Thursday, 30 April 2026

आये हो, तो जाओगे।

है विदित जो जीव का,

प्रारब्ध और गंतव्य यही।

हर मिलन के बीज में  है,

विरह का भवितव्य ही।


न रहा अपवाद कोई,

द्युलोक, अंतरिक्ष, पृथ्वी।

समय चक्र सब नाचते,

ग्रह गोचर और रवि।


आये हो, तो जाओगे।

फिर सोचते हो क्या?कवि!

सर्वं खलु ईदम ब्रह्म,

हो आहूत बन हवि।