Saturday, 5 January 2019

बड़े घर की बेटी ( लघु कथा )


सरकारी नोकरी लगते ही बड़े बड़े घरों की बेटियों के रिश्ते आने लगे. और एक दिन एक बड़े घर की बेटी इस सरकारी बाबू की बहू बनकर आ भी गयी. आते ही बहू ने अपनी सतरंगी आभा का विस्तार किया. नौकर, चाकर, मुवक्किल, मुलाजिम, ठेकेदार, देनदार, अमले, फैले, भूमि, जनसंख्या, सरकार, सब साहब के, लेकिन संप्रभुता बहू की और सबकी आज्ञाकारिता का भाव बहू के प्रति समर्पित. अरमान और फरमान दोनों बहू के. साहब तो इस व्यवस्था के 'श्री कंठ' मात्र थे जिससे मेमसाहब के स्वर निःसृत होते थे. सारा कंट्रोल बड़े घर की इस बेटी के हाथ में ही था. दिन पर दिन घर की इकॉनमी और मेम साहब का शारीरिक शौष्ठव शेयर मार्किट की तरह उछाल पर आने लगा था.
दुर्भाग्य ने अचानक साहब के शरीर में सेंध लगा दी. उनके किडनी ख़राब हो गए. बदलने की नौबत आ गयी. सत्रह लाख रुपये की दरकार थी. साहब ने चारों तरफ नज़रें घुमा लिए, एड़ी चोटी एक कर दी, हाथ पाँव मार लिए, सबसे चिरौरी कर ली. कहीं दाल न गली. हाथ पाँव फूलने लगे. कहाँ से जुगाड़े इतनी रकम. सात लाख तक ही जुटा पाए थे. भाई लाल बिहारी ने दिलासा दी. उसने खेत बेचे. मंगेतर के गहने गिरवी रखे और किसी तरह भीड़ा ली जुगत अतिरिक्त दस लाख रुपयों का. ऑपरेशन सफल रहा. साहब की जान बच गयी.
सरकार ने अचानक बिजली गिरा दी. नोटबंदी की घोषणा हो गयी. अफरा तफरी मच गयी जमाखोरों में. मेमसाहब ने भी सत्रह लाख रुपये मजबूरी में साहब के हाथों में धर दिए. साहब ने पथराई आँखों से कागज़ के उन टुकड़ों को बिखेर दिया.
आज कचहरी की दहलीज़ से हाथों में तलाक़ का अदालती फरमान लिए साहब सामने घंटा घर की बंद घड़ियों की सुइयां निहार रहे थे और उन सुइयों पर प्रेमचन्द की 'बड़े घर की बेटी' लटकी हुई थी.  


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