Tuesday, 25 August 2026

सरगोशियों के स्वर




सरगोशियों के स्वर 
कविता संग्रह 
(लेखक – सुशील कुमार जोशी)
प्रकाशक -न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन 
सी ५१५, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी, नयी दिल्ली - ११००१२



‘या  निशा सर्व भूतानां तस्यां जाग्रति संयमी’ – अर्थात जो सब जीवों के लिये  रात्रि है, वह आत्मविश्लेषी मुनियों के लिए दिन है। प्रोफ़ेसर (डॉक्टर) सुशील कुमार जोशी एक ऐसे ही साहित्यिक मनीषी हैं जो अपने ‘उलूक’ के साथ अपनी ‘सरगोशियों के स्वर’ में समकालीन समाज के   विश्लेषण को  अभिव्यक्ति देते हैं। उलूक अर्थात उल्लू एक निशाचर पक्षी है। यह मुख्य रूप से रात में सक्रिय होता है और अत्यन्त  सतर्क निगाहों से  बिना किसी आहट  के अपना आखेट ढूँढ लेता है। ज़ाहिर है, अपने ‘उलूक’ के साथ विचरण और कानाफूसी करते डॉक्टर जोशी आज के समाज की उन तमाम विसंगतियों को बड़ी आसानी से पकड़ लेते हैं और अत्यन्त  सूक्ष्मता से उसका तार-तार उधेड़ देते हैं। कवि डॉक्टर जोशी का प्रस्तुत कविता संग्रह ‘सरगोशियों के स्वर’ उसी तार-तार हुए समाज के सच का बड़ा मर्मस्पर्शी उद्गार है। सत्तर कविताओं का यह संग्रह अपने आस-पास के जीवन के कटु यथार्थ का दर्पण है। जोशी जी भौतिक रसायन में परास्नातक और रासायनिक बल गति विज्ञान में पी एच डी हैं। इन कविताओं में सोबन सिंह विश्वविद्यालय के इस प्रोफ़ेसर कवि की शोधार्थी दृष्टि भारतीय समाज की समकालीन भौतिकी, उसके लोकतंत्र की बलगति और उसकी राजनीति के रसायन की भीतरी तह तक का अन्वेषण अपने ‘उलूक’ के साथ अपनी सरगोशियों में कर रही हैं। ‘उलूक’ के साथ उनकी काव्यात्मक कानाफूसी के अल्फ़ाज़ और अन्दाज़ भी बड़े लाजवाब हैं। कवि बोलता है अभिधा में। ‘उलूक’ सुनता है लक्षणा में और पाठकों को मिलता है व्यंजना का स्वाद। यदि एक पंक्ति में कहें तो यही ‘सरगोशियों के स्वर’ का असली मिज़ाज है। कवि की यह बतकही शाब्दिक मसखरे में समाज के आडम्बर को परोसती है। 
यान्त्रिकता के निविड़  तम में विलुप्त होती जा रही मानवीय संवेदना पर कवि चेता रहा है – 
“कम्प्यूटर कुछ वर्षों में संवेदनशील भी हो जाएगा।
क्योंकि आदमी अब अपनी संवेदनाएँ खो चुका है
वास्तव में कम्प्यूटर हो गया है”।
मनुष्य लूटने-खसोटने में  लगा हुआ है। भगवान महावीर की यह भूमि  परिग्रह के कुसंस्कार की नागफनी से पट गयी है। ‘टका धर्म:, टका कर्म:, टका ही परमं तप:’ का मन्त्र गूँजने लगा है। सर्वत्र भ्रष्टाचार का बोलबाला है। मनुष्य की धन लोलुपता सुरसा की तरह मुँह बाए जा रही है। येन-केन-प्रकारेण कितना धन जमा कर लें, यही उसकी फ़ितरत हो गयी है –
“आदमी चावल के बोरे गिनती करते
कभी नहीं थकता”
बोरों की गिनती भी वह राम से ही शुरू करता है। राम अब उसके मन से उसके व्यवसाय में उतर गए हैं और फिर व्यवसाय से राजनीति में। ‘राम-राज्य’ की परिकल्पना का झुनझुना बजाते  मनुष्य ने राम को अपने ‘राज्य का राम’ बना लिया है। अब  राजनीति के राम के नाम के रोर में मन के राम रो रहे हैं। संस्कार की सीता सो गयी हैं। आम आदमी का अन्तस आकुल है। करे तो क्या करे!-
“बड़ी बेचैनी है
कोई इस बात को क्यों नहीं समझ रहा है
जब राम का हो रहा है यह हाल
तो बताइए…”!
कवि की दुनिया का चित्रपट बहुत विस्तृत है। बहुरंगी आभाएँ उभर रही हैं। जीवन की हर छटा छिटक रही है। सब अपने हिस्से का हर्फ़ हसोट रहे हैं। किसके जीवन के संगीत का मूल छन्द  समयाकाश के वितान पर किस तार में बज उठे, उसी की तलाश उसकी जिजीविषा है –
“किसी को नज़र आने शुरू हो जाते हैं
बहुत से अक्स आईने की माफ़िक़
तैरते हुए हों जैसे उसके अपने सपने
और कब अनजाने में निकल जाता है
उसके मुँह से – ‘वाह’!”
मज़हब के बदसूरत चेहरे की काली छाईयाँ कवि को आतंकित करती हैं। लालच, डाह, ईर्ष्या, मत्सरता, स्वार्थ, कटुता और वैमनस्य  के केंचुल से झाँकती क़ौम फुफकार मार रही है। चन्द कौड़ियों के मोल  बिकती अवाम अपने  आईन के  नंगेपन संग  नाच रही है –
“नियम, क़ानून, कोर्ट
नंगों के लिए नहीं होती
काश! कोई नंगा मेरा भी बाप होता
मैं भी शायद कहीं आबाद होता”।
रोज़मर्रे की जद्दोजहद से जूझते आदमी के लिए समय का गुज़रना अब उसकी आदत बनकर रह गयी है। काल की यह गति अब उसके जीवन का भोगा जानेवाला सत्य है न कि किसी कुतूहल, आश्चर्य, विस्मय, आशा व निराशा का कोई मसला। कवि मानव और आज के समाज के मनोविज्ञान का चतुर चित्रकार है। अब सब कुछ भेड़ियाधसान है।  समय भी और समय की धार में डूबता उतराता मनुष्य भी।
“पुराने साल को हाथ से फिसलते देख
अब रोना नहीं आता है
नए साल के आने की
कोई ख़ुशी नहीं होती है
हाथ में आता हुआ एक नया हाथ
जैसे पकड़ा जाता नहीं है।
मानवीय मूल्यों के पतन और समाज के निर्लज्ज होने की दुरावस्था पर कवि के व्यंग्य का प्रहार बड़ा तीखा है –
“लूट, खसोट, चूस और मुस्कुरा
और फिर कह दे सामने वाले से
‘मैं हूँ पानी’
 आज की दुनिया में इंसानी जज़्बातों की कोई जगह नहीं है। उसूलों की भी नहीं है। यहाँ ज़मीर और ज़मीन राजनीति की है। छल और कपट की कुशल बाज़ीगरी की है। ख़ुदगर्ज़ी की है। एक-दूसरे के पैर में लँगड़ी मार के आगे निकल जाने की है।  तिज़ारत की है। ख़रीद-फ़रोख़्त की है। यहाँ सब कुछ बाज़ारू है। इस बाज़ार का भी एक अलग ही दस्तूर है। वह नहीं बिकता, जो टिकता है। सच का कोई ख़रीददार नहीं। सिर्फ़ झूठ और फ़रेब बिकते हैं। मक्कारी का फ़ैशन है। फ़ैशन की दुनिया में गारण्टी का कोई वजूद नहीं। कवि अब अपने अन्दर  की दुनिया में बाहर के पसरे संसार को शोधता है।
“मेरे अपने ख़ुद के खुले आसमान
खो गए, पता नहीं कहाँ”?
छल-प्रपंच की इस दुनिया में जिजीविषा ने जिज्ञाषा को लील लिया है। केनोपनिषद की प्रतियाँ बाज़ार से ग़ायब हैं। वाजश्रवा का बहुमत है। शास्त्रार्थ की परम्परा वाला यह समाज अब प्रश्न पूछने वाले को बेवक़ूफ़ कहने लगा है-
“बेवक़ूफ़ों के ख़ाली दिमाग़ में उठे प्रश्न
होशियारों के उत्तरों का कभी भी
मुक़ाबला नहीं किया करते हैं
दुर्जनों के दुर्घर्ष तुमुल में इंसानियत की बोली दब गयी है-
“’उलूक’ कानों में अपने-अपने ही हाथ लगाए
अपना ही कहा अन्धेरे में ढूँढने की ख़ातिर
डोल रहा होता है”
समाज की इस विरूपता के सामने प्रकृति भी घुटने टेकने लगी है। पर्यावरण की मार झेलती प्रकृति अब कवि की कल्पना को भी झाड़ लगाती है। बहते ग्लेशियर से नंगे होते पहाड़ की कलौंछ में  कवि की कल्पना भी काली पड़ने लगी है। प्रकृति के सुकुमार कवि ‘पन्त’ की पुण्यतिथि के स्मरण-क्षणों  में कवि की वेदना सिसक उठती है –
“’सुमित्रानन्दन पन्त’
हिमालय में अब सफ़ेद बर्फ़
दूर से भी नज़र नहीं आती है
काले पड़ चुके पहाड़ों को शायद
रात भर अब नीन्द नहीं आती है”
बढ़ती महत्वाकांक्षाओं में मूल्यों का दम तोड़ना अचानक नहीं होता –
“सोन्धी मिट्टी से बनी रेत की
आँधियों में सब उड़ जाएगा
कुछ नहीं बचेगा
महत्वाकांक्षाओं के भूतों से लबालब
एक श्मशान हो जाएगा”
बदहाल शिक्षा जगत के वर्तमान परिदृश्य पर कवि का करुण विलाप फूट पड़ता है। शिक्षा के मन्दिर कलाली में तब्दील हो गए हैं। गुरुकुल से गुरु के  कुल, शील और लज्जा  का अपहरण हो गया है। छात्रों के वेश में गुण्डों का हुजूम उतर आया है –
“छात्रों का कालिख लगाना एक मास्टर के
और चुप रहना मास्टरों की जमात का
मास्टरों की सोच का पोस्टर
बेलगाम हो गयी है”
कवि के तंज की धार आगे भी फूटती है –
“पढ़ना पढ़ाना, लिखना लिखाना
पुराना हो चुका
सुना है, आगे से अब काम नहीं आएगा “
कविताएँ समसामयिक परिवेश और घटनाओं को समेटती प्रवाहमयी और परवाहमयी हैं। कहीं कहीं सुशील कुमार जोशी में मनोहर श्याम जोशी उतर आते हैं। उनका चुटीलापन कविताओं के भीतर से झाँकता है। सत्ता की सनक के ख़िलाफ़ कवि के अल्फ़ाज़ बड़े मारक हैं।  कभी- कभी अपनी सरगोशियों के दरम्यान कवि अपनी वेदना का भड़ास ‘उलूक’ पर उतार देता है, मानो  उलूक ही उस सता का प्रतीक हो, जो समाज की, सियासत की और उसकी मूल्यहीनता की लगाम थामे बैठा है और विसंगतियों की इस घनेरी रात में ख़ुद उलूक को ही  कुछ नहीं सूझ रहा है। मर्यादा की रक्षा में पौराणिक गाथाओं वाली इस धरती पर मर्यादा के क्षत-विक्षत होने की कहानी भी अब एक भ्रमित भविष्य गढ़ रही है। भ्रान्ति की इस काली रजनी में आशा के उन्मेष  का आह्वान करती कविता साहित्यकारों को जगाती है –
“डरो मत
बेधड़क लिख
अपने सभी सवाल
कुछ लिख”
 

Tuesday, 18 August 2026

फ़ितरत

 



अनवरत यात्रा है,

यह जिंदगी हर पल।

नई आदतों के बनने और

पुरानी आदतों के ढहने की ।

जमती जाती हैं हर,

परवर्ती परत-दर-परत।

कोटि बनकर,

समय की भुज पर।

फैलती - सिकुड़ती,

जीवन के आकाश में।


बन जाता है मन,

कभी-कभी पुरातत्वविद।

और  मनन, तकनीक! 

खोदने - शोधने की।

तलाशने की आयु,

उन परतों की।

इस कार्बन-डेटिंग में,

कभी-कभी तो !

छोड़ जाता है मन,

इस स्थूल काया को भी।


और सहेज लेता है जीवाश्म,

अपनी पुरानी आदतों के। 

गाहे-बेगाहे उघेड़कर,

समय के छिलके को।

परतों की बुनियाद में,

जमती जाती आदतों की।

सीरत है इन आदतों की,

हमें भी बदल देना, पर!

एक चीज नहीं बदलती,

हमारी फितरत!



Friday, 14 August 2026

गिरमिटिया




स्वतन्त्रता दिवस की इस सुनहली सुबह के पीछे ग़ुलाम भारत की अनगिन स्याह शामें हमारे अतीत की अतातायी यादों के साथ हमारे ज़ेहन में उतरती हैं। हम अपने उन पूर्वजों का स्मरण करते हैं जिनसे ग़ुलामी ने उनका वतन तक छीन  लिया। फिर भी, अपनी मिट्टी की सुगन्ध को अपने साथ लेकर गए और इसके संस्कार, इसकी भाषा, इसकी  चाल और इसके चरित्र को न केवल बचाए रखा बल्कि अपने पसीने से सींचकर इसे एक विशाल वटवृक्ष का आकार दिया। १९वीं शताब्दी में परतन्त्र भारत के ग़रीबों की कहानी लाचारी, सामन्ती शोषण, अमानुषिक दमन और एक लूटे तक़दीर की दास्तान  है।  औद्योगिक क्रान्ति  ने देश के परम्परागत कुटीर और घरेलू उद्योगों की रीढ़ तोड़ दी। सामन्ती  मानसिकता और जमीन्दारी  शोषण एवं दमन की ज्वाला में  गरीब धू-धू कर जल रहे थे। बड़ी जातियों का छोटी जातियों पर अत्याचार अपने चरम पर था। धार्मिक आडम्बर, पोंगापन्थी, अशिक्षा, सामाजिक  कुरीतियाँ और जातिगत भेद से समूचा भारतीय समाज बीमार था। ऊपर से ग़ुलामी और ब्रितानी साम्राज्य का भयंकर क़हर। बड़ी-बड़ी विदेशी कम्पनियाँ अपने गन्ने, रबर और चाय के बाग़ानों में अफ़्रीका से ग़ुलामों को लाकर मज़दूर रखती थीं। लेकिन १८०७ में ग़ुलामी प्रथा हटने के बाद कमोबेश १८३४ तक सारे ग़ुलाम छोड़ दिए गए थे। अब इन बाग़ानों को मज़दूर की ज़रूरत थी। भारत इन कम्पनियों के लिए मज़दूर बटोरने का सबसे अच्छा देश साबित हुआ। सामन्ती अत्याचार से पीड़ित ग़रीब और बेरोज़गार जनता का मन इस त्रासक  माहौल से पलायन करने को कुलबुलाते रहता। उधर १८५७ के सिपाही विद्रोह के बाद ढेर सारे भारतीय फ़ौजी बेरोज़गार हो गए थे। समाज के अन्दर  ऊँची जाति की विधवाओं की स्थिति भी बहुत दयनीय थी। इस माहौल का फ़ायदा इन कम्पनियों ने अपने एजेंट के माध्यम से भरपूर उठाया। कम्पनियों ने पहले इसे क़ानूनी जामा पहनाने के उद्देश्य से अग्रीमेंट (क़रार) पत्र तैयार करवाए, जिस पर मज़दूरों का अँगूठा लिया जाता। मज़दूरों को तरह-तरह के झूठे प्रलोभन देकर अपने छल-जाल में फँसाने के लिए एजेंटों  का एक जाल-सा था। कहीं ज़ोर-ज़बरदस्ती से भी काम लिया जाता। भला इस ग़ुलाम देश में इन बेबसों को सुनने वाला कौन था? ये एजेंट ‘अरकाटी’ कहलाते थे। मैथिली शरण गुप्त जी ने इस कुटिल ‘अरकाटी’ के प्रपंचों का बड़ा सजीव वर्णन किया है : 
“अधम अरकाटी कहता था फ़ीजी स्वर्ग है भू पर,
नभ के नीचे रहकर भी वह पहुँच गया है ऊपर।
मैं  कहता हूँ, फ़ीजी स्वर्ग है, तो नरक कहाँ है?
नरक कहीं है, किंतु नरक से बढ़कर दशा यहाँ है”।
‘अग्रीमेण्ट’ शब्द ‘गिरमेण्ट’ होता हुआ अपने देहाती रूप ‘गिरमिट’  में बदल गया और उस पर अँगूठा लगाकर अपने तक़दीर को नीलाम कर देने वाले ये बेबस ग़रीब अनपढ़ मज़दूर ‘गिरमिटिया’ बन गए। इन्हें जानवरों की तरह  जहाज़ में ठूँसकर  फ़ीजी, मारीच (मौरिशस), रियूनियन द्वीप, सेशेल्स, गुयाना, त्रिनिदाद और टोबैको, जमैका, सूरीनाम (श्री राम) आदि द्वीपों पर गिराया जाने लगा। 
“पाल के जहज़िया में रोई-धोई बईठी हो,
कैसी हो काला पानी पार रे बिदेसिया”।
जहाज़ पर जात-पात का टूटना लाचारी होती। ऐसे अरकाटी भी नीची जातियों के लोगों को ही फाँसते। फिर भी अपने व्यक्तिगत मजबूरियों से परेशान ऊँची जाति  के लोग भी इस जाल में फँस जाते।  पुरुषों में नीची जाति के लोगों का बाहुल्य होता जबकि महिलाएँ अधिकतर ऊँची जाति की होतीं। सवर्णों को खाना बनाने का काम दे दिया जाता। किन्तु, बीमार लोगों के मुँह में एक ही थर्मामीटर घुसाया जाता, चाहे वे किसी भी जाति के हों।  जातिगत दुराग्रह की अतिशयता से पीड़ित कई लोगों को यह छूत असह्य हो जाता। एक जहाज़ पर से तो कुछ क्षत्रियों ने इस बात पर समुद्र में कूदकर आत्महत्या कर ली कि वे दलितों से छूआ गए थे। कुछ अरकाटी तो जहाज़ पर चढ़ने से पहले ब्राह्मणों से जनेऊ तुड़वा लेते थे। ऐसे भी, अरकाटी कोमल हाथ वाले सवर्णों को लेने से परहेज़ करते क्योंकि उन्हें कठोर हथेली वाले श्रमिक अवर्णो की ज़रूरत  ज़्यादा थी। फिर भी पढ़ाने-लिखाने या अन्य ग़ैर श्रमिक कार्यों में सवर्ण कहीं-कहीं लग जाते। लेकिन आवश्यक रूप से उन्हें कूली का ही काम करना होता।
इन्हें ‘कूली’ कहा जाता। ‘कूली’ एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ होता है, ‘पैसे के लिए काम करना’। द्वीपों पर उतारने के बाद इन्हें ‘कूली-लाइंस’ (कूलियों की बस्ती) भेज दिया जाता। प्रवीण कुमार झा ने अपनी पुस्तक ‘कूली-लाइंस’ में बड़े विस्तार से  गिरमिटियों के इस अश्रु-सिक्त इतिहास का वर्णन किया है। यहाँ कूलियों के लिए बैरक बने थे जिसमें दस फ़ीट गुणा सात फ़ीट के कमरे में अमूमन चार कूली कोंच दिए जाते अपनी आगे की ज़िन्दगी बसर करने के लिए। यह इलाक़ा काफ़ी गन्दा इलाक़ा होता। गन्दी बजबजाती नालियों की दुर्गन्ध पूरे वातावरण में तैरती रहती।  पीने को पानी की क़िल्लत और उसके लिए भी छीना-छिनी, लड़ाई और झकझक। नहाने की तो बात ही दूर रही। बीमारियों का साम्राज्य! 
“काली कोठरिया में बीते नहीं रतिया हो,
किस के बतायी हम पीर रे बिदेसिया।
दिन-रात बीती हमरी दुःख में उमरिया हो,
सूखा सब नैन के नीर रे बिदेसिया।“
दिनभर काम करते मज़दूरों के हाथ-पैर छालों से भर जाते। ऊपर से कोड़ों की पिटायी। बड़ा कठोर दण्ड-विधान था। काम में थोड़ी भी कोताही करने पर चाबूकों की मार पड़ती। कई मर जाते। महिलाओं को पेड़ से बाँधकर उनके बच्चों के सामने नंगा किया जाता। महिलाओं को अपने छोटे बच्चे को खेत पर ले जाने की मनाही थी। एक बार एक माँ अपने बीमार शिशु को लेकर गयी। उस पर जम के कोड़े बरसे। अपने शिशु को अपनी गोद में चिपकाए उसकी चीत्कार आकाश में गूँजती रही। बेरहम मालिक ऊपर शिकायत होने पर भी गवाह के बग़ैर अपने रोबो-रुआब से बच जाते। महिलाओं की आबरू भी सुरक्षित नहीं थी। कई महिलाओं और उनके पतियों ने आत्महत्या कर ली।  गाँधी जी के मित्र एण्ड्रयुस ने लिखा, ‘हिन्दुस्तानी ग़रीबी और यातना झेल सकते हैं। पर किसी महिला की इज़्ज़त से खिलवाड़ कभी नहीं झेल सकते’।
 सात वर्ष से ऊपर का जो बच्चा गिरमिटिया के साथ आता, वह बिना किसी अग्रीमेण्ट के बारह साल का होते ही अपने आप गिरमिटिया बन जाता और पाँच साल की बँधुआ मज़दूरी करने के बाद ही इस ग़ुलामी से मुक्त हो पाता। प्रवीण झा के आँकड़ों के मुताबिक़ १९०६ में फ़ीजी द्वीप में ६२ प्रतिशत बच्चे मौत के मुँह में समा गए थे। फिर भी इन बेरहम मालिकों के भीषण अत्याचार का नंगा नृत्य होते रहा और लाचार गिरमिटिया अपने ख़ून-पसीने से उन बाग़ानों को सींचते रहे।
“ख़ून-पसीने से सींचे हम बगिया,
बैठे-बैठे हुकुम चलाए रे बिदेसिया”।
एक तो ग़रीबी और अत्याचार की मार। दूसरी परतन्त्रता का अभिशाप। ऊपर से अपनी माटी से विरह की व्यथा! ये सारी प्रतिकूलताएँ उन्हें अन्दर  से खाए जा रही थी। फिर भी इन गिरमिटियों ने अपनी माटी की महक को नहीं बिसारा। भारत के ये लाल अपनी जिजीविषा के साथ रामचरितमानस का गुटका और गीता का कर्मयोग भी लेकर गए थे।  शाम को अपनी ‘बैठकी’ में अपना रामायण बाँचते, कीर्त्तन गाते और अपनी ‘बिदेसिया’ के करुण गीतों में अपनी दिन भर की पीड़ा घोल देते।  उनकी यह सांस्कृतिक शाम अपनी जड़ों से शक्ति सहेजती और जीवन के कुरुक्षेत्र में अपने कलैव्य की तिलांजलि देकर नए जोश से जीवन का सूत्र तलाशने  में जुट जाती।  धीरे-धीरे गिरमिटियों की इस एकजुटता में संघर्ष के स्वर फूटने लगे।  वे संगठित होने लगे और विद्रोह का बिगुल बजने लगा।  एक पीड़िता ‘कुन्ती’ की लिखी चिट्ठी उनके संघर्ष के इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बनी और उनके संघर्ष की धमक द्वीप के पार भी सुनायी देने लगी। भारत में गोपाल कृष्ण  गोखले ने ब्रितानी साम्राज्य को इत्तिला दी। उधर फ़ीजी द्वीप के तोताराम सानिद्धय ने गाँधी जी को पत्र लिखा। गाँधी जी ने बैरिस्टर मणिलाल मगनलाल डॉक्टर को फ़ीजी भेजा। बाद में बदरी महाराज नामक गिरमिटिया को लेजिस्लेटिव काउन्सिल में जगह मिली। चार्ल्स एण्ड्रयुज भी फ़ीजी गए। बँधुआ मज़दूरी को ख़त्म करने में उनका संघर्ष उल्लेखनीय रहा। वे दीनबन्धु कहलाए। अन्तत: अपने कठिन संघर्ष और बलिदानों के बाद भारत माता के इन गिरमिटिया सपूतों ने १ जनवरी १९२० को अपनी आज़ादी पा ली। चतुर्दिक उत्सव का माहौल था। अब मज़दूरी बढ़ाने के लिए मणिलाल डॉक्टर की पत्नी की अगुयायी में हड़ताल हुयी। १३ फ़रवरी १९२० को हड़तालियों के पुलिस से संघर्ष में ‘फ़ीजी का जालियाँवाला बाग़’  हुआ। १५ अप्रिल १९२० को मणिलाल को देशद्रोह के आरोप में फ़ीजी द्वीप छोड़ना पड़ा। तब से आज तक फ़ीजी की फ़िज़ा में बहुरंगी बयार बह चुकी है।  
आज भिन्न-भिन्न द्वीपों पर  इन गिरमिटियों की चौथी-पाँचवीं पीढ़ी अपना परचम फहरा रही है। अपने  ख़ून-पसीने और अदम्य संघर्ष के बूते आज ये उत्कर्ष के शिखर पर हैं। कई द्वीपों की सियासत इनके क़ब्ज़े में आ चुकी है। भारतीयता, भोजपुरीपन और भोज-भात इन द्वीपों की जीवन-शैली बन गयी है। आकाश में बधाई, सोहर और छठियार के गीत गूँज रहे हैं। आज की पीढ़ियाँ भले ही  अपने ‘गिरमिटिया’ शब्द को  भूल रही हों, इतिहास उन्हें कभी विस्मृत नहीं करेगा। हम बार-बार इस बात को दुहराते हैं कि वे पीढ़ियाँ आभागी होती हैं, जिनका कोई इतिहास नहीं होता। किन्तु, उससे भी अधिक आभागी वह पीढ़ी होती है जिनका इतिहास तो होता है लेकिन अपने इतिहास को वह भूल जाती है। दुनिया की तवारीख में गिरमिटियों की दास्तान हमेशा जीवित रहेगी और आनेवाली पीढ़ियाँ उनसे प्रेरणा की ऊर्जा ग्रहण करेंगी। वतन की अपनी लड़ाई उन्होंने परदेस में लड़ी और अपने वतन की रूह के लिए जीत दर्ज की:
“शहीदों के मज़ारों पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का बाक़ी यही निशाँ होगा”।

 भारत के  स्वतन्त्रता-उत्सव की इस उषा-वेला में हम अपने उन गिरमिटिया पूर्वजों के अप्रतिम उत्सर्ग को अपने नम नयनों से श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सात समुन्दर पार भी अपनी बदहाली में वे भारत माता के अरुण-केतन को थामे रहे। अपनी आज़ादी की लड़ाई बिदेसी ज़मीन पर जीती और उस धरती को अपने आर्यावर्त के संस्कार में रंग दिया।

“ख़ून-पसीना, मानस, गीता, 
जय धोती, लोटा, खटिया।
भारत माँ के वीर सपूत वे,
जय बोलो, जय गिरमिटिया”।