Wednesday, 16 September 2026

नदी कोरी है।



 कवयित्री नीरज सिंह अपनी आँखों में दुनियावी जीवन के  यथार्थ को समझने-बुझने की अबूझ प्यास पाले हुए हैं। यहीं अबूझपन उनकी कविताओं में शब्द बनकर  फूटता है।  उनकी पुस्तक ‘नदी कोरी है’ अभी सामने है। धीमे-धीमे धूमिल होती  आदर्श की  आशाओं को अपनी मुट्ठी में थामे रखने के ‘ख़्वाब’ के साथ नीरज जी की यथार्थ के धरातल पर ‘वापसी’ में उनकी अंतर्भूत विरसता की अभिव्यक्ति को बहिर्मुख विस्तार मिलता है।  यहाँ ज़िंदगी ख़ुद से जुदा होकर एक एलीयन की तरह खड़ी है। इनकी कविताएँ ज़िंदगी की विद्रूपताओं के त्रास से दंशित मनुष्य के आत्मिक विखंडन का आख्यान है, जहाँ :

“बनते  बिगड़ते इन चेहरों में 

एक ही आकार, एक ही बनावट है।“

कवयित्री की सकारात्मकता में यह साफ़ सफ़्फ़ाक झलकता है कि:

“भोर की नयी किरणों में गाएगी

 जब यह धरती, नाचेंगे जब पवन 

थिरकेंगे तेरे भी पाँव, उठना

तब तू भी हो मगन 

सुन! ओ मेरे मन!”

नीरज जी संवेदना की गीतकार हैं। मानवीय अंतर्द्वंद्व की वह गहरी पड़ताल करती हैं और मुक्ति की आशा का राग गुनगुनाती हैं। जीवन के पग-पग की प्रतिकूलताओं से वह  प्रतिहत तो होती  हैं, किंतु हतोत्साहित किंचित नहीं! प्रत्युत, प्रकृति, अनुभव, इतिहास और मिथकों के गर्भ में बैठे तदनुकूल संदर्भों से वह ऊर्जा ग्रहण करती हैं और संघर्ष का शंखनाद करती हैं। निराशा के तम में लिपटे निविड़ अरण्य में उनकी कविताएँ आशा का सूर्योदय हैं। वह समस्यायों की नहीं, वरन समाधान की कवयित्री हैं। अपनी अभिव्यंजनाओं के प्रतीकार्थ जड़ पदार्थों में चेतना का आरोपण वह मानवीकरण अलंकार में करती हैं। कई बार ‘स्व’ से संवाद करती कवयित्री अपनी आत्मा से परा, पश्यंती और मध्यमा के पड़ावों को पार कर ‘सर्वात्म’ की वैखरी में बिखर जाती हैं। यही उनका काव्य सौंदर्य है।

 पहली प्रतिध्वनि तो यही है, “ज्यों-ज्यों बुड़े स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जल होय।“

रश्मि प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित ‘नदी कोरी है’ उस सद्य:प्रशांत झील की तरह प्रतीत हो रही है जिनमे क्षण भर पूर्व ही प्रतिघाती पत्थरों ने अपने आपतन आघात से उथल-पथ मचा रखा हो।

अस्तु, 

पुस्तक - नदी कोरी है ( कविता संग्रह )

प्रकाशक - रश्मि प्रकाशन, लखनऊ 


Sunday, 13 September 2026

छन्द जिज्ञासा के



आदरणीय जिज्ञासा जी की तीन पुस्तकें मिलीं। नक्षत्रों ने दीप जलाए (कविता संग्रह), माटी तेरा मोह न छूटा ( गीत संग्रह) और फूलों वाली मेरी पुस्तक (बाल गीत संग्रह)। तीनों पुस्तक अपने आप में अनूठी हैं। उन्हें हार्दिक बधाई। इन पुस्तकों की अर्गला खोलने का एक छोटा प्रयास। 

नक्षत्रों ने दीप जलाए
(कविता संग्रह)
(प्रकाशक – भारतीय साहित्य संग्रह, १०९/१०८, नेहरू नगर, कानपुर) 

संग्रह का श्री गणेश ‘सरस्वती वन्दना’ से होता है। ज़िन्दगी की धूप-छाँह से लुका-छिपी खेलती कवयित्री जिज्ञासा की भाव-यात्रा का अवलोकन करता पाठक स्वयं अपने अन्दर  जीवन दर्शन की जिज्ञासा भर लेता है। कहीं निराशा का तिमिर छा जाता है। इसे पोंछ कर जिज्ञासा आशा की अमृत बूँदों को छींटती है। कभी कोई अपना अचानक बिछूड़कर विरह के प्रभूत ताप में जलने को छोड़ जाता है। कविताएँ जीवन में कुछ खो जाने से उत्पन्न विछोह को पछाड़ती हुई कुछ पाने की उत्कण्ठा और उत्साह का वाचन करती हैं। मन को चेतना के आलोक से ज्योतित करने की कामना से परिपूर्ण जिज्ञासा अपने संघर्ष पथ पर एक सकारात्मक सन्धान का आह्वान करती हैं। जीवन का हर दिन कवयित्री के लिए एक नवीन संघर्ष की कहानी है जहाँ – ‘मुझमें जीती मेरी सरिता/ ढूँढ रही अपना निष्कर्ष’। सुख दुःख की आँखमिचौनि में सब कुछ उलझा-उलझा- सा लगता है – ‘ताना- बाना सब उलझा है/आज सबेरा बुझा – बुझा है’। तथापि, कवयित्री का मन अपने आन्तरिक उमंग, उत्साह और ऊर्जा से अपनी जिजीविषा को सहेजता है और अभिलाषाओं के अन्तरिक्ष में अपनी उड़ान की अभिप्सा का गीत गाता है – ‘बाज़ जैसे पंख होते काश/ चूमती नभ पार का आकाश’। जीवन की नश्वरता से कवयित्री अपने जीवन का गीत गुनती हैं।  आना-जाना तो नियम है। सृष्टि के उपवन में संहार भी झूलता है, - ‘सृष्टि का संहार निश्चित/है नहीं संदेह किंचित’। इस सत्य का भान भी मनुज जीवन से सांसारिकता की भाव-छाया को हटा नहीं पाता। लोभ, मोह, अमर्ष, मत्सरता, सुख, दुःख आदि के  भाव-अंकुश में आबद्ध मनुष्य जीवन के मूल लक्ष्यों से भटक गया है। प्रकृति से उसका सन्तुलन भंग हो गया है। इस असन्तुलन  का आघात पर्यावरण की विरूपता में व्यक्त हो रहा है। पृथ्वी त्राहि-त्राहि कर रही है – ‘धारिणी छल छल जरी है/ उर्वरा मुँह बल पड़ी है// कोख में शस्या मरी है/शोक का प्रालाप मत लो’। धरती की यह तड़प उस पौराणिक आख्यान का पुनर्पाठ-सा है जब पापों के बोझ से दबी-दुबकी धरती गाय का वेश बनाकर त्राहिमाम पुकारती ईश्वर के समक्ष उपस्थित होती है। आकाश चतुर्दिक प्रदूषित है। मानव जीवन की इस विद्रूपता पर जिज्ञासा का आर्त्तनाद मन को छूता है – ‘वो मेरा आकाश लेकर उड़ गया है/ और मैं हतप्रभ खड़ी हूँ’। मानों किसी अपने ने ही कवयित्री  के मन में बेवफ़ाई का ख़ंजर घोंप दिया हो!   इसकी वेदना की सघनता ने उसे संज्ञाशून्य कर दिया है। अभिव्यक्ति के शब्दों को उसकी छटपटाहट ने छीन  लिया है। आँसुओं की धार सुख गयी है। जीवन का हर पल मरुस्थल सा तप्त है –‘सूखे रेतीले मरुस्थल में/बीत रहे हर बीते पल में/डूब रही हूँ’। नैराश्य के इस दुर्निवार प्रहर में कवयित्री का मन अजीब ऊहापोह में है – ‘ना जागती है, ना सोती है/ना हँसती है, ना रोती है/ भावों की शैया पर लेटी/ फ़सल फ़ासलों की बोती है’। इन  समस्त प्रतिकूलताओं के पलते पल में भी जिज्ञासा अपने विकल भाव से मुक्ति पाने को सतत प्रयत्नशील है। उनके विरह आकुल मन ने आशा का सम्बल नहीं छोड़ा है। उनकी अभिलाषाएँ अँगड़ाइयाँ ले रही हैं। निराशा के नीरव तिमिर में उन्हें जीवन का नवगीत सुनाई दे रहा है। इस आस-निराश के भ्रम से उबरने का कवयित्री का संघर्ष सतत है और यथार्थ है –‘घूँघरुओं की चाप मुझ तक आ रही है/या घटा पायल पहनकर फिर मुझे भरमा रही है’। कवयित्री के मन से अब अवसाद के बादल छँट चुके हैं –‘नक्षत्रों ने दीप जलाए/उतर मेरे नैनों में आए’। अब विरहिनी प्रेमिका ने अपने प्रियतम को पाने की ठान ली है –‘सखी, सुन लो प्रीतम के घर मुझको जाना है’। अब उसने अपने अन्तर्मन की चेतना के आलोक में अपने आत्मविश्वास को सहेज लिया है – ‘एक सृष्टि मैं बनाऊँगी/नए परमाणु की/निर्माण का हर यत्न करके/ओ मनुज तुम देखते जाना’।
कवयित्री की भावनाएँ  अत्यन्त  आत्म बोधात्मक शैली और मानवीयकरण अलंकार में जीवन के उत्थान-पतन, घात-प्रतिघात, मिलन-विरह, प्यार-दुत्कार, निशा-दिवा और  सृष्टि-संहार से उपजी ऊहापोह और उस ऊहापोह से उबरने की उत्कण्ठा है।  यह कविता संग्रह  मानव हृदय के इसी ऊहापोह से निकले जिज्ञासा की शब्द वीणा पर आकुल उत्कण्ठा के अनूठे रागों वाला मधुर गीत है।

माटी तेरा मोह न छूटा
(गीत -संग्रह) 
(प्रकाशक – वनिका पब्लिकेशंस, एन ए १६८, गली नम्बर ६, विष्णु गार्डन, नयी दिल्ली – ११००१८)

जिज्ञासा के गीतों के स्वर, सुर, ताल, लय और व्यंजन का प्रसव उनकी भावनाओं की कुक्षी से होता है। ये भाव सीधे उनकी हिया के गह्वर से प्रस्फुटित होते हैं। फिर, मन की रागिनी बनकर उनके होठों पर मन्द-मन्द सिहुरने लगते हैं। यही सिहरन शब्द बनकर इस गीत संग्रह में मचल उठा है। घटा से उतरते मेह मन को मुदित करते हैं। यह मोद कवयित्री के कण्ठ का मल्हार बनकर इस संग्रह में बरसा है। वर्णांजलि अनुप्रास की छटा बनकर बहने लगी है – ‘घनन-घनन घनघोर घटा घन, घूम घूम घन घन घन, छमक छमक छम छम्मक छम्मक, छनन छनन छन छन छन, झूम झूम झंकार झनक झन, झमक झमक  झम झमझम, चमक चमक चमकार चमक चम, चपला चमचम चमचम, बूँद-बूँद बरसें बूँदें, बड़बोली बहे बयार, मुदित मन मोहित में मल्हार’। उनकी चितवन में कभी माटी का मोह उभर आता है, ‘माटी तेरा मोह न छूटा’, तो कभी अभिसार के अनन्त पथ पर अपनी आँखें बिछायी कवयित्री का कुसुमाकर मन अपने प्रियतम संग मौन संवाद करने लगता है, ‘मैं गीत प्रेम के लिख बैठी, मनमीत मुसाफ़िर पढ़ लेना’।  कवयित्री के प्रीत की तान में अर्पण की एकनिष्ठा है। उसमें स्थिरता है। उसमें समर्पण का योग है। उसकी प्रेम-चुनर में नेह के सितारे टँके हैं। यही उसका शाश्वत श्रिंगार है – ‘प्रीति का परिधान सुन्दर, आज पहनो कल उतारो, न चलेगा, यह कोई खेला नहीं, जो जीत लेगा’।
कवयित्री के गीतों का सरोकार प्रकृति और पर्यावरण से भी उतना ही गहरा है, - ‘कंकरीटों के वनों की छाँव त्यागो, धुएँ की बहती नदी से दूर भागो/ लगी जो आग पानी में, जलाएगी धरा कण-कण/ कि छालें ही पड़ेंगे, गड़ेंगे शूल’। समाज  का समसामयिक सच अपने प्रखर स्वर में जिज्ञासा के गीतों में गूँजा है। लिंगभेद और बेटी भ्रूण हत्या से उनका मन आहत है। तज्जन्य करुणा इनके लबों पर सहसा छलक उठती है, ‘प्रसव की पीड़ा तिरस्कृत, हो जहाँ पर जन्म लेते/ लिंग निस्तारण प्रभेदी, भ्रूण परिचय मर्म सेते/ संविदा की नवल धरती, क्या दुहेगी क्या दुहेगी, गूँज की उस माप करना/ भूमि का उस त्याग करना’। कवयित्री जिज्ञासा का अन्तर्मन सृजन के संस्कार से सिंचित है।  उनका कल्पना-बिम्ब रचनात्मक है। उनकी रचनाओं से सकारात्मकता का सोता बहता है। जीवन की वाटिका में कोयल की आशा भारी कूक उनके गीतों में सुर भरती हैं। उनकी मधुर तान से फूलवारी का हर फूल पुलकित होता है – ‘टहनियाँ फूल से भरने लगी हैं,  … कमल-शतदल किया रोपित, हर तरफ़ कलियाँ खिली, हँसने लगी हैं’।
इक्यासी गीतों के इस संग्रह का हर गीत जीवन उपवन के डाल-डाल पर खिलखिलाते खग-वृन्द का वह मधुर कलरव है जिसमें हर कली का रंग है, हर फूल की सुगन्ध है, हर पत्ते की थिरकन है, हर मिलिन्द का मकरन्द है, हर तितली के सोहर का छन्द है, मन्द पवन की मदमस्त लहर का वेग है, झूमती वनस्पतियों की बहार है और प्रकृति-वनिता के अंग-प्रत्यंग के श्रिंगार का विलास है। यह सरस संग्रह पठनीय तो है ही, संग्रहणीय भी है।

फूलों वाली मेरी पुस्तक 
(बाल-कविता संग्रह)
(प्रकाशक – वनिका पब्लिकेशंस)
‘मातु शारदे मन में बसना, ज्ञान ध्यान तप देने वाली, मुझे सिखा दो पढ़ना लिखना’, इस बाल सुलभ शारदे वन्दना से श्री गणेश होनेवाली पैंतीस बाल कविताओं की सुवासित माला ‘फूलों वाली मेरी पुस्तक’ अत्यन्त मन भावन है। यह कवयित्री जिज्ञासा सिंह के सरल और निश्छल मनोभावों की मधुर और मोहक अभिव्यक्ति है। आज के युग में नयी पीढ़ी की पढ़ने-लिखने की प्रवृति से छत्तीस का आँकड़ा बनता नज़र आ रहा है। ऐसे समय में बच्चों के लिए सरस कविताएँ लिखकर उन्हें किताबों की ओर आकर्षित करना एक स्तुत्य प्रयास है। कविताओं का मिज़ाज भी पूरी तरह बाल मनोविज्ञान के अनुरूप है। क़लन्दर, बन्दर, चौकलेट, टौफ़ी, जैसे शब्दों का प्रयोग बच्चों की चुहलबाज़ी और चटुल कल्पना शक्ति को बड़ी सजीवता से उकेरती है। बाल मन में उठने वाली हाथी की आकृति की बानगी देखिए – ‘हाथी तेरे कान बड़े/मुझे देखते खड़े खड़े/ … हाथी तेरी नन्ही पूँछ/ लगी हुई है उसमें मूँछ’। आम का रसीला वर्णन बरबस बाल मन को मोहता है –‘फल का राजा घनी छाँव देने वाल/सो जाता पल भर में राही मतवाला’। सरल एवं सुबोध शब्दावली में ऐसी बाल कविताएँ बच्चों के कोमल मन में पर्यावरण के प्रति प्रेम के संस्कार का बीजारोपण भी करती हैं। ‘समुन्दर’, ‘मम्मी की साड़ी’, ‘बादल भैया’, तितली जैसी फ़्रॉक’, किसने फाड़ी मेरी पुस्तक’, होली का त्योहार’, ‘रेल आ गयी’, ‘प्यारा सा ख़रगोश’, ‘मछली के संसार में’, ‘मोटा तगड़ा भालू’, ‘चौराहे की लाइट’ आदि कविताएँ अपनी अद्भुत मनभावन शैली और मनोहारी शब्द-व्यंजना में बालकों को न केवल कविताओं की ओर खिंचती है, प्रत्युत उनके ज्ञान के वितान और उनकी जिज्ञासा को एक व्यापक विस्तार भी देती है। कवयित्री की यह ‘फूलों वाली मेरी पुस्तक’ सामयिक अपेक्षाओं पर सौ फ़ीसदी खरी उतरती है। जिज्ञासा ने बड़ी कुशलता से इस बाल कविता स्तवक के माध्यम से यह प्रमाणित कर दिया है कि ‘जीवन में उतार-चढ़ाव, दुःख-सुख आते रहेंगे लेकिन बचपन नहीं मरना चाहिए’। यह पुस्तक बाल साहित्य की सशक्त रचनाकार उनकी बहन स्वर्गीय अर्चना सिंह के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि भी है। 
 


Friday, 4 September 2026

नील नायक


 



नील नायक 
विधा – नाटक 
नाटककार -डॉक्टर दिवाकर राय 
प्रकाशक -लोकनाथ प्रकाशन, वैष्णो कालोनी, पराग डेयरी के पीछे 
सीतापुर – २६१००१, मोबाइल - ९६७०१००२७०

डॉक्टर दिवाकर राय की प्रस्तुत नाट्य-कृति ‘नील नायक’ न केवल चम्पारण आन्दोलन के अग्रणी नायक श्री राजकुमार शुक्ल की पावन स्मृति का पुनर्पाठ है, अपितु हमारी भूली-बिसरी विरासत को बटोरने का एक पुनीत प्रयास भी है। मैं बार-बार इस बात पर बल देता हूँ कि वे पीढ़ियाँ बड़ी आभागी होती हैं जिनकी कोई विरासत नहीं होती, जिनका कोई इतिहास नहीं होता। किन्तु, उससे भी बड़अभागी वे पीढ़ियाँ होती हैं जो अपनी महान विरासत को विस्मृत कर देती हैं। विशेषकर आज के संदर्भ में काल-क्रम की ऐसी चौखट पर जब तथाकथित ‘जेन-जी’ पीढ़ी अपने इतिहास नायकों की यादों से दूर होती जा रही हो और राजनीति दिशाहीनता का आखेट बनती जा रही हो, ऐसी कृतियों का लेखन एक सजग साहित्यकार का स्तुत्य प्रयास है। राजकुमार शुक्ल के व्यक्तित्व और कृतित्व को अपने नाटक ‘नील नायक’ में प्रस्तुत कर दिवाकर राय जी ने साहित्य के एक कर्तव्यनिष्ठ नायक की अपनी भूमिका को भी रेखांकित किया है। नाटक की विधा सर्वदा से एक  लोक रंजक और लोक कल्याणकारी विधा रही है। अपने श्रव्य और दृश्य प्रभाव से यह पाठक, श्रोता और दर्शक के मन को सीधे छूती है। भारतीय परम्परा में यह विधा हमारी जातीय संस्कृति के आन्तरिक दर्शन को प्रतिबिम्बित करती है। नाटककार, रंगमंच और दर्शक उस दर्शन की भाव-धारा में एक साथ बहते हैं। रंगमंचीय अभिनय दर्शक को अपने पात्रों के व्यक्तित्व और कृतित्व के असाधारण तन्तु  से जोड़ता है और दर्शक स्वयं उस पात्र विशेष का प्रतीकात्मक बिम्ब बन जाता है। रंगमंच की यही सोद्देश्यता इस कला की आत्मा होती है।  दिवाकर राय जी की प्रस्तुत कृति इसकी प्रामाणिकता का जीवन्त दस्तावेज़ है। कथानक परतन्त्र भारत में बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक के उस काल खण्ड का है जब अंग्रेज़ नीलहे ज़मीन्दारों के तीनकठिया तिकड़म के अत्याचार में चम्पारण  की जनता सिसक रही है। उस ज़ुल्म के ख़िलाफ़ इसी माटी का एक किसान बेटा अपनी आवाज़ बुलन्द करता है। वह एक जन आन्दोलन  खड़ा करता है और इस आन्दोलन  को राष्ट्रीय फ़लक पर लाकर चम्पारण  को गाँधी के सत्याग्रह की प्रयोग भूमि बनाता है। अत्याचारियों के हौसले पस्त हो जाते हैं। किसानों को मुक्ति मिलती है।
नाटक में घटनाएँ पुरानी हैं किन्तु अभिव्यक्ति का टटक़ापन है। भाषा में चित्रात्मकता है, गति है और धार है।  दृश्य में नैसर्गिकता और सजीवता  है। ‘खटिया’, ‘बिट्ठा’, ‘सुरती’, ‘अनेरिया’, ‘दुब्बर’, ‘जवार’ जैसे देशज शब्दों की बहार है। संवाद में बोली की मिठास है। पाठक को बरबस महसूस होता है कि वह गाँव की किसी बैठकी में बैठा हुआ है। कहीं-कहीं चौपाल की चुहालबाज़ी भी है। भोजपुरी की तरंगे संवादों में लहराती हैं। हालाँकि, नाटककार के अन्दर  का शिक्षक अपने व्याकरण बोध की गरिमा में कहीं-कहीं उसकी लेखनी को पकड़कर उसके देसी अन्दाज़ को लुलुआ देता है। जैसे बिगन के मुँह  से  उसकी असली भाखा ‘फेरु  एगो बात सुने में आ रहा है’ को निकालकर अपनी परिमार्जित भाषा गढ़ लेता है, ‘फिर भी एक बात सुनने में आ रही है’। तथापि, एक बात के लिए नाटककार को दाद देनी पड़ेगी कि उसने अपनी पूरी रचना में गँवई लोकोक्तियों और मुहावरों की मनोहारी छटा बिखेर दी है।  बानगी देखिए, ‘बिगन - …  जानते हैं न कि जब सौ गो अनेरिया मरता है, तब जाकर एगो हरामी पैदा होता है’, …  ‘लखन – पल्ला नहीं पटका परुआ बैल की तरह’, …‘राजकुमार – चिल्लर के भय से भगई पहनना बन्द कर दिया जाय’, … ‘अकलु – लुत्ती को भी लहास बनते ज़्यादा समय नहीं लगता’, … ‘मँगनी – उसकी अँतड़ी में भी बुद्धि है’, … ‘राजकुमार – जो चरावे दिल्ली, उसको चरावे करीकी पिल्ली’। भाखा के इस ठेठ अन्दाज़ से समूचा संवाद पटा पड़ा है। यह नाटककार की भोजपुरी समाज के आचार, विचार और संस्कार पर गहरी पकड़ का परिचायक है।
नाटक की भूमिका का प्रभावी निर्माण आँचलिक बयार के वासन्ती उपवन में होता है। इसमें बालसुन्दर का लोक गीत ‘जोगिया का भेली’ घोर देता है –
‘एहो, कूदे जइसे बछरु दुआर
हाथवा में ले के घइलवा।
गोरियाँ चलेली इनार …’   
हाँफते-दौड़ते भूखल अहीर की पंचायत बुलाने की राय, लखन का कोठी पर जाने का मशविरा, बालसुन्दर के मन में पइसा कोठी का डर, और राजकुमार की ललकार – नाटककार की अद्भुत दृश्य-संवाद योजना है जो कथानक के भवितव्य के ताने-बाने बुन रही है। कोठी का नुमाईन्दा, मँगनी, इस पंचायत को बग़ावत क़रार देता है। अकलु के साथ उसकी कोठी के कान भरने की भाखा में राजकुमार एक विद्रोही के रूप में उगते हैं।  नीलहा कोठी का अंगरेज ज़मीन्दार, एम्मन, राजकुमार के ख़िलाफ़ फिर अपना फेंटा खोंस लेता है। इधर राजकुमार गाँव वालों के मन में अपने अन्दाज़ में पौराणिक कथाएँ सुनाकर विद्रोह के तेवर जगा रहे हैं। 
कोठी की नाफ़रमानी एम्मन का कोड़ा बनकर राजकुमार की पीठ पर बरसती है। कोड़े खाकर भी उनकी स्तब्धता में गाँधी  की वह छवि उकर आती है जब गाँधी को ट्रेन से समान सहित पीटरमारिट्जबर्ग रेलवे स्टेशन पर फेंक दिया गया था। इस जगह पर नाटककार दिवाकर राय जी भी अपनी अद्भुत चित्रात्मक शैली के साथ उपस्थित होते हैं। ‘इ दो कोड़ा की मार ही आपके राक्षसी राज रूपी ताबूत की अन्तिम कील साबित होगी’ – राजकुमार की यह चेतावनी एम्मन के सीने में ख़ंजर की तरह उतरती है, मानो यह व्यंजना ब्रितानी हुकूमत का भविष्य उचार रही हो।
गौरैया, मेढक, मधुमक्खी और कठफोड़वा की कहानी में लक्षणा की शब्द-शक्ति है। राजकुमार बड़ी सरलता से अपनी रणनीति का ख़ुलासा कर रहे हैं। गाँव के लोगों से उनकी बातचीत में तत्कालीन निरंकुश कर-प्रणाली का भाण्डा फूटता है। करों की भरमार है – मोटरही, घोड़ही, नवही, हथियही, कोल्हूआवन, चूल्हीआवन, महापातरी, हक़-जुर्माना, कटहली, अमही, फगुनही, दशहरी, दावातपूज़ही, भेंटही, मँड़वच, सगौड़ा, बेंचाही, बाँट-छपी, रसीदावन, तहरीर, हिसाबन, राजाअंश  … और  ना जाने कितने अन्य टैक्सों की चक्की में चम्पारण  की उन्नीस लाख ग़रीब जनता पिस रही है।
कोठी का कूटनीतिक छल-कपट अपने उछाल पर है। संत राउत को कोठी बहरिया देता है। राजकुमार, रोज़ा मियाँ और राजबली पर मुक़द्दमा ठोक दिया जाता है। कोठी के स्थानीय चमचे जासूस हवा सूँघते फिर रहे हैं। रघुवीर की बोली में नाटककार के कटाक्ष की धार है – ‘जबतक टाँगी में लकड़ी का बेंट नहीं होगा, टाँगी पेड़ नहीं काटेगी’।  राजकुमार के जेल से निकलते ही आन्दोलन को अब एक ऊँचे फ़लक पर विस्तार देने की सुगबुगाहट सुर पकड़ लेती है।
पत्रकार पीर मुहम्मद मूनिस और राजकुमार में गहरी छनती है। राजकुमार शोषण के प्रति विद्रोह-भाव की प्रतिमा हैं तो मूनिस उन भावनाओं की बौद्धिक आवाज़। मूनिस की मसि राजकुमार की असि है।  राजकुमार की पीड़ा को पीर अपने लेखन में स्वर देते हैं। यह आलेख गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘प्रताप’ में कानपुर से छपता है। यह अख़बार चम्पारण की चिंगारी को पूरे देश में छींटता है। दिवाकर राय जी ने बड़ी कुशलता से पीर और राजकुमार के वार्तालाप में ग़ुलाम हिन्दुस्तान में चम्पारण के किसानों की वेदना का नाट्य चित्र खिंचा है। समकालीन राजनीतिक परिदृश्य भी बड़ी सजीवता से उभर कर आता है। लखनऊ में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन आहूत है। कांग्रेस, हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग, नरम-गरम, लाल-बाल-पाल, मालवीयजी, गाँधीजी   – सबका जमावड़ा है। ब्रज किशोर बाबु से बात हो गयी है। चम्पारण की दुर्दशा को लखनऊ के मंच पर उतारने की तैयारी है। अपना जत्था लेकर राजकुमार मूनिस और  संत राउत के साथ लखनऊ पहुँचते हैं। मंच से राजकुमार जनसभा को अपनी भोली-भाली गँवई बोली में चम्पारण के कृषकों की व्यथा सुनाकर रुला देते हैं। गाँधी  के सामने स्वयं सत्याग्रह की मुद्रा में निहोरा-पाती कर उन्हें चम्पारण चलने के लिए मना लेते हैं। इस पूरे प्रकरण के नाट्यांकन में नाटककार ने गागर में सागर भर दिया है। गाँधी का चम्पारण आगमन, वहाँ की माटी में सत्याग्रह का बीजारोपण, जन-जन को सत्य और अहिंसा के दर्शन से ओत-प्रोत  करना, शिक्षा, स्वास्थ्य, सफ़ाई एवं सामाजिक सुधार के आन्दोलन  से चम्पारण  के मन प्राण को अनुप्राणित करना और अन्तत: निलहों के ज़ुल्म से चम्पारण  की मुक्ति – इस घटना चक्र को अपनी समग्रता में दिवाकर राय जी की लेखनी इस नाट्य-कृति में सहेजती है। नन्हकी की आवाज़ में चम्पारण की नारी का वीरांगना स्वर गूँजता है – ‘अब तो यहाँ ज़नाना भी मर्दाना हो गयी है’।
रुग्ण राजकुमार का अपनी पत्नी, केवल, से यह आग्रह कि उनके मरने पर उनको मुखाग्नि उनकी बेटी, देवपति, दे; राजकुमार के प्रगतिशील सामाजिक और धार्मिक दर्शन को पाठकों के समक्ष रखती है। साबरमती में बीमार राजकुमार गाँधी से पूछ बैठते हैं, ‘महात्मा जी, क्या हम अपनी आँखों से आज़ादी देख पाएँगे?’ यह प्रश्न गाँधी  को निष्काम कर्मयोगी की मुद्रा में धकेल देता है।
साबरमती से लौटते ही राजकुमार अपनी पंचभूत देह का त्याग कर देते हैं। उनके श्राद्ध में उनके चिर शत्रु एम्मन की आँखों का भर आना, श्राद्ध के ख़र्चे के लिए उसका तीन सौ रुपए भेजना और एम्मन के मुँह से राजकुमार शुक्ल के लिए श्रद्धा के ये शब्द निकलना कि ‘वह चम्पारण  का अकेला मर्द था’, इस नाटक के शीर्षक ‘नील नायक’ को पूरी सार्थकता और सोद्देश्यता प्रदान करता है।
यह नाट्य कृति अपनी विधा के सर्वांगों में संपुष्ट और परिपूर्ण है। प्रकाशन स्तरीय है। किताब की बँधाइ भले थोड़ी शिथिल हो किन्तु भावों और शब्दों की बँधाइ और बुनावट अत्यन्त  सुगठित, सरस और प्रांजल है। नाटककार अपने उद्देश्य में शत प्रति शत सफल हैं। इस अच्छी कृति के लिए नाटककार दिवाकर राय जी को बधाई।