Sunday, 13 September 2026

छन्द जिज्ञासा के



आदरणीय जिज्ञासा जी की तीन पुस्तकें मिलीं। नक्षत्रों ने दीप जलाए (कविता संग्रह), माटी तेरा मोह न छूटा ( गीत संग्रह) और फूलों वाली मेरी पुस्तक (बाल गीत संग्रह)। तीनों पुस्तक अपने आप में अनूठी हैं। उन्हें हार्दिक बधाई। इन पुस्तकों की अर्गला खोलने का एक छोटा प्रयास। 

नक्षत्रों ने दीप जलाए
(कविता संग्रह)
(प्रकाशक – भारतीय साहित्य संग्रह, १०९/१०८, नेहरू नगर, कानपुर) 

संग्रह का श्री गणेश ‘सरस्वती वन्दना’ से होता है। ज़िन्दगी की धूप-छाँह से लुका-छिपी खेलती कवयित्री जिज्ञासा की भाव-यात्रा का अवलोकन करता पाठक स्वयं अपने अन्दर  जीवन दर्शन की जिज्ञासा भर लेता है। कहीं निराशा का तिमिर छा जाता है। इसे पोंछ कर जिज्ञासा आशा की अमृत बूँदों को छींटती है। कभी कोई अपना अचानक बिछूड़कर विरह के प्रभूत ताप में जलने को छोड़ जाता है। कविताएँ जीवन में कुछ खो जाने से उत्पन्न विछोह को पछाड़ती हुई कुछ पाने की उत्कण्ठा और उत्साह का वाचन करती हैं। मन को चेतना के आलोक से ज्योतित करने की कामना से परिपूर्ण जिज्ञासा अपने संघर्ष पथ पर एक सकारात्मक सन्धान का आह्वान करती हैं। जीवन का हर दिन कवयित्री के लिए एक नवीन संघर्ष की कहानी है जहाँ – ‘मुझमें जीती मेरी सरिता/ ढूँढ रही अपना निष्कर्ष’। सुख दुःख की आँखमिचौनि में सब कुछ उलझा-उलझा- सा लगता है – ‘ताना- बाना सब उलझा है/आज सबेरा बुझा – बुझा है’। तथापि, कवयित्री का मन अपने आन्तरिक उमंग, उत्साह और ऊर्जा से अपनी जिजीविषा को सहेजता है और अभिलाषाओं के अन्तरिक्ष में अपनी उड़ान की अभिप्सा का गीत गाता है – ‘बाज़ जैसे पंख होते काश/ चूमती नभ पार का आकाश’। जीवन की नश्वरता से कवयित्री अपने जीवन का गीत गुनती हैं।  आना-जाना तो नियम है। सृष्टि के उपवन में संहार भी झूलता है, - ‘सृष्टि का संहार निश्चित/है नहीं संदेह किंचित’। इस सत्य का भान भी मनुज जीवन से सांसारिकता की भाव-छाया को हटा नहीं पाता। लोभ, मोह, अमर्ष, मत्सरता, सुख, दुःख आदि के  भाव-अंकुश में आबद्ध मनुष्य जीवन के मूल लक्ष्यों से भटक गया है। प्रकृति से उसका सन्तुलन भंग हो गया है। इस असन्तुलन  का आघात पर्यावरण की विरूपता में व्यक्त हो रहा है। पृथ्वी त्राहि-त्राहि कर रही है – ‘धारिणी छल छल जरी है/ उर्वरा मुँह बल पड़ी है// कोख में शस्या मरी है/शोक का प्रालाप मत लो’। धरती की यह तड़प उस पौराणिक आख्यान का पुनर्पाठ-सा है जब पापों के बोझ से दबी-दुबकी धरती गाय का वेश बनाकर त्राहिमाम पुकारती ईश्वर के समक्ष उपस्थित होती है। आकाश चतुर्दिक प्रदूषित है। मानव जीवन की इस विद्रूपता पर जिज्ञासा का आर्त्तनाद मन को छूता है – ‘वो मेरा आकाश लेकर उड़ गया है/ और मैं हतप्रभ खड़ी हूँ’। मानों किसी अपने ने ही कवयित्री  के मन में बेवफ़ाई का ख़ंजर घोंप दिया हो!   इसकी वेदना की सघनता ने उसे संज्ञाशून्य कर दिया है। अभिव्यक्ति के शब्दों को उसकी छटपटाहट ने छीन  लिया है। आँसुओं की धार सुख गयी है। जीवन का हर पल मरुस्थल सा तप्त है –‘सूखे रेतीले मरुस्थल में/बीत रहे हर बीते पल में/डूब रही हूँ’। नैराश्य के इस दुर्निवार प्रहर में कवयित्री का मन अजीब ऊहापोह में है – ‘ना जागती है, ना सोती है/ना हँसती है, ना रोती है/ भावों की शैया पर लेटी/ फ़सल फ़ासलों की बोती है’। इन  समस्त प्रतिकूलताओं के पलते पल में भी जिज्ञासा अपने विकल भाव से मुक्ति पाने को सतत प्रयत्नशील है। उनके विरह आकुल मन ने आशा का सम्बल नहीं छोड़ा है। उनकी अभिलाषाएँ अँगड़ाइयाँ ले रही हैं। निराशा के नीरव तिमिर में उन्हें जीवन का नवगीत सुनाई दे रहा है। इस आस-निराश के भ्रम से उबरने का कवयित्री का संघर्ष सतत है और यथार्थ है –‘घूँघरुओं की चाप मुझ तक आ रही है/या घटा पायल पहनकर फिर मुझे भरमा रही है’। कवयित्री के मन से अब अवसाद के बादल छँट चुके हैं –‘नक्षत्रों ने दीप जलाए/उतर मेरे नैनों में आए’। अब विरहिनी प्रेमिका ने अपने प्रियतम को पाने की ठान ली है –‘सखी, सुन लो प्रीतम के घर मुझको जाना है’। अब उसने अपने अन्तर्मन की चेतना के आलोक में अपने आत्मविश्वास को सहेज लिया है – ‘एक सृष्टि मैं बनाऊँगी/नए परमाणु की/निर्माण का हर यत्न करके/ओ मनुज तुम देखते जाना’।
कवयित्री की भावनाएँ  अत्यन्त  आत्म बोधात्मक शैली और मानवीयकरण अलंकार में जीवन के उत्थान-पतन, घात-प्रतिघात, मिलन-विरह, प्यार-दुत्कार, निशा-दिवा और  सृष्टि-संहार से उपजी ऊहापोह और उस ऊहापोह से उबरने की उत्कण्ठा है।  यह कविता संग्रह  मानव हृदय के इसी ऊहापोह से निकले जिज्ञासा की शब्द वीणा पर आकुल उत्कण्ठा के अनूठे रागों वाला मधुर गीत है।

माटी तेरा मोह न छूटा
(गीत -संग्रह) 
(प्रकाशक – वनिका पब्लिकेशंस, एन ए १६८, गली नम्बर ६, विष्णु गार्डन, नयी दिल्ली – ११००१८)

जिज्ञासा के गीतों के स्वर, सुर, ताल, लय और व्यंजन का प्रसव उनकी भावनाओं की कुक्षी से होता है। ये भाव सीधे उनकी हिया के गह्वर से प्रस्फुटित होते हैं। फिर, मन की रागिनी बनकर उनके होठों पर मन्द-मन्द सिहुरने लगते हैं। यही सिहरन शब्द बनकर इस गीत संग्रह में मचल उठा है। घटा से उतरते मेह मन को मुदित करते हैं। यह मोद कवयित्री के कण्ठ का मल्हार बनकर इस संग्रह में बरसा है। वर्णांजलि अनुप्रास की छटा बनकर बहने लगी है – ‘घनन-घनन घनघोर घटा घन, घूम घूम घन घन घन, छमक छमक छम छम्मक छम्मक, छनन छनन छन छन छन, झूम झूम झंकार झनक झन, झमक झमक  झम झमझम, चमक चमक चमकार चमक चम, चपला चमचम चमचम, बूँद-बूँद बरसें बूँदें, बड़बोली बहे बयार, मुदित मन मोहित में मल्हार’। उनकी चितवन में कभी माटी का मोह उभर आता है, ‘माटी तेरा मोह न छूटा’, तो कभी अभिसार के अनन्त पथ पर अपनी आँखें बिछायी कवयित्री का कुसुमाकर मन अपने प्रियतम संग मौन संवाद करने लगता है, ‘मैं गीत प्रेम के लिख बैठी, मनमीत मुसाफ़िर पढ़ लेना’।  कवयित्री के प्रीत की तान में अर्पण की एकनिष्ठा है। उसमें स्थिरता है। उसमें समर्पण का योग है। उसकी प्रेम-चुनर में नेह के सितारे टँके हैं। यही उसका शाश्वत श्रिंगार है – ‘प्रीति का परिधान सुन्दर, आज पहनो कल उतारो, न चलेगा, यह कोई खेला नहीं, जो जीत लेगा’।
कवयित्री के गीतों का सरोकार प्रकृति और पर्यावरण से भी उतना ही गहरा है, - ‘कंकरीटों के वनों की छाँव त्यागो, धुएँ की बहती नदी से दूर भागो/ लगी जो आग पानी में, जलाएगी धरा कण-कण/ कि छालें ही पड़ेंगे, गड़ेंगे शूल’। समाज  का समसामयिक सच अपने प्रखर स्वर में जिज्ञासा के गीतों में गूँजा है। लिंगभेद और बेटी भ्रूण हत्या से उनका मन आहत है। तज्जन्य करुणा इनके लबों पर सहसा छलक उठती है, ‘प्रसव की पीड़ा तिरस्कृत, हो जहाँ पर जन्म लेते/ लिंग निस्तारण प्रभेदी, भ्रूण परिचय मर्म सेते/ संविदा की नवल धरती, क्या दुहेगी क्या दुहेगी, गूँज की उस माप करना/ भूमि का उस त्याग करना’। कवयित्री जिज्ञासा का अन्तर्मन सृजन के संस्कार से सिंचित है।  उनका कल्पना-बिम्ब रचनात्मक है। उनकी रचनाओं से सकारात्मकता का सोता बहता है। जीवन की वाटिका में कोयल की आशा भारी कूक उनके गीतों में सुर भरती हैं। उनकी मधुर तान से फूलवारी का हर फूल पुलकित होता है – ‘टहनियाँ फूल से भरने लगी हैं,  … कमल-शतदल किया रोपित, हर तरफ़ कलियाँ खिली, हँसने लगी हैं’।
इक्यासी गीतों के इस संग्रह का हर गीत जीवन उपवन के डाल-डाल पर खिलखिलाते खग-वृन्द का वह मधुर कलरव है जिसमें हर कली का रंग है, हर फूल की सुगन्ध है, हर पत्ते की थिरकन है, हर मिलिन्द का मकरन्द है, हर तितली के सोहर का छन्द है, मन्द पवन की मदमस्त लहर का वेग है, झूमती वनस्पतियों की बहार है और प्रकृति-वनिता के अंग-प्रत्यंग के श्रिंगार का विलास है। यह सरस संग्रह पठनीय तो है ही, संग्रहणीय भी है।

फूलों वाली मेरी पुस्तक 
(बाल-कविता संग्रह)
(प्रकाशक – वनिका पब्लिकेशंस)
‘मातु शारदे मन में बसना, ज्ञान ध्यान तप देने वाली, मुझे सिखा दो पढ़ना लिखना’, इस बाल सुलभ शारदे वन्दना से श्री गणेश होनेवाली पैंतीस बाल कविताओं की सुवासित माला ‘फूलों वाली मेरी पुस्तक’ अत्यन्त मन भावन है। यह कवयित्री जिज्ञासा सिंह के सरल और निश्छल मनोभावों की मधुर और मोहक अभिव्यक्ति है। आज के युग में नयी पीढ़ी की पढ़ने-लिखने की प्रवृति से छत्तीस का आँकड़ा बनता नज़र आ रहा है। ऐसे समय में बच्चों के लिए सरस कविताएँ लिखकर उन्हें किताबों की ओर आकर्षित करना एक स्तुत्य प्रयास है। कविताओं का मिज़ाज भी पूरी तरह बाल मनोविज्ञान के अनुरूप है। क़लन्दर, बन्दर, चौकलेट, टौफ़ी, जैसे शब्दों का प्रयोग बच्चों की चुहलबाज़ी और चटुल कल्पना शक्ति को बड़ी सजीवता से उकेरती है। बाल मन में उठने वाली हाथी की आकृति की बानगी देखिए – ‘हाथी तेरे कान बड़े/मुझे देखते खड़े खड़े/ … हाथी तेरी नन्ही पूँछ/ लगी हुई है उसमें मूँछ’। आम का रसीला वर्णन बरबस बाल मन को मोहता है –‘फल का राजा घनी छाँव देने वाल/सो जाता पल भर में राही मतवाला’। सरल एवं सुबोध शब्दावली में ऐसी बाल कविताएँ बच्चों के कोमल मन में पर्यावरण के प्रति प्रेम के संस्कार का बीजारोपण भी करती हैं। ‘समुन्दर’, ‘मम्मी की साड़ी’, ‘बादल भैया’, तितली जैसी फ़्रॉक’, किसने फाड़ी मेरी पुस्तक’, होली का त्योहार’, ‘रेल आ गयी’, ‘प्यारा सा ख़रगोश’, ‘मछली के संसार में’, ‘मोटा तगड़ा भालू’, ‘चौराहे की लाइट’ आदि कविताएँ अपनी अद्भुत मनभावन शैली और मनोहारी शब्द-व्यंजना में बालकों को न केवल कविताओं की ओर खिंचती है, प्रत्युत उनके ज्ञान के वितान और उनकी जिज्ञासा को एक व्यापक विस्तार भी देती है। कवयित्री की यह ‘फूलों वाली मेरी पुस्तक’ सामयिक अपेक्षाओं पर सौ फ़ीसदी खरी उतरती है। जिज्ञासा ने बड़ी कुशलता से इस बाल कविता स्तवक के माध्यम से यह प्रमाणित कर दिया है कि ‘जीवन में उतार-चढ़ाव, दुःख-सुख आते रहेंगे लेकिन बचपन नहीं मरना चाहिए’। यह पुस्तक बाल साहित्य की सशक्त रचनाकार उनकी बहन स्वर्गीय अर्चना सिंह के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि भी है। 
 


5 comments:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 16 सितंबर 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. बहुत ही सार गर्भित समीक्षा की है आपने तीनों पुस्तकों की, बहुत बहुत बधाई

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