Monday, 13 June 2022

न ब्रुयात, सत्यं अप्रियम

सत्यं ब्रुयात, ब्रुयात प्रियम,

कभी साँच को आँच नहीं।

न ब्रुयात, सत्यं अप्रियम,

भले ख़िलाफ़त, बाँच सही।


बड़ा ताप है, इन बातों में,

कहना कोई खेल नहीं है।

ढोंगी, पोंगी वाजश्रवा का,

नचिकेता से मेल नहीं है।


भले लोक परधाम गया,

पर आख़िर तक सच बोला।

ज्ञान-स्नात शिशु के सच से,

यमराज का मन डोला।


भले प्रताड़ित होता पल को,

नहीं पराजित होता है।

भू, द्यौ  और अंतरिक्ष में,

कालजयी यह होता है।


सत्य ढका हो, कनक कवच से,

उसे अनावृत करना है।

परम तत्व से सज्जित होकर,

भव-सागर को तरना है।


सत्यमेव जयते की लय पर,

मृत्यु देव ने किया समर्पण।

जुग-जुग से यह गूँजे जग में,

सत्य नूपुर के सुर की खन-खन।


34 comments:

  1. पौराणिक पात्रों और घटनाओं को ले कर समझाने का प्रयास सराहनीय है ।।
    सत्य अधिकतर कड़वा ही होता है । भला किसे पसंद आएगा ।। फिर भी सत्य कभी छुपता नहीं है । बहुत सुंदर रचना ।

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  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार(14-6-22) को "वो तो सूरज है"(चर्चा अंक-4461) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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    कामिनी सिन्हा

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  3. सत्य कहने को प्रेरित करती प्रभावी रचना |

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  4. सकारात्मक संदेश वाली प्रासंगिक कविता।
    बहुत खूब !👌👌

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  5. सत्यमेव जयते !! अति सुन्दर !!

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  6. अब चाहे सर फूटे या माथा, मैंने सच (अप्रिय सत्य) की राह पकड़ ली.

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  7. सच का महत्व प्रतिपादित करती सुंदर रचना।

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  8. डॉ विभा नायक14 June 2022 at 13:03

    वाह! क्या शैली है!🌹आपको को तो अध्यापक होना चाहिये🙏लाजवाब

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    1. फ़िलहाल तो शिष्य ही हूँ।बस आप गुरुओं का आशीष बना रहे। अत्यंत आभार।

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  9. सच बोलने और सुनने के लिए बहुत बड़ा जिगरा चाहिए आजकल

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  10. सत्यं शिवं सुन्दरम!!!!!

    हालांकि प्रिय सत्य के साथ अप्रिय सत्य को ना बोलने की ताकीद भी है।यूँ सत्य को जीना एक तपस्या है,पर हर सीख, कथा या प्रवचन का ध्येय सत्य मार्ग के लिए ही प्रेरित करना है।परमसत्ता का पर्याय ही सत्य है।सत्य की महिमा बढ़ाती अनमोल रचना ।हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं आदरनीय विश्वमोहन जी 🙏🙏

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  11. सत्यमार्गी का पथ कहाँ सरल है
    जो इसे जीता,शिव बन पीता गरल है!
    पर सत्य का विकल्प कहाँ
    इस जैसा कोई संकल्प कहाँ !!
    🙏🙏

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    1. वाह! सुंदर काव्यात्मक टिप्पणी!!

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  12. वाह!गज़ब कहा सर 👌

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    1. जी, अत्यंत आभार आपका!!!

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  13. बहुत बहुत सुन्दर

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  14. सत्य ढका हो, कनक कवच से,

    उसे अनावृत करना है।

    परम तत्व से सज्जित होकर,

    भव-सागर को तरना है। सत्य के आलोक को दिग्दिगंत करती सुंदर शब्द शिल्प से भरी गहन रचना ।

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  15. उपनिषदों का सत्य आज भी सत्य है।
    बस चलने वाले कहां गये।
    अप्रतिम।

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