Saturday, 11 July 2026

' क ' से कहानी

 


‘क’ से कहानी 

(पुस्तक-समीक्षा)

पुस्तक का नाम – ‘क’ से कहानी 

विधा – कहानी 

कहानीकार – डॉक्टर उषा सिन्हा 

प्रकाशक – स्पर्श प्रकाशन, ३०२ बी, श्री हरिराधा अपार्टमेंट, बोरिंग रोड, पटना 


कहानी की कहानी उतनी ही पुरानी है जितनी इस धरती पर मानव जाति की कहानी। कहानियाँ पहले भावनाओं, भंगिमाओं, और व्यवहार के धरातल पर उपजीं; शब्दों की नाव पर भाषा के प्रवाह में बाद में बहीं। तदन्तर ये संस्कृति को उचारती रहीं और सभ्यताओं से टकराती रहीं। काल के ज्वार-भाटा से समकालीन जीवन-तत्वों को सहेजती रहीं। ‘जैसी करनी, वैसी कथनी’ बनकर ये अपने को उस परिवेश के  ऋँगार से सँवारती रहीं। सरल समाज की सरल कहानी और क्लिष्ट समष्टि की विरल अभिव्यक्ति! सिकुड़ती संस्कृति और फैलती सभ्यता के दबाव में कहानियाँ भी सकुचाती और पसरती रहीं। आगे चलकर बौद्धिक वितण्डा और वाद-पंथ के प्रचण्ड ताप में झुलसने लगीं। पर्यावरण के प्रदूषण ने पदार्थ और प्रकृति को ही दमघोंटू नहीं बनाया, वरन वाद और पंथ के पाथेय ने कहानियों का भी दम घुटाया। दाम और वाम तथा उत्तर और दक्षिण की पंथ-विभाजन रेखा ने कहानियों की कहानी को भी बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसी स्थिति में यदि कथा रचती साहित्य-वीरांगना डॉक्टर उषा सिन्हा की ‘क से कहानी’ की ‘अपनी बात’ से यह संगीत निकलता हो कि “ मेरी कहानियाँ किसी वाद के चक्कर में न फँसकर नदी की उन्मुक्त धारा की तरह राह के कंकड़-पत्थर, सीपियाँ और शंख समेटती चलती हैं। जहाँ थाह मिले, थोड़ी देर के लिए रुक जाती हैं और फिर चल पड़ती हैं – असीम सम्भावनाओं के साथ”। - तो निश्चय की निराशा के घटाटोप तिमिर में यह आशा की ‘उषा’ का उन्मेष है। उषा जी की इन बातों के प्रतीकार्थ में दम है कि असल में कहानियों को आज दुनिया की दब्बू क़िस्म की मध्यवर्गीय वनिता रचनाकारों की ही सख़्त ज़रूरत है जो समाज की विसंगतियों को खुद जीती हैं। वही अपनी नित-नित की ज़िन्दगी में इस समाज को पढ़ती हैं, लिखती है, फाड़ती हैं, फेंक देती हैं, बटोरती हैं, छाँटती हैं और फिर सहेजकर सहजता से अनायास-अनवरत कहानियाँ बुनती चली जाती हैं। इस बुनावट में चारों ओर फैले उनकी ज़िंदगी के हर बिम्ब कहानियों के पात्र बनकर पाठकों से बतियाते रहते हैं।

‘क से कहानी’ उषा जी की दस कहानियों का संग्रह है। उनकी ही बोली में आस-पास की ज़िंदगी से ही इतने कथा सूत्र मिल जाते हैं कि कहीं भटकने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। सामाजिक जीवन का उनका विशद अनुभव, नारी सुलभ सूक्ष्मदर्शिता, विलक्षण विश्लेषण क्षमता और उनका जन-सरोकार – ये सभी तत्व इन कहानियों में आद्योपांत पाठक के साथ-साथ चलते हैं। कहानियों के पात्र आम ज़िंदगी के किरदार हैं, जीवट से भरपूर हैं और उम्मीदों के प्रकाश-पथ पर गतिमान हैं।  

लेखन के क्षेत्र में डेगाडेगी देनेवाली महिलाओं के संरक्षण की आड़ में अपने निजी एजेंडा को साधने की गुप्त योजना को पोषित करने वाली साहित्यिक संस्था ‘साहित्य-मंजूषा’ की संस्थापक चन्द्रकान्ता जी आज के चलन को जस-का-तस प्रतिबिम्बित करती हैं – ‘हाथी के दाँत’ दिखाने के और, खाने के और! यह कहानी इतनी बड़ी सहजता से पाठकों के मन में उतर जाती है। लगता है कि रचनाकार स्वयं ऐसी किसी संस्था के प्रतिघात से उपजी पीड़ा की अपनी राम कहानी ही कथ रही हों। चलते-चलते बग़लगीर को रगड़ा मार जाने वाली उषा जी की कहन-शैली की मारक क्षमता अद्भुत है। लघु-कथा संगोष्ठी उन तमाम सद्विचारों का उद्घोष करती है जो संस्था के अपने आचरण के ठीक उलट है। कथा-वाचन में उच्चारण की तमाम अशुद्धियाँ श्रोताओं की तालियों की गूँज से होड़ ले रही हैं। संस्था में जाति अभी भी एक ऐसा सच है जिसे लोग सूँघकर पहचान लेते हैं, सरनेम से चाहे आप जितना भी ढक लें! लघुकथा का विचार-बिंदु है – पुरुष द्वारा स्त्री का शोषण। लेकिन ‘साहित्य- मंजूषा’ की अंदरूनी कहानी कुछ और ही बयान कर रही है। बाहर से कुछ और, अंदर से कुछ और। ऊपर से फ़िट-फाट, नीचे से मोकामा घाट! यहाँ तो स्त्री के द्वारा ही स्त्री शोषित है। चन्द्रकान्ता शोषक है और नीमा शोषित! संस्था के आचरण की यह दुविधा संकेत अर्थ में समूचे साहित्य-समाज का चरित्र है। ईमान की बात नहीं होती अब। अभिजात मुँह से निकली बात ही ईमान है। ‘क्यों रे, कितना खाता है? तेरा बाप कमा कर रख गया है क्या?’ मालकिन की इस बात पर कूड़ा बीनने वाला बच्चा खाने का पैकेट और पानी का बोतल पटक कर चला जाता है। उस लाचार बालक का यह विद्रोही स्वाभिमान नीमा को प्रतिरोध के एक नए तेवर के लिए हुलका जाता है। उषा जी की यह कहानी ‘हाथी के दाँत’ तथाकथित साहित्यिक संस्थाओं के चाल और चरित्र की सड़ान्ध के सफ़्फाक सच को सामने रखती है।

बिहार में पकडुआ बियाह अपने ज़माने का एक रोचक समाजशास्त्रीय सच है। ऐसे विवाहों में न केवल जाने-पहचाने परिजनों की साज़िश होती है, बल्कि कभी-कभी तो पकडुआ दूल्हा भी अपने को पकड़वाने की साज़िश में शामिल होता है। बढ़ते तिलक-दहेज की कुप्रथा के प्रतिकार बनकर ऐसी व्यवस्था उभरी जिसकी चपेट में वह क्षेत्र भी था जहाँ से कहानीकार का सरोकार है। ऐसे क्षेत्र की जन-प्रतिनिधि होने के नाते पकडुआ बियाह पर कहानीकार की समाजशास्त्रीय पकड़ अत्यन्त  प्रगाढ़ है। इसलिए उनकी कहानी ‘और वह चली गयी’ में इस प्रसंग का विवरण अत्यन्त संजीदा होना स्वाभाविक है। ‘एक ही जाति, एक ही धर्म, दोनों कुँवारे, दोनों जवान, अच्छी जोड़ी, फिर दिक्कत कहाँ?’ बहुतायत विवाहों पर यह बात खरी उतरती है। ‘मात्र पाँचवीं पास फूलमती दिल और दिमाग़ की बात करती है। सिनेमा देखकर बौरा गयी है। शहर की हवा ने मानुष के तन-मन को कलुषित कर दिया है’।– फूलमती की माई की यह कारुणिक चीत्कार सिनेमायी दुष्प्रभाव और शहरों के बदसूरत संस्कार पर व्यंग्यात्मक प्रहार है। उषा जी की सतर्क दृष्टि पुरुष की कमज़ोरी को बड़ी सबलता से सामने रखती है जब अमिरका फूलमती के साथ अपने बच्चों को यह कहकर त्याग देता है, ‘साँप और सँपोलियों सबको बाहर करो’। यहाँ कहानीकार प्रकारांतर में नारी के पवित्र और उदात्त मातृत्व रूप का दिग्दर्शन करा देती हैं। यही रूप तो नारी को देवी बना देता है।

अपनी घोर अवैज्ञानिकता के आवरण में भी ‘ब्रह्म-पिशाच’ कहानी एक वैज्ञानिक संदेश छोड़ जाती है। यह पशु-पक्षी को मारने के विरुद्ध पाठकों को चेता जाती है।

‘इच्छा-मुक्ति’ एक बेबस पत्नी के आत्म-समर्पण में ही अपनी मुक्ति पाने की करुण कसमसाहट है। आज के विवाहेत्तर सम्बन्धों को कहानी अपना विचार-केन्द्र बनाती है जो बिलकुल सामयिक है। किन्तु, कहानी का अधूरापन अवश्य पाठकों को खलता है। समस्या की तह की तलाश में कहानी पाठक को बीच रास्ते पर ही छोड़ जाती है और सोद्देश्यता के स्तर पर कथानक काफ़ी हल्का हो जाता है।

‘सुनयना’ मध्यवर्गीय पुरुष मानसिकता के नपुंसक तत्व की त्रासदी की करुण गाथा है। स्वतन्त्रता के उषा काल की यह कहानी यही सन्देश देती है कि महिलाओं के प्रति मर्दों की मन:स्थिति तब भी वही थी और आज भी वही। मतलब ढाक के तीन पात! लाखों लुभावने नारों के बावजूद बेटियों की वेदना की तीव्रता ज्यों-की-त्यों है। अब नारा तो यह होना चाहिए कि ‘बेटा पढ़ाओ, बेटी बचाओ!’ अपने पात्रों के चरित्र में रंग भरने की कला की उषा जी चतुर चित्रकार हैं। उनकी कूँची अपने पात्र की संवेदना के हर स्पेक्ट्रम  को पकड़ लेती है और अपने शब्द-चित्रों में उसे उतार लेती हैं। ‘श्रीधर की पत्नी रामरती ने देवरानी की लड़की को देखा तो आदतन पहले नाक-भौं सिकोड़ा … बड़ी बड़ी आँखों से ताई जी को ही देख रही थी … रामरती की आँखों में स्नेह उमड़ आया’। - ये पंक्तियाँ न केवल भारतीय संयुक्त परिवार के अंदरूनी मनोविज्ञान की पड़ताल करती प्रतीत होती हैं, प्रत्युत विश्वम्भर नाथ शर्मा कौशिक जी की कालजयी कहानी ‘ताई’ का स्मरण भी करा जाती है।

‘निरुपमा’ में सामाजिक आचरण की विकृतियों की घिनौनी गंदगी का बड़ी सफ़ाई से चित्रण हुआ है। 

बेटे और बेटी के प्रति समाज के दोहरे रवैए का भण्डा फोड़ने वाली उषा जी की कहानी ‘अब पछताए होत क्या – एक पिता की डायरी’ संवेदना का सरगम है। एक सजग पाठक की आँखों को यह कहानी नम तो करती है, साथ में एक अपराध भाव भी छोड़ जाती है कि रोपे पेड़ बाबुल का तो आम कहाँ से होय! ‘शायद हमारे समाज में बेटों की कामना ही इसलिए की जाती है कि अन्तिम संस्कार में वे बाप को कन्धा और मुखाग्नि देकर उनकी आत्मा को तृप्त करें’। - यथार्थ में तो पिता के अरमानों की चिता में ये बेटे जीते जी ही आग लगा देते हैं। अमृता के पिता की डायरी इसी सत्य का अभिलेख है।

इस बनावटी दुनिया की मायावी चकाचौंध और जीवन के नग्न यथार्थ के दो पाटों के बीच हीन-भाव की ग्रन्थि में फँसी वीथिका के सत्य से साक्षात्कार और आत्म-बोध की कहानी है – ‘अम्मा’। “उसे मम्मी नहीं अम्मा चाहिए, अपनी अम्मा। होश सम्भालने के बाद पहली बार वह अम्मा से सर्वांग लिपट पड़ी। टप-टप गिरते आँसूओं के समुद्र में डूबती उतराती रही। अम्मा का भीगा आँचल उसने कस कर पकड़ लिया। तुम हमें छोड़ कर कहीं मत जाना अम्मा। कभी मत जाना”। कहानी के अवसान बिंदु पर पाठक के मन-आँगन में वीथिका की यह आवाज़ गूँजती रह जाती है। 

यक़ीन कीजिए, ‘यह कहानी नहीं’ वाक़ई एक कहानी नहीं है। घोर भ्रष्टाचार, असभ्य और अशैक्षणिक   आचरण से परिपूर्ण आज के विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों का यह आँखों देखा हाल है। एक प्रोफ़ेसर की लेखनी से निकली यह कहानी न्याय-दर्शन के सभी प्रमाणों पर सौ फ़ीसदी खरी उतरती है। 

संग्रह की अंतिम कहानी ‘गुरुदीक्षा’ मनोवैज्ञानिक वेदना का विस्तृत वितान है। प्रकारांतर में ग़रीबी और  जातीय असमानता से जुड़ी हैसियत की सामाजिक अवधारणा पर यह एक व्यंग्यात्मक प्रहार भी है – “एक तो ग़रीब, दूसरे जाति का कुर्मी! चौरहा बटईया जोतना और व्याह-शादी में पत्तल उठाना उसके परिवार का पुश्तैनी पेशा था … पर ‘परसुआ’ को यह सब कहाँ पता था … उसे ऊँच-नीच कहाँ मालूम था।“ नीलांजना के पत्थर से परसुआ के माथे पर लगी चोट में पाठकों को वही मर्मांतक आर्त्तनाद सुनायी देता है जो जैनेंद्र जी की कहानी ‘खेल’ में मनोहर द्वारा घरौंदे के ढाह देने से सूरबाला के दिल को लगे आघात में। 

संग्रह की सारी कहानियों के अवयव आम जीवन की देखी सुनी है। सबकुछ स्वाभाविक, खरा और टटका! समाज के सच का चलचित्र है – ‘क’ से कहानी! कहानियों की धार बड़ी प्रखर है, कथानक बड़े संजीदे हैं, कहन का शिल्प बड़ी सुगठित है, शब्द-चित्र बड़े जीवंत हैं, घटनाएँ महज़ आख्यान नहीं बल्कि भोगे हुए अनुभव और देखे हुए सच हैं, बोली बड़ी सरल है और संदेश बड़े सीधे हैं। उषा जी, सच में, आम लोगों की बात आम भाषा में ही करती हैं।  यहाँ भी भाषा उतनी ही प्रांजल और वेगमयी है। बस, भाषा के मनोहर प्रवाह में कहीं-कहीं स्पर्श प्रकाशन के प्रूफ़ शोधन की कोताही और वर्तनी की अशुद्धियाँ अवश्य रोड़े अटकाती हैं। पुस्तक का आवरण संयोजन एवं मुद्रण आकर्षक है। एक मनोहर और पठनीय कहानियों के इस सुशीर्षक संग्रह ‘क’ से कहानी’ के लिए सर्वतोमुखी प्रतिभा एवं उपलब्धि सम्पन्न प्रख्यात साहित्यकार प्रोफ़ेसर (डॉक्टर) उषा सिन्हा जी को साधुवाद एवं आत्मीय बधाई!!!

Wednesday, 27 May 2026

अविरल श्याम



 

पुस्तक – अविरल स्याम ( एक विस्मृत क्रांतिकारी की कथा) (नाटक)
लेखक – डॉ. किशोर सिन्हा, प्रकाशक – नोशन प्रेस, चेन्नई 



नाटक सर्वदा से मेरे लिए जन-सरोकार का विषय रहे हैं। यह एक स्वतंत्र साहित्यिक विधा है, जिसके हृदय में लोक कल्याण और लोकरंजन दोनों भाव साथ-साथ धड़कते हैं। इसके मूल में सर्वकल्याणकारी लोक संदेश की अनुगूँज होती है जो श्रव्य तो होती ही है, साथ में दृश्य भी। नाटकों का चाक्षुष प्रभाव दीर्घजीवी  होता है। हमें सदा से नाटकों की भारतीय परंपरा पाश्चात्य परंपरा से ज़्यादा शास्त्रीय और सुसंगत लगी हैं। कारण, पश्चिमी दृष्टि जहाँ नाटकों को भौतिक आवश्यकता और उसकी पूर्ति के साधन दोनों रूप में आँकती है, वही भारतीय दृष्टि इसे जीवन के अंतरंग दर्शन की प्रस्तुति और पड़ताल दोनों रूपों में निहारती है। इसीलिए भारतीय दृष्टि इसके  रमणीक तत्व को रेखांकित करती है –
‘काव्येषु नाटकं रम्यम’।
 यह सनातन साहित्य का पंचम वेद है। भरत मुनि का भारतीय नाट्यशास्त्र नाटक को नृत (ताल/लय), नृत्य (भाषाश्रित) और नट (अभिनय) की त्रिवेणी के स्वरूप में प्रतिष्ठित करता है। यहाँ ऋग्वेद से पठनीयता, सामवेद से गेयता, यजुर्वेद से अभिनय और ऋग्वेद से श्रिंगार के भाव-तत्व की समग्रता को समाहित किया गया है। 
“त्रैलोकस्य अस्य सर्वस्य नाट्यं भाव अनुकीर्त्तनं”
ये भाव नाटककार, रंगमंच और दर्शक को एक भाव-धारा में बहा ले जाते हैं। रंगमंच मूल पात्र को साधारण रूप में प्रस्तुत कर दर्शक को उस पात्र की असाधारणता से जोड़ देता है और दर्शक स्वयं को उस पात्र की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति मान बैठता है। कुल मिलाकर, नाटक गद्य-विधा का दृश्य काव्य है जिससे दर्शकों में ललित आनंद और सात्विक परिष्कार का पारावार लहराता है। सोद्देश्यता इसकी आत्मा होती है।
किशोर सिन्हा जी की नाट्य कृति ‘अविराम श्याम’ एक विस्मृत क्रांतिकारी की कथा का पुनित पाठ है। यह न मात्र हमारी महान विरासत को सहेजता है, प्रत्युत पाठकों के उर को संवेदना के एक अविराम प्रवाह से तर करता है। हम बार-बार इस बात को दुहराते हैं कि वे पीढ़ियाँ बड़ी आभागी होती हैं, जिनकी कोई विरासत नहीं होती, जिनका कोई महान इतिहास नहीं होता! किंतु, उससे भी बड़-आभागी पीढ़ियाँ तो वे होती हैं जो अपने  गौरवमय अतीत को विस्मृत कर देती हैं। तवारीखें उन्हें कभी भी माफ़ नहीं करती और अपनी अस्मिता की तलाश में एक-न-एक दिन वे भटकने को बेबस हो जाती हैं। हमें याद है कि भीष्म साहनी की पुस्तक ‘तमस’ पर दूरदर्शन ने एक धारावाहिक बनाया था। उसके दृश्यपट पर आरंभ में ही एक पंक्ति उभरती थी, ‘ वे जो इतिहास को भूल जाते हैं, इसे दुहराने को अभिशप्त हैं ‘। किशोर जी की इस कृति में पीढ़ियों को उस अभिशाप से मुक्त कराने की छटपटाहट दिख रही है। विशेषकर अपने उदात्त संस्कारों की लीक से भटकी आज की तथाकथित जेन-जी पीढ़ी को अपने अतीत के आलोक से भविष्य के पथ को प्रकाशित कर आगे बढ़ने की दिशा में इस तरह की कृतियाँ मील का पत्थर होने की क्षमता रखती हैं।  
नाटक की दृश्य-व्यवस्था का श्री गणेश दिन के उन्मेष से होता है। दादा और पोते की बतकही के मीठेपन से कथ्य अपनी चित्रात्मकता के साथ उभरना शुरू होता है। दोनों की वेश-भूषा उनके पीढ़ीगत परिवेश और मूल्यों का गणवेश है – सत्तर साल के दद्दु कुर्ते-पैजामे में कंधे पर गमछा डाले और चौदह-पंद्रह साल का किशोर पोता, रमन अपने जींस, टी-शर्ट में कंधे पर एक बैग डाले और टी-शर्ट में चश्मा खोंसे! यही से नाटककार पाठकों को अपने पाश में बाँधता, अपनी गलबहियाँ में लेकर अपनी नाट्य-यात्रा की रोचकता में प्रवेश कर जाता है। दद्दु और रमन की बातचीत से इतिहास जगह-जगह झाँकता नज़र आता है। रेलगाड़ी से उतरकर बस की सवारी, फिर पैदल।  दादा-पोते धिपते घाम में ‘बिन्द’ गाँव पहुँचते है। यह महान स्वतंत्रता सेनानी, १९३७ से १९५२ तक बिहार असेम्बली के सदस्य और समाजसेवी श्याम नारायण सिंह का गाँव है। उनकी आदमकद प्रतिमा एक जर्जर से विद्यालय के पास खड़ी, मानो अपने ज़माने की गवाही दे रही है। इस स्कूल की सत्रह एकड़ ज़मीन श्याम बाबु की दान की हुई है। विद्यालय के भवन की जर्जर हालत अपनी विरासत के प्रति हमारी दृष्टि की दुर्दशा की जीती-जागती तस्वीर है। वहीं भेंटा जाते हैं प्रकाश बाबु - एक अवकाश प्राप्त डाक बाबु। श्याम बाबु के नाम पर जारी डाक टिकट को अपनी स्मृतियों में सहजते उनके मुख से फूट पड़ता है- ‘यह डाक टिकट एक चेहरे का नहीं था, एक विचार का था, एक आन्दोलन का था … ये डाक टिकट एक आदमी का नहीं एक युग का था …’।
नाटककार ने बड़ी कुशलता से इस नाटक में आद्योपांत करुणा की अजस्त्र धार बहायी है, जिसमें पाठक अनायास डूबते-उतराते रहता है। सही बात है, श्याम बाबु जैसे लोग इतिहास की किताबों के लिए नहीं जीते, वे लोगों के लिए जीते हैं। यह भी उतना ही सही है कि कभी-कभी इतिहास देर से आता है, पर ख़ाली हाथ नहीं आता! किशोर जी की इस कृति ने भी अपने पाठक-दर्शक को ख़ाली हाथ नहीं रहने दिया है।
फ़्लैश-बैक के साथ दृश्यान्तर होता है। श्याम बाबु की उपस्थिति के साथ नाटक आगे बढ़ता है। श्याम बाबु के पिता रामप्रसाद बाबु की यह ताक़ीद – ‘बेटा श्याम, ये जो मेरी ज़मींदारी है न, उसका अर्थ विलासिता नहीं, कर्त्तव्य है’ – आज के नवधनिक सियासतदानों के लिए एक कड़वी घूँट है। श्याम बाबु का उस ज़माने का दर्शन – ‘जिस देश की बेटियाँ शिक्षित नहीं, वह देश आज़ाद नहीं हो सकता’ आज के हिन्दुस्तान का भी उतना ही बड़ा सच है – ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’! बीच-बीच में सरल और सुबोध कोरस नाटक को सरस गति देते हैं। दिन के निकलने से शुरुआत होने वाली कहानी का अवसान प्रकाश के धीरे-धीरे बुझने … फिर सूर्यास्त दिखायी देने की प्रकाश-व्यवस्था से होना नाटककार की कल्पनाशीलता, रचनात्मकता और चित्रात्मकता के उत्कर्ष को प्रदर्शित करता है। इसी प्रकाश-व्यवस्था में दद्दु फ़्लैश-बैक से वापस रमन के पास लौटते हैं। प्रभाव इतना गहरा है कि पाठक और दर्शक अभी भी वहीं अपनी संवेदना के सरगम में अपने दृष्टि-बोध के पाश में झूलता खड़ा है। वह अपनी उस अविराम अवस्था को प्राप्त हो गया है, जो नाटककार की संवेदना ने उसके मन पर छाप दिया है। कहन का शिल्प भी अद्भुत है। दादाजी पोते को बताते हैं कि यह कहानी उन्हें उनके पिताजी अर्थात पोते के परदादा ने सुनायी थी। अपनी महान विरासत के मूल्यों और संस्कारों के संचरण की इस प्रक्रिया को अपनी कहानी के शिल्प में गढ़ने और नाटक के रूप में आज की पीढ़ी के समक्ष प्रस्तुत करने का यह महायज्ञ इस पूरी कृति को सोद्देश्यता के श्रिंगार से सुसज्जित करता है:
“हम मानवता के पहरेदार हैं  … 
हम जाग रहे हैं  … 
हम मानवता के पहरेदार हैं …
हम जाग रहे हैं …”
नाटक के संवाद अत्यन्त प्रभावशाली हैं। भरसक, कहीं-कहीं तो कालजयी हैं। बानगी देखिए – ‘धर्म अगर इंसानियत से बड़ा हुआ तो ईश्वर भी रोएगा’, ‘वोट नहीं, संकल्प दो’, ‘जहाँ शरीर क़ैद होता है, वहीं आत्मा का विस्तार होता है। इतिहास के सबसे उजले अध्याय अक्सर जेल की कोठरियों में लिखे जाते हैं’, ‘जब विचार हथियार बन जाए और जनता ढाल, तब इतिहास की दिशा बदलती है’, आज़ादी बाहर नहीं होती, भीतर होती है’, ‘समय बहुत कुछ छीन लेता है, पर कुछ नाम ऐसे होते हैं जो समय को ही बदल देते हैं’, ‘जो आज पीछे हटा, समझो वह पीढ़ियों तक झुका रहेगा’, ‘क्रान्ति केवल टकराव नहीं, साहचर्य भी है। जहाँ विचार मिलते हैं, वहाँ इतिहास की रगों में रक्त तेज़ी से बहने लगता है’, तुम्हारे साहस में करुणा भी है’, और अंत में संवेदना का गढ़ियापन शब्दों में उतरता देखिए, ‘आज कोई माँ हिन्दू नहीं, कोई माँ मुसलमान नहीं, सबकी कोख डर से थर-थर काँप रही है, बाबू!’ 
किशोर जी साहित्यकार हैं, लेखक हैं, नाटककार हैं, अभिनेता हैं, नाट्य निर्देशक हैं, कवि हैं, मीडिया-मैन हैं, संगीतकार हैं और फ़िल्मकार हैं। ज़ाहिर है, जब वह कुछ रचते हैं, उनके व्यक्तित्व में बसते ये सारे किरदार एक साथ मिलकर उन्हें अपना आवेग देने लगते हैं। स्वाभाविक है कि पाठक-दर्शक का सहज संबंध उनके पात्रों के अंतर्मन से जुड़ जाता है। नाटककार की कल्पनाजीविता नाटक के चरित्र में भाव, विचार, संवेदना और अनुभूतियों के बीज छींटते हैं जो समकालीन परिदृश्य को पूरी तरह सहेज लेता है। चरित्र गतिशील हैं और संघर्षशील भी। भाषा सहज है, संप्रेषणीय है, भावनुरूप है, पत्रानुकूल है, चित्रात्मक है और गतिशील है। यह पाठक के अंतर्मन में पात्र की जीवन्त छवि को खड़ा कर देती है। गठा शिल्प और अनूठी संवाद शैली नाटक के प्राण हैं। संवादों में कसाव है, तारतम्यता है और साथ ही पात्र और परिवेश की स्पष्टता है।
शीर्षक, ‘अविराम श्याम’ में रोचकता का तत्व है और एक चुंबकीय आकर्षण है जो पाठकों के मन को बाँधता है। कहने को है तो नाटक लेकिन कृत्रिम नाटकीयता से कोसों दूर। सब कुछ खाँटी स्वाभाविक, सहज, सरल और अविराम!  ‘अविराम श्याम’!
बधाई किशोर जी, अविराम श्याम के लिए!
 ----- विश्वमोहन 

Friday, 15 May 2026

सीखना


 

मैने कहा,

मुझे लिखना सिखा दो।

उसने कहा,

पहले सीखना सिखो।

मैने कहा,

वही सिखा दो।

...

...

मुझे लिखना आ गया।

सीखना अभी भी सीख रहा हूँ।

Thursday, 30 April 2026

आये हो, तो जाओगे।

है विदित जो जीव का,

प्रारब्ध और गंतव्य यही।

हर मिलन के बीज में  है,

विरह का भवितव्य ही।


न रहा अपवाद कोई,

द्युलोक, अंतरिक्ष, पृथ्वी।

समय चक्र सब नाचते,

ग्रह गोचर और रवि।


आये हो, तो जाओगे।

फिर सोचते हो क्या?कवि!

सर्वं खलु ईदम ब्रह्म,

हो आहूत बन हवि।



Monday, 16 March 2026

जहाँ ना संशय, ना कोई डर!

 



हो किरणों पर न कोई पहरा,
चिड़ियों की चहक चिरंतन हो।
तर तुषार तृण फुनगी फुदके,
चेतन का स्वर- स्पंदन हो।

तरु  हरित पत्र गोल-गोल,
झूमें गायें डोल-डोल।
टहनी से डंठल लिपट-लिपट,
खुसुर-फुसूर फिर बोल-बोल।

कौओं की पंचायत से,
फदगुदियाँ ले रहीं होड़।
अपना हुक़ूक़ हैं जता रहीं,
गिलहरियाँ माटी कोड़-कोड़।

सन्नाटे का सुर सरोवर,
शकल दिल-सी रंगी नील।
जलतरंग में छाया नर्तन,
गोद गिरि गदरायी झील।

सभी स्वच्छंद हैं, सभी मुक्त हैं,
कण-कण चिन्मय अजर अमर।
हे पवन प्राण, सुन, ठहर यहीं,
जहाँ ना संशय, ना कोई  डर!