Friday, 14 August 2026

गिरमिटिया



स्वतन्त्रता दिवस की इस सुनहली सुबह के पीछे ग़ुलाम भारत की अनगिन स्याह शामें हमारे अतीत की अतातायी यादों के साथ हमारे ज़ेहन में उतरती हैं। हम अपने उन पूर्वजों का स्मरण करते हैं जिनसे ग़ुलामी ने उनका वतन तक छीन  लिया। फिर भी, अपनी मिट्टी की सुगन्ध को अपने साथ लेकर गए और इसके संस्कार, इसकी भाषा, इसकी  चाल और इसके चरित्र को न केवल बचाए रखा बल्कि अपने पसीने से सींचकर इसे एक विशाल वटवृक्ष का आकार दिया। १९वीं शताब्दी में परतन्त्र भारत के ग़रीबों की कहानी लाचारी, सामन्ती शोषण, अमानुषिक दमन और एक लूटे तक़दीर की दास्तान  है।  औद्योगिक क्रान्ति  ने देश के परंपरागत कुटीर और घरेलू उद्योगों की रीढ़ तोड़ दी। सामन्ती  मानसिकता और जमीन्दारी  शोषण एवं दमन की ज्वाला में  गरीब धू-धू कर जल रहे थे। बड़ी जातियों का छोटी जातियों पर अत्याचार अपने चरम पर था। धार्मिक आडम्बर, पोंगापन्थी, अशिक्षा, सामाजिक  कुरीतियाँ और जातिगत भेद से समूचा भारतीय समाज बीमार था। ऊपर से ग़ुलामी और ब्रितानी साम्राज्य का भयंकर क़हर। बड़ी-बड़ी विदेशी कम्पनियाँ अपने गन्ने, रबर और चाय के बाग़ानों में अफ़्रीका से ग़ुलामों को लाकर मज़दूर रखती थीं। लेकिन १८०७ में ग़ुलामी प्रथा हटने के बाद कमोबेश १८३४ तक सारे ग़ुलाम छोड़ दिए गए थे। अब इन बाग़ानों को मज़दूर की ज़रूरत थी। भारत इन कम्पनियों के लिए मज़दूर बटोरने का सबसे अच्छा देश साबित हुआ। सामन्ती अत्याचार से पीड़ित ग़रीब और बेरोज़गार जनता का मन इस त्रासक  माहौल से पलायन करने को कुलबुलाते रहता। उधर १८५७ के सिपाही विद्रोह के बाद ढेर सारे भारतीय फ़ौजी बेरोज़गार हो गए थे। समाज के अन्दर  ऊँची जाति की विधवाओं की स्थिति भी बहुत दयनीय थी। इस माहौल का फ़ायदा इन कम्पनियों ने अपने एजेंट के माध्यम से भरपूर उठाया। कम्पनियों ने पहले इसे क़ानूनी जामा पहनाने के उद्देश्य से अग्रीमेंट (क़रार) पत्र तैयार करवाए, जिस पर मज़दूरों का अँगूठा लिया जाता। मज़दूरों को तरह-तरह के झूठे प्रलोभन देकर अपने छल-जाल में फँसाने के लिए एजेंटों  का एक जाल-सा था। कहीं ज़ोर-ज़बरदस्ती से भी काम लिया जाता। भला इस ग़ुलाम देश में इन बेबसों को सुनने वाला कौन था? ये एजेंट ‘अरकाटी’ कहलाते थे। मैथिली शरण गुप्त जी ने इस कुटिल ‘अरकाटी’ के प्रपंचों का बड़ा सजीव वर्णन किया है : 

“अधम अरकाटी कहता था फ़ीजी स्वर्ग है भू पर,

नभ के नीचे रहकर भी वह पहुँच गया है ऊपर।

मैं  कहता हूँ, फ़ीजी स्वर्ग है, तो नरक कहाँ है?

नरक कहीं है, किंतु नरक से बढ़कर दशा यहाँ है”।

‘अग्रीमेंट’ शब्द ‘गिरमेंट’ होता हुआ अपने देहाती रूप ‘गिरमिट’  में बदल गया और उस पर अँगूठा लगाकर अपने तक़दीर को नीलाम कर देने वाले ये बेबस ग़रीब अनपढ़ मज़दूर ‘गिरमिटिया’ बन गए। इन्हें जानवरों की तरह  जहाज़ में ठूँसकर  फ़ीजी, मारीच (मौरिशस), रियूनियन द्वीप, सेशेल्स, गुयाना, त्रिनिदाद और टोबैको, जमैका, सूरीनाम (श्री राम) आदि द्वीपों पर गिराया जाने लगा। 

“पाल के जहज़िया में रोई-धोई बईठी हो,

कैसी हो काला पानी पार रे बिदेसिया”।

जहाज़ पर जात-पात का टूटना  लाचारी होती। ऐसे अरकाटी भी नीची जातियों के लोगों को ही फाँसते। फिर भी अपने व्यक्तिगत मजबूरियों से परेशान ऊँची जाति  के लोग भी इस जाल में फँस जाते।  पुरुषों में नीची जाति के लोगों का बाहुल्य होता जबकि महिलाएँ अधिकतर ऊँची जाति की होतीं। सवर्णों को खाना बनाने का काम दे दिया जाता। किंतु, बीमार लोगों के मुँह में एक ही थर्मामीटर घुसाया जाता, चाहे वे किसी भी जाति के हों।  जातिगत दुराग्रह की अतिशयता से पीड़ित कई लोगों को यह छूत असह्य हो जाता। एक जहाज़ पर से तो कुछ क्षत्रियों ने इस बात पर समुद्र में कूदकर आत्महत्या कर ली कि वे दलितों से छूआ गए थे। कुछ अरकाटी तो जहाज़ पर चढ़ने से पहले ब्राह्मणों से जनेऊ तुड़वा लेते थे। ऐसे भी, अरकाटी कोमल हाथ वाले सवर्णों को लेने से परहेज़ करते क्योंकि उन्हें कठोर हथेली वाले श्रमिक अवर्णो की ज़रूरत  ज़्यादा थी। फिर भी पढ़ाने-लिखाने या अन्य ग़ैर श्रमिक कार्यों में सवर्ण कहीं-कहीं लग जाते। लेकिन आवश्यक रूप से उन्हें कूली का ही काम करना होता।

इन्हें ‘कूली’ कहा जाता। ‘कूली’ एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ होता है, ‘पैसे के लिए काम करना’। द्वीपों पर उतारने के बाद इन्हें ‘कूली-लाइंस’ (कूलियों की बस्ती) भेज दिया जाता। प्रवीण कुमार झा ने अपनी पुस्तक ‘कूली-लाइंस’ में बड़े विस्तार से  गिरमिटियों के इस अश्रु-सिक्त इतिहास का वर्णन किया है। यहाँ कूलियों के लिए बैरक बने थे जिसमें दस फ़ीट गुणा सात फ़ीट के कमरे में अमूमन चार कूली कोंच दिए जाते अपनी आगे की ज़िंदगी बसर करने के लिए। यह इलाक़ा काफ़ी गन्दा इलाक़ा होता। गन्दी बजबजाती नालियों की दुर्गन्ध पूरे वातावरण में तैरती रहती।  पीने को पानी की क़िल्लत और उसके लिए भी छीना-छिनी, लड़ाई और झकझक। नहाने की तो बात ही दूर रही। बीमारियों का साम्राज्य! 

“काली कोठरिया में बीते नहीं रतिया हो,

किस के बतायी हम पीर रे बिदेसिया।

दिन-रात बीती हमरी दुःख में उमरिया हो,

सूखा सब नैन के नीर रे बिदेसिया।“

दिनभर काम करते मज़दूरों के हाथ-पैर छालों से भर जाते। ऊपर से कोड़ों की पिटायी। बड़ा कठोर दण्ड-विधान था। काम में थोड़ी भी कोताही करने पर चाबूकों की मार पड़ती। कई मर जाते। महिलाओं को पेड़ से बाँधकर उनके बच्चों के सामने नंगा किया जाता। महिलाओं को अपने छोटे बच्चे को खेत पर ले जाने की मनाही थी। एक बार एक माँ अपने बीमार शिशु को लेकर गयी। उस पर जम के कोड़े बरसे। अपने शिशु को अपनी गोद में चिपकाए उसकी चीत्कार आकाश में गूँजती रही। बेरहम मालिक ऊपर शिकायत होने पर भी गवाह के बग़ैर अपने रोबो-रुआब से बच जाते। महिलाओं की आबरू भी सुरक्षित नहीं थी। कई महिलाओं और उनके पतियों ने आत्महत्या कर ली।  गाँधी जी के मित्र एण्ड्रयुस ने लिखा, ‘हिंदुस्तानी ग़रीबी और यातना झेल सकते हैं। पर किसी महिला की इज़्ज़त से खिलवाड़ कभी नहीं झेल सकते’।

 सात वर्ष से ऊपर का जो बच्चा गिरमिटिया के साथ आता, वह बिना किसी अग्रीमेंट के बारह साल का होते ही अपने आप गिरमिटिया बन जाता और पाँच साल की बँधुआ मज़दूरी करने के बाद ही इस ग़ुलामी से मुक्त हो पाता। प्रवीण झा के आँकड़ों के मुताबिक़ १९०६ में फ़ीजी द्वीप में ६२ प्रतिशत बच्चे मौत के मुँह में समा गए थे। फिर भी इन बेरहम मालिकों के भीषण अत्याचार का नंगा नृत्य होते रहा और लाचार गिरमिटिया अपने ख़ून-पसीने से उन बाग़ानों को सींचते रहे।

“ख़ून-पसीने से सींचे हम बगिया,

बैठे-बैठे हुकुम चलाए रे बिदेसिया”।

एक तो ग़रीबी और अत्याचार की मार। दूसरी परतंत्रता का अभिशाप। ऊपर से अपनी माटी से विरह की व्यथा! ये सारी प्रतिकूलताएँ उन्हें अन्दर  से खाए जा रही थी। फिर भी इन गिरमिटियों ने अपनी माटी की महक को नहीं बिसारा। भारत के ये लाल अपनी जिजीविषा के साथ रामचरितमानस का गुटका और गीता का कर्मयोग भी लेकर गए थे।  शाम को अपनी ‘बैठकी’ में अपना रामायण बाँचते, कीर्त्तन गाते और अपनी ‘बिदेसिया’ के करुण गीतों में अपनी दिन भर की पीड़ा घोल देते।  उनकी यह सांकृतिक शाम अपनी जड़ों से शक्ति सहेजती और जीवन के कुरुक्षेत्र में अपने कलैव्य की तिलांजलि देकर नए जोश से जीवन का सूत्र तलाशने  में जुट जाती।  धीरे-धीरे गिरमिटियों की इस एकजुटता में संघर्ष के स्वर फूटने लगे।  वे संगठित होने लगे और विद्रोह का बिगुल बजने लगा।  एक पीड़िता ‘कुन्ती’ की लिखी चिट्ठी उनके संघर्ष के इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बनी और उनके संघर्ष की धमक द्वीप के पार भी सुनायी देने लगी। भारत में गोपाल कृष्ण  गोखले ने ब्रितानी साम्राज्य को इत्तिला दी। उधर फ़ीजी द्वीप के तोताराम सानिद्धय ने गाँधी जी को पत्र लिखा। गाँधी जी ने बैरिस्टर मणिलाल मगनलाल डॉक्टर को फ़ीजी भेजा। बाद में बदरी महाराज नामक गिरमिटिया को लेजिस्लेटिव काउन्सिल में जगह मिली। चार्ल्स एण्ड्रयुज भी फ़ीजी गए। बँधुआ मज़दूरी को ख़त्म करने में उनका संघर्ष उल्लेखनीय रहा। वे दीनबन्धु कहलाए। अन्तत: अपने कठिन संघर्ष और बलिदानों के बाद भारत माता के इन गिरमिटिया सपूतों ने १ जनवरी १९२० को अपनी आज़ादी पा ली। चतुर्दिक उत्सव का माहौल था। अब मज़दूरी बढ़ाने के लिए मणिलाल डॉक्टर की पत्नी की अगुयायी में हड़ताल हुयी। १३ फ़रवरी १९२० को हड़तालियों के पुलिस से संघर्ष में ‘फ़ीजी का जालियाँवाला बाग़’  हुआ। १५ अप्रिल १९२० को मणिलाल को देशद्रोह के आरोप में फ़ीजी द्वीप छोड़ना पड़ा। तब से आज तक फ़ीजी की फ़िज़ा में बहुरंगी बयार बह चुकी है।  

आज भिन्न-भिन्न द्वीपों पर  इन गिरमिटियों की चौथी-पाँचवीं पीढ़ी अपना परचम फहरा रही है। अपने  ख़ून-पसीने और अदम्य संघर्ष के बूते आज ये उत्कर्ष के शिखर पर हैं। कई द्वीपों की सियासत इनके क़ब्ज़े में आ चुकी है। भारतीयता, भोजपुरीपन और भोज-भात इन द्वीपों की जीवन-शैली बन गयी है। आकाश में बधाई, सोहर और छठियार के गीत गूँज रहे हैं। आज की पीढ़ियाँ भले ही  अपने ‘गिरमिटिया’ शब्द को  भूल रही हों, इतिहास उन्हें कभी विस्मृत नहीं करेगा। हम बार-बार इस बात को दुहराते हैं कि वे पीढ़ियाँ आभागी होती हैं, जिनका कोई इतिहास नहीं होता। किंतु, उससे भी अधिक आभागी वह पीढ़ी होती है जिनका इतिहास तो होता है लेकिन अपने इतिहास को वह भूल जाती है। दुनिया की तवारीख में गिरमिटियों की दास्तान हमेशा जीवित रहेगी और आनेवाली पीढ़ियाँ उनसे प्रेरणा की ऊर्जा ग्रहण करेंगी। वतन की अपनी लड़ाई उन्होंने परदेस में लड़ी और अपने वतन की रूह के लिए जीत दर्ज की:

“शहीदों के मज़ारों पर लगेंगे हर बरस मेले,

वतन पर मरने वालों का बाक़ी यही निशाँ होगा”।


 भारत के  स्वतन्त्रता-उत्सव की इस उषा-वेला में हम अपने उन गिरमिटिया पूर्वजों के अप्रतिम उत्सर्ग को अपने नम नयनों से श्र्स्द्धांजलि अर्पित करते हैं। सात समुन्दर पार भी अपनी बदहाली में वे भारत माता के अरुण केतन को थामे रहे। अपनी आज़ादी की लड़ाई बिदेसी ज़मीन पर जीती और उस धरती को अपने आर्यावर्त के संस्कार में रंग दिया।


“ख़ून-पसीना, मानस, गीता, 

जय धोती, लोटा, खटिया।

भारत माँ के वीर सपूत वे,

जय बोलो, जय गिरमिटिया”।


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