Thursday, 13 October 2016

एकोअहं,द्वितीयोनास्ति

   
       (१)
ऊँघता आसमान,
टुकुर टुकुर ताकता चाँद।
तनहा मन,मौन पवन।
सहमे पत्ते,सोयी रात।
सुबकता दिल।
आँखे,उदास झील।
उस पर पसरती
अवसाद की
स्याह परत।
और!
एकांत को तलाशता
मेरा अकेला
अकेलापन।

       (२)
आया अकेला,
चला अकेला,
चल भी रहा हूँ
अकेला,और अब
जाने की भी तैयारी!
अकेले।
पर न कभी एकांत हुआ,
न तुम मिले।
न जाने,
कितनी ज़िन्दगियाँ
पार करके,
ढूंढता एकांत
पहुँचा हूँ यहाँ।


        (३)
पथ अनवरत है ये!
मिलूंगा,जब कभी तुमसे।
तो, एकांत में ही!
तसल्ली से लिखूंगा
तभी, मुक्ति का गीत।
पूरी होगी साध
तब जा के,
मिलने की तुमसे,
 मेरे मीत।
धुल जाती,धूल स्मृति की।
सरकने में बार बार,
भ्रूण के एक कोख से
दूसरे गर्भ के बीच।


           (४)
आह्लादित,मर्माहत
माया की कुटिया में
ज़िन्दगी की कथा
बांचते बाँचते,
फिर! सो जाता हूँ।
अकेले।
भटकने को
योनि दर योनि,
अकेले।
एकांत की तलाश में।
आज
ज़मीन पर लेटा,
आसमान को निहारता।


         (५)
टिमटिमाते तारों में,
अकेलेपन को उकेरता।
उदासियों की आकाशगंगा
सुगबुगाया फिर ,
मेरा अकेलापन।
और, मचल उठा है
मन।
पाने को एकांत!
नींद के जाते ही
हो गयी हैं अकेली
आँखे।
परंतु, मन की मन्नत है,
नितांत एकांत!


       (६)
मन को एकांत आते ही
बन जायेगी मेरी आत्मा
परमात्मा!
पंचमात्रिक इंद्रियों
से भारित पंचभूत,
होगा मुक्त।
योनियों के झंझट से।
फिर, हम दोनों
होंगे एक ,
और गूंजे ब्रह्माण्ड
समवेत प्रशस्ति
एकोअहं
द्वितीयोनास्ति!