Friday, 8 July 2022

लभ 'मिरेज' (लघुकथा)

 

दोनों के अंदर की कड़वाहट अब उबलकर बाहर आने लगी थी। अब न पत्नी शब्दों को चलनी में चालती, न ही पति उन्हे छनौते में छानता। पत्नी की जुबान पर कैंची और पति के मुख पर आत्मदर्प का तेज कुछ ज्यादा ही था।

आज फिर कैंची चल गई थी। रक्त की ऊष्मा भी आत्मदर्प में दमकने लगी। 'देखो जी, थोड़ी जुबान पर कंट्रोल करो।'

कैंची फिर छिटकी, '' ये तो तब कंट्रोल करना था न, जब तुम्हारा सौदा चार लाख में अरेंज कर दिया था, तुम्हारे बाप ने।''

'फिर तो कैंची वहीं चलाओ जहाँ  भुगतान किया था। मुझे तो तुम्हारे फादर से एक रेजगारी भी नहीं मिली थी।'

कामवाली बाई बड़ी रस लेकर किचेन में यह आँखों  देखा हाल पड़ोसन की उस नई नवेली बहू को सुना रही थी,  जिसे उसका खसम इसी खरमास में भगा के ले आया था।

'सुनो, ये चार लाख वाली बात माँ  जी के सामने मत बकना। मुँह पर ताला लगा लो अब! और, यह भी गठरी बांध लो कि हमारा अरेंज नहीं, लव मैरेज है।'

'भगवान आपका लभ 'मिरेज' बनाए रखे', यह कहते हुए  बाई तेजी से निकल गई।



30 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-07-2022) को चर्चा मंच     "ग़ज़ल लिखने के सलीके"   (चर्चा-अंक 4485)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'   

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  2. वाह😅 क्या खूब लिखा है आपने।

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  3. सही कहा,कुछ समय पश्चात love का mirage भर ही रह जाता है , चाहे arranged हो या love marriage !!😁

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  4. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज शनिवार(०९-०७ -२०२२ ) को "ग़ज़ल लिखने के सलीके" (चर्चा-अंक-४४८५) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  5. शादी ही रह जाती है एडजस्ट करती हुई ,बढ़िया कहानी

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  6. सुन्दर भी सत्य भी

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  7. प्रिय विश्वामोहन जी, बहुत अच्छी लघुकथा! हार्दिक साधुवाद!

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  8. बहुत बढ़िया कहा जीवंत शब्द चित्र आँखों के सामने उभर आया।
    समय क्या क्या करवाता है इंसान से।
    सादर

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  9. एक तीर से कई निशाने साधती लघुकथा!! विवाह में सौदेबाजी से दांपत्य जीवन में प्रेम की उष्मा का ह्वास निश्चित है तो प्रेम विवाह के अपने जोखिम।और घर के भेदियों का अपना यही चरित्र रहा है सदियों से।सादर 🙏🙏

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    1. और आपकी यह पारदर्शी और सार्थक समीक्षा भी नुकीले तीर की तरह लघुकथा के आर पार को बेधती हुई! जी, अत्यंत आभार आपके अवलोकन की तीक्ष्णता का।

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  10. 'सुनो जी', अभी भी कहा जा रहा है तो बात बिगड़ी नहीं है, प्रेम तो हरेक के भीतर शाश्वत है, बस कभी-कभी नश्वर क्रोध जीत जाता है

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    1. वाह! प्रेम अपने शाश्वत स्वरूप में सदैव जीवित रहता है। अत्यंत आभार।

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  11. डॉ विभा नायक17 July 2022 at 20:17

    वाह ज़बर्दस्त👌👌भाषा बहुत खूब👌 व्यंग्य ज़बर्दस्त। बहुत बधाई

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  12. वाह!! शैलीगत कटाक्ष करतीं लघुकथा।

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  13. बहुत अच्छी लघुकथा

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