकर अपनी नाट्य-यात्रा की रोचकता में प्रवेश कर जाता है। दद्दु और रमन की बातचीत से इतिहास जगह-जगह झाँकता नज़र आता है। रेलगाड़ी से उतरकर बस की सवारी, फिर पैदल।  दादा-पोते धिपते घाम में ‘बिन्द’ गाँव पहुँचते है। यह महान स्वतंत्रता सेनानी, १९३७ से १९५२ तक बिहार असेम्बली के सदस्य और समाजसेवी श्याम नारायण सिंह का गाँव है। उनकी आदमकद प्रतिमा एक जर्जर से विद्यालय के पास खड़ी, मानो अपने ज़माने की गवाही दे रही है। इस स्कूल की सत्रह एकड़ ज़मीन श्याम बाबु की दान की हुई है। विद्यालय के भवन की जर्जर हालत अपनी विरासत के प्रति हमारी दृष्टि की दुर्दशा की जीती-जागती तस्वीर है। वहीं भेंटा जाते हैं प्रकाश बाबु - एक अवकाश प्राप्त डाक बाबु। श्याम बाबु के नाम पर जारी डाक टिकट को अपनी स्मृतियों में सहजते उनके मुख से फूट पड़ता है- ‘यह डाक टिकट एक चेहरे का नहीं था, एक विचार का था, एक आन्दोलन का था … ये डाक टिकट एक आदमी का नहीं एक युग का था …’।
नाटककार ने बड़ी कुशलता से इस नाटक में आद्योपांत करुणा की अजस्त्र धार बहायी है, जिसमें पाठक अनायास डूबते-उतराते रहता है। सही बात है, श्याम बाबु जैसे लोग इतिहास की किताबों के लिए नहीं जीते, वे लोगों के लिए जीते हैं। यह भी उतना ही सही है कि कभी-कभी इतिहास देर से आता है, पर ख़ाली हाथ नहीं आता! किशोर जी की इस कृति ने भी अपने पाठक-दर्शक को ख़ाली हाथ नहीं रहने दिया है।
फ़्लैश-बैक के साथ दृश्यान्तर होता है। श्याम बाबु की उपस्थिति के साथ नाटक आगे बढ़ता है। श्याम बाबु के पिता रामप्रसाद बाबु की यह ताक़ीद – ‘बेटा श्याम, ये जो मेरी ज़मींदारी है न, उसका अर्थ विलासिता नहीं, कर्त्तव्य है’ – आज के नवधनिक सियासतदानों के लिए एक कड़वी घूँट है। श्याम बाबु का उस ज़माने का दर्शन – ‘जिस देश की बेटियाँ शिक्षित नहीं, वह देश आज़ाद नहीं हो सकता’ आज के हिन्दुस्तान का भी उतना ही बड़ा सच है – ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’! बीच-बीच में सरल और सुबोध कोरस नाटक को सरस गति देते हैं। दिन के निकलने से शुरुआत होने वाली कहानी का अवसान प्रकाश के धीरे-धीरे बुझने … फिर सूर्यास्त दिखायी देने की प्रकाश-व्यवस्था से होना नाटककार की कल्पनाशीलता, रचनात्मकता और चित्रात्मकता के उत्कर्ष को प्रदर्शित करता है। इसी प्रकाश-व्यवस्था में दद्दु फ़्लैश-बैक से वापस रमन के पास लौटते हैं। प्रभाव इतना गहरा है कि पाठक और दर्शक अभी भी वहीं अपनी संवेदना के सरगम में अपने दृष्टि-बोध के पाश में झूलता खड़ा है। वह अपनी उस अविराम अवस्था को प्राप्त हो गया है, जो नाटककार की संवेदना ने उसके मन पर छाप दिया है। कहन का शिल्प भी अद्भुत है। दादाजी पोते को बताते हैं कि यह कहानी उन्हें उनके पिताजी अर्थात पोते के परदादा ने सुनायी थी। अपनी महान विरासत के मूल्यों और संस्कारों के संचरण की इस प्रक्रिया को अपनी कहानी के शिल्प में गढ़ने और नाटक के रूप में आज की पीढ़ी के समक्ष प्रस्तुत करने का यह महायज्ञ इस पूरी कृति को सोद्देश्यता के श्रिंगार से सुसज्जित करता है:
“हम मानवता के पहरेदार हैं  … 
हम जाग रहे हैं  … 
हम मानवता के पहरेदार हैं …
हम जाग रहे हैं …”
नाटक के संवाद अत्यन्त प्रभावशाली हैं। भरसक, कहीं-कहीं तो कालजयी हैं। बानगी देखिए – ‘धर्म अगर इंसानियत से बड़ा हुआ तो ईश्वर भी रोएगा’, ‘वोट नहीं, संकल्प दो’, ‘जहाँ शरीर क़ैद होता है, वहीं आत्मा का विस्तार होता है। इतिहास के सबसे उजले अध्याय अक्सर जेल की कोठरियों में लिखे जाते हैं’, ‘जब विचार हथियार बन जाए और जनता ढाल, तब इतिहास की दिशा बदलती है’, आज़ादी बाहर नहीं होती, भीतर होती है’, ‘समय बहुत कुछ छीन लेता है, पर कुछ नाम ऐसे होते हैं जो समय को ही बदल देते हैं’, ‘जो आज पीछे हटा, समझो वह पीढ़ियों तक झुका रहेगा’, ‘क्रान्ति केवल टकराव नहीं, साहचर्य भी है। जहाँ विचार मिलते हैं, वहाँ इतिहास की रगों में रक्त तेज़ी से बहने लगता है’, तुम्हारे साहस में करुणा भी है’, और अंत में संवेदना का गढ़ियापन शब्दों में उतरता देखिए, ‘आज कोई माँ हिन्दू नहीं, कोई माँ मुसलमान नहीं, सबकी कोख डर से थर-थर काँप रही है, बाबू!’ 
किशोर जी साहित्यकार हैं, लेखक हैं, नाटककार हैं, अभिनेता हैं, नाट्य निर्देशक हैं, कवि हैं, मीडिया-मैन हैं, संगीतकार हैं और फ़िल्मकार हैं। ज़ाहिर है, जब वह कुछ रचते हैं, उनके व्यक्तित्व में बसते ये सारे किरदार एक साथ मिलकर उन्हें अपना आवेग देने लगते हैं। स्वाभाविक है कि पाठक-दर्शक का सहज संबंध उनके पात्रों के अंतर्मन से जुड़ जाता है। नाटककार की कल्पनाजीविता नाटक के चरित्र में भाव, विचार, संवेदना और अनुभूतियों के बीज छींटते हैं जो समकालीन परिदृश्य को पूरी तरह सहेज लेता है। चरित्र गतिशील हैं और संघर्षशील भी। भाषा सहज है, संप्रेषणीय है, भावनुरूप है, पत्रानुकूल है, चित्रात्मक है और गतिशील है। यह पाठक के अंतर्मन में पात्र की जीवन्त छवि को खड़ा कर देती है। गठा शिल्प और अनूठी संवाद शैली नाटक के प्राण हैं। संवादों में कसाव है, तारतम्यता है और साथ ही पात्र और परिवेश की स्पष्टता है।
शीर्षक, ‘अविराम श्याम’ में रोचकता का तत्व है और एक चुंबकीय आकर्षण है जो पाठकों के मन को बाँधता है। कहने को है तो नाटक लेकिन कृत्रिम नाटकीयता से कोसों दूर। सब कुछ खाँटी स्वाभाविक, सहज, सरल और अविराम!  ‘अविराम श्याम’!
बधाई किशोर जी, अविराम श्याम के लिए!
 ----- विश्वमोहन 

Friday, 15 May 2026

सीखना


 

मैने कहा,

मुझे लिखना सिखा दो।

उसने कहा,

पहले सीखना सिखो।

मैने कहा,

वही सिखा दो।

...

...

मुझे लिखना आ गया।

सीखना अभी भी सीख रहा हूँ।

Thursday, 30 April 2026

आये हो, तो जाओगे।

है विदित जो जीव का,

प्रारब्ध और गंतव्य यही।

हर मिलन के बीज में  है,

विरह का भवितव्य ही।


न रहा अपवाद कोई,

द्युलोक, अंतरिक्ष, पृथ्वी।

समय चक्र सब नाचते,

ग्रह गोचर और रवि।


आये हो, तो जाओगे।

फिर सोचते हो क्या?कवि!

सर्वं खलु ईदम ब्रह्म,

हो आहूत बन हवि।



Monday, 16 March 2026

जहाँ ना संशय, ना कोई डर!

 



हो किरणों पर न कोई पहरा,
चिड़ियों की चहक चिरंतन हो।
तर तुषार तृण फुनगी फुदके,
चेतन का स्वर- स्पंदन हो।

तरु  हरित पत्र गोल-गोल,
झूमें गायें डोल-डोल।
टहनी से डंठल लिपट-लिपट,
खुसुर-फुसूर फिर बोल-बोल।

कौओं की पंचायत से,
फदगुदियाँ ले रहीं होड़।
अपना हुक़ूक़ हैं जता रहीं,
गिलहरियाँ माटी कोड़-कोड़।

सन्नाटे का सुर सरोवर,
शकल दिल-सी रंगी नील।
जलतरंग में छाया नर्तन,
गोद गिरि गदरायी झील।

सभी स्वच्छंद हैं, सभी मुक्त हैं,
कण-कण चिन्मय अजर अमर।
हे पवन प्राण, सुन, ठहर यहीं,
जहाँ ना संशय, ना कोई  डर!