अनवरत यात्रा है,
यह जिंदगी हर पल।
नई आदतों के बनने और
पुरानी आदतों के ढहने की ।
जमती जाती हैं हर,
परवर्ती परत-दर-परत।
कोटि बनकर,
समय की भुज पर।
फैलती - सिकुड़ती,
जीवन के आकाश में।
बन जाता है मन,
कभी-कभी पुरातत्वविद।
और मनन, तकनीक!
खोदने - शोधने की।
तलाशने की आयु,
उन परतों की।
इस कार्बन-डेटिंग में,
कभी-कभी तो !
छोड़ जाता है मन,
इस स्थूल काया को भी।
और सहेज लेता है जीवाश्म,
अपनी पुरानी आदतों के।
गाहे-बेगाहे उघेड़कर,
समय के छिलके को।
परतों की बुनियाद में,
जमती जाती आदतों की।
सीरत है इन आदतों की,
हमें भी बदल देना, पर!
एक चीज नहीं बदलती,
हमारी फितरत!

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