Thursday, 29 April 2021

सजीव-निर्जीव

जिसका स्फुरण आपकी अनुभूतियों को उद्भूत करे, आपके विचारों को जगाए, आपकी इंद्रियों को उद्वेलित करे और आपकी संवेदना में सजीवता घोल जाए, मेरी दृष्टि में वही सजीव कारक है। अनुभूतियों का दायरा अत्यंत फैला हुआ है। यह भौतिक सत्ता से लेकर वैचारिक और भावनात्मक धरा का स्पर्श करती आध्यात्मिक बिंबों तक विस्तृत है। मस्तिष्क की तंत्रिका से दृष्टिबोध का कितना तालमेल है, यह दृश्य की जीवंतता के परिमाण को इंगित करता है। सजीवता की अनुभूति में ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान तीनों समान रूप से शामिल हैं। ज्ञेय का अस्तित्व ज्ञाता की अनुभूति की प्रखरता और तीव्रता पर निर्भर करता है। एक बार 'ज्ञेय' यदि 'ज्ञाता' की प्रखरता की पकड़ में आ गया तो वह फिर 'ज्ञान' बन जाता है। मतलब ‘ज्ञान’ का ‘होना’ ज्ञाता और ज्ञेय दोनों की क़ाबिलियत पर भी उतना ही निर्भर करता है जितना उसके स्वयं की सत्ता में होने के सच पर। यहाँ क़ाबिलियत का सीधा मतलब है कि ज्ञाता को अपनी अनुभूतियों में पकड़ने के क़ाबिल होना चाहिए और ज्ञेय में भी पकड़े जाने की उतनी ही क़ाबिलियत होनी चाहिए। दोनों में एक भी तंतु टूटा कि ज्ञान छूटा!

जब तक अति सूक्ष्म जीवाणु दृष्टि की पकड़ में न आए, भौतिक धरातल पर वह सत्ताहीन है। एक शक्तिशाली माइक्रस्कोप उसे सत्ता में ला देता है। अर्थात एक अक्षम ज्ञाता को माइक्रस्कोप सक्षम और क़ाबिल बना देता है। ज्ञाता के सक्षम बनते ही ज्ञेय की सत्ता सच हो जाती है और वह अब ज्ञान बन जाता है। अर्थात ‘होना’ या ‘न होना’ एक सापेक्षिक सत्य मात्र है ज्ञाता के लिए।  सच कहें तो ज्ञाता को उस जीवाणु का ज्ञान न होने से उस जीवाणु का अस्तित्व असत्य नहीं हो जाता! तो, भ्रम ज्ञाता में है, ज्ञेय में नहीं। ज्ञेय तो ज्ञान बनने के लिए व्याकुल है। उसे इंतज़ार है ज्ञाता के सजीव होने की।

बस आप मान कर चलें कि हमने सजीव और निर्जीव के विषय में जो अपने विचार बना लिए हैं न, वह भी हमारी अपनी सक्षमता या सजीवता की इन्हीं परतों में दबा है। हम किसी वस्तु की सजीवता के कितने सूक्ष्मातिसूक्ष्म लक्षणों को ग्रहण कर पाने में सक्षम या सजीव  हैं – यही कसौटी है हमारे द्वारा उस वस्तु को सजीव घोषित किए जाने की! निरपेक्ष रूप में तो वह जो है, वही है और जैसा है, वैसा ही है। अर्थात किसी वस्तु की सजीवता की अनुभूति सच में हमारी  अपनी सजीवता का प्रतिभास है।

इसलिए हमारा मानना है कि इस चराचर जगत में कुछ भी निर्जीव नहीं है। सभी सजीव हैं। बस सब कुछ निर्भर करता है हमारी अपनी अनुभूति और संवेदना की सक्षमता जिसे आप चेतना भी कह सकते हैं, उसके स्तर पर कि ज्ञेय की सजीवता के कितने अंश को वह पकड़ पाता है। और यह पकड़ना, मैं फिर दुहराऊँगा, “भौतिक सत्ता से लेकर वैचारिक और भावनात्मक धरा का स्पर्श करती आध्यात्मिक बिंबों तक विस्तृत है।“ बीसों साल पहले परम धाम को प्रस्थित माँ आज भी स्मृतियों में सजीव हो उठती है और दुलारकर चली जाती है। क्लांत मन हरिहरा जाता है। आँखें ओदा जाती हैं। मन कुछ बुदबुदाने लगता है। इसे आप क्या कहेंगे – किसी सजीव सत्ता से ‘इंटरैक्शन’ या किसी सत्ताहीन निर्जीव का ‘इन्फ़ेक्शन’!  


18 comments:

  1. आदरणीय विश्वमोहन जी , प्रत्यक्ष और निरपेक्ष रूप से सृष्टि में जो जड़ है -वही निर्जीव है और जो चैतन्य है वही सजीव! भौतिक सत्ता में इनकी यही परिभाषा है ! पर आपने जो अवलोकन अपने लेख में किया है , संभवतः यथार्थ के धरातल पर स्वीकार्य नहीं हो सकता! क्योंकि जो अदृश्य है, अरूप है, भले स्मृतियों में कितना ही जीवंत क्यों ना हो उसे सजीव नहीं मान सकते! हाँ, अनुभूतियों का कपोल- काल्पनिक संसार सदैव इन भ्रामक बिंबों से गुलज़ार रहा है! कवियों, साहित्यकारों की इस काल्पनिक दुनिया के बिना ज़रा भी गुज़र नहीं है! संवेदनाओं की धरा पर इस मर्म को जाने बिना सृजन की फ़सल नहीं पनपती! अनुभूतियों के स्तर पर ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय के सूक्ष्मातिसूक्ष्म
    लक्षणों को गढ़ने में चिंतक स्वतंत्र है!
    बहरहाल, अच्छा लगा आपकी सकारात्मक सोच का विस्तार देख कर ! कोटि आभार सजीवता और निर्जीवता के नये लक्षणों से परिचित कराने के लिए !! आपकी लेखनी से निसृत ऐसे अन्य दुर्लभ विषयपरक रोचक लघु निबंधों की प्रतीक्षा रहेगी! उत्तम लेख के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाई 💐💐🙏🙏

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    1. क्या जड़ है और क्या चैतन्य - इसी का निर्धारण तो इस आलेख का मुख्य बिंदु है। जड़ और चेतन की अवस्था कौन तय करेगा ज्ञाता या ज्ञेय! और दोनों की भूमिकाओं का कितना अंश कितना है, इस ज्ञान को अर्जित करने में। फिर वह मौलिक कारक कौन से है, इन अवस्थाओं का उद्घाटन करने वाली। तभी तो वेदांत का श्री गणेश ही इस वाक्य से होता है - अथातो ब्रह्म जिज्ञाषा। अत्यंत आभार आपके सारगर्भित विमर्श के लिए।

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  2. जिसे हमारी आँखे देखने में या अनुभव करने में असमर्थ है वही निर्जीव है। सही कहा आपने।
    भगवान का कोई साकार या सजीव रूप नहीं और ना ही उस माँ की स्मृतियों का जो अब सजीव नहीं। इतना ही नहीं उस प्रिय का भी कोई सजीव रूप नहीं जो सिर्फ आपकी स्मृतियों में हो फिर भी हर पलछिन वो आपकी अनुभूतियों में सजीव हो उठता है और आप स्वतः ही उससे जुड़ जाते है।
    आध्यात्मिक भाव लिए सुंदर विश्लेषण ,सादर नमन आपको

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    1. जी, एक रोचक वैज्ञानिक तथ्य आपसे इसी बात पर साझा कर लूं। जब आदमी के रास्ते में चलते हुए सामने कोई अवरोध आ जाता है तो रास्ते से थोड़ा हटके अवरोध पार कर वह फिर अपने मौलिक पथ पर चलने लगता है। करीब 100 साल पहले आइंस्टीन ने प्रकाश की किरणों के गमन के बारे में ऐसे ही व्यवहार की भविष्यवाणी की थी। उनके पास ऐसे उन्नत उपकरण उपलब्ध नहीं थे जिससे इसकी वह प्रायोगिक पुष्टि कर सके। तत्कालीन वैज्ञानिक जगत ने आइंस्टीन की काफी खिल्ली उड़ाई थी। सौ वर्ष बाद आइंस्टीन की इसी खोज की पुष्टि के लिए भौतिकी का नॉबेल पुरस्कार मिला। मतलब संभव है कि आपकी अपनी सजीवता और चेतना की कमी किसी चैतन्य को जड़ न समझ ले। अत्यंत आभार गंभीर विषयों पर आपकी रुचि और सार्थक समीक्षा के लिए।🙏🙏

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  3. गहन चिंतन का विषय है..सजीव निर्जीव प्रकट अप्रकट.. आपने बेहतरीन तरीके से इस भेद का अवलोकन किया है..प्रश्न और उत्तर दोनों सटीक एवं तार्किक है.. लाज़वाब।

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    1. जी, बहुत खुशी हुई आपको भी गंभीर लेखकों के पाठक वर्ग में पाकर। अत्यंत आभार आपके सुंदर वचनों का।

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  4. A living thing is living now or was once alive and it grows, develops, has a life cycle, made up of cells, responds or adapts to environment and has locomotion. It has to fulfill all these criteria. The non living is not alive today or was ever alive.
    This is what our basic education in biology started with, and the distinction between the two is neatly defined with no scope of any confusion
    What you have touched upon, is the abstract.
    You are not talking about the living and the non living as physical ,tangible things.
    You are talking about perceptions and imagination. If we enter that realm , then the scope is limitless. One could be like Alice in Wonderland!!
    Agree with you on this point, that existence or presence of a certain thing, living or non living is not dependent on whether it can be appreciated by our senses, which certainly has its limitations.

    All in all a thought provoking write up.

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    1. ज्योतिर्सुर्योरग्नि हविर्विभावसः तेजोस्विनावधीयते विप्रांशुक देवो जायमानो अथर्वम् चापरे भूयताम।
      ज्योति स्रोत सूर्य तत गुण अग्नि दिन रात तेज वृद्धि हेतु हवि प्रस्तुति से ध्यान की हमारी धारणा को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष जीव की रूप धारण वृत्ति के परिणाम स्वरुप परिवर्तित स्थिति से समृद्ध बनाये।
      यह मन्त्र अपने आप में एक बहुत बड़ा ग्रन्थ है. इसकी रहस्यमयी अवधारणा जीवन एवं निर्जीव की द्वैतावस्था के मध्य कड़ी के रूप में अग्नि की परिकल्पना के साथ अवस्थित है. अपरापर विपर्यय के स्वानुपातिक अवलम्बन के द्वारा ये तीनो (शिव, सूर्य एवं अग्नि) प्रत्यक्ष रूप में एक दूसरे से अवबद्ध है. इसीलिये इनका अपना कर्षण क्षेत्र बन जाता है. और इनसे संलग्न होने या सम्बद्ध होने पर प्रकृति या अपर स्थाणुओ को भी प्रतिवर्तन का सहभागी बनना पड़ता है.

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    2. @Rashmi
      Thanks a lot for your observations. I will not venture to contest the points dealt by you at length with a biologist and medical expert. But transcending the biological definition of living and non living there is a very thin line of difference when you take to the 'virus'. The state of virus is the function of its host. With leaving host, it is very much living and with the non living host it loses its 'liveliness'. Does this actual behaviour of virus not exactly fit in the philosophical scheme of what has been averred in the above article. Kindly get enlightened with the following link. Thanks again.
      https://microbiologysociety.org/publication/past-issues/what-is-life/article/are-viruses-alive-what-is-life.html

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    3. @हिमांशु
      बहुत सुंदर। वैदिक मंत्रों के आलोक में विषय को नई गरिमा देता दृष्टिकोण! अत्यंत आभार।

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  5. आज आधुनिक विज्ञान भी इसे सिद्ध कर चुका है. प्रकाश विन्दु या ऊर्ज़ा केंद्र के चतुर्दिक एक आकर्षण क्षेत्र (Magnetic Orbit) स्वाभाविक रूप से बन जाता है. और उसके क्षेत्र में प्रवेश करते ही सजीव या निर्जीव आलोकित या तप्त हो जाता है. अब यह उस जीव या निर्जीव की आधार कोशिका के अंदर स्थित विविध पदार्थ एवं जीवद्रव्य की प्रवृत्ति-प्रकृति की क्षमता के ऊपर निर्भर है कि किस अनुपात में ये पदार्थ उत्तप्त या आलोकित होते है.
    सूर्य वलय तो प्रत्यक्ष है. जिसके अंदर प्रतिक्षण हजारो परमाणु विष्फोट होते रहते है. जिनसे निकलने वाली ऊर्ज़ा एवं प्रकाश से समस्त चराचर जगत प्रभावित होता है.

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    1. सत्य वचन। अत्यंत आभार।

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  6. बीसों साल पहले परम धाम को प्रस्थित माँ आज भी स्मृतियों में सजीव हो उठती है और दुलारकर चली जाती है। क्लांत मन हरिहरा जाता है। आँखें ओदा जाती हैं। मन कुछ बुदबुदाने लगता है। इसे आप क्या कहेंगे – किसी सजीव सत्ता से ‘इंटरैक्शन’ या किसी सत्ताहीन निर्जीव का ‘इन्फ़ेक्शन’! बहुत ही गूढ़ विश्लेषण किया है आपने विश्वमोहन जी,जीवन के अनुभव को आपने एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण में साधकर मुझ जैसे लोगो को जो हमेशा सजीव ,निर्जीव के भेद को मापते रहते है,बहुत सुंदर दृष्टिकोण को समझाया है,मैने जीवन में अपनी मां के बारे में यही अनुभव किया कि वो मुझे सात वर्ष की उम्र में छोड़ गई थी,पर उनकी सजीव परछाई मेरे इर्दगिर्द हमेशा रही । बहुत सुंदर आध्यात्मिकता भरे चिंतन के लिए आपको मेरा नमन एवम वंदन ।

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    1. आपकी बातों ने इस विषय के प्रति मेरी रोचकता और संजीदगी को अच्छा खासा प्रभावित किया है। बहुत आभार आपका इन गंभीर लेखों में अपनी समीक्षात्मक दृष्टि के साथ पदार्पण का।

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  7. ज्ञेय तो ज्ञान बनने के लिए व्याकुल है। उसे इंतज़ार है ज्ञाता के सजीव होने की। वाह ! मनन करने के लिए सुंदर विचार !

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    1. जी, अत्यंत आभार आपकी समीक्षा की सजीवता का।

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  8. जब जागे तभी सवेरा ... नहीं तो सब निर्जीव ...
    सच है जहाँ तक सोच वहीँ तक जीवन, जो नहि देखा वो मृत, पर सच में वो या हमारी सोच का वहां जा कर मृत हो जाना, सत्य क्या है ...
    गहरी अनुभूति जगाता हुआ आलेख ...

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    1. जी, अत्यंत आभार आपकी दृष्टि की सूक्ष्मता का।

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