Thursday, 30 March 2017

चैता की तान

पवन शरारत उधम करता/
अमराई की छाहों में//
धरती सरमाती सुस्ताती/
चुलबुल चैत की बाहों में//

शीत तमस ने किया पलायन/
सूरज ने ऊष्मा घोली//
कोकिल कुंजित चित चितवन में/
हारिल की हरी डाली डोली//

रेतों की चादर को ओढ़े/
अलसाई मुरझाई दरिया//
सरसों के पीले फूलों को/
सूंघती उंघती धुप दुपहरिया//

दिन तिल तिल कर पांव पसारे/
शरमाई सकुचाई रातें//
नयी नवेली दुल्हनिया की/
रही अधूरी प्यार की बातें// 

गिलहरियों की कानाफुसी/
मंजरी महके बाग़ बगान//
पंचम में आलाप गुंजरित/
स्वर लहरी चैता की तान//