Thursday, 11 February 2021

कृष्ण-कन्हैया

 पल-पल पुलकित पलकों में,

जो,  प्रीत तू अबतक पाली।

नित नयनों में तेरे उतराए,

वह बिम्ब कौन री व्याली!


उर की धडकन में धक-धक,

जो धड़क-धड़क कर बोले।

चतुर-चितेरा, चहक-चहक,

 मन वेणी,   तेरी  खोले।


कूल-कालिंदी से कलकल,

कलरव करती किल्लोलें।

हिय वह हौले-हौले तेरे,

नेह मधुर रस  घोले।


मूंदे दृग-पट अपना तू,

करता वह  नैन बसेरा।

आँखों के आँगन में,

तेरे, डाला उसने डेरा।


चमके चिर चितवन चंचल,

वह, तेरे कपोल की लाली।

कौन! कहाँ? वह कृष्ण-कन्हैया!

तू,  किस हारिल की डाली!


वैलेंटाइन सप्ताह

11.2.2021

पटना


34 comments:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 12-02-2021) को
    "प्रज्ञा जहाँ है, प्रतिज्ञा वहाँ है" (चर्चा अंक- 3975)
    पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.


    "मीना भारद्वाज"

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १२ जनवरी २०२१ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।


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  3. वाह!वाह!
    मूंदे दृग-पट अपना तू,

    करता वह नैन बसेरा।

    आँखों के आँगन में,

    तेरे, डाला उसने डेरा।

    क्या बात...।

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  4. चमके चिर चितवन चंचल,

    वह, तेरे कपोल की लाली।

    कौन! कहाँ? वह कृष्ण-कन्हैया!

    तू, किस हारिल की डाली!..बहुत सुन्दर मनमोहक रचना.. आज के समय में बहुत ही प्रासंगिक है, जब पश्चिमी सभ्यता को नयी पीढ़ी अपनाने को आतुर है..

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  5. कौन! कहाँ? वह कृष्ण-कन्हैया!
    तू, किस हारिल की डाली!
    बहुत खूब भावाभिव्यक्ति आदरणीय विश्वमोहन जी।
    किसी के मन में बसे हारिल की डाली सेकृष्ण- कन्हैया को कौन दूसरा जान पाया है जिसके अनुराग की आभा किसी व्यक्तित्व में दिव्य आभा भरती है।
    प्रेमिल भावों से भरी रचना। और हमेशा की तरह लाजवाब। हार्दिक शुभकामनाएं🙏🙏

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  6. अनुप्रास तो कमाल है 👌👌

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  7. अनुप्रास अलंकार के चमत्कारिक सौंदर्य से लेकर अभिसारिका के अनुपम सौंदर्य तक,अद्भुत !!! .... इतने सुकोमल शब्दों में पूछने से तो शायद उस रहस्य को प्रकट कर भी देगी वह सखी !

    पल-पल पुलकित पलकों में,
    जो, प्रीत तू अबतक पाली।
    नित नयनों में तेरे उतराए,
    वह बिम्ब कौन री व्याली

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    1. जी, आपके इस अनुपम आशीष का अत्यंत आभार!!!

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  8. शानदार सृजन..

    सादर प्रणाम..

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  9. बहुत खूबसूरत श्रृंगारित, सुकोमलता की गागर से भरी रचना।
    बधाई।

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  10. वैलेंटाइन सप्ताह में ऐसी अद्भुत रचना...वाह व‍िश्वमोहन जी, गोप‍िकाओं और राधा के मन की गत‍ि बताती ...वह भी काल‍िंंदी के कूल पै... कृष्ण ..वाह

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    1. जी, बहुत आभार आपके सुंदर शब्दों का!!!

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  11. वाह! बेहद सुन्दर रचना। मन को भा गई।

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  12. वाह विश्वमोहन जी ! क्या कहना है इस गीत का ! भाव-विभोर हो गया हूँ इसे पढ़कर ।

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    1. जी, बहुत आभार आपके इन सुंदर शब्दों का।

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  13. कृष्णमय इस सुंदर कविता के लिए साधुवाद 🙏

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  14. प्रेम-रस में पगी बहुत सुन्दर कविता !

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