Sunday, 24 May 2020

पद-तल, मरु थल के!

मनुष्य :

पिता, दान तेरे वचनो का, लेकर आया जीवन में,
संग चलोगे पग-पग मेरे , जीवन के मरु आँगन में।

तेरी अंगुली पकड़ मचला मैं, सुभग-सलोने जीवन में,
हरदम क़दम मिले दो जोड़ी, जैसे माणिक़ कंचन से।

किंतु, यह क्या? हे प्रभु! कैसी है तेरी माया !
घेरी विपदा की जब बदरी, चरण चिह्न न तेरी पाया!

भीषण ताप में दहक रहा था, पथ की मैं मरु-ज्वाला में,
रहा भटकता मैं अनाथ-सा, तप्त बालुकूट  माला में।

हे निर्मम ! निर्दयी-से निंद्य! क्यों वचन बता, तूने तोड़ा?
तपते-से सैकत  में तुमने, मुझे अकेला क्यों छोड़ा?

देख! देख! मरुस्थल में, तू मेरा जलता जीवन देख!
देख घिसटती  संकट में , पाँवों की  यह मेरी रेख!

देख, मैं कैसे जलूँ  अकेला! मरु के भीषण ज्वालों से,
सोंचू! कैसे ढोयी  देह यह, छलनी-से पग-छालों से।

अब न पुनर्जन्म, हे स्वामी,! नहीं धरा पर जाऊँगा,
परम पिता,  तेरी प्रवंचना! नहीं छला अब जाऊँगा।



ईश्वर:

छल की बात सुन,  भगवन के नयनों में करुणा छलक गए।
छौने की निश्छल पृच्छा पर,  पलकों से आँसू ढलक गए।


छोड़ूँ साथ तुम्हारा मैं ! किंचित न सोचना सपने में!
हे वत्स! मरु में पद-चिह्न वे,  नहीं तुम्हारे अपने थे।

डसे   तुम्हें,  जब दुर्भाग्य के, कुटिल करील-से डंकों ने,
पुत्र !  सोए तुम रहे सुरक्षित,  मेरी भुजा के अंकों में।

चला जा रहा,  मैं ही  अकेला!  तुम्हें उठाए बाँहों में,
पद तल वे मेरे ही, बेटे!  मरु थल की धिपती राहों में!






48 comments:


  1. डँसे तुम्हें, जब दुर्भाग्य के, कुटिल करील-से डंकों ने,
    पुत्र ! सोए तुम रहे सुरक्षित, मेरी भुजा के अंकों में
    सत्यम, शिवम और सुंदरम रचना...इन पंक्तियों को पढ़कर मेरी आँखें नम हुईं तो क्या आश्चर्य ? इन पंक्तियों का मर्म वही समझ सकता है जिसने इस अनुभव को जिया है। मानव तो बस उलाहना ही देना जानता है एक बालक की तरह परंतु परमपिता की करुणा कभी कम नहीं होती।

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    1. जी, बिलकुल सत्य कथन। यह ज्ञान से परे अनुभूति मात्र की बात है। अत्यंत आभार आपकी समर्थक पंक्तियों का।

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  2. मानव जीवन में विचलित मन का एक ही अवलंबन -- अरूप , अदृश्य परमपिता | कितनी सुंदर है ये बोधकथा और उससे भी कहीं इसके अंतर्निहित मर्म को उजागर करती रचना !!!!! जीवन से हारे विकल मानव का मर्मांतक वेदना भरा विकल प्रलाप और उस पर संतप्त मन को सांत्वनास्वरूप परमपिता के मधुर आशीर्वचन रचना को आध्यात्मिक उत्कर्ष प्रदान कर रहे है | मन में करूणा को विस्तार देते इस अतुल्य काव्य चित्र के लिए निशब्द हूँ | ईश्वर के सानिध्य की लालसा व्यक्ति की शाश्वत प्रवृत्ति है । रचना में इस पावन बंधन की
    अत्यंत सुंदर अभिव्यक्ति हुई है ।लयद्धता ने तो सरस रचना के भावों को मानों पंख ही दे दिए |
    ये पंक्तियाँ रचना का मानों आत्म तत्व ही हैं --
    डसे तुम्हें, जब दुर्भाग्य के, कुटिल करील-से डंकों ने,
    पुत्र ! सोए तुम रहे सुरक्षित, मेरी भुजा के अंकों में।
    विस्मय भरे इस सृजन के लिए आपको हार्दिक शुभकामनायें और बधाई आदरणीय विश्वमोहन जी!!!!🙏🙏🙏🙏

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    1. और मन के मर्म से निकली आपकी भावभीनी समीक्षा ने तो आशीष का अमृत ही प्रवाहित कर दिया। अत्यंत आभार आपके आशीर्वाद का!

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  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में  सोमवार 25 मई 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. जी, अत्यंत आभार आपके अनुग्रह का!

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  4. बहुत सुन्दर एवं भावपूर्ण रचना।

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  5. विपत्ति में जब कभी मैं यह सोचता हूँ कि ईश्वर ने मेरे साथ अन्याय किया। उसने मेरी आस्था पर कुठाराघात किया। तब मैं भूल जाता हूँ कि जिस प्रकृति ने हर प्राणी को संरक्षण दिया , मनुष्य उसके साथ क्या किया, उसका दोहन यही न ?मानव ने सृष्टि के हर प्राणी का उत्पीड़न किया है और वह स्वयं आपस में भी एक-दूसरे के साथ भी वही करता आ रहा है।
    यह वही मानव है जो वातानुकूलित कक्ष में बैठ मेवा-मिष्ठान का सेवन कर श्रमिकों की भूख पर कविता लिखता है। यह वही मानव है, जो दूसरों की भूख पर भी राजनीति करता है। टेलीविज़न स्क्रीन पर बहस करता है।
    उसे कोई अधिकार नहीं है कि सृष्टिकर्ता से शिकायत करे, जिसकी सृष्टि को वह नष्ट किये जा रहा है,अपनों से निरंतर छल किये जा रहा है।

    मनुष्य एवं ईश्वर के संवाद
    का आपने बहुत ही भावपूर्ण वर्णन किया है।
    प्रणाम।

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    1. प्रकृति से छल मनुष्य को रसातल में ले जाएगा। बहुत आभार।

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  6. देख, मैं कैसे जलूँ अकेला! मरु के भीषण ज्वालों से,
    सोंचू! कैसे ढोयी देह यह, छलनी-से पग-छालों से।
    व्यथित मनुष्य मन पिता के आगे ही रोयेगा न ,पर नादान मन नहीं समझता कि =वही परमपिता संभालता है हमें जब हम अपने ही बनाये नर्क की ज्वाला में जलते हैं तो वही शीतलता प्रदान करता हैं
    डसे तुम्हें, जब दुर्भाग्य के, कुटिल करील-से डंकों ने,
    पुत्र ! सोए तुम रहे सुरक्षित, मेरी भुजा के अंकों में।

    निःशब्द हूँ, आपके इस सृजन पर ,सादर नमन

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    1. जी, बहुत आभार आपके आशीर्वचनों का!

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  7. जननी को प्रसव पीड़ा याद रह जाये तो वो क्या दोबारा सृजन करेगी...
    मानव को सहन करनी शक्ति बढ़ गई है

    सुंदर रचना

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    1. सुनते हैं कि एक कवि की सृजन वेदना और माँ की प्रसव वेदना एक ही होती है। रचना कर्म की परम्परा उसी वेदना से आनंद बटोरकर सत् और चित का उसमें समावेश करती है और सच्चिदानंद की सनातन संस्कृति का सूत्रपात करती है। अत्यंत आभार आपके आशीष का।

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  8. डसे तुम्हें, जब दुर्भाग्य के, कुटिल करील-से डंकों ने,
    पुत्र ! सोए तुम रहे सुरक्षित, मेरी भुजा के अंकों में।

    चला जा रहा, मैं ही अकेला! तुम्हें उठाए बाँहों में,
    पद तल वे मेरे ही, बेटे! मरु थल की धिपती राहों में!
    बेहद मर्मस्पर्शी प्रस्तुति आदरणीय

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    1. जी, अत्यंत आभार आपका!!!

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  9. अद्भुत.. जब मनचाहा नहीं होता तो ईश्वर को कोसने से बाज नहीं आते हम।उन्हें उलाहना देते हैं।साधारण इंसान की सूक्ष्म बुद्धि उस परमपिता परमेश्वर की अनुकंपाओं का अनुमान तक नहीं लगा सकती।
    मनुष्य और ईश्वर के बीच का ये संवाद मन को शक्ति से भर देता है कि अँधेरों में भी वह कभी मेरा साथ नहीं छोड़ेगा।
    बहुत सुंदर रचना आदरेय..👌👌👌

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    1. जी, इसे अनुभव के स्तर पर ही समझा और जीया जा सकता है। बहुत आभार आपके आशीर्वचनों का!

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  10. अंतर्मन की करुना, प्रेम, विहल-भाव और जीवन के अनिभव को शब्दों की वेणी में बाँध कर मन के गहरे तल तक उतर जाती है ये संवेदनशील रचना ... गहन चिंतन, नमन और तरल ह्रदय से उपजे भाव हिं विश्वमोहन जी ... नमन है लेखनी को ...

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    1. जी, आभार आपके आशीष का!

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  11. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (26 -5 -2020 ) को "कहो मुबारक ईद" (चर्चा अंक 3713) पर भी होगी, आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

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  12. हे निर्मम ! निर्दयी-से निंद्य! क्यों वचन बता, तूने तोड़ा?
    तपते-से सैकत में तुमने, मुझे अकेला क्यों छोड़ा?
    हर दुखी मन इसी तरह उस परमपिता से प्रश्न करता है अपने दुख के क्षणों में उसे कोसता है उसके इशारे को नहीं समझता और उसे अपने अन्तर्मन नहीं महसूसता है
    छोड़ूँ साथ तुम्हारा मैं ! किंचित न सोचना सपने में!
    हे वत्स! मरु में पद-चिह्न वे, नहीं तुम्हारे अपने थे।
    कदाचित यही परम सत्य है कि हर दुख सुख में वो हमारे साथ रहता है ....यदि हम उसका अवलम्बन लें तो हर सुख दूख से उबर पाये....।
    अन्तर्मन के मंथन से उपजी बहुत ही अद्भुत चिन्तनपरक विचारणीय एवं संग्रहणीय लाजवाब कृति....।
    🙏🙏🙏🙏🙏

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    1. इसी सत्य का अनुभव हमें स्थितप्रज्ञता की ओर ले जाता है। अत्यंत आभार आपके सुंदर वचनों का!

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  13. बहुत सुंदर भावप्रवण रचना।🙏

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  14. संवेदना एवम् आध्यात्म की ओर अग्रसर करती कविता

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  15. बहुत बढ़िया

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  16. आहा!कितना सुंदर!कितना अनुपम!
    आदरणीय सर सादर प्रणाम 🙏
    सत्य है कि हम उस परमपिता परमेश्वर की संतानें अपने हर सुख दुख में यूज़ ढूँढ़ते हैं। सुख में तो उसकी कृपा में ही उसे देख लेते हैं किंतु जब अंधेरा छाता और हम भटकते हैं और उसके पदचिह्न हमे दिखायी नही पड़ते तो यूज़ कोसने लगते हैं और यह ध्यान ही नही देते कि जो सुख में हमारे पीछे चलता है वो दुख में हमे अपनी बाँहों में उठा लेता है अपने कंधों पर बिठा लेता है और स्वयं चलता और जो पदचिह्न बनते हैं वो हमारे नही हमारे परमपिता के होते हैं।
    आपकी करुणामय पंक्तियों ने तो भावविभोर कर दिया। सराहना कर सकूँ इतनी योग्यता नही मुझमें अतः मेरा कोटिशः नमन स्वीकार करिए आदरणीय सर। शुभ रात्रि 🙏

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    1. अत्यंत आभार आँचल, आपके सुन्दर शब्दों का!

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  17. अद्भुत लेखन प्रिय बहन👌👌👌👌

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    1. किसी भी रचनाकार के अन्दर का कवि या उसका सृजन-संस्कार उसका नारीत्व भाव ही होता है. इसीलिए तो भगवान् शिव को अर्द्धनारीश्वर भी कहते हैं. बहुत आभार आपका इस सनातन सत्य की अभिव्यक्ति के लिए.

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  18. मरूभूमि में भावों की शीतल धारा।
    आदरणीय विश्वमोहन जी आपकी सुंदर,जीवन-दर्शन,प्रकृति से मनुष्य का भावपूर्ण संवाद। लयात्मक उत्कृष्ट सृजन।
    सादर प्रणाम।🙏

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  19. वाह!!अद्भुत!!ईश्वर और मनुज का सुंदर संवाद ।
    वह कहाँ हमें छोडता है सदा उसकी छत्रछाया हमारे ऊपर बनी रहती है । 🙏

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    1. जी, अत्यंत आभार। हृदयतल से।

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  20. ईश्वर और मानव का भावपूर्ण संवाद । बेहतरीन सृजन आदरणीय ।

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  21. प्रकृति का कण कण ईश्वरमय है, फिर भला कैसे मनुष्य का साथ ईश्वर छोड़ सकता है. मनुष्य को आदत सी हो जाती है भूल करने की और जब इस भूल का परिणाम उसे भुगतने का समय आता है तो वह कराह उठता है।
    बहुत अच्छी चिंतन प्रस्तुति

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