Monday, 16 March 2026

जहाँ ना संशय, ना कोई डर!

 



हो किरणों पर न कोई पहरा,
चिड़ियों की चहक चिरंतन हो।
तर तुषार तृण फुनगी फुदके,
चेतन का स्वर- स्पंदन हो।

तरु  हरित पत्र गोल-गोल,
झूमें गायें डोल-डोल।
टहनी से डंठल लिपट-लिपट,
खुसुर-फुसूर फिर बोल-बोल।

कौओं की पंचायत से,
फदगुदियाँ ले रहीं होड़।
अपना हुक़ूक़ हैं जता रहीं,
गिलहरियाँ माटी कोड़-कोड़।

सन्नाटे का सुर सरोवर,
शकल दिल-सी रंगी नील।
जलतरंग में छाया नर्तन,
गोद गिरि गदरायी झील।

सभी स्वच्छंद हैं, सभी मुक्त हैं,
कण-कण चिन्मय अजर अमर।
हे पवन प्राण, सुन, ठहर यहीं,
जहाँ ना संशय, ना कोई  डर!



 



 

7 comments:

  1. अति मनमोहक, सारगर्भित, बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।
    प्रणाम
    सादर।
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    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १७ मार्च २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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    1. जी, हार्दिक आभार।

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  2. सुंदर सृजन, प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य का अभिनव वर्णन

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  3. जी, हार्दिक आभार।

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  4. बहुत सुंदर, मनमोहक कविता है यह आपकी विश्वमोहन जी

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