Thursday, 22 April 2021

अभिसार का आसव

 महाकवि दिनकर की पुण्यतिथि पर उनकी काव्य कृति ' उर्वशी' के ' नर प्रेम,  नारी प्रेम' अंश में व्यक्त मनोविज्ञान के प्रत्युत्तर में पुरुष मन का उद्गार क्षमा याचना सहित उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित।

पता नहीं कब तोड़ बाँध,

लहरें यौवन प्रचंड से।

ऊष्मा उर से उकस-उकस,

भड़केगी भुजबंध से।


आँखों में उसकी छलकेगा

अभिसार का आसव।

और प्रेम की कुञ्ज वीथी में,

कुजे कोकिल कलरव।


कादम्बरी के मधु मादक से,

नर्तन करे कब प्याली।

प्रेम के आतप से धिप-धिप,

हो रमणी रति-सी व्याली।


और विश्व के नस-नस में,

धधके पौरुष की ज्वाला।

अधराधर कर्षण-घर्षण में,

बहे मदिरा का नाला।


रम्य रमण रमणी का रण में,

आलिंगन अंतिम क्षण में।

उत्कर्ष के चरम चरण,

आरोहण अवरोहण में।


श्वासों का उत्थान-पतन,

बेलि-सी  सिमटी! बाहुपाश।

वनिता तंद्रिल क्लान्त शिथिल,

विश्रांत विश्व गोधुल आकाश।







  




16 comments:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २३ अप्रैल २०२१ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. बहुत अच्छे आदरणीय कविवर! एक उत्तम प्रयास अमर कवि दिनकर की प्रगाढ़ श्रृंगार रचना के सुर में सुर मिलाने का, वो भी पुरुष के मनोविज्ञान को बखूबी उद्घाटित करने का! राष्ट्रकवि दिनकर ने 'उर्वशी 'के रूप में अपनी राष्ट्रवादी छवि के वीपरीत पुरुरवा और उर्वशी की प्रेम कथा के पौराणिक आख्यान को अपने महाकाव्य का आधार बनाया! जिसमें लौकिक और आलौकिक धरातल से लेकर आध्यात्मिक उत्कर्ष तक सहज प्रेम को सहज अभिव्यक्ति मिली! जहाँ उर्वशी और पुरुरवा सनातन नारी और नर के प्रतीक बन कर उभरे, भले नाम पौराणिक पात्रों का रहा! उस पर, राष्ट्रकवि की, संयोग -वियोग के अभिराम रसों से सुसज्जित ये महाकविता ज्ञानपीठ ले गयी, जो किसी चमत्कार से कम ना था! कवि दिनकर की तरह पुरुष मन के उद्गारों को अभिव्यक्ति दे आपने अपने मंजे काव्य हुनर का परिचय दिया है! अनुप्रास के अलंकरण से रचना खिल पड़ी है! आपको हार्दिक बधाई इस नये प्रयोग के लिए🙏🙏

    अमरकवि दिनकर को उनकी पुण्य तिथि पर सादर नमन! साहित्याकाश में उनकी कीर्ति सूर्य सम ही अटल और अमर है🙏🙏 🌹🙏🙏

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    1. जी, अत्यंत आभार आपके इस सुंदर साहित्यिक विश्लेषण का। यदि 'रश्मिरथी' दिनकर की सबसे अधिक पढ़ी गयी कृति है तो 'उर्वशी' उनकी सबसे अधिक चर्चित और साहित्य जगत में उद्वेलन पैदा करने वाली रचना। कवि ने अनकही भावनाओं को अपनी कविता के आख्यान बनाने का एक अत्यंत दुष्कर साहित्यिक दुस्साहस किया है।

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  3. वाह अद्भुत... बेहद खूबसूरत सृजन आदरणीय।

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  4. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति,मन में उतर गई,आपको हार्दिक शुभकामनाएं।

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    1. जी, सादर आभार आपके सुंदर भावों का!

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  5. आपकी इस रचना पर प्रिय रेणु की टिप्पणी के बाद कुछ शेष नहीं बचा कुछ कहने को ...

    भाव विभोर करती सुन्दर रचना ...

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  6. आँखों में उसकी छलकेगा
    अभिसार का आसव।
    और प्रेम की कुञ्ज वीथी में,
    कुजे कोकिल कलरव।
    समसामयिक नकारात्मकता और दूरियों वाले इस माहोल में
    अभिसार के आसव को छलकाती आपकी यह रचना वाकई दिनकर जी की 'उर्वशी'की तरह ही मनभावनी एवं उत्कृष्ट कृति है...पुरुष मन के उद्गारों पर आधारित इस अद्भुत एवं लाजवाब कृति हेतु हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं🙏🙏🙏🙏

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    1. जी सादर आभार आपके आशीर्वचनों का।

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