Tuesday, 18 August 2026

फ़ितरत

 



अनवरत यात्रा है,

यह जिंदगी हर पल।

नई आदतों के बनने और

पुरानी आदतों के ढहने की ।

जमती जाती हैं हर,

परवर्ती परत-दर-परत।

कोटि बनकर,

समय की भुज पर।

फैलती - सिकुड़ती,

जीवन के आकाश में।


बन जाता है मन,

कभी-कभी पुरातत्वविद।

और  मनन, तकनीक! 

खोदने - शोधने की।

तलाशने की आयु,

उन परतों की।

इस कार्बन-डेटिंग में,

कभी-कभी तो !

छोड़ जाता है मन,

इस स्थूल काया को भी।


और सहेज लेता है जीवाश्म,

अपनी पुरानी आदतों के। 

गाहे-बेगाहे उघेड़कर,

समय के छिलके को।

परतों की बुनियाद में,

जमती जाती आदतों की।

सीरत है इन आदतों की,

हमें भी बदल देना, पर!

एक चीज नहीं बदलती,

हमारी फितरत!



6 comments:

  1. हा हा फितरत को भारतीय राष्ट्रीय चरित्र कह दूँ तो बुरा न मानिएगा बस यूं ही पता नहीं क्यूँ ?

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    1. अब हमारी बारी है आपको 'वाह ' कहने की। सादर आभार।

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 19 अगस्त 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 19 अगस्त 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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