Saturday, 25 January 2014

साथी

मेरे अकेलेपन मे साथी
तुम आकर दस्तक देना.
दूर कहीं एकांत नभ में
मुझे भी सैर करा देना.

निस्सीम व्योम के अंचल में
सूनापन मन का फैलाना.
मेरे अकेलेपन  में साथी
तुम आकर दश्तक देना.




जीवन ने कौतुक कैसा खेला
मेरा निज शाश्वत अकेला.
जीवन की शुष्क तरंगो से
हलाहल मन का हर लेना.
मेरे अकेलेपन में साथी
तुम आकर दश्तक देना.


जीव  जगत  जब  मिलते हैं
नित नित नव रीत ये रचते हैं.
मेरी जड़ प्रकृति में साथी
अपने पुरुष का चेतन भर देना.
मेरे अकेलेपन में साथी
तुम आकर दश्तक देना.

आदि जनम है अंत मरण है
शैशव यौवन का मधुर मिलन है.
वृद्धावस्था की तड़पन है
काल चक्र का यहीं घुर्णन है.

माया के इस महाजाल से
साथी हमे सुलझा लेना.
मेरे अकेलेपन में साथी
तुम आकर दश्तक देना.



                                                                                    
तु अनादि है, तु अनंत है
मेरा मैं तेरा ही अंश है.
मेरे निज को हरकर हमदम
मुझको पूरा कर देना.
 मेरे अकेलेपन में साथी
तुम आकर दश्तक देना.

------ विश्वमोहन