पुस्तक – अविरल स्याम ( एक विस्मृत क्रांतिकारी की कथा) (नाटक)
लेखक – डॉ. किशोर सिन्हा, प्रकाशक – नोशन प्रेस, चेन्नई
किशोर सिन्हा जी की नाट्य कृति ‘अविराम श्याम’ एक विस्मृत क्रांतिकारी की कथा का पुनित पाठ है। यह न मात्र हमारी महान विरासत को सहेजता है, प्रत्युत पाठकों के उर को संवेदना के एक अविराम प्रवाह से तर करता है। हम बार-बार इस बात को दुहराते हैं कि वे पीढ़ियाँ बड़ी आभागी होती हैं, जिनकी कोई विरासत नहीं होती, जिनका कोई महान इतिहास नहीं होता! किंतु, उससे भी बड़-आभागी पीढ़ियाँ तो वे होती हैं जो अपने गौरवमय अतीत को विस्मृत कर देती हैं। तवारीखें उन्हें कभी भी माफ़ नहीं करती और अपनी अस्मिता की तलाश में एक-न-एक दिन वे भटकने को बेबस हो जाती हैं। हमें याद है कि भीष्म साहनी की पुस्तक ‘तमस’ पर दूरदर्शन ने एक धारावाहिक बनाया था। उसके दृश्यपट पर आरंभ में ही एक पंक्ति उभरती थी, ‘ वे जो इतिहास को भूल जाते हैं, इसे दुहराने को अभिशप्त हैं ‘। किशोर जी की इस कृति में पीढ़ियों को उस अभिशाप से मुक्त कराने की छटपटाहट दिख रही है। विशेषकर अपने उदात्त संस्कारों की लीक से भटकी आज की तथाकथित जेन-जी पीढ़ी को अपने अतीत के आलोक से भविष्य के पथ को प्रकाशित कर आगे बढ़ने की दिशा में इस तरह की कृतियाँ मील का पत्थर होने की क्षमता रखती हैं।
नाटक की दृश्य-व्यवस्था का श्री गणेश दिन के उन्मेष से होता है। दादा और पोते की बतकही के मीठेपन से कथ्य अपनी चित्रात्मकता के साथ उभरना शुरू होता है। दोनों की वेश-भूषा उनके पीढ़ीगत परिवेश और मूल्यों का गणवेश है – सत्तर साल के दद्दु कुर्ते-पैजामे में कंधे पर गमछा डाले और चौदह-पंद्रह साल का किशोर पोता, रमन अपने जींस, टी-शर्ट में कंधे पर एक बैग डाले और टी-शर्ट में चश्मा खोंसे! यही से नाटककार पाठकों को अपने पाश में बाँधता, अपनी गलबहियाँ में लेकर अपनी नाट्य-यात्रा की रोचकता में प्रवेश कर जाता है। दद्दु और रमन की बातचीत से इतिहास जगह-जगह झाँकता नज़र आता है। रेलगाड़ी से उतरकर बस की सवारी, फिर पैदल। दादा-पोते धिपते घाम में ‘बिन्द’ गाँव पहुँचते है। यह महान स्वतंत्रता सेनानी, १९३७ से १९५२ तक बिहार असेम्बली के सदस्य और समाजसेवी श्याम नारायण सिंह का गाँव है। उनकी आदमकद प्रतिमा एक जर्जर से विद्यालय के पास खड़ी, मानो अपने ज़माने की गवाही दे रही है। इस स्कूल की सत्रह एकड़ ज़मीन श्याम बाबु की दान की हुई है। विद्यालय के भवन की जर्जर हालत अपनी विरासत के प्रति हमारी दृष्टि की दुर्दशा की जीती-जागती तस्वीर है। वहीं भेंटा जाते हैं प्रकाश बाबु - एक अवकाश प्राप्त डाक बाबु। श्याम बाबु के नाम पर जारी डाक टिकट को अपनी स्मृतियों में सहजते उनके मुख से फूट पड़ता है- ‘यह डाक टिकट एक चेहरे का नहीं था, एक विचार का था, एक आन्दोलन का था … ये डाक टिकट एक आदमी का नहीं एक युग का था …’।
नाटककार ने बड़ी कुशलता से इस नाटक में आद्योपांत करुणा की अजस्त्र धार बहायी है, जिसमें पाठक अनायास डूबते-उतराते रहता है। सही बात है, श्याम बाबु जैसे लोग इतिहास की किताबों के लिए नहीं जीते, वे लोगों के लिए जीते हैं। यह भी उतना ही सही है कि कभी-कभी इतिहास देर से आता है, पर ख़ाली हाथ नहीं आता! किशोर जी की इस कृति ने भी अपने पाठक-दर्शक को ख़ाली हाथ नहीं रहने दिया है।
फ़्लैश-बैक के साथ दृश्यान्तर होता है। श्याम बाबु की उपस्थिति के साथ नाटक आगे बढ़ता है। श्याम बाबु के पिता रामप्रसाद बाबु की यह ताक़ीद – ‘बेटा श्याम, ये जो मेरी ज़मींदारी है न, उसका अर्थ विलासिता नहीं, कर्त्तव्य है’ – आज के नवधनिक सियासतदानों के लिए एक कड़वी घूँट है। श्याम बाबु का उस ज़माने का दर्शन – ‘जिस देश की बेटियाँ शिक्षित नहीं, वह देश आज़ाद नहीं हो सकता’ आज के हिन्दुस्तान का भी उतना ही बड़ा सच है – ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’! बीच-बीच में सरल और सुबोध कोरस नाटक को सरस गति देते हैं। दिन के निकलने से शुरुआत होने वाली कहानी का अवसान प्रकाश के धीरे-धीरे बुझने … फिर सूर्यास्त दिखायी देने की प्रकाश-व्यवस्था से होना नाटककार की कल्पनाशीलता, रचनात्मकता और चित्रात्मकता के उत्कर्ष को प्रदर्शित करता है। इसी प्रकाश-व्यवस्था में दद्दु फ़्लैश-बैक से वापस रमन के पास लौटते हैं। प्रभाव इतना गहरा है कि पाठक और दर्शक अभी भी वहीं अपनी संवेदना के सरगम में अपने दृष्टि-बोध के पाश में झूलता खड़ा है। वह अपनी उस अविराम अवस्था को प्राप्त हो गया है, जो नाटककार की संवेदना ने उसके मन पर छाप दिया है। कहन का शिल्प भी अद्भुत है। दादाजी पोते को बताते हैं कि यह कहानी उन्हें उनके पिताजी अर्थात पोते के परदादा ने सुनायी थी। अपनी महान विरासत के मूल्यों और संस्कारों के संचरण की इस प्रक्रिया को अपनी कहानी के शिल्प में गढ़ने और नाटक के रूप में आज की पीढ़ी के समक्ष प्रस्तुत करने का यह महायज्ञ इस पूरी कृति को सोद्देश्यता के श्रिंगार से सुसज्जित करता है:
“हम मानवता के पहरेदार हैं …
हम जाग रहे हैं …
हम मानवता के पहरेदार हैं …
हम जाग रहे हैं …”
नाटक के संवाद अत्यन्त प्रभावशाली हैं। भरसक, कहीं-कहीं तो कालजयी हैं। बानगी देखिए – ‘धर्म अगर इंसानियत से बड़ा हुआ तो ईश्वर भी रोएगा’, ‘वोट नहीं, संकल्प दो’, ‘जहाँ शरीर क़ैद होता है, वहीं आत्मा का विस्तार होता है। इतिहास के सबसे उजले अध्याय अक्सर जेल की कोठरियों में लिखे जाते हैं’, ‘जब विचार हथियार बन जाए और जनता ढाल, तब इतिहास की दिशा बदलती है’, आज़ादी बाहर नहीं होती, भीतर होती है’, ‘समय बहुत कुछ छीन लेता है, पर कुछ नाम ऐसे होते हैं जो समय को ही बदल देते हैं’, ‘जो आज पीछे हटा, समझो वह पीढ़ियों तक झुका रहेगा’, ‘क्रान्ति केवल टकराव नहीं, साहचर्य भी है। जहाँ विचार मिलते हैं, वहाँ इतिहास की रगों में रक्त तेज़ी से बहने लगता है’, तुम्हारे साहस में करुणा भी है’, और अंत में संवेदना का गढ़ियापन शब्दों में उतरता देखिए, ‘आज कोई माँ हिन्दू नहीं, कोई माँ मुसलमान नहीं, सबकी कोख डर से थर-थर काँप रही है, बाबू!’
किशोर जी साहित्यकार हैं, लेखक हैं, नाटककार हैं, अभिनेता हैं, नाट्य निर्देशक हैं, कवि हैं, मीडिया-मैन हैं, संगीतकार हैं और फ़िल्मकार हैं। ज़ाहिर है, जब वह कुछ रचते हैं, उनके व्यक्तित्व में बसते ये सारे किरदार एक साथ मिलकर उन्हें अपना आवेग देने लगते हैं। स्वाभाविक है कि पाठक-दर्शक का सहज संबंध उनके पात्रों के अंतर्मन से जुड़ जाता है। नाटककार की कल्पनाजीविता नाटक के चरित्र में भाव, विचार, संवेदना और अनुभूतियों के बीज छींटते हैं जो समकालीन परिदृश्य को पूरी तरह सहेज लेता है। चरित्र गतिशील हैं और संघर्षशील भी। भाषा सहज है, संप्रेषणीय है, भावनुरूप है, पत्रानुकूल है, चित्रात्मक है और गतिशील है। यह पाठक के अंतर्मन में पात्र की जीवन्त छवि को खड़ा कर देती है। गठा शिल्प और अनूठी संवाद शैली नाटक के प्राण हैं। संवादों में कसाव है, तारतम्यता है और साथ ही पात्र और परिवेश की स्पष्टता है।
शीर्षक, ‘अविराम श्याम’ में रोचकता का तत्व है और एक चुंबकीय आकर्षण है जो पाठकों के मन को बाँधता है। कहने को है तो नाटक लेकिन कृत्रिम नाटकीयता से कोसों दूर। सब कुछ खाँटी स्वाभाविक, सहज, सरल और अविराम! ‘अविराम श्याम’!
बधाई किशोर जी, अविराम श्याम के लिए!
----- विश्वमोहन


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