Monday, 3 August 2020

वैदिक वाङ्गमय और इतिहास बोध ----- (१)





यह एक प्रचलित लोकोक्ति है कि ‘साहित्य समाज का दर्पण है’। अर्थात,  कोई भी साहित्य अपने समाज के प्रतिबिम्ब को हमारे सामने रखता है। साहित्यकार जिस समाज में जीता है, उसी की मिट्टी से अपनी रचना की उर्वरा शक्ति को प्राप्त करता है । उसी समाज के वे समस्त उपादान जो रचनाकार के रचनात्मक वातवारण  का निर्माण करते हैं, रिस-रिस कर उसकी रचनाओं की सृजन-धारा बन बहते हैं। उसकी रचनाओं में समाज की समकालीन हलचल के शोर सुनायी देते हैं। समाज की संरचना, समाज का अर्थशास्त्र, समाज की राजनीति, समाज का संस्कार, समाज की सभ्यता, मौसम, आबोहवा, नदी-नाला, जंगल-पहाड़, बोली-चाली, प्रेम-मुहब्बत, मार-पीट, गाली-गलौज, खेल-कूद, नाच-गान, शादी-बियाह, रहन-सहन, खेती-बाड़ी, खान-पान, गहना-गुरिया, चिरई-चिरगुन, माल-जाल,  कपड़ा-लत्ता, पूजा-पाठ, रीति-कुरीति, दर्शन-आध्यात्म, चिंतन-शैली, संस्कृति सब की छाप उस युग में उस समाज की धरती पर रचे जाने वाले  साहित्य पर स्पष्ट रूप से पड़ती है। अतः किसी  काल के समाज को भली-भाँति समझने में  हमें उस काल में रचित उस समाज के साहित्य से बहुत सहायता मिलती है। 
              इतिहास में तो ऐसे साहित्य, उत्कीर्ण आलेख, खुदाई में मिले अभिलेख आदि का अत्यंत महत्व रहा है।  बुद्ध काल या मौर्यकाल में मिले आलेख हमें उस काल के बारे में बहुत कुछ समझा जाते हैं। सच कहें तो विशेष रूप से हमारे देश भारतवर्ष में हमारे पूर्वज अपने द्वारा रचित साहित्य में ही हमें इतिहास, भूगोल, विज्ञान, आद्यात्म, दर्शन, ज्ञान सब कुछ समझा गए। बीच-बीच में बाहर से आए यात्री भले अपने संस्मरणों में कुछ इतिहास की झलकी अलग से छोड़ गए हों तो अलग बात है। हमारे पूर्वजों के द्वारा दी गयी  साहित्य की अपार थाती  हमारे पास श्रुति, स्मृति, वेद, उपनिषद, सूत्र-ग्रंथ, ब्राह्मण, अरण्यक, रामायण, महाभारत, पुराण, त्रिपिटक, बौद्ध और जैन ग्रंथ, संस्कृत  नाटक आदि के रूप में हमारे पास संग्रहित हैं। इतिहास ही इस बात का भी गवाह है  कि पुस्तकों  के  एक विशाल भंडार को नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में शैतान आततायियों ने आग लगाकर स्वाहा कर दिया। कहते हैं कि पुस्तकों का इतना विशाल भंडार था कि तीन महीनों तक पुस्तकें जलती रहीं।
           ऋग्वेद हमारे देश ही नहीं अपितु समूचे विश्व साहित्य की सबसे प्राचीन कृतियों में एक है और अपने अंदर पुरातनकाल के महान इतिहास को समाहित किए हुए है। समस्त वैदिक साहित्य के अध्ययन से न केवल मानव-सभ्यता एवं संस्कृति के विकास की कथा-धारा के प्रवाह की दशा और दिशा का ज्ञान मिलता है, बल्कि समकालीन भूगोल और इतिहास के आपसी ताने-बाने का भी एक सम्यक् चित्र मिलता है। ऋग्वेद की रचना  के काल के निर्धारण में  जब तक विज्ञान ने अपनी सहायता  उपलब्ध नहीं करायी तबतक इतिहासकार अपनी अटकलबाजियों के घटाटोप अंधकार में भटकते रहे।
             पश्चिमी विद्वानों ने भारत पर बाहर से आर्यों के आक्रमण, अतिक्रमण और भारत में उनके बसने की घटना से ऋग्वेद की रचना को जोड़ा। भारत के देशी इतिहासकारों में दुर्भाग्य से वस्तुनिष्ठ शोध और अनुसंधान की उन्नत परम्परा का विकास अपेक्षित स्तर तक नहीं हो पाया। परिणामतः उन्हें पश्चिमी इतिहासकारों पर ही प्रारम्भ में ज़्यादा निर्भर रहना पड़ा। आगे चलकर इतिहासकारों में भी दक्षिणपंथी और वामपंथी दो खेमे बन गए और दोनों खेमें वैज्ञानिक शोध की परम्परा से भटककर अपनी राजनीति के फेर में ज़्यादा पड़  गए। इससे हमारी पीढ़ियाँ अपने इतिहास के सही स्वरूप को समझने में पिछड़ गयी।  किंतु, सौभाग्य से सूचना-क्रांति की नयी पीढ़ी के हाथ में वैज्ञानिक सोच का एक अमोध शस्त्र है और उसने अपने शास्त्रों की पड़ताल एक तर्कसंगत दृष्टिकोण से नए सिरे से शुरू कर दी  है।
          हम पहले थोड़ा इतिहास को उकटेंगे। फिर सभी पाठकों के साथ मिलकर इस पर एक तर्कसंगत और वैज्ञानिक दृष्टि डालने की कोशिश करेंगे कि  किस तरह हमारा वैदिक साहित्य हममें एक इतिहासबोध जगाता है।  ईस्ट इंडिया कम्पनी का शासन देश में हो गया था। १७८४ का ज़माना था। विलियम जोंस कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनकर आए थे। वारेन हेस्टिंग्स  'गवर्नर-जनरल ऑफ़ बंगाल' (१८३३ के चार्टर-ऐक्ट तक इस पद का यहीं नाम था) थे। दोनों ने मिलकर कलकत्ता में ‘बंगाल एशियाटिक सॉसायटी’ की स्थापना की। गवर्नर-जनरल  साहब संरक्षक और जज साहब अध्यक्ष बने। सॉसायटी का उद्देश्य भारतीय समाज, संस्कृति और यहाँ के धर्म का सम्यक् अध्ययन कर एक ओर अपने क़ानूनों में उनकी अपेक्षाओं का समावेश करना था तो दूसरी ओर अपनी शासकीय नीति-निर्धारण  में भी उन तत्वों से समुचित फ़ायदा उठाना था। 
         विलियम जोंस  ने संस्कृत भाषा और भारतीय ग्रंथों का विशद अध्ययन किया। वह सोसायटी के वार्षिक समारोह में हर साल अपना अध्यक्षीय भाषण देते थे और उसमें सोसायटी द्वारा किए गए शोध कार्यों पर प्रकाश डालते थे। १७८६ के भाषण में उन्होंने भाषा-विज्ञान  के बारे में अपने एक सिद्धांत का ख़ुलासा किया, जिसे ‘प्रोटो-लैंग्वेज थ्योरी’ कहा जाता है। इसमें उन्होंने भाषाओं की उत्पति, परिवार और पारस्परिक सम्बन्धों का बड़ी गहरायी से विश्लेषण किया। अपने गहन अनुसंधान के बाद उन्होंने ग्रीक, लैटिन, गोथिक और अन्य यूरोपीय भाषाओं के परिवार का ही संस्कृत  को भी एक सदस्य बताया और इस बात की ओर इशारा किया कि संस्कृत भारत में जन्मी भाषा नहीं है। १७९३ में उनका अंतिम अध्यक्षीय भाषण हुआ और महज़ ४८ साल की उम्र में उनकी  १७९४ में मृत्यु हो गयी। अपने दस वर्षों के भारत प्रवास  के दौरान विलियम जोंस ने भारतीय धर्म ग्रंथों यथा वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, आरण्यक, पुराण सभी का संग्रह कर लिया था और उनका पूरा शोधपरक  अध्ययन भी  किया। इन ग्रंथों के अंग्रेज़ी अनुवाद की भी पहल उन्होंने  की।
              आगे चलकर  १८३० में अपने भारत विरोधी रवैए के लिए मशहूर मेकौले साहब गवर्नर-जनरल की कौंसिल में 'लॉ-मेंबर'  बनकर आए। उनका कार्यक्रम भारत की शिक्षा और संस्कृति को पूरी तरह ध्वस्त कर इस देश का पूर्ण ईसाईकरण करना था। यह कोई आरोप-प्रत्यारोप की बात नहीं है क्योंकि इस बात का उद्घाटन स्वयं उन्होंने ही अपने पत्रों में किया है। उन्हें वेद की महिमा और इसके प्रभाव का आभास था। इसलिए फ़ौरी तौर पर इससे वह जल्दी कोई छेड़छाड़ करना नहीं चाहते थे। वह अंग्रेज़ी माध्यम और अपनी  शिक्षा नीति के क्रूर दंशों द्वारा इसे धीरे-धीरे डसना चाहते थे। वह वेद का अनुवाद अपनी योजना के आलोक  में चाहते थे। लेकिन अपना  यह मिशन पूरा होने के पहले ही  वह विलायत लौट गए। 
             उनकी आस अभी भी  बुझी नहीं थी। उन्होंने ईस्ट इंडिया  कम्पनी से अपने इस मिशन के लिए कुछ पैसे जुगाड़े और आक्स्फोर्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्रोफ़ेसर हॉरिस विल्सन से सम्पर्क साधा। उन्होंने आग्रह किया कि यदि प्रोफ़ेसर विल्सन  जैसा स्थापित विद्वान इस विषय पर उनके विचारों को लिखेगा तो उसे स्वीकृति और वैधता मिलेगी। उनका विचार था कि  वेदों के बारे में ऐसा कुछ चित्रित किया जाय कि यह खानाबदोश, बर्बर और जंगली जनजातियों द्वारा  लिखा गया एक पूजा-पाठ या ढोंग-प्रपंच  के मिथक-गल्प से बढ़कर कुछ ख़ास ज़्यादा नहीं है। प्रोफ़ेसर विल्सन ने इससे कन्नी काटते हुए यह कह दिया कि अगले ही सत्र में वह सेवा-निवृत होने वाले हैं। उन्होंने अपनी बला टालने के लिए अपने विभाग के एक नए तेजस्वी और युवा सदस्य का नाम आगे बढ़ा  दिया। इस युवा प्रोफ़ेसर का नाम  ‘मैक्स मूलर’ था, जो मेकौले के लिए  वेद की महिमा से ‘मोक्ष’ और ईसायीयत के बीजारोपण  का  ‘मूल’ था।
               अब थोड़ा मैक्स  मूलर के बारे में जान लें। मैक्स मूलर जर्मन मूल के एक कट्टरवादी ईसाई थे। वह जाने माने भाषविद और संस्कृत भाषा के प्रकांड अध्येता थे। भाषा-शास्त्र  को वह ‘भौतिक विज्ञान’ मानते थे। संस्कृत जाने बिना भाषा-शास्त्र का अध्ययन करना उनकी निगाह में गणित जाने बग़ैर ज्योतिष शास्त्र के अखाड़े में प्रवेश पाने के समान था। जब १८७७ में थौमस अल्वा एडिसन ने ग्रामोफ़ोन का आविष्कार किया तो उन्होंने मैक्स मूलर से आग्रह किया कि  इसमें रेकर्ड  करने के लिए कुछ विशेष शब्दों का चयन करें जो इस मौक़े को एक ख़ास गरिमा प्रदान कर सके। मूलर ने जो सबसे पहले शब्द रेकर्ड किए वे ऋग्वेद के प्रथम सूक्त के आरंभिक  मंत्र थे, “ॐ अग्निम इले पुरोहितम”।
                                                                                                                ……क्रमशः……..

36 comments:

  1. लाजवाब। जारी रखें। अगाली कड़ी का इन्तजार रहेगा। ज्ञानवर्धक।



























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    1. जी, बहुत आभार। बस आप जैसे गंभीर पाठकों का साथ मिला तो हम इस श्रृंखला को लेकर काफी आगे तक साथ-साथ चल सकते हैं। आशीष बनाये रखें।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (04-08-2020) को   "अयोध्या जा पायेंगे तो श्रीरामचरितमानस का पाठ करें"  (चर्चा अंक-3783)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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    1. जी, बहुत आभार। श्रावण पूर्णिमा को प्रारंभ होने वाली इस लेख श्रृंखला के धारावाहिक अब प्रत्येक शुक्रवार को प्रस्तुत होंगे। आशा है गंभीर पाठकों की आलोचनाओं की अग्नि परीक्षा से इस लेख को गुजरने का अवसर मिलेगा।

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  3. बेहद शानदार, अगली कड़ी का इंतजार रहेगा ...

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    1. जी, आभार। हर कड़ी में शुक्रवार की सुबह आपसे मिलेंगे आपकी आलोचना के दो शब्द सुनने।

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  4. आदरणीय विश्वमोहन जी, सर्वप्रथम एक उद्देश्यपूर्ण लेख श्रृंखला के श्री गणेश के लिए आपको हार्दिक शुभकामनाएं|सच में इतिहासबोध बहुत जरूरी है | आने वाली पीढ़ियों को अपने इतिहास की जानकारी होना बहुत जरूरी है , ताकि वे अपने गौरवशाली इतिहास से परिचित हो सकें |विज्ञानं और तकनीक में खोयी पीढी को अपनी संस्कृति और वैदिक संस्कार से जोड़ने के लिए , उन्हें इसके लिए प्रेरित करना जरूरी है | बहुत ज्ञानवर्धक तथ्यों से अवगत कराया आपने | अग्रेजी शासन काल में वैदिक साहित्य पर शोध को बढ़ावा तो मिला पर अंग्रेजों ने इसे अपने रंग में रंगने की कोशिश शायद इसलिए की , क्योंकि उस समय भारतीय समाज में अशिक्षा , गरीबी इत्यादि व्याप्त थे जिससे बहुत कम लोगों का ध्यान ही इस तरफ जाता होगा | और यदि अपनी ही विरासत को कोई सहेजने में असमर्थ हो, उसे कुत्सित मानसिकता वाला कोई भी व्यक्ति बदरंग कर सकता है |
    संयोग ही है कि पिछले दिनों मैंने गायत्री परिवार के प्रणेता आदरणीय श्रीराम शर्मा जी द्वारा अनुदित ऋग्वेद- संहिता के कुछ अंश पढ़े , जिनमें से कुछ महत्वपूर्ण बातें यहाँ लिखना जरूरी समझती हूँ --वे इसकी भूमिका में लिखते हैं ---
    विदेशी संस्कृति के विद्वानों में वेदों के प्रति जिज्ञासा तो थी , पर ऋषि -प्रज्ञा के अभाव में वैदिक रूपकों को उन्होंने अपनी विश्लेषणात्मक बुद्धि के सहारे पढने व प्रतिपादित करने की कोशिश की |वे भाषा के साथ न्याय नहीं कर पाए | यही कारण है कि उन्होंने वेदों को '' एक आदिम , जंगली और अत्यधिक बर्बर समाज की स्त्रोत सहिंता '' नाम दिया और यहाँ तक कह डाला कि वेद मात्र '' गडरियों के गीत '' हैं |जो अनगढ़ नैतिक व पुरातन धार्मिक विचारों से भरे हुए हैं |
    इसके साथ ज्ञातव्य है , कि रास्ते में चलते हुए जब माननीय राजा राजामोहन्रराय जी को उपनिषदों का एक फटा पन्ना मिला तो उन्हें औपनिषदिक , वैदिक साहित्य पर पढ्न , मनन और शोध की प्रेरणा मिली | उन्होंने ब्रह्म समाज द्वारा बंगाल में -- तो दयानन्द सरस्वती जी ने आर्य समाज के द्वारा वैदिक संहिताओं के अध्ययन और अध्यापन की प्रेरणा जनमानस में जगाई और यजुर्वेद और ऋग्वेद के कुछ सूक्तों पर मौलिक संस्कृत भाष्य प्रकाशित किये |
    आपके अगले लेख की प्रतीक्षा रहेगी | आपके ज्ञानवर्धक लेख के माध्यम से मुझे भी अपनी बात कहने का अवसर मिला जिसके लिए हार्दिक आभार | सादर -

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    1. जी, बहुत आभार आपकी इस सार्थक और प्रेरक टिप्पणी का।सही कहा आपने कि हमारे अंदर अपने इतिहास को जानने और समझने की चेतना होनी चाहिए। आपकी ये बहुमूल्य प्रतिक्रिया हमारी इस शृंखला-यात्रा में अत्यंत प्रेरक रहेंगी।

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  5. चिन्तनपरक लेख । आगे की कड़ियों की प्रतीक्षा रहेगी ।

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    1. जी, बहुत आभार आपके अवलोकन का!

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  6. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 5 अगस्त 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  7. सर इस के लिए में आप को एक लिंक शेयर करूंगा आप चाह तो मेरे फेसबुक प्रोफाइल में रमेश तिवारी जी है जिन्होंने सनातन धर्म का अभूतपूर्व विश्लेषण किया हे अवश्य विजिट करे आप को आंनद आयेगा
    अन्यथा ना लेे

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    1. बहुत आभार हृदयतल से। लिंक भेजिये।

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  8. https://www.facebook.com/100005669621218/posts/1390701761128798/?flite=scwspnss&extid=ya1gPn9zeJ5q7pi4

    आप इन की बुक्स भी पड़ सकते और चाहे तो इन के फेसबुक वॉल पर भी ...

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  9. आदरणीय सर,
    बहुत ही सुंदर और ज्ञानवर्धक लेख। ओढ़ जर बहुत सी नई जानकारियां मिलीं और आनंद भी आया। मुझे इसकी अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी। साढ़ ही साथ मेरे ब्लॉग पर जब हनुमान जी स्वयं बोले और क्षमायाचना पर अपनी प्रेरक प्रतिक्रिया देने के लिये हृदय से आभार। कृपया आते रहें।

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    1. आभार। आप भी लिखते रहिये। शुभकामना!

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  10. इतिहासकार,
    का ‘मानस’ अथवा उसकीषड्यन्त्रकारी दृष्टि तथ्यों की व्याख्या अपने
    अनुरूप कर इतिहास का स्वरूप बदल सकती है। कई बार ऐसा जान-बूझकर
    किया जाता है तो कभी-कभी ऐसा अनजाने में इतिहासकार के मानस के
    अनुसार होता है। इस बात को और स्पष्ट रूप से समझाने के लिए एक प्रसंग
    का उल्लेख प्रासंगिक होगा। ज्योतिष शास्त्र पर चर्चा के दौरान एक बार श्री
    अजय ओझा ने कहा कि ज्योतिष की गणनाओं का निष्कर्ष ज्योतिषी के
    सोच, उसकी समझ अथवा उसकी दृष्टि पर निर्भर करता है। जैसे कि एक
    बार ब्रह्मा ने अपने दो शिष्यों बृहस्पति और शुक्र को दर्शन एवं ज्योतिष का
    ज्ञान कराने के बाद व्यावहारिक प्रशिक्षण हेतु एक गाँव में भेजा। दोनों गाँव
    में घूमते-घूमते एक बुढ़िया के दरवाजे पर रुके। बुढ़िया का बेटा ज्ञानार्थ काशी
    गया हुआ था। बुढ़िया यह जानना चाहती थी कि उसका बेटा घर कब लौटेगा।
    दोनों ऋषियों को देखकर बुढ़िया ने अपना प्रश्न किया और ऋषिद्वय को पानी
    पिलाने हेतु कुएँ से जल निकालने लगी। जल निकालते समय रस्सी टूट गयी
    और जल-पात्र कुएँ के पानी में जा गिरा। इस घटना के साक्षी बृहस्पति ने कहा
    कि- तुम्हारा बेटा अब इस लोक में नहीं है जबकि शुक्र ने कहा कि तुम्हारा
    पुत्र ढाई घड़ी में तुम्हारे पास आ रहा है। दोनों का निष्कर्ष रस्सी के टूट जाने
    पर ही आधारित था। बृहस्पति का कहना था कि रस्सी टूट गयी अतः तुमसे
    तुम्हारे बेटे का सम्बन्ध टूट चुका है जबकि शुक्र कह रहे थे कि जल से
    उसका हिस्सा दूर खींचा जा रहा था किन्तु अलग हुआ जल रस्सी टूट जाने
    से अपने उद्गम में तुरन्त जा मिला। तथ्य एक ही है निष्कर्ष दो हैं। यद्यपि कि
    इस दो निष्कर्ष मेंषड्यन्त्र नहीं है। ऐसे ही इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग
    ऐसा है जो नासमझी में अथवा दशकों से बनाये गये विकृत इतिहास के साँचे
    से भ्रमित अनजाने मेंषड्यन्त्रकारी इतिहासकारों के गिरोह का समर्थक हो जा
    रहा है।.....विश्वमोहन जी..बहुत जानकारीपूर्ण लेख।आगे की कड़ियों की प्रतीक्षा रहेगी ।

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    1. वाह! बहुत सुंदर दृष्टांत से समझाया आपने। बहुत आभार।

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  11. It was me do not know why my name did not appear
    Himanshu Saran

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    1. I think your google account will solve this problem.

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    2. बधाई, अब आप 'बेनामी' नहीं रहे।😀🌹🙏🏻

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  12. शानदार है आज कई दिनों बाद कुछ ऐसा मिला जिसको काफी रुचि से पढ़ा । आगे का इंतजार रहेगा।

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    1. जी, बहुत आभार। आगे भी आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।

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  13. व्यस्तता के कारण मैं आपके इस अति विशिष्ट लेख पर काफी विलम्ब से पहुंची इसके लिए क्षमा चाहती हूँ। वैसे भी मेरे लिए आपका लेख सिर्फ पढ़ने भर का विषय नहीं होता है,आपका शोधपरक लेख ज्ञान का बहुमूल्य पिटारा होता है इसलिए उसे फुरसत में पढ़कर कुछ समझने, सिखने और आत्मसात करने का विषय है मेरे लिए। बहुत ही सुंदर और ज्ञानवर्धक श्रृंखला की शुरुआत की है आपने भावी पीढ़ी को इससे बहुत लाभ मिलने वाला है।
    " मैंने गायत्री परिवार के प्रणेता आदरणीय श्रीराम शर्मा जी द्वारा अनुदित ऋग्वेद- संहिता के कुछ अंश पढ़े , जिनमें से कुछ महत्वपूर्ण बातें यहाँ लिखना जरूरी समझती हूँ --वे इसकी भूमिका में लिखते हैं ---"
    सखी रेनू ने जिनका जिक्र किया है मैं उसी गायत्री परिवार की सदस्य हूँ,जब होश भी नहीं था तब से जुडी हूँ इस परिवार से.मेरे गुरुदेव ३५००० से ज्यादा पुस्तक लिखे है हम सब उनकी छोटी- छोटी पुस्तकों को पढ़ते हुए बड़े हुए हैं।
    आपको इस शोधपरक लेख के लिए हार्दिक शुभकामनाएं ,सादर नमस्कार

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    1. बहुत आभार हमारे लेखों को ध्यान से पढ़ने और हमारा हौसला बढ़ाने के लिए। आशा है आप जैसे प्रबुद्ध और गम्भीर पाठक 'वाह-वाह गिरोह' से अलग हटकर लेख-शृंखला में एक स्वस्थ विमर्श की परम्परा को पुष्ट करेंगे और इसे एक सार्थक परिणती की ओर ले जाएँगे। आभार हृदयतल से!

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  14. सुन्दर जानकारी, साधुवाद

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    1. जी, बहुत आभार आपके आशीष का और इस लेख पर दृष्टि डालने का।

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  15. बढ़िया जानकारी युक्त लेख के लिए आभार !
    अफ़सोस आजकल इतिहास के बारे में भ्रामक जानकारी अधिक उपलब्ध है और तथ्यों का अभाव है !
    आशा है आपकी लेखनी प्रकाश देती रहेगी !
    हँसते रहें हंसाते रहें !

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    1. जी, बहुत आभार इस लेख पर आपकी गम्भीर दृष्टि की!

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  16. राजीव नयन मिश्र, कंपनी सचिव, दूरदर्शन पटना19 September 2020 at 07:00

    बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख। अभियंता, साहित्यकार और इतिहासकार.....अर्थात 3 विधाओं को एक कूची में पिरोकर कागज पर चित्रित करना कोई साधारण काम नहीं है। आपकी इस विधा को मेरा दिल से नमस्कार।

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    1. जी, अत्यंत आभार आपके सुंदर आशीर्वचनों का।

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