Saturday, 1 June 2019

सेनुर की लाज ( चम्पारण सत्याग्रह के सूत्रधार राजकुमार शुक्ल से जुड़ी एक सत्य लघुकथा)

राम बरन मिसतिरि अपनी पगड़ी उतार के शुकुल जी के गोड़ पर रख दिये। सिसकते-सिसकते मुंह मे घिघ्घी बंध गयी थी। आवाज नहीं निकल पा रही थी। आंखों में उस जानवर एमन साहब की घिनौनी शक्ल घूम रही थी। बड़ी मुश्किल से रामबरन ने एक कट्ठा का कोला बन्धकी रख के बेटी का बिआह ठीक किआ था। रात ही हाथ पीले किये थे उसके।  बिदाग़री की तैयारी कर ही रहा था कि कलमुहें एमन का फरमान लेकर उसके जमदूत उतर  गए थे। उस पूरे जोवार में किसी गरीब की बेटी की डोली उठती तो वह पहले एमन की हवेली होकर जाती जहां रात कुंआरी तो चढ़ती  लेकिन उतरती नहीं। इस अँगरेज दरिंदे की हबस में पूरा जोवार सिसकता था। निलहे साहब की  वहशी कहानियों को सुनकर ब्याहता बनने की कल्पना मात्र से क्वांरियों का रक्त नीला पड़ जाता।
'मालिक, पूरे गांव की आबरू का सवाल है। बचा लीजिये।' रोते-रोते रामबरन ने निहोरा किया।
शुकुल जी खेत का पानी काछते-काछते थम से गये। पूरा माज़रा समझते उन्हें देर न लगी। निलहों के विरुद्ध उन्होंने बिगुल पहले से ही फूंक रखा था। एमन उनसे खार खाता था और बराबर इस जोगाड़ में रहता कि उनको  मौका मिलते ही धोबिया पाठ का मज़ा चखाये। किन्तु शुकुलजी के ढीठ सत्याग्रही मिज़ाज़ के आगे उसकी योजनाएं धरी रह जाती।
रामबरन की कहानी सुन उनका खून खौल उठा। हाथ धोया। गमछे से मुंह पोछा। फेंटा कसा। सरपट घर पहुंचे और मिरजई ओढ़ने लगे। अंगौछे को कंधा पर रख घर से बहरने ही वाले थे कि शुकुलाइन को भनक लग गयी और दौड़ के आगे से उनका रास्ता छेंक ली। शुकुलजी ने उनको सारी बात बताई और एमन से इस बार गांव की लाज के खातिर जै या छै करने की ठान ली। एमन के नाम से समूचे जिला जोवार का हाड़ कांपता था। मार के लास खपा देना उसके बाएं हाथ का खेल था। पुलिस, हाकिम, जज, कलक्टर सब उसी की हामी भरते थे।
शुकुलाइन ने उनको भर पांजा छाप लिया और अपने सुहाग की दुहाई देकर उनको नहीं जाने की चिरौरी करने लगी। उनकी मांग का सेनुर उनकी आंखों के पानी मे घुलकर शुकुलजी के मिरजई में लेभरा गया। शुकुलजी के खौलते खून को भला शुकुलाइन कब तक रोकती।
वह हनहनाते हुए एमन की हवेली पर चढ़ बैठे। पूरी उत्तेजना में एमन को ललकार दिया शुकुल जी ने। गांव वाले भी जोश में आ गए थे। रामबरन की बेटी की विदाई हो गयी। कुटिल एमन कसमसा के रह गया।
शुकुल जी को फुसला के बैठा लिया और उसने पुलिस बुला ली। शुकुलजी पर रामबरन की बेटी के साथ बलजोरी का आरोप लगा। उनकी मिरजई में लिपटी सुकुलाइन के सेनुर के दाग को साक्ष्य बनाया गया। शुकुल जी को इक्कीस दिन की सजा हो गयी।
आज इक्कीस दिन का जेल काटकर शुकुलजी घर पहुंचे थे। शुकुलाइन ने टहकार सेनुर लगाकर शुकुलजी की आरती उतारी।आखिर इसी सेनुर ने तो गांव की बेटी के सेनुर की लाज रख ली थी।




आंचलिक शब्दों के अर्थ :
                                       सेनुर- सिन्दूर,   गोड़ - पैर,   कोला - खेत,  बिआह- व्याह,  बिदाग़री -विदाई,  जोवार - क्षेत्र,  निहोरा - आग्रह, जै या छै  - अंतिम रूप से निपटारा,  भर पांजा छाप लेना - पूरी तरह से दोनों बाहों में भर लेना, टहकार - गाढ़ा

20 comments:

  1. सटीक। आज के समाज को आईना दिखाती कहानी।

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (02 -06-2019) को "वाकयात कुछ ऐसे " (चर्चा अंक- 3354) पर भी होगी।

    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ....
    अनीता सैनी

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  3. गांव की भाषा में रचा , सत्य घटना पर आधारित ये लघु कथा दिल को झकझोर गयी,क्या क्या न सहा हमारे आज़ादी के दीवानो ने , आप को और आप की लेखनी को सादर नमन

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    1. जी, बहुत आभार आपके इस सारगर्भित आशीष का।

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  4. बहुत बढ़िया

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  5. गज़ब..आँचलिक भाषा के लालित्य से दमकती बेहद उत्कृष्ट कहानी..सराहनीय👌

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  6. असाधारण व्यक्तित्व के धनी शुक्ल जी के साहस और गांव की बेटी के लिए किया गया प्रयास किसी भी शब्द में नही बांथा जा सकता।
    बहुत प्रेरक कथा आंचलिक भाषा का सरस प्रवाह शानदार लेखन।

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  7. बुलंद थी जिनकी हस्तियां, वो लोग जाने कौन थे?
    मिट गए जो शान से, अहले वतन के वास्ते:
    रह अडिग जो भिड गए हर तूफान से
    सर बांध के कपडा जो फिरते थे कफ़न के वास्ते!!!
    इतिहास के अमर पुरुष के सन्दर्भ में तत्कालीन समाज की रोचक, नैतिक बोध जगाती प्रेरक लघुकथा! साहसी पुरुष ही क्रान्तियों के सूत्रधार बनते हैं। लोक रस पगी सुंदर रचना हेतु हार्दिक शुभकामनाएं। सादर 👌👌👌👌

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  8. बहुत प्रेरक कथा। गांव की बेटी के लिए इतना करने की हिम्मत किसी महापुरुष में ही हो सकती हैं।

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  9. बहुत प्रेरणादायक कथा. राजकुमार शुक्ल जी की स्मृति को नमन !

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  10. अंतस को उद्वेलित करती बहुत प्रेरक लघु कथा।

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