Friday, 4 September 2026

नील नायक


 



नील नायक 
विधा – नाटक 
नाटककार -डॉक्टर दिवाकर राय 
प्रकाशक -लोकनाथ प्रकाशन, वैष्णो कालोनी, पराग डेयरी के पीछे 
सीतापुर – २६१००१, मोबाइल - ९६७०१००२७०

डॉक्टर दिवाकर राय की प्रस्तुत नाट्य-कृति ‘नील नायक’ न केवल चम्पारण आन्दोलन के अग्रणी नायक श्री राजकुमार शुक्ल की पावन स्मृति का पुनर्पाठ है, अपितु हमारी भूली-बिसरी विरासत को बटोरने का एक पुनीत प्रयास भी है। मैं बार-बार इस बात पर बल देता हूँ कि वे पीढ़ियाँ बड़ी आभागी होती हैं जिनकी कोई विरासत नहीं होती, जिनका कोई इतिहास नहीं होता। किन्तु, उससे भी बड़अभागी वे पीढ़ियाँ होती हैं जो अपनी महान विरासत को विस्मृत कर देती हैं। विशेषकर आज के संदर्भ में काल-क्रम की ऐसी चौखट पर जब तथाकथित ‘जेन-जी’ पीढ़ी अपने इतिहास नायकों की यादों से दूर होती जा रही हो और राजनीति दिशाहीनता का आखेट बनती जा रही हो, ऐसी कृतियों का लेखन एक सजग साहित्यकार का स्तुत्य प्रयास है। राजकुमार शुक्ल के व्यक्तित्व और कृतित्व को अपने नाटक ‘नील नायक’ में प्रस्तुत कर दिवाकर राय जी ने साहित्य के एक कर्तव्यनिष्ठ नायक की अपनी भूमिका को भी रेखांकित किया है। नाटक की विधा सर्वदा से एक  लोक रंजक और लोक कल्याणकारी विधा रही है। अपने श्रव्य और दृश्य प्रभाव से यह पाठक, श्रोता और दर्शक के मन को सीधे छूती है। भारतीय परम्परा में यह विधा हमारी जातीय संस्कृति के आन्तरिक दर्शन को प्रतिबिम्बित करती है। नाटककार, रंगमंच और दर्शक उस दर्शन की भाव-धारा में एक साथ बहते हैं। रंगमंचीय अभिनय दर्शक को अपने पात्रों के व्यक्तित्व और कृतित्व के असाधारण तन्तु  से जोड़ता है और दर्शक स्वयं उस पात्र विशेष का प्रतीकात्मक बिम्ब बन जाता है। रंगमंच की यही सोद्देश्यता इस कला की आत्मा होती है।  दिवाकर राय जी की प्रस्तुत कृति इसकी प्रामाणिकता का जीवन्त दस्तावेज़ है। कथानक परतन्त्र भारत में बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक के उस काल खण्ड का है जब अंग्रेज़ नीलहे ज़मीन्दारों के तीनकठिया तिकड़म के अत्याचार में चम्पारण  की जनता सिसक रही है। उस ज़ुल्म के ख़िलाफ़ इसी माटी का एक किसान बेटा अपनी आवाज़ बुलन्द करता है। वह एक जन आन्दोलन  खड़ा करता है और इस आन्दोलन  को राष्ट्रीय फ़लक पर लाकर चम्पारण  को गाँधी के सत्याग्रह की प्रयोग भूमि बनाता है। अत्याचारियों के हौसले पस्त हो जाते हैं। किसानों को मुक्ति मिलती है।
नाटक में घटनाएँ पुरानी हैं किन्तु अभिव्यक्ति का टटक़ापन है। भाषा में चित्रात्मकता है, गति है और धार है।  दृश्य में नैसर्गिकता और सजीवता  है। ‘खटिया’, ‘बिट्ठा’, ‘सुरती’, ‘अनेरिया’, ‘दुब्बर’, ‘जवार’ जैसे देशज शब्दों की बहार है। संवाद में बोली की मिठास है। पाठक को बरबस महसूस होता है कि वह गाँव की किसी बैठकी में बैठा हुआ है। कहीं-कहीं चौपाल की चुहालबाज़ी भी है। भोजपुरी की तरंगे संवादों में लहराती हैं। हालाँकि, नाटककार के अन्दर  का शिक्षक अपने व्याकरण बोध की गरिमा में कहीं-कहीं उसकी लेखनी को पकड़कर उसके देसी अन्दाज़ को लुलुआ देता है। जैसे बिगन के मुँह  से  उसकी असली भाखा ‘फेरु  एगो बात सुने में आ रहा है’ को निकालकर अपनी परिमार्जित भाषा गढ़ लेता है, ‘फिर भी एक बात सुनने में आ रही है’। तथापि, एक बात के लिए नाटककार को दाद देनी पड़ेगी कि उसने अपनी पूरी रचना में गँवई लोकोक्तियों और मुहावरों की मनोहारी छटा बिखेर दी है।  बानगी देखिए, ‘बिगन - …  जानते हैं न कि जब सौ गो अनेरिया मरता है, तब जाकर एगो हरामी पैदा होता है’, …  ‘लखन – पल्ला नहीं पटका परुआ बैल की तरह’, …‘राजकुमार – चिल्लर के भय से भगई पहनना बन्द कर दिया जाय’, … ‘अकलु – लुत्ती को भी लहास बनते ज़्यादा समय नहीं लगता’, … ‘मँगनी – उसकी अँतड़ी में भी बुद्धि है’, … ‘राजकुमार – जो चरावे दिल्ली, उसको चरावे करीकी पिल्ली’। भाखा के इस ठेठ अन्दाज़ से समूचा संवाद पटा पड़ा है। यह नाटककार की भोजपुरी समाज के आचार, विचार और संस्कार पर गहरी पकड़ का परिचायक है।
नाटक की भूमिका का प्रभावी निर्माण आँचलिक बयार के वासन्ती उपवन में होता है। इसमें बालसुन्दर का लोक गीत ‘जोगिया का भेली’ घोर देता है –
‘एहो, कूदे जइसे बछरु दुआर
हाथवा में ले के घइलवा।
गोरियाँ चलेली इनार …’   
हाँफते-दौड़ते भूखल अहीर की पंचायत बुलाने की राय, लखन का कोठी पर जाने का मशविरा, बालसुन्दर के मन में पइसा कोठी का डर, और राजकुमार की ललकार – नाटककार की अद्भुत दृश्य-संवाद योजना है जो कथानक के भवितव्य के ताने-बाने बुन रही है। कोठी का नुमाईन्दा, मँगनी, इस पंचायत को बग़ावत क़रार देता है। अकलु के साथ उसकी कोठी के कान भरने की भाखा में राजकुमार एक विद्रोही के रूप में उगते हैं।  नीलहा कोठी का अंगरेज ज़मीन्दार, एम्मन, राजकुमार के ख़िलाफ़ फिर अपना फेंटा खोंस लेता है। इधर राजकुमार गाँव वालों के मन में अपने अन्दाज़ में पौराणिक कथाएँ सुनाकर विद्रोह के तेवर जगा रहे हैं। 
कोठी की नाफ़रमानी एम्मन का कोड़ा बनकर राजकुमार की पीठ पर बरसती है। कोड़े खाकर भी उनकी स्तब्धता में गाँधी  की वह छवि उकर आती है जब गाँधी को ट्रेन से समान सहित पीटरमारिट्जबर्ग रेलवे स्टेशन पर फेंक दिया गया था। इस जगह पर नाटककार दिवाकर राय जी भी अपनी अद्भुत चित्रात्मक शैली के साथ उपस्थित होते हैं। ‘इ दो कोड़ा की मार ही आपके राक्षसी राज रूपी ताबूत की अन्तिम कील साबित होगी’ – राजकुमार की यह चेतावनी एम्मन के सीने में ख़ंजर की तरह उतरती है, मानो यह व्यंजना ब्रितानी हुकूमत का भविष्य उचार रही हो।
गौरैया, मेढक, मधुमक्खी और कठफोड़वा की कहानी में लक्षणा की शब्द-शक्ति है। राजकुमार बड़ी सरलता से अपनी रणनीति का ख़ुलासा कर रहे हैं। गाँव के लोगों से उनकी बातचीत में तत्कालीन निरंकुश कर-प्रणाली का भाण्डा फूटता है। करों की भरमार है – मोटरही, घोड़ही, नवही, हथियही, कोल्हूआवन, चूल्हीआवन, महापातरी, हक़-जुर्माना, कटहली, अमही, फगुनही, दशहरी, दावातपूज़ही, भेंटही, मँड़वच, सगौड़ा, बेंचाही, बाँट-छपी, रसीदावन, तहरीर, हिसाबन, राजाअंश  … और  ना जाने कितने अन्य टैक्सों की चक्की में चम्पारण  की उन्नीस लाख ग़रीब जनता पिस रही है।
कोठी का कूटनीतिक छल-कपट अपने उछाल पर है। संत राउत को कोठी बहरिया देता है। राजकुमार, रोज़ा मियाँ और राजबली पर मुक़द्दमा ठोक दिया जाता है। कोठी के स्थानीय चमचे जासूस हवा सूँघते फिर रहे हैं। रघुवीर की बोली में नाटककार के कटाक्ष की धार है – ‘जबतक टाँगी में लकड़ी का बेंट नहीं होगा, टाँगी पेड़ नहीं काटेगी’।  राजकुमार के जेल से निकलते ही आन्दोलन को अब एक ऊँचे फ़लक पर विस्तार देने की सुगबुगाहट सुर पकड़ लेती है।
पत्रकार पीर मुहम्मद मूनिस और राजकुमार में गहरी छनती है। राजकुमार शोषण के प्रति विद्रोह-भाव की प्रतिमा हैं तो मूनिस उन भावनाओं की बौद्धिक आवाज़। मूनिस की मसि राजकुमार की असि है।  राजकुमार की पीड़ा को पीर अपने लेखन में स्वर देते हैं। यह आलेख गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘प्रताप’ में कानपुर से छपता है। यह अख़बार चम्पारण की चिंगारी को पूरे देश में छींटता है। दिवाकर राय जी ने बड़ी कुशलता से पीर और राजकुमार के वार्तालाप में ग़ुलाम हिन्दुस्तान में चम्पारण के किसानों की वेदना का नाट्य चित्र खिंचा है। समकालीन राजनीतिक परिदृश्य भी बड़ी सजीवता से उभर कर आता है। लखनऊ में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन आहूत है। कांग्रेस, हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग, नरम-गरम, लाल-बाल-पाल, मालवीयजी, गाँधीजी   – सबका जमावड़ा है। ब्रज किशोर बाबु से बात हो गयी है। चम्पारण की दुर्दशा को लखनऊ के मंच पर उतारने की तैयारी है। अपना जत्था लेकर राजकुमार मूनिस और  संत राउत के साथ लखनऊ पहुँचते हैं। मंच से राजकुमार जनसभा को अपनी भोली-भाली गँवई बोली में चम्पारण के कृषकों की व्यथा सुनाकर रुला देते हैं। गाँधी  के सामने स्वयं सत्याग्रह की मुद्रा में निहोरा-पाती कर उन्हें चम्पारण चलने के लिए मना लेते हैं। इस पूरे प्रकरण के नाट्यांकन में नाटककार ने गागर में सागर भर दिया है। गाँधी का चम्पारण आगमन, वहाँ की माटी में सत्याग्रह का बीजारोपण, जन-जन को सत्य और अहिंसा के दर्शन से ओत-प्रोत  करना, शिक्षा, स्वास्थ्य, सफ़ाई एवं सामाजिक सुधार के आन्दोलन  से चम्पारण  के मन प्राण को अनुप्राणित करना और अन्तत: निलहों के ज़ुल्म से चम्पारण  की मुक्ति – इस घटना चक्र को अपनी समग्रता में दिवाकर राय जी की लेखनी इस नाट्य-कृति में सहेजती है। नन्हकी की आवाज़ में चम्पारण की नारी का वीरांगना स्वर गूँजता है – ‘अब तो यहाँ ज़नाना भी मर्दाना हो गयी है’।
रुग्ण राजकुमार का अपनी पत्नी, केवल, से यह आग्रह कि उनके मरने पर उनको मुखाग्नि उनकी बेटी, देवपति, दे; राजकुमार के प्रगतिशील सामाजिक और धार्मिक दर्शन को पाठकों के समक्ष रखती है। साबरमती में बीमार राजकुमार गाँधी से पूछ बैठते हैं, ‘महात्मा जी, क्या हम अपनी आँखों से आज़ादी देख पाएँगे?’ यह प्रश्न गाँधी  को निष्काम कर्मयोगी की मुद्रा में धकेल देता है।
साबरमती से लौटते ही राजकुमार अपनी पंचभूत देह का त्याग कर देते हैं। उनके श्राद्ध में उनके चिर शत्रु एम्मन की आँखों का भर आना, श्राद्ध के ख़र्चे के लिए उसका तीन सौ रुपए भेजना और एम्मन के मुँह से राजकुमार शुक्ल के लिए श्रद्धा के ये शब्द निकलना कि ‘वह चम्पारण  का अकेला मर्द था’, इस नाटक के शीर्षक ‘नील नायक’ को पूरी सार्थकता और सोद्देश्यता प्रदान करता है।
यह नाट्य कृति अपनी विधा के सर्वांगों में संपुष्ट और परिपूर्ण है। प्रकाशन स्तरीय है। किताब की बँधाइ भले थोड़ी शिथिल हो किन्तु भावों और शब्दों की बँधाइ और बुनावट अत्यन्त  सुगठित, सरस और प्रांजल है। नाटककार अपने उद्देश्य में शत प्रति शत सफल हैं। इस अच्छी कृति के लिए नाटककार दिवाकर राय जी को बधाई।