Tuesday, 4 February 2020

जश्न नहीं मनाना

रंग-रोगन में
'सैंतालीस की आज़ादी'  के।
काले धब्बों को,
झुलसी दीवारों के
नालंदा की।
घुला दोगे!

इसमें बसी
शैतानी रूह
काली रेख
बर्बर बख्तियार की
खालिस खिलजी स्याह आह।
झुठला दोगे!

मत भूलो
हे दुर्घर्ष, संघर्षशील!
मोड़ दे जो काल को,
वह गति हो तुम!
सनातन संस्कृति की
शाश्वत संतति हो तुम!

निष्ठुर स्मृति का
कर्कश कुकृत्यों की
अश्लील अतीत के
जश्न नहीं मनाना।
एक नया नालंदा बनाना।
अपने अख्तियार की!

22 comments:

  1. अब तो न नालंदा बनेगा,नहीं गुरुकुल
    बस गूगल बाबा को मनाना है और
    दिन भर मोबाइल से चिपके रहना है
    सोशल मीडिया को गुरुदेव बनाना है
    कुछ ऐसा ही जमाना है....

    सादर।

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    1. सही बात। अत्यंत आभार।

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 05 फरवरी 2020 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. जी, अत्यंत आभार इस मौन के मुखरित होने का।

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ७ फरवरी २०२० के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  4. निष्ठुर स्मृति का
    कर्कश कुकृत्यों की
    अश्लील अतीत के
    जश्न नहीं मनाना।
    एक नया नालंदा बनाना।
    अपने अख्तियार की!
    वाह!!!!
    क्या बात....
    बहुत ही लाजवाब सृजन।

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  5. नालंदा और तक्षशिला जैसे महाविद्यालयों की वजह से ही हम विश्व गुरु कहलाये। भारत शिक्षा केन्द्र रहा है, ये भुलाने योग्य नहीं है।
    लाजवाब लेखन

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  6. बहुत सुंदर व्यथा मुखरित हो रही हैैं पुराने जख्मों की ।
    शानदार अभिव्यक्ति।

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  7. मत भूलो
    हे दुर्घर्ष, संघर्षशील!
    मोड़ दे जो काल को,
    वह गति हो तुम!
    सनातन संस्कृति की
    शाश्वत संतति हो तुम

    संस्कृति के पतन की व्यथा कहती , बहुत ही सुंदर और सटीक,सादर नमन

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  8. बेहद शानदार सृजन

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  9. हमेशा की तरह सार्थक सृजन आदरणीय विश्वमोहन जी ,|

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  10. मत भूलो
    हे दुर्घर्ष, संघर्षशील!
    मोड़ दे जो काल को,
    वह गति हो तुम!
    सनातन संस्कृति की
    शाश्वत संतति हो तुम!
    बेहतरीन और लाजवाब सृजन ।

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