Thursday, 30 April 2026

आये हो, तो जाओगे।

है विदित जो जीव का,

प्रारब्ध और गंतव्य यही।

हर मिलन के बीज में  है,

विरह का भवितव्य ही।


न रहा अपवाद कोई,

द्युलोक, अंतरिक्ष, पृथ्वी।

समय चक्र सब नाचते,

ग्रह गोचर और रवि।


आये हो, तो जाओगे।

फिर सोचते हो क्या?कवि!

सर्वं खलु ईदम ब्रह्म,

हो आहूत बन हवि।



14 comments:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर शनिवार 2 मई 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  2. सब कुछ ब्रह्म ही है फिर किसका आना और किसका जाना

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    1. जी, बिल्कुल सही कहा। सब जन्म मुझी से पाते हैं और लौट हमीं में आते हैं - रश्मिरथी।
      हार्दिक आभार।

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  3. बहुत ही सुन्दर रचना आदरणीय

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  4. बहुत ही अच्छी रचना है यह आपकी विश्वमोहन जी। कम शब्दों में गहरी बात कह दी है आपने।

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  5. बहुत अच्छी रचना

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