Monday, 25 December 2017

यूँ समय सरकता जाता है

कल बिता काल, कल नया साल!
यूँ समय सरकता जाता है।

श्वेत श्वेत से सात अश्व से
सुसज्जित ये समय शकट है
घिरनी से घूमते पहिये पर
घटता घड़ी घड़ी जीवन घट है

निशा दिवा का नयन मटक्का
अंजोर अन्हार की अठखेली
ठिठुर ठिठक कर ठहर गई है
हर्ष विषाद की अबूझ पहेली

चाहे सम्मुख दुख हो, सुख हो
समय थाल भला थमता है?
तप्त तुषार तरल जल बहकर
शीत समय संग फिर जमता है

हिम तरल का, तरल हिम् का
जग परिवर्तन का अंकुर है
मोह जाल में जकड़े जीव को
स्वयं काल भी क्षण भंगुर है

भ्रूण भोर से यम यामिनी
यातना योनि दर योनि
विषय वासना, कनक कामना
केंचुल में कोमल मृगछौनि

है संघर्ष पाश से मुक्ति का
जीव ब्रह्म योग की युक्ति का
सतचित आनंद के आंगन में
चिर योग जगा अंतर्मन में

काल बंध के भंजन में
स्थितप्रज्ञ से मंथन में
माया मत्सर मोह महल
सुभीत दरकता जाता है

कल बिता काल, कल नया साल!
यूँ समय सरकता जाता है।