Sunday, 2 April 2017

सृजन के फूल

मैं चिर प्रणय की प्रात लाली/
तू छलना निर्वात आली//
मैं पुष्प प्रीत पराग वेणु/
स्वाति सुधा संग सीप रेणु//

मैं चमकता स्वर्ण शबनम/
दूध सी तू रजत पूनम//
ब्रह्माण्ड के आकाश में/
तू रासे विश्व लास में//   

प्रणय विजय में तुम्हारी/
प्रीत का पय पान कर//
प्रेम तरल अधर रस से/
अमर जल को छानकर//

घोल हिय के पीव अपना/
पान करता थारकर//
तू हार जाती जीतकर/
मैं जीत जाता हारकर!//

जब सहज यह प्रकृति /
अंतर्द्वंद्व है किस बात का//
भाव अभाव, सत असत/
जीव-ब्रह्म, असमानता //


 भावों की असमानता से/
 बीज रचना के बटोरूँ //
 आंसू के फिर नयन घट में /
उर्वरक वो प्रीत घोरुं //

मै समर्पित, मौन प्रिये /
 विरह विगलित गरल पीलें//
चल न मन एकांत में तू/
 जहां सृजन के फूल खिले//