सरगोशियों के स्वर
कविता संग्रह
(लेखक – सुशील कुमार जोशी)
प्रकाशक -न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन
सी ५१५, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी, नयी दिल्ली - ११००१२
‘या निशा सर्व भूतानां तस्यां जाग्रति संयमी’ – अर्थात जो सब जीवों के लिये रात्रि है, वह आत्मविश्लेषी मुनियों के लिए दिन है। प्रोफ़ेसर (डॉक्टर) सुशील कुमार जोशी एक ऐसे ही साहित्यिक मनीषी हैं जो अपने ‘उलूक’ के साथ अपनी ‘सरगोशियों के स्वर’ में समकालीन समाज के विश्लेषण को अभिव्यक्ति देते हैं। उलूक अर्थात उल्लू एक निशाचर पक्षी है। यह मुख्य रूप से रात में सक्रिय होता है और अत्यन्त सतर्क निगाहों से बिना किसी आहट के अपना आखेट ढूँढ लेता है। ज़ाहिर है, अपने ‘उलूक’ के साथ विचरण और कानाफूसी करते डॉक्टर जोशी आज के समाज की उन तमाम विसंगतियों को बड़ी आसानी से पकड़ लेते हैं और अत्यन्त सूक्ष्मता से उसका तार-तार उधेड़ देते हैं। कवि डॉक्टर जोशी का प्रस्तुत कविता संग्रह ‘सरगोशियों के स्वर’ उसी तार-तार हुए समाज के सच का बड़ा मर्मस्पर्शी उद्गार है। सत्तर कविताओं का यह संग्रह अपने आस-पास के जीवन के कटु यथार्थ का दर्पण है। जोशी जी भौतिक रसायन में परास्नातक और रासायनिक बल गति विज्ञान में पी एच डी हैं। इन कविताओं में सोबन सिंह विश्वविद्यालय के इस प्रोफ़ेसर कवि की शोधार्थी दृष्टि भारतीय समाज की समकालीन भौतिकी, उसके लोकतंत्र की बलगति और उसकी राजनीति के रसायन की भीतरी तह तक का अन्वेषण अपने ‘उलूक’ के साथ अपनी सरगोशियों में कर रही हैं। ‘उलूक’ के साथ उनकी काव्यात्मक कानाफूसी के अल्फ़ाज़ और अन्दाज़ भी बड़े लाजवाब हैं। कवि बोलता है अभिधा में। ‘उलूक’ सुनता है लक्षणा में और पाठकों को मिलता है व्यंजना का स्वाद। यदि एक पंक्ति में कहें तो यही ‘सरगोशियों के स्वर’ का असली मिज़ाज है। कवि की यह बतकही शाब्दिक मसखरे में समाज के आडम्बर को परोसती है।
यान्त्रिकता के निविड़ तम में विलुप्त होती जा रही मानवीय संवेदना पर कवि चेता रहा है –
“कम्प्यूटर कुछ वर्षों में संवेदनशील भी हो जाएगा।
क्योंकि आदमी अब अपनी संवेदनाएँ खो चुका है
वास्तव में कम्प्यूटर हो गया है”।
मनुष्य लूटने-खसोटने में लगा हुआ है। भगवान महावीर की यह भूमि परिग्रह के कुसंस्कार की नागफनी से पट गयी है। ‘टका धर्म:, टका कर्म:, टका ही परमं तप:’ का मन्त्र गूँजने लगा है। सर्वत्र भ्रष्टाचार का बोलबाला है। मनुष्य की धन लोलुपता सुरसा की तरह मुँह बाए जा रही है। येन-केन-प्रकारेण कितना धन जमा कर लें, यही उसकी फ़ितरत हो गयी है –
“आदमी चावल के बोरे गिनती करते
कभी नहीं थकता”
बोरों की गिनती भी वह राम से ही शुरू करता है। राम अब उसके मन से उसके व्यवसाय में उतर गए हैं और फिर व्यवसाय से राजनीति में। ‘राम-राज्य’ की परिकल्पना का झुनझुना बजाते मनुष्य ने राम को अपने ‘राज्य का राम’ बना लिया है। अब राजनीति के राम के नाम के रोर में मन के राम रो रहे हैं। संस्कार की सीता सो गयी हैं। आम आदमी का अन्तस आकुल है। करे तो क्या करे!-
“बड़ी बेचैनी है
कोई इस बात को क्यों नहीं समझ रहा है
जब राम का हो रहा है यह हाल
तो बताइए…”!
कवि की दुनिया का चित्रपट बहुत विस्तृत है। बहुरंगी आभाएँ उभर रही हैं। जीवन की हर छटा छिटक रही है। सब अपने हिस्से का हर्फ़ हसोट रहे हैं। किसके जीवन के संगीत का मूल छन्द समयाकाश के वितान पर किस तार में बज उठे, उसी की तलाश उसकी जिजीविषा है –
“किसी को नज़र आने शुरू हो जाते हैं
बहुत से अक्स आईने की माफ़िक़
तैरते हुए हों जैसे उसके अपने सपने
और कब अनजाने में निकल जाता है
उसके मुँह से – ‘वाह’!”
मज़हब के बदसूरत चेहरे की काली छाईयाँ कवि को आतंकित करती हैं। लालच, डाह, ईर्ष्या, मत्सरता, स्वार्थ, कटुता और वैमनस्य के केंचुल से झाँकती क़ौम फुफकार मार रही है। चन्द कौड़ियों के मोल बिकती अवाम अपने आईन के नंगेपन संग नाच रही है –
“नियम, क़ानून, कोर्ट
नंगों के लिए नहीं होती
…
काश! कोई नंगा मेरा भी बाप होता
मैं भी शायद कहीं आबाद होता”।
रोज़मर्रे की जद्दोजहद से जूझते आदमी के लिए समय का गुज़रना अब उसकी आदत बनकर रह गयी है। काल की यह गति अब उसके जीवन का भोगा जानेवाला सत्य है न कि किसी कुतूहल, आश्चर्य, विस्मय, आशा व निराशा का कोई मसला। कवि मानव और आज के समाज के मनोविज्ञान का चतुर चित्रकार है। अब सब कुछ भेड़ियाधसान है। समय भी और समय की धार में डूबता उतराता मनुष्य भी।
“पुराने साल को हाथ से फिसलते देख
अब रोना नहीं आता है
नए साल के आने की
कोई ख़ुशी नहीं होती है
हाथ में आता हुआ एक नया हाथ
जैसे पकड़ा जाता नहीं है।
मानवीय मूल्यों के पतन और समाज के निर्लज्ज होने की दुरावस्था पर कवि के व्यंग्य का प्रहार बड़ा तीखा है –
“लूट, खसोट, चूस और मुस्कुरा
और फिर कह दे सामने वाले से
‘मैं हूँ पानी’
आज की दुनिया में इंसानी जज़्बातों की कोई जगह नहीं है। उसूलों की भी नहीं है। यहाँ ज़मीर और ज़मीन राजनीति की है। छल और कपट की कुशल बाज़ीगरी की है। ख़ुदगर्ज़ी की है। एक-दूसरे के पैर में लँगड़ी मार के आगे निकल जाने की है। तिज़ारत की है। ख़रीद-फ़रोख़्त की है। यहाँ सब कुछ बाज़ारू है। इस बाज़ार का भी एक अलग ही दस्तूर है। वह नहीं बिकता, जो टिकता है। सच का कोई ख़रीददार नहीं। सिर्फ़ झूठ और फ़रेब बिकते हैं। मक्कारी का फ़ैशन है। फ़ैशन की दुनिया में गारण्टी का कोई वजूद नहीं। कवि अब अपने अन्दर की दुनिया में बाहर के पसरे संसार को शोधता है।
“मेरे अपने ख़ुद के खुले आसमान
खो गए, पता नहीं कहाँ”?
छल-प्रपंच की इस दुनिया में जिजीविषा ने जिज्ञाषा को लील लिया है। केनोपनिषद की प्रतियाँ बाज़ार से ग़ायब हैं। वाजश्रवा का बहुमत है। शास्त्रार्थ की परम्परा वाला यह समाज अब प्रश्न पूछने वाले को बेवक़ूफ़ कहने लगा है-
“बेवक़ूफ़ों के ख़ाली दिमाग़ में उठे प्रश्न
होशियारों के उत्तरों का कभी भी
मुक़ाबला नहीं किया करते हैं
दुर्जनों के दुर्घर्ष तुमुल में इंसानियत की बोली दब गयी है-
“’उलूक’ कानों में अपने-अपने ही हाथ लगाए
अपना ही कहा अन्धेरे में ढूँढने की ख़ातिर
डोल रहा होता है”
समाज की इस विरूपता के सामने प्रकृति भी घुटने टेकने लगी है। पर्यावरण की मार झेलती प्रकृति अब कवि की कल्पना को भी झाड़ लगाती है। बहते ग्लेशियर से नंगे होते पहाड़ की कलौंछ में कवि की कल्पना भी काली पड़ने लगी है। प्रकृति के सुकुमार कवि ‘पन्त’ की पुण्यतिथि के स्मरण-क्षणों में कवि की वेदना सिसक उठती है –
“’सुमित्रानन्दन पन्त’
हिमालय में अब सफ़ेद बर्फ़
दूर से भी नज़र नहीं आती है
काले पड़ चुके पहाड़ों को शायद
रात भर अब नीन्द नहीं आती है”
बढ़ती महत्वाकांक्षाओं में मूल्यों का दम तोड़ना अचानक नहीं होता –
“सोन्धी मिट्टी से बनी रेत की
आँधियों में सब उड़ जाएगा
कुछ नहीं बचेगा
महत्वाकांक्षाओं के भूतों से लबालब
एक श्मशान हो जाएगा”
बदहाल शिक्षा जगत के वर्तमान परिदृश्य पर कवि का करुण विलाप फूट पड़ता है। शिक्षा के मन्दिर कलाली में तब्दील हो गए हैं। गुरुकुल से गुरु के कुल, शील और लज्जा का अपहरण हो गया है। छात्रों के वेश में गुण्डों का हुजूम उतर आया है –
“छात्रों का कालिख लगाना एक मास्टर के
और चुप रहना मास्टरों की जमात का
मास्टरों की सोच का पोस्टर
बेलगाम हो गयी है”
कवि के तंज की धार आगे भी फूटती है –
“पढ़ना पढ़ाना, लिखना लिखाना
पुराना हो चुका
सुना है, आगे से अब काम नहीं आएगा “
कविताएँ समसामयिक परिवेश और घटनाओं को समेटती प्रवाहमयी और परवाहमयी हैं। कहीं कहीं सुशील कुमार जोशी में मनोहर श्याम जोशी उतर आते हैं। उनका चुटीलापन कविताओं के भीतर से झाँकता है। सत्ता की सनक के ख़िलाफ़ कवि के अल्फ़ाज़ बड़े मारक हैं। कभी- कभी अपनी सरगोशियों के दरम्यान कवि अपनी वेदना का भड़ास ‘उलूक’ पर उतार देता है, मानो उलूक ही उस सता का प्रतीक हो, जो समाज की, सियासत की और उसकी मूल्यहीनता की लगाम थामे बैठा है और विसंगतियों की इस घनेरी रात में ख़ुद उलूक को ही कुछ नहीं सूझ रहा है। मर्यादा की रक्षा में पौराणिक गाथाओं वाली इस धरती पर मर्यादा के क्षत-विक्षत होने की कहानी भी अब एक भ्रमित भविष्य गढ़ रही है। भ्रान्ति की इस काली रजनी में आशा के उन्मेष का आह्वान करती कविता साहित्यकारों को जगाती है –
“डरो मत
बेधड़क लिख
अपने सभी सवाल
कुछ लिख”



