मोही और दद्दू
(बाल गीत संग्रह, नोशन प्रेस, चेन्नई)
लेखक – डॉ० किशोर सिन्हा
व्यक्ति जैसे-जैसे अपने वय की सन्ध्या की ओर क़दम बढ़ाता है, उसके हृदय में वैसे- वैसे बचपन की उषा मचलने लगती है। मन के शिशु की स्निग्ध खिलखिलाहट से उसका अन्तस सराबोर हो उठता है। जीवन की हर लय और ताल में उसे बचपन के सुर सुनायी देने लगते हैं। एकदम निर्दोष, निर्द्वंद्व, निरीह और निश्छल भाव! जैसा अन्दर, वैसा बाहर। कहीं कोई अनुताप नहीं, कोई पश्चाताप नहीं। सब कुछ शीतल, निर्भ्रान्त और निर्मल। ऐसे में एक बालक का संग उसे बालपन से आपूर्ण आप्यायित कर देता है। उसकी अवस्था की परिपक्वता, विचारों की प्रगल्भता और अभिव्यक्ति की प्रौढ़ता बालपन की चाशनी से लेपित हो जाती है।एक ऐसे शाश्वत नेह की डोरी में वह बंध जाता है जहाँ ‘ईमानदार सच्चाई भी है और फ़ैंटेसी भी - पर ये उस स्वप्न की तरह है, जिसका प्रभाव आँख खुल जाने पर भी देर तक रहता है’।
उसकी यह बाल-मैत्री न केवल उसे एक बालक में बदल देती है, बल्कि उसके बाल मुख में बाल गोविन्द की तरह समूचा ब्रह्माण्ड अँट जाता है और इस चराचार जगत के समस्त गूढ़ दर्शन उसकी चक्षु-दृष्टि में समा जाती है। शैशव के इस सर्व समाहारी स्वरूप के समक्ष उसके अपने अनुभवों का संसार ठिगना बन जाता है। विचारों का सागर भावों की जलधार के उद्गम में खो जाता है।
अपनी पोती मोही का साथ दद्दू किशोर के अंदर जीवन का एक ऐसा ही अमृत बोध जगा जाता है। ऐसे में यदि वह मोही की मधुर भावनाओं की थाप को अपने शब्दों में उतार दे तो ‘मोही और दद्दू’ का यही आलाप एक पोती द्वारा दीक्षित दादा या बाबा की काव्यात्मक अभिव्यक्ति बन जाती है – यदि ऐसा कहें तो यही सच है। दादा की सिर्फ़ ज़ुबान ही है। भाव पोती का ही है। मोही आत्मा है और दद्दू देह! दोनो का यह अनूठा रिश्ता ‘आख्यायेय’ है, ‘अनुपम’ है और अलौकिक है। मासूम मोही की ‘स्फटिक खिलखिलाहट’ ही अनुभवों की थाती सम्भाले दद्दू की शब्दाँजलि में गूँज रही है। इन ‘रिश्तों की धड़कन’ में समय समा गया है और जड़वत स्थिर-स्थूल-सा हो गया है। ‘ मोही की फ़रमाईश’ और ‘दद्दू की अजमाईश’ यही इन कविताओं के स्वाभाविक शिल्प के ताने-बाने हैं जो अद्भुत मिठास और सौंदर्य से परिपूर्ण हैं और बड़े मोहक हैं। मन का गीत निखर आया है। यह ‘मात्र कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि जीवन्त रिश्ते की धड़कन है, उसका संगीत है’। संग्रह की सज्जा तथा उसका आवरण भी कवि के स्नेहिल हाथों ही संपन्न हुआ है, जो अत्यंत अभिराम और मनोहर है।
मोही के नाम दद्दू की चिट्ठी भी दिल की दास्ताँ है। यह हर युग के सबसे बड़े सच की प्रतिध्वनि है – ‘मैं नित्य तुम्हें अपने समय से आगे चलता हुआ देख रहा हूँ … आनन्दित भी होता हूँ तुम्हारी प्रगति से … पर कभी आशंकित भी होता हूँ कि तुम्हारी ये तेज़ी कहीं तुम्हारी सम्वेदना का हरण न कर ले’!
किशोर जी के अट्ठाईस बाल गीतों का यह संग्रह सम्वेदना के इसी बीज तत्व को शिशु मन में अँखुआने, उगाने और अगोरने का अनोखा यज्ञ है –
‘हर शब्द में जैसे नयी कहानी,
हर पंक्ति में रंग।
मोही के संग पढ़ते दद्दू,
होकर उसके संग।
