मैने कहा,
मुझे लिखना सिखा दो।
उसने कहा,
पहले सीखना सिखो।
मैने कहा,
वही सिखा दो।
...
...
मुझे लिखना आ गया।
सीखना अभी भी सीख रहा हूँ।
ज़िन्दगी की कथा बांचते बाँचते, फिर! सो जाता हूँ। अकेले। भटकने को योनि दर योनि, अकेले। एकांत की तलाश में!
मैने कहा,
मुझे लिखना सिखा दो।
उसने कहा,
पहले सीखना सिखो।
मैने कहा,
वही सिखा दो।
...
...
मुझे लिखना आ गया।
सीखना अभी भी सीख रहा हूँ।
है विदित जो जीव का,
प्रारब्ध और गंतव्य यही।
हर मिलन के बीज में है,
विरह का भवितव्य ही।
न रहा अपवाद कोई,
द्युलोक, अंतरिक्ष, पृथ्वी।
समय चक्र सब नाचते,
ग्रह गोचर और रवि।
आये हो, तो जाओगे।
फिर सोचते हो क्या?कवि!
सर्वं खलु ईदम ब्रह्म,
हो आहूत बन हवि।