Wednesday, 16 September 2026

नदी कोरी है।



 कवयित्री नीरज सिंह अपनी आँखों में दुनियावी जीवन के  यथार्थ को समझने-बुझने की अबूझ प्यास पाले हुए हैं। यहीं अबूझपन उनकी कविताओं में शब्द बनकर  फूटता है।  उनकी पुस्तक ‘नदी कोरी है’ अभी सामने है। धीमे-धीमे धूमिल होती  आदर्श की  आशाओं को अपनी मुट्ठी में थामे रखने के ‘ख़्वाब’ के साथ नीरज जी की यथार्थ के धरातल पर ‘वापसी’ में उनकी अंतर्भूत विरसता की अभिव्यक्ति को बहिर्मुख विस्तार मिलता है।  यहाँ ज़िंदगी ख़ुद से जुदा होकर एक एलीयन की तरह खड़ी है। इनकी कविताएँ ज़िंदगी की विद्रूपताओं के त्रास से दंशित मनुष्य के आत्मिक विखंडन का आख्यान है, जहाँ :

“बनते  बिगड़ते इन चेहरों में 

एक ही आकार, एक ही बनावट है।“

कवयित्री की सकारात्मकता में यह साफ़ सफ़्फ़ाक झलकता है कि:

“भोर की नयी किरणों में गाएगी

 जब यह धरती, नाचेंगे जब पवन 

थिरकेंगे तेरे भी पाँव, उठना

तब तू भी हो मगन 

सुन! ओ मेरे मन!”

नीरज जी संवेदना की गीतकार हैं। मानवीय अंतर्द्वंद्व की वह गहरी पड़ताल करती हैं और मुक्ति की आशा का राग गुनगुनाती हैं। जीवन के पग-पग की प्रतिकूलताओं से वह  प्रतिहत तो होती  हैं, किंतु हतोत्साहित किंचित नहीं! प्रत्युत, प्रकृति, अनुभव, इतिहास और मिथकों के गर्भ में बैठे तदनुकूल संदर्भों से वह ऊर्जा ग्रहण करती हैं और संघर्ष का शंखनाद करती हैं। निराशा के तम में लिपटे निविड़ अरण्य में उनकी कविताएँ आशा का सूर्योदय हैं। वह समस्यायों की नहीं, वरन समाधान की कवयित्री हैं। अपनी अभिव्यंजनाओं के प्रतीकार्थ जड़ पदार्थों में चेतना का आरोपण वह मानवीकरण अलंकार में करती हैं। कई बार ‘स्व’ से संवाद करती कवयित्री अपनी आत्मा से परा, पश्यंती और मध्यमा के पड़ावों को पार कर ‘सर्वात्म’ की वैखरी में बिखर जाती हैं। यही उनका काव्य सौंदर्य है।

 पहली प्रतिध्वनि तो यही है, “ज्यों-ज्यों बुड़े स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जल होय।“

रश्मि प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित ‘नदी कोरी है’ उस सद्य:प्रशांत झील की तरह प्रतीत हो रही है जिनमे क्षण भर पूर्व ही प्रतिघाती पत्थरों ने अपने आपतन आघात से उथल-पथ मचा रखा हो।

अस्तु, 

पुस्तक - नदी कोरी है ( कविता संग्रह )

प्रकाशक - रश्मि प्रकाशन, लखनऊ 


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