Tuesday, 14 October 2014

देवालय

विज्ञान, पुराण और इतिहास सभी इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि कश्मीर  पुरा काल में जलोत्प्लावित था और सतीसर के नाम से जाना जाता था. बारामुला (वाराह मूल) में पर्वत-खंड के शिला द्वार खुलने से यह भाग जलरिक्त हुआ था और इस सुरम्य घाटी में सभ्यता का विकास हुआ. इस वर्ष सितम्बर महीने में भीषण बाढ़ की वीभिषिका से दंशित यह क्षेत्र पुनः अपने सतीसर स्वरुप में उपस्थित हुआ. सर्वत्र जलमग्न!
इसी त्रासदी में यह खबर आयी कि भारतीय सेना के सपुत रण-बांकुरो के सह्योग से शंकराचार्य निर्मित शिव मंदिर परिसर में श्रीनगर के मुसलमनों ने शरण ली. ये तो था प्रकाशन और प्रसारण समाचार माध्यमों में छपने और बंचने वाली खबरों का पत्रकारी स्वरुप. सही बात ये होती कि बाढ़ पीड़ित इंसानों ने पनाह ली. एक बेघर बेघर होता है और एक भूखा भूखा! न वह हिंदु होता है, न मुसलमान. मदद को उठे इंसानी हाथ भी उसकी रुह में बैठे खुदाई खिदमतगार की रहमत होती है.
फिर मंदिर मंदिर होता है- देवालय. वहां ईश्वर का निवास होता है. ईश्वर का कोई धर्म नहीं होता. उसकी कोई जाति नहीं होती. ये तो उसके पास जाने के लिये इंसान के द्वारा गढ़े गये रास्ते या जीवन-पद्धतियां हैं. तो फिर देवालय का शरणागत भी प्राणी मात्र ही होता है. वह हिंदु मुसलमान नहीं होता. वहां पहुंचने पर उसका सर्वस्व पीछे छूट जाता है. याद करें, क्या कहा भगवान कृष्ण ने गीता में-
      “ सर्वांधर्मान परित्यज्य, मामेकं शरणं व्रज “
सामान्यतः, मेरा ऐसी किसी घटना से पाला नहीं पड़ता कि किसी दंगाग्रस्त इलाके में किसी मंदिर ने किसी पीड़ित अहिंदु को या किसी मस्जिद ने किसी गैर मुसलमान को पनाह दी हो. इसलिये एक आम इंसान होने के नाते ऐसे  मंदिर-मस्जिद के ठेकेदारों के प्रति मेरी कोई श्रद्धा नहीं. मुझे उस बंगाली हिंदु पति को भी धर्मभ्रष्ट काफिर कहने में कोई संकोच नहीं होता, जिसका सामना अज्ञेय की कहानी रमंते तत्र देवताः में सरदारा विशन सिंह से कलकत्ते के शामपुकुर लेन में होता है.     
 ऐसे में, ईश्वर के दूत इन सैनिकों को शत शत नमन!
हिंदुत्व एक जीवन पद्धति है. यह मानव आत्मा के समष्टि विलयन के सांस्कारिक श्रृंगार की शाश्वत प्रणाली है.
       “अयं निजः परो वेत्ति गणना लघुचेतसाम
       उदार चरितानांतु  वसुधैव   कुटुम्बकम.”
इसके मूल में यह सार्वभौमिक मान्यता है कि आत्मवतसर्वभुतेषु यः पश्यति सः पण्डितः’. हिंदु दर्शन का आधार है प्रकृति के समस्त परमाणु में परम पिता परमेश्वर का वास होता है. तो फिर, उसके आवास यानि देवालयों में भी प्रत्येक परमाणु समान हैं. वहां कोई भेदभाव क्यों? चर-अचर, जड़-चेतन, सजीव-निर्जीव सभी वस्तुएं उसकी नैसर्गिक आभा के विस्तार हैं. तो फिर शिव निवास में शरणागत को किसी धर्म या सम्प्रदाय की संज्ञा के उच्छृंखल बंधन में क्यों बांधे! यह सतीसर के  उस अखंड, प्रचंड व प्रगल्भ भगवान शिव की अपार महिमा का खंडन होगा जिसका मूल स्वरुप है- सत्यम, शिवम, सुंदरम.
भगवान ईंट, गारे और प्रबलित कंक्रीट की अट्टलिकाओं में नहीं बसते. वे तो उन पवित्र भावनाओं में रमते हैं जो आत्मा और परमात्मा के बीच की चिरंतन कड़ी है. आइये, कबीर को सुनें-
       पाथर पूजे हरी मिले तो मैं पूजु पहाड़
                 और
       “कांकड़-पाथर जोड़ी के, मस्जिद दियो बनाय

       ता पर मुल्ला बांग दे, क्या बहरे भयो खुदाय.”