हवा की बरजोरी,
शाखा का सिहरना।
टहनी की गलबाँही,
पलक मिलमिलाना।
पत्ते की छुअन,
बहारों का छाना।
दिल का फ़साना,
या कोई अफ़साना!
हवा, शाखा, टहनी,
पत्ता-पत्ता हम- तुम,
ये उल्फ़त का मंजर,
हुए हम तुम गुम- सुम।
साँसों की शोर,
मन सराबोर।
हिया की हुक हुक,
पिरितिया की डोर।
कासे कहूँ, जो
आया न हमें कहना।
भावों की भँवरी,
बस, यूँ ही थामे रहना।

ReplyDeleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 30 सितंबर 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जी, हार्दिक आभार।
Deleteअनुपम चित्र और शाश्वत प्रेम का अहसास दिलाते शब्द
ReplyDeleteजी, हार्दिक आभार।
Deleteअनुपम !! अति सुन्दर सृजन ।
ReplyDeleteजी, आभार।
ReplyDeleteवाह
ReplyDeleteजी, आभार।
Deleteसुन्दर सृजन
ReplyDeleteजी, आभार।
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