ज़िन्दगी की कथा बांचते बाँचते, फिर! सो जाता हूँ। अकेले। भटकने को योनि दर योनि, अकेले। एकांत की तलाश में!
है विदित जो जीव का,
प्रारब्ध और गंतव्य यही।
हर मिलन के बीज में है,
विरह का भवितव्य ही।
न रहा अपवाद कोई,
द्युलोक, अंतरिक्ष, पृथ्वी।
समय चक्र सब नाचते,
ग्रह गोचर और रवि।
आये हो, तो जाओगे।
फिर सोचते हो क्या?कवि!
सर्वं खलु ईदम ब्रह्म,
हो आहूत बन हवि।
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर शनिवार 2 मई 2026 को लिंक की गयी है....http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!!
हार्दिक आभार।
सब कुछ ब्रह्म ही है फिर किसका आना और किसका जाना
जी, बिल्कुल सही कहा। सब जन्म मुझी से पाते हैं और लौट हमीं में आते हैं - रश्मिरथी।हार्दिक आभार।
बहुत ही सुन्दर रचना आदरणीय
जी, हार्दिक आभार।
बहुत ही अच्छी रचना है यह आपकी विश्वमोहन जी। कम शब्दों में गहरी बात कह दी है आपने।
वाह
अच्छी
आभार।
बहुत अच्छी रचना
जी, आभार।
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर शनिवार 2 मई 2026 को लिंक की गयी है....
ReplyDeletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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हार्दिक आभार।
Deleteसब कुछ ब्रह्म ही है फिर किसका आना और किसका जाना
ReplyDeleteजी, बिल्कुल सही कहा। सब जन्म मुझी से पाते हैं और लौट हमीं में आते हैं - रश्मिरथी।
Deleteहार्दिक आभार।
बहुत ही सुन्दर रचना आदरणीय
ReplyDeleteजी, हार्दिक आभार।
Deleteबहुत ही अच्छी रचना है यह आपकी विश्वमोहन जी। कम शब्दों में गहरी बात कह दी है आपने।
ReplyDeleteजी, हार्दिक आभार।
Deleteवाह
ReplyDeleteजी, हार्दिक आभार।
Deleteअच्छी
ReplyDeleteआभार।
Deleteबहुत अच्छी रचना
ReplyDeleteजी, आभार।
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